26 मार्च, 2017

सिलकोसिस से सिसकती जिदगिया

सिलकोसिस से सिसकती जिंदगियां  

रवीन्द्र व्यास 

मध्य प्रदेश के  बुंदेलखंड के सबसे पिछडा जिला  पन्ना  में एक गाँव है गुडियाना यहां  के आदमी की औसत उम्र 50 साल है । गाँव में आधा सैकड़ा महिलाये विधवा हैं ।  आदिवासी बाहुल्य  इस गाँव में यह कोई शाप नहीं है बल्कि ये आदिवासी अपनी जान देकर विकाश की कीमत चुकाते हैं । जिससे सरकार और सेठ तो माला माल होते हैं और इनके हिस्से आती है सिर्फ मौत । असल में पत्थर की धूल से इन्हें मिलती है टी बी और सिलकोसिस जैसी ला इलाज बीमारी जो इनकी जान लेकर ही छोड़ती है ।  बुंदेलखंड में यह अभिशाप सिर्फ इस  गाँव के लोग ही नहीं   भोग रहे हैं  बल्कि सागर ,दमोह ,छतरपुर ,टीकमगढ़ ,उत्तर प्रदेश के  झाँसी , लालितपुर ,महोबा , चित्रकूट जिले में इस तरह के सैकड़ों मामले आये हैं । पन्ना में तो लोगों को जिंदगी की भीख मांगने के लिए कोर्ट का सहारा लेना पड़ा । इस जिले में गैर सरकारी आंकड़े बताते हैं कि  लगभग 15 हजार लोग सिलकोसिस जैसी बीमारी से ग्रसित  हैं । 


                                                  बुंदेलखंड के मध्य प्रदेश इलाके में  आने वाले पन्ना जिले की पहचान देश दुनिया में हीरा के कारण मानी जाती  हैं । हीरा खादानो के अलावा यहां फर्शी पत्थर की वैध और अवैध खदानों का जाल फैला हुआ है । 7 हजार 135 वर्ग किमी में फैले पन्ना जिले में  1011 गाँव  में से 64 गाँव वीरान हो  चुके हैं । रोजगार के  साधनो नाम पर  हीरा खदान और पत्थर खदान  ही सबसे  बड़ा  रोजगार का जरिया है ।  इन  खदानों से लगभग 28 से 30 हजार लोगों को रोजगार मिलता है । इन खदानों में सुरक्षा मानकों का उपयोग नहीं किये जाने के कारण   मजदूरों और उनके परिवार की  पेट की आग तो बुझ जाती है पर बदले में मिलती है , टी बी और सिलकोसिस जैसी बीमारी । जो इनकी मौत की मुख्य वजह बनती है । 

                                                 
                                              पन्ना की समीपवर्ती पंचायत मनोर के आदिवासी बाहुल्य  गुडियाना गाँव में वर्तमान में 50 साल से ज्यादा का  कोई व्यक्ति जीवित नहीं है । गाँव के ये आदिवासी असल में पत्थर खदानों में काम करते हैं जिसके कारण पत्थर से निकलने वाली  धूल से   इनको टी बी और सिलकोसिस जैसी घातक बीमारी होती है और ये असमय काल के गाल में समा जाते हैं ।गाँव के एकलौते 49 वर्षीय सूरज आदिवासी भी अपना इलाज पन्ना और नोगांव में करा रहे हैं ।  गाँव में इस बीमारी से  होती मौतों के कारण  गाँव में 40 से ज्यादा विधवा महिलाये हैं । गाँव के अधिकाँश 40 से 45 साल के लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं । बेवा महिलाओं के सामने दोहरी समस्या खड़ी  होती है, अपना और अपने बच्चों का पेट पालना ,। जिसके लिए इनके सामने जंगल से लकड़ी काट कर बेचना ही जीवन निर्वाह का जरिया बचता है । इन हालातो में एक तो ये खुद कुपोषण की शिकार होती हैं इनके बच्चे भी कुपोषण के शिकार होते हैं ।  

                                                     पन्ना जिले में  सिलकोसिस और टीबी के मरीजों का आंकड़ा साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है । ऐसा भी नहीं है की इसकी रोक थाम के लिए प्रयास नहीं किये जा रहे हों । पर्यावरण और समाज सेवा के क्षेत्र में काम करने वाली कुछेक संस्थाए काम कर रही हैं । किन्तु खदान के मालिक अपने लाभ को किसी भी कीमत पर कम नहीं होने देना चाहते , जिसके चलते मजदूरो की मौत इन ठेकेदारो को मंजूर है पर उनको सुरक्षा के साधन उपलब्ध कराना मंजूर नहीं । सिलकोसिस से पीड़ित मजदूरों के लिए काम करने वाले युसूफ बेग बताते हैं की अभी हाल ही में पन्ना में सिलकोसिस पीड़ित मजदूरों की जांच के लिए सुप्रीम  कोर्ट की एक जांच समिति आई थी । जिसने  पाया की पन्ना में इस बिमारी से पीड़ित व्यक्ति के इलाज की कोई सुविधा ही नहीं है ।  सरकार के सुरक्षा के नियमो का खदान पर पालन नहीं किया जाता , मजदूरो की केस हिस्ट्री बनाने की यहां जरुरत ही नहीं समझी जाती है । केम्प में समिति  के सदस्यों ने सिलकोसिस पीड़ित 122 मजदूरों  से चर्चा भी की । वे बताते हैं की   यह एक लाइलाज बीमारी है जिसमे इसका शिकार व्याक्ति तड़प तड़प कर मरता है ।  इसके इलाज के लिए ना कोई प्रशिक्षित डॉ यहां पर है और ना ही उसके कोई उपकरण ।  उनके प्रयासों से यहां के एक डॉ सुधाकर को प्रशिक्षण के लिए उनकी संस्था ने मलेशिया भिजवाया था , पर मध्य प्रदेश सरकार ने उनके वापास लौटने के  दो माह बाद उनका ट्रांसफर रीवा कर दिया । 


                              मजदूरों की जिंदगी से यहां का स्वास्थ्य अमला किस तरह खिलवाड़ करता है इसकी बानगी देखने को मिली यहां की पत्थर खदानों पर लगे दो स्वास्थ्य शिवरो से । डॉक्टर साहब ने आला लगा कर बता दिया  की हां इसको सिलकोसिस है , जबकि इसकी जांच के लिए अलग उपकरण होते हैं । पिछले दो दशकों से इन मजदूरों के लिए काम करने वाले बेग कहते हैं इस बीमारी का कोई इलाज तो नहीं है  किन्तु सुरक्षा ही इस समस्या से निपटने का मुख्य साधन है ।
                                   दरअसल सिलिका के कणो  और पत्थरो के तोड़ने के कारण निकली धूल , स्वांस नली के द्वारा फेफड़ों तक पहुँचती है । यह पत्थर के खनन अथवा तोड़ने  , रेत खनन , कांच उद्योग, स्लेट पेन्सिल उद्योग  में काम करने वाले मजदूरों को बड़ी आसानी से हो जाती है । इस ला इलाज  बीमारी का अब तक कोई इलाज नहीं है , यहां तक की मजदूरों को दिए जाने वाले मास्क भी बारीक कणो  को फेफड़ों तक जाने से रोक पाने में सक्षम नहीं हैं । जब ये कण फेफड़ो जम जाते हैं तो इनको बाहर नहीं निकाला जा सकता । फेफड़ों में जमने के कारण   
धीरे धीरे ये मोटी परत बना लेते हैं जिस कारण सांस लेने में तकलीफ होती है और अंत में आदमी की मौत हो जाती है । पन्ना जिले के मामले में तो स्थितियां और भी भयानक हैं , यहाँ  अधिकाँश मामलों में सिलकोसिस की बीमारी को टीबी मानकर इलाज किया जाता रहा है । ज्यादा गंभीर होने पर उन्हें टी बी अस्पताल नोगांव का पता बता कर चलता किया जाता रहा है ।  एन जी ओ की सक्रियता से मामले पर  गौर  तो होने लगा पर वह भी नीम हकीम जैसा ही है । अब डाक्टर अंदाजिया तौर पर लोगों को सिलकोसिस का मरीज बताने लगे हैं ।  सरकार से लोगों की जिंदगी की भीख मांगने के लिए यहां काम करने वाले एन जी ओ को हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा  खटखटाना  पड़ा । 


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