15 अगस्त, 2016

BUndelkhand Dayri

बुंदेलखंड की डायरी :- 
आजादी के 70 साल और "बुंदेलखंड" ?
रवीन्द्र व्यास 

बुंदेलखंड _ भी आजादी की 70 वी  वर्षगाँठ मना रहा है ,। इस दिन बुंदेलखंड की अधिकाँश रियासतों के वाशिंदों को दोहरी गुलामी से मुक्ति मिली थी । "आजादी " का यह शब्द यहां के लोगों के लिए एक अलग ही मायने रखता था । समय बीता , देश में जब बीते सात दशकों में विकास का पहिया तेजी से घूमा ,और बुंदेलखंड की रफ़्तार सुस्त रही तो अनेक सवाल बुन्देलखंडियो के मन में खड़े होने लगे । उन  कमियाँ  और कारणों की तलाश होने लगी जिसके चलते बुलंद बुंदेलखंड - बदहाल  हुआ । लोगों को हर बदहाली के मूल में राजनैतिक नक्कारापन ,और विभाजन की टीस नजर आई । इसको लेकर बुंदेलखंड के लोगों को छला भी गया , अपने ही लोगों ने अपना स्वार्थ सिद्ध भी किया , पर जिसका हकदार बुंदेलखंड था वह उसे कभी नहीं मिला , बल्कि यहां से छीना ही गया । 
                                    अतीत के पन्ने पलटे जाए तो  बुंदेलखंड का इलाका ऋषि मुनियों की तपो भूमि रहा है । यहां भगवान् राम ने वनवास बिताया तो भक्त प्रह्लाद ने  यहां की भूमि में जन्म लेकर धरा को पावन किया । गोस्वामी तुलसीदास  ने रामायण की रचना कर दुनिया को एक अनोखा ग्रन्थ दिया ।  वहीँ आल्हा_ उदल ,छत्रसाल और  रानी लक्ष्मी बाई जैसे वीर योद्धाओ ने बुंदेलखंड का नाम इतिहास में अमर कर दिया । अपनी ही धरती के गामा पहलवान और हॉकी के जादूगर ध्यानचंद्र को भला कौन भूल सकता है । अग्रेजो से युद्ध में यहां के लोगों ने भी जालियां वाला बाग़ की तरह शहादत दी , खून से लाल हुई उर्मिल नदी को देखने वाले कुछ लोग आज भी जीवित हैं । 



            
                                
                             उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 13 जिलों वाला यह बुंदेलखंड इलाका तक़रीबन 70 हजार वर्ग किमी में फैला है । इस विशाल भू _ भाग में हीरा , ग्रेनाइट , फर्शी पत्थर , पयरोफेलाईट , डोलोमाइट की खादानें, लोह अयस्क , रॉक फास्फेट की खदाने  संचालित हैं । वहीँ भू - वैज्ञानिकों ने बुंदेलखंड इलाके के छतरपुर,पन्ना , टीकमगढ़ , और दमोह जिले में हीरा के बड़े भण्डार होने का पता लगाया । मिनिरल्स और माइंस विभाग की रिपोर्ट बताती है की ललितपुर जिले में सोने और प्लेटिनम के भंडार हैं , तो झांसी जिले में सिलिका के भंडारो का पता चला है । इसके अलावा पोटाश,एस्बेस्ट्स के भंडारो की भी जानकारी लगी है । पिछले कुछ समय से छतरपुर जिले में  यूरेनियम की खोज का काम चल रहा है । छतरपुर और दमोह जिले की सीमा पर गैलिना और माइका (अभ्रक )  के पॉकेट डिपॉजिट होने का भी पता चला है । पन्ना की हीरा खदानों से आज भी दुनिया का सबसे बेहतरीन किस्म का हीरा निकलता है । वही सागर के ब्लेक स्टोन , ललितपुर के फर्शी पत्थर और ग्रेनाइट की मांग दुनिया के अनेक देशों में है । यहां से निकलने वाले पायरोफलाइट  की मांग देश की अनेको सौंदर्य प्रसाधन का कारोबार करने वाले उद्योगों में हैं । रेत का तो कहना ही क्या है ।
 बड़े उद्योग के नाम पर 70 के दशक में झांसी में बी एच ई एल और 80 के दशक में दमोह में बिड़ला का सीमेंट उद्योग और हाल के वर्षों में बीना रिफायनरी जैसे गिने चुने उद्योग ही हैं ।
                                       दरअसल आजादी के 69 साल बाद भी बुंदेलखंड इलाके में इस बात का सर्वेक्षण ही नहीं किया गया कि इस इलाके में किस किस तरह के उद्योगों की सम्भावनाये हैं ।  उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए किसी तरह की छूट देने की जरुरत ही नहीं समझी  गई । पन्ना और फिर खजुराहो में  डायमंड पार्क को यहां राजनैतिक नक्कारेपन के कारण इंदौर जाने दिया  गया । मध्य प्रदेश सरकार ने बड़े बड़े इन्वेस्टर सम्मिट किये जिसमे दो बार खजुराहो में भी ये स्वांग हुआ , कहा  गया की कई इन्वेस्टर ने इसमें रूचि भी दिखाई , सरकार ने दावा किया  बुंदेलखंड में कई उद्योगों की आधार शिला रखी जायगी , स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा, किन्तु क्या हुआ पन्ना में सीमेंट उद्योग और छतरपुर में स्पंज आयरन का उद्योग लगाने में अपनी सहमति जताने वाले उद्योग पति आज भी अपनी फ़ाइल लिए घूम रहे  हैं ।
                                                     
                                                                इस इलाके में 70 से 80 फीसदी लोग कृषि पर आश्रित हैं , मौसम ने साथ दिया तो खाने का जुगाड़ हो गया नहीं दिया तो मजदूरी के लिए पलायान का रास्ता खुला है । और ज्यादा हुआ  तो खुद को गिरवी रख दिया या बच्चों को गिरवी रख दिया । ऐसा ही एक मामला पिछले दिनों सामने आया , सवर्ण जाति के  युवक ने बुंदेलखंड के एक पूंजीपति से ढाई लाख रु कर्ज में लिए , कर्ज  एवज में वह पिछले पांच साल से सिर्फ दो वक्त के भोजन पर काम करने को मजबूर है । मामले में दिलचस्प ये है की ना तो बंधक युवक कुछ बोलने को तैयार है और बंधक बनाने वाले  ।  ये तो सिर्फ एक नमूना है इस तरह के और  ना जाने कितने मामले हैं , जहाँ आपसी सहमति से बंधक जीवन जीने को लोग मजबूर हैं । 
                                                  आजादी के पूर्व के  हालात गांधी के सपनो को साकार करने वाले थे । अपने आप मे  आत्मनिर्भर इन गांवों  में खेती किसानी के साथ  लोग अपने समाज के परंपरागत कार्यो को करते , एक तरह से ये  छोटे कुटीर उद्योग थे  जो  लोगो को आत्मनिर्भर बनाते थे । कागज, बरतन, धातु शिल्प , काष्ठ,लौह, मिट्टी  शिल्प , वस्त्र  जैसे कई कुटीर उद्योग , वनोपज ,लोगों की आय के अतरिक्त  और प्रमुख साधन थे । आजाद हुए तो गांधी के सपनो के ये कुटीर  उद्योग धीरे धीरे नष्ट हो गए । कृषि के सत्यानाश की योजना चली और कृषि उत्पाद बढ़ाने  के नाम पर ऐसे ऐसे खाद और रसायनों का प्रयोग हुआ की भूमि बंजर होने लगी । अब जरूर परम्परागत खेती को जैविक खेती का नाम देकर बढ़ावा देने का प्रयास हो रहा है ।  
                                                   आजादी के समय जो बुंदेलखंड राज्य था जिसकी राजधानी नोगांव बनी आजादी के बाद उसी बुंदेलखंड को पहले विन्ध्य प्रदेश और फिर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में विभाजित कर दिया गया । प्रथक बुंदेलखंड राज्य के नाम पर सशत्र संघटन से ले कर गांधी वादी आंदोलन भी चले । किन्तु प्रातःक बुंदेलखंड राज्य को जो समर्थन उत्तर प्रदेश वाले बुंदेलखंड इलाके में मिला वह मध्य प्रदेश वाले इलाके में नहीं मिला । उमा भारती के झांसी से सांसद बनने के समय यह बात जरूर कही गई की जल्द ही बुंदेलखंड अलग राज्य बनेगा किन्तु यह सपना ही रह गया । फिर से उत्तर प्रदेश में विधान सभा के चुनाव आ रहे हैं , बी एस पी जैसे दल प्रथक राज्य पर सहमति जता रहा है , जब की बीजेपी जिसके घोषणा पात्र में छोटे राज्यों की कभी बात कही जाती थी अब पसोपेस में है । 
                                                        देखा जाए तो नीति और नियत ही लोगों को बुनियादी  सुविधाएं और उनकी आर्थिक प्रगति में सहायक होती हैं । पर बुंदेलखंड के मसले पर सरकार और नेताओं की नीति और नियत दोनों ही  दिखावटी रही । जिसका परिणाम है की  आजादी की 70 वी वर्ष गाँठ मनाते समय भी बुंदेलखंड बदहाल है , भय भूख और भ्रस्टाचार की गिरफ्त में है ।        

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