08 जुलाई, 2018

बुंदेलखंड की डायरी 
हाथ मिल गए साथ चले पर दिल मिलना बाकी 
रवीन्द्र व्यास 
कांग्रेस की समन्वय यात्रा  ओरछा से शुरू होकर पन्ना में समाप्त  गई | प्रथम चरण  के इस  अभियान में बुंदेलखंड के  टीकमगढ़ ,छतरपुर और पन्ना जिले के कांग्रेसी नेताओ कार्यकर्ताओं के हाथ मिलवाकर दिग्विजय ने हाथ का साथ देने की बात कही । पंगत की संगत मे भी हाथ के साथ रहने की सौगंध दिलवाई।  बुन्देलखंड  और मध्यप्रदेश के संदर्भ मे यदि देखा जाए तो कांग्रेस को कांग्रेसी ही हराते और  जिताते है । दुशमन का दुशमन दोस्त की युक्ति पर ये लोग कांग्रेस का हाथ ही काट देते थे, । ये बात 14 साल के वनवास के बाद  अब कांग्रेस को समझ मे आई है शायद  इसीलिए चुनाव  अभियान से पहले कांग्रेस ने घर जोड़ो अभियान शुरू किया | 
 माना जाता है कि  कोई शुभ कार्य के पहले देवताओ का आशीर्वाद लेने से काम सफल हो जाते है । इसलिए समन्वय समिति के अध्यक्ष दिग्विजय सिंह ओरछा के  रामराजा से आशीर्वाद लेने 31 मई को पहुंचे ।समिति के सदस्यों  के साथ पूजा अर्चना के बाद   दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं वा नेताओं के बीच समन्वय का अभियान शुरू किया  |  ओरछा के राम राजा मंदिर को सियासत के लोग सिद्ध स्थान मानते है, । जब  आपरेशन ब्लू स्टार की बात  आई तो स्वयं इन्दिरा गांधी यहां आशीर्वाद लेने आई थी ।     राजा राम के दरबार में 31 मई 1984 को तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने पंजाब में स्वर्ण मंदिर से आतंकवादियों से मुक्त कराने का आशीर्वाद लिया था |यह बात प्रदेश के एक रिटायर्ड  आईएएस अधिकारी अखिलेन्दु अरजरिया ने  अपनी फेसबुक वाल पर लिखी है । उन्होंने लिखा है कि यहा से जाने के बाद इन्दिरा जी ने 3 जून को स्वर्ण मंदिर को आतंकवादियों से मुक्त कराया था ।   नरेंद्र मोदी  2014 का चुनाव जीतेँ  इसके लिए उनके ख़ास समर्थकों ने यहां यज्ञ भी कराया था |  उमा भारती सहित बुंदेलखंड के टीकमगढ़ और झाँसी (यूपी) के अधिकाँश उम्मीदवार चुनावी जीत  लिए यहां रामराजा का आशीर्वाद लेने आते हैं | 
                  2018 मे  ठीक 31 मई के  दिन दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस की एकता व विजय का आशीर्वाद लेकर कांग्रेस की समन्वय यात्रा शुरू की | हालांकि कहा यह जा रहा है की कांग्रेस में समन्वय यह अभियान राहुल गांधी के इशारे पर शुरू किया गया है | समन्वय का जबाबदारी  दिग्विजय के ऊपर छोड़ी गई है , और उनके साथ समन्वय समिति में जिन जिन लोगों को रखा गया है वो कांग्रेस के अलग अलग गुटों से सम्बंधित हैं |  इसके पीछे की वजह भी बड़ी साफ़ बताई जा रही है कि मध्य प्रदेश में दिग्विजय गुट  सर्वाधिक प्रभावी है जिस पर नियंत्रण वे ही कर सकते हैं | बुंदेलखंड में कांग्रेस के हार की बड़ी वजह भी यही गुट बाजी रही , जिसके चलते पार्टी दिग्विजय और  सत्यव्रत  खेमे में बट गई | चुनाव में इन लोगों ने एक दूसरे का हाथ थामना उचित नहीं समझा , नतीजतन पार्टी को  बुंदेलखंड की मात्र 20 फीसदी सीटों से ही संतोष करना पड़ा | 
14 साल का वनवास काटने के बाद कांग्रसी दिग्गजों को यह ज्ञान मिला है कि अपना राजनैतिक अस्तित्व बचाना है तो पार्टी को फिर से जीवंत बनाना होगा || इसी के चलते दिग्विजय सिंह , सत्यव्रत चतुर्वेदी और उनकी टीम ने  बुंदेलखड का तीन दिवसीय दौरा पूर्ण किया | ओरछा से जब इसकी शुरुआत हुई तो आदत के अनुसार पार्टी कार्यकर्ता अपने अपने नेता के जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे |  इस बात को लेकर दिग्विजय  ओरछा में एक बुजुर्ग कांग्रेसी से कान पकड़कर माफ़ी भी मंगवाई थी | बाद समन्वय समिति का काफिला पृथ्वीपुर होते हुए टीकमगढ़ पहुंचा | टीकमगढ़ ,छतरपुर होते हुए यह समन्वय समिति २ जून को पन्ना पहुंची | हर जगह दिग्विजय ने रात बिताई और पार्टी के आला नेताओं से अलग अलग स्तर पर बातचीत की और समझाइस भी दी | कार्यकर्ताओं से भी मुलाक़ात कर उनकी बाते और समस्याएं सुनी वा समझी | हर जगह उन्होंने पत्रकार वार्ता की | पत्रकार वार्ता में उन्होंने अपने उस दाग को मिटाने का  जतन भी किया जिसके कारण मध्य प्रदेश की सड़के गड्ढों में तब्दील हो गई थी और प्रदेश अन्धकार में डूब गया था | उन्होंने इसका ठीकरा भी तत्कालीन एनडीए सरकार पर फोड़ा , और आज की बेहतर सड़कों और विद्दुत व्यवस्था के लिए अपनी नीतियों को प्रमुख वजह बताया | साथ ही उन्होंने अपने मुख्य मंत्रित्व कार्यकाल में सर्वाधिक रोजगार उपलब्ध कराने का दावा किया |  
          पंगत की संगत में उन्होंने कांग्रेसी कार्यकर्ताओं से ये संकल्प भी करवाया की हर हाल में कांग्रेस के लिए काम करेंगे | उनका दिलाया यह संकल्प कितना कारगर रहेगा , यह पार्टी के टिकट वितरण के बाद ही साफ़ हो पायेगा | जब टिकट ना मिलने से खफा कांग्रेसी अपने ही दल के प्रत्यासी को हराने में जुट जाते हैं | इन हालातों से निपटने के लिए भी दिग्विजय सिंह और उनकी समिति कितनी सक्रीय रहेगी ? यह सवाल समन्वय कारी कांग्रेसियों को बेचैन किये है | हालांकि दिग्विजय के प्रयासों से पार्टी के एक दूसरे के  विरोधी भी साथ साथ बैठे भी पर कांग्रेसियों के दिल मिलना अभी भी बाकी हैं  , यह साथ कब तक साथ रहेगा और कब टूट जाएगा यह कहा नहीं  जा सकता | अलबत्ता यह जरूर कहा  जा सकता है की कांग्रेस अपने चुनावी अभियान में बहुत पीछे चल रही है जिसकी कीमत भी उसे चुकानी पड़ सकती है | 

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