जल अभाव ग्रस्त होता बुंदेलखंड
रवीन्द्र व्यास
बुंदेलखंड का नाम आते ही लोगों की आँखों के सामने अजब गजब तस्वीरें घूमने लगती हैं | शोषित , शापित इस इलाके की बदनसीबी ही है की भू - गर्भ खनिजों ,रत्नो से सराबोर है पर जीवन जीने के लिए आवश्यक जल धीरे धीरे उससे दूर होता जा रहा है | जल , जंगल, जानवर और जमीन जिससे जुड़ा है जीवन और समृद्धि का एक चक्र , पर आर्थिक समृद्धि की लालसा में जीवन के इस चक्र को ही ना सिर्फ खंडित कर दिया बल्कि इसे नेस्तानाबूद करने में जुटे हुए हैं | सामाजिक जिम्मेदारी समझने वाले लोग इसको लेकर प्रयास भी करते हैं , सरकार योजनाए भी बनाती है बजट भी देती है किन्तु तंत्र को संचालित करने वाला गिरोह योजनाओ को कागजों में साकार कर देता है और धन को अपनी तिजोरी में बंद कर देता है | जिसके चलते कागजों में जंगल लहलहा रहें हैं , और धरा जल से परिपूर्ण है | जल संरचनाओं की उपेक्षा ही बुंदेलखंड के दुष्काल का सबसे बड़ा कारण बन कर सामने आया है |
पिछले कुछ समय में बुंदेलखंड के इन हालातों को देख कर लोगो ने और सत्ता पर काबिज लोगों ने अपनी चिंता तो जताई है | मई माह में झांसी में जल संरक्षण के लिए जीवन समर्पित करने वाले राजेंद्र सिंह ने बुंदेलखंड दुष्काल मुक्ति अभियान की शुरुआत की है | इसके लिए उत्तर प्रदेश वाले बुंदेलखंड इलाके में हर जिले में एक संयोजक नियुक्त किया गया है | इस दुष्काल मुक्ति अभियान के मौके पर राजेंद्र सिंह ने माना की यहां का दुष्काल सिर्फ प्राकृतिक नहीं बल्कि यहां के शासक और शोषित वर्ग बुद्धि का भी दुष्काल है | प्रकृति के बदलते मिजाज के कारण वर्षा चक्र बदल गया है ,जिसके चलते अनियमित वर्षा , भू जल स्तर में गिरावट और उजड़ता समाज ( पलायन करते लोग ) बुंदेलखंड का दुष्काल है | उन्होंने इसके लिए लोगों को जागरूक करने और जल संचय संरचनाओं के विकाश को आवश्यक माना | इस मौके पर मौजूद सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा मांग पत्र तैयार किया गया जिसमे हर इलाके की जल संरचनाओं पहचान करने , उनका सीमांकन करने , गाँवो में पेयजल और खाद्यान सुरक्षा सुनिश्चित करने , पलायन रोकने के लिए मनरेगा के प्रभावी बनाने की बात कही गई | यह मांग पत्र हर जिलाधिकारी के माध्यम से सरकार को भेजा जाएगा |
ललितपुर में भी भू -जल संरक्षण और जल समाधान को लेकर एक कार्यशाला हुई | केंद्रीय भूमि जल बोर्ड लखनऊ और भूगर्भ जल विभाग द्वारा आयोजित इस कार्यशाला में भी वर्षा जल संचय और वृक्षारोपण पर जोर दिया गया | 
उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में केंद्र सरकार के जल संरक्षण योजना के तहत भू-जल स्तर की आन लाइन निगरानी की जायेगी | हर विकाश खंड के 20 गाँव में मापक यंत्र लगेंगे, इन यंत्रो के लग जाने के बाद दिल्ली और लखनऊ में बैठे अधिकारी अब रोजाना बुंदेलखंड के जल स्तर के हालात देख सकेंगे |
वही उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ किसानो को दो साल इन्तजार करने की सलाह देते है , दो साल बाद बुंदेलखंड में ना पीने के पानी की समस्या होगी और ना ही सिचाई के लिए पानी की समस्या होगी | यहां का जो किसान अब तक एक फसल उगाता था वह भी तीन तीन फसल उगा पायेगा | इसके लिए योजना बनाई जा रही है | उत्तर प्रदेश सरकार के ही कृषि मंत्री सूर्य प्रताप शाही ने भी माना है की बुंदेलखंड में सबसे गंभीर संकट जल का है | इस संकट के तात्कालिक समाधान के लिए 30 जून के पहले बुंदेलखंड में एक हजार और मिर्जापुर में 4 सौ नए तालाब खुदवाये जाएंगे | इसके लिए सरकार किसानो को 50 फीसदी अनुदान भी देगी |
मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में भू- जल स्तर में सुधार के लिए केंद्र सरकार ने दो सौ करोड़ से ज्यादा की राशि उपलब्ध कराई है | देखा जाए तो बुंदेलखंड धीरे धीरे डार्क जोन की ओर बढ़ रहा है | सेन्ट्रल वाटर कमीशन ने भी अपनी रिपोर्ट में माना है की बुंदेलखंड में अधिकाँश वर्षा जल बह जाता है | यहां के पाराम्परिक चंदेल कालीन तालाबों से जल संचय में मदद मिलती थी किन्तु उनमे से अधिकांश या तो नष्ट कर दिए गए या फिर उनका रकबा घट गया | अविरल बहती छोटी बड़ी नदियों की जल धाराओं को रोक कर छोटे बड़े बाँध तो बनाये गए पर उनमे जल प्रबंधन का ध्यान नहीं रखा गया | हालात ये हुए की नदिया ही अपना अस्तित्व खोने लगी | अब एक और बड़ी नदी केन को समाप्त करने की योजना बन कर तैयार है |डॉ एम् विश्वेशरय्या ने देश की जल समस्याओं से निजात के लिए बाढ़ वाली नदियों पर बाँध बनाने और और बाढ़ वाली नदियों को सूखी नदियों से जोड़ने की योजना बनाई थी | पर बुंदेलखंड में इसके ठीक उलटा हो रहा है गैर बाढ़ वाली नदी केन को बाढ़ वाली नदी बेतवा से जोड़ा जा रहा है |
जंगल के हालात भी कुछ दुरुस्त नहीं हैं सरकारी आंकड़े कहते हैं की उत्तर प्रदेश वाले इलाके में मात्र 7. 92 फीसदी और मध्य प्रदेश वाले इलाके में 29. 9 फीसदी वन क्षेत्र बचा है । जब की गैर सरकारी आंकड़े बताते हैं की जंगलों का तेजी से विनाश हुआ है | वे जंगल जो भू जल वृद्धि में सहायक होते थे नष्ट किये गए | मध्य प्रदेश इलाके के बुंदेलखंड क्षेत्र में भी असल में 13 फीसदी ही जंगल बचे हैं | शहरी करण और सुविधाओं की लालसा में भेंट चढ़े वनों के विनाश का नतीजा सबके सामने है , जल स्तर में गिरावट के अलावा यह इलाका तेजी से बीहड़ में भी बदल रहा है |
जल ,जंगल, जमीन और जानवरों से नाता तोड़ कर सरकार ने हमें शहरी बाबू बनाने के प्रयास में जुटी है | अब सरकार अपनी गलतियों पर पर्दा डालने के लिए तरह तरह की योजनाए तो बना रही हैं | कभी बुंदेलखंड को पैकेज देती है तो कभी कर्ज माफ़ी की बात करती है | तो कभी सिचाई सुविधाओं की वृद्धि की बात करती है | पर जिस जल से समाज, संस्कृति और आर्थिक प्रगति का रास्ता खोजा जा सकता है उसके सरक्षण और संवर्धन के लिए ईमानदार प्रयास नहीं हो रहे हैं |
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