29 अगस्त, 2016

RIo Tinto_टिन्टो (रियो ) का टंटा


टिन्टो (रियो ) का टंटा
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रवीन्द्र व्यास 

 बुंदेलखंड के छतरपुर जिला  में पिछले १४ साल से हीरा की खोज और खुदाई के जतन में जुटी ,आस्ट्रेलियन हीरा कंपनी रियो टिंटो अब बकस्वाहा में हीरा नहीं खोदेगी  इस साल के अंत तकवह अपना कार्य पूर्णतः बंद कर देगी  यह विदेशी कंपनी भी सरकार की सुस्त चाल औरसियासती तिकड़मो से हार कर सैकड़ों करोड़ खर्च कर अब हीरा के मोह को त्याग रही है  ग्रहों कीचाल और ज्योतिष में भरोषा करने वाले ज्ञानी मानते है की हीरा एक रत्न है , जो नीलम जैसेरत्न की तरह हर किसी  के अनकूल नहीं होता  यह शुभ और अशुभ फल देता है   जिसकेकारण आपको आर्थिक ,मानसिक और शारीरिक  नुक्सान  और परिस्थितियां प्रतिकूल हो जाती हैं शायद रियो टिंटो के साथ भी ऐसा ही हो गया ,उनकी गृह दशा हिंदुस्तानी हीरे के अनकूल नहींथी , जिस कारण १४ वर्ष के लम्बे संघर्ष के बाद भी उन्हें हीरा खोदने का स्थाई अधिकार नहींमिल पाया  ग्रहों की चाल बदलने के बाद उम्मीद हो सकती है की परिस्थितियां रियो के अनकूलहो जाएँ  पर इसकी उम्मीद कम ही लगती हैं , क्योंकि भारत के प्रधान गृह के दो पूंजी गृह कीदृष्टि राहु _केतु की तरह बक्स्वाहा की इस हीरा खदान पर है   


   बुंदेलखंड की इस धरा में  हीरा सिर्फ पन्ना और छतरपुर जिला भर में ही नहीं हैं , बल्कि हीराभंडारो की खोज टीकमगढ़ और दमोह जिलो में भी हो चुकी है  कीमती खनिज संपदा से भर पूरइस इलाके  के लोगों को सपने दिखा कर बहलाया जाता है  पर लोग नहीं समझ पाते की सुबहहोते ही सपने टूट ही जाते हैं  और फिर  यहाँ के लोग को  अभावो और बदनसीबी में जीने कीवास्तिकता को स्वीकारना पड़ता  है  पिछले एक दशक से ज्यादा समय से लोगो को  हीरा चकाचौन्ध में भ्रमित किया जा रहा था  अब उसी हीरा कंपनी रियो टिंटो ने अपने कारोबार कोसाल के अंत तक समेटने का एलान करके छतरपुर जिले को और मोदी और शिवराज की निवेशनीति को  एक बड़ा  झटका   दिया है  वहीँ दूसरी तरफ पन्ना की उथली हीरा खदान को कारपोरेट जगत को देने की रण नीति बनाई जा रही है    
सागर के एक भूगर्भ शास्त्री  डॉ स्थापक की रिपोर्ट पर  आस्ट्रेलिया की प्रमुख कंपनी रियो टिंटो ने(रियो टिंटो एक्सप्लोरेशन इंडिया प्रा.ली.) ने २००४ से इस जिले के बक्सवाहा इलाके में हीरा खोजने का काम शुरू किया था  कम्पनी को इस एरिया में  किम्बरलाईट रोक्स (चट्टान ) कासमूह मिला कम्पनी ने इस प्रोजेक्ट का नाम "बन्दर परियोजनादिया \  33   करोड़ की लागतके हीरा सेम्पल प्रोसेसिंग प्लांट का उदुघाटन  मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिव राज सिंह चौहान ने२७ अक्तूबर2009  को किया था  इस आधुनिक प्लांट को रियो टिंटो ने ऐसे ही नही लगाया था  ,कम्पनी  को जो प्रारंभिक रिपोर्ट मिली थी  उसके मुताबिक यहाँ ३७ मिलियन टन हीरा के भंडारहै , हीरे की गुणवत्ता को  भी दुनिया   के हीरा से बेहतर बतया गया था   ,कम्पनी को भरोषाथा   की यहाँ का हीरा पन्ना हीरा खदान से  गुना ज्यादा मूल्यवान होगा , यहाँ की उत्पादनक्षमता  भी पन्ना से २० गुना ज्यादा होगी  और  यह एरिया विश्व के १० शीर्ष हीरा उत्पादकक्षेत्रो में  शामिल हो जाएगा   लोगों को खुद मुख्य मंत्री ने भरोषा दिलाया था की इस  परियोजनाके कारण स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा , बुंदेलखंड की किस्मत हीरा की तरह चमकनेलगेगी 
अब कंपनी ने २२०० करोड़ की  इस परियोजना को इस साल के अंत तक बंद करने और किसीतीसरे पक्ष को देने का विचार करने का कहकर  देश की निवेश नीति पर सवालिया निशान लगादिया  रियो टिंटो के इस कदम के पीछे माना जा रहा है की पिछले कुछ समय से इस हीरा खदानको लेने के लिए देश के कई बड़े उद्योगिक घराने लगे थे  इन उद्योग पतियों  की ऊँचीराजनीतिक पहुँच भी मानी जाती है  उस पर पर्यावरण की स्वीकृति अब तक  ना मिलना  एकबड़ा कारण बताया  जा रहा है \ 

सामाजिक संघर्ष
दरअसल  रियो टिंटो को 26 मई 2006 को हीरे की तलाश के लिए  सर्वे लायसेंस की अनुमतिमध्यप्रदेश सरकार ने जारी की थी। कंपनी को  बकस्वाहा ईलाके की 2484.23 हेक्टेयर भूमि परयह सर्वे करना था जिसमें 2329.7 हेभूमि वन परिक्षेत्र की थी।  प्लांट स्थापना के बादरियोटिन्टो ने 5 अप्रेल 2012 को 954 हेराजस्व भूमि को अधिकृत करने के लिये कलेक्टरछतरपुर को आवेदन दिया था 
12 फरवरी 2014 को जब बक्सवाहा ब्लॉक के कसेरा गांव में पर्यावरण को लेकर जान सुनवाई हुईतो स्थानीय लोगों ने रियो टिंटो के कारण हो रहे और होने वाले पर्यावरण के नुकशान पर अपनीजोरदार दलीलें देकर इस योजना को समाज के लिए एक बड़े नुकशान के रूप में दर्शाया था  लाख व्रक्षो ,नदी  के अलावा जंगली जीव जंतुओं के लिए भी इसे अहितकर बताया था    वहीँ यह भी बताया गया था की यह इलाका लुप्त होते बाघों का रहवास क्षेत्र भी है 
कंपनी के लोगों ने तर्क दिए थे की कुछ हजार वृक्ष ही कटेंगे , उससे तीन गुना ज्यादा वृक्षारोपणकिया जाएगा  नदी के नष्ट होने या जल स्तर में गिरावट और बाघ के रहवास क्षेत्र  की बात को कंपनी ने  कपोल कल्पित  बताया था 
सामाजिक सरोकार
रियो टिंटो हीरा खनन  परियोजना को लेकर जहां लोगों में विरोध देखने को मिला वहीँ , ऐसे भीलोग हैं जो इस परियोजना को बुंदेलखंड के लिए एक  आवश्यक परियोजना मानते हैं  दरअसलयह परियोजना ऐसे इलाके में लग रही थी , जिसका अधिकाँश क्षेत्र बंजर है , अथवा कम उपजवाला है   इस योजना से स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर बढ़ते , साथ ही आस पास काकारोबार भी बढ़ता 
दूसरी तरफ रियो टिंटो ने अपने अनकूल माहौल बनाने के लिए कई सामाजिक कार्य भी शुरूकराये थे  यूनिसेफ जैसी संस्था इस इलाके के गाँव  में आंगनवाड़ी केंद्रों को मदद देने का  कामकर रही है , शिक्षा के क्षेत्र में कमजोर बालक बालिकाओ के लिए  विशेष  प्रशिक्षण  की व्यवस्था ,गाँव में पेयजल उपलब्ध कराने की पहल  जैसे कई कार्यक्रम  शुरू किये हैं  रियो टिंटो के जाने केबाद संभवतः  ये  सभी  कार्यक्रम ठन्डे बास्ते में चले जाएंगे  
              दरअसल  रियो टिंटो मामला वन सलाहकार समिति के पास लंबित है , जिससे  कंपनीको अभी तक स्वीकृति नहीं मिली है   माना जाता है की दुनिया की प्रमुख खनिज उत्खनन कंपनी  रियो टिंटो की कुल आय में हीरा की आय मात्र 5 फीसदी है   इस आर्थिक समीकरण  औरपरियोजना पर आये दिन होते विवादों  कारण  कंपनी ने इस परियोजना से दूर ही रहने काफैसला किया है   हालांकि यह अलग बात है की दुनिया में आज भी हिंदुस्तान के हीरे की अपनीएक अलग पहंचान है  बकस्वाहा इलाके की इस खदान से दुनिया का श्रेष्टतम हीरा निकलने कीउम्मीद जताई गई थी 

21 अगस्त, 2016

BUndelkhand Dayri


पानी को तरसते बुंदेलखंड में हुई आफत की बारिश 

रवींद्र व्यास 

बुंदेलखंड का इलाका पिछले तीन चार साल से बून्द -बून्द पानी के लिए तरश रहा था । इस बार कुछ ऐसा पानी बरषा की ये आफत की बारिश हो गई । हाल की बारिश के इस प्रकोप में इस क्षेत्र के 30 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई ।तीन दिन तक बुंदेलखंड के कई जिलों का  सड़क संपर्क काटा रहा ।  सड़के ,पल पुलिया क्षति ग्रस्त हो गए तो कही स्टॉप डेम बाह गए तो कही तालाब फुट गए । अंग्रेजो के शासन काल में बने गंगऊ डेम की दीवाल भी इस बार पानी का दबाव नहीं झेल पाई । बुंदेलखंड के हर बाँध के गेट खुल गए तो   तालाबो ,नदी नालों ने  भी अपनी सीमा लांघी और  जहां जो मिला उसे बर्बाद करता पानी चला गया । फिर वो चाहे मानव हो  मानव की सुख सुविधाओं के लिए बनी सड़क हो या पुल पुलिया अथवा मानव और जीवो के पेट की आग बुझाने वाले खेत हो फिर सर पर साया बनाने वाले घर । 

मध्य प्रदेश के छः और उत्तर प्रदेश के सात जिलो में तीन चार दिन की लागातार बारिश ने ऐसा कहर बरपाया की उत्तर प्रदेश के  करीब एक दर्जन और मध्य प्रदेश वाले इलाके के १८ से ज्यादा लोग पानी की भेंट चढ़ गए । सबसे दर्दनाक सागर जिले में हुआ जहां एक मकान बारिस के कारण ऐसा धरासाईं हुआ की उसमे तीन मासूम बच्चो सहित सात लोगों की मौत हो गई पांच लोग घायल हो गए । छतरपुर जिले के  बक्शवाहा विकाश खंड में  एक कार छीपा नाले में बह गई । कार  में सवार छः लोगों में से तीन को स्थानीय लोगो की मदद से बचा लिया लिया गया किन्तु तीन लोग बह गए , सागर के रहने वाले इन तीनो लोगों के शव जब घर पहुंचे तो सागर नगर शोक से सराबोर हो गया ।  
                           मौसम विभाग की चेतावनियों का लाभ जिला प्रशासन को अवश्य मिला । छतरपुर ,पन्ना, टीकमगढ़, दमोह ,सागर , महोबा, बांदा , चित्रकूट , हमीरपुर , झाँसी , ललितपुर में लोगों समय रहते सुरक्षित ठिकानों पर पहुंचाया गया । पर इन जिलो में डूब क्षेत्र में आये सैकड़ों कच्चे घर धरासाई  । महोबा में बीस साल बाद इतनी बारिश हुई है । महोबा के कीरत सागर के ओवर फ्लो के फाटक जब नहीं खुले तो जेसीबी मशीन से तालाब की पट्टी तोड़ कर पानी बहाया गया । 

नदियों  का कहर : 
केन नदी का कहर बांदा उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिले में देखने को मिला । केन नदी पर बने बाँध गंगऊ , बरियारपुर  और इसमें मिलने वाले रनगुआ बाँध का पानी जब केन में छोड़ा गया तो यह अपने रौद्र रूप में आ गई ।छतरपुर जिला के रामपुर घाट ,बरीखेरा , गोयरा ,फत्तेपुर ,मडैयन ,कुरधना ,बरीखेरा ,बडनपुर ,परेई ,हाजीपुर जैसे गाँवों में संकट पैदा हो गया । वहीँ बांदा उत्तर प्रदेश में नदी किनारे बसी बस्तियों में पानी भर गया । अकेले बांदा जिले में घर गिरने से छह लोगों की मौत हो गई ।   
                  बेतवा ,यमुना , केल , उर्मिल ,धसान ,चन्द्रावल , सोनार ,जूडी , व्यारमा , शून्य ,मंदाकनी आदि नदिया अपना रौद्र रूप दिखाती रही । हमीरपुर जिसके लगभग चारों ओर से  बेतवा और यमुना का बहाव क्षेत्र है  और नदियों के तीव्र प्रवाह और कटाव के कारण हमीरपुर सिकुड़ता  जा रहा है ।  अकेली बेतवा नदी के बहाव क्षेत्र में ८६ से ज्यादा गाँव की डेड लाख से ज्यादा आबादी प्रभावित होती है । जबकि यमुना नदी के बहाव क्षेत्र में इस जिले के २० गाँव की लगभग ३० हजार की आबादी प्रभावित होती है । 
                                 राम की नगरी चित्रकूट में मंदाकनी नदी ने जब अपनी सीमाएं लांघी तो राम वन जैसे इलाके के लोगों को स्थान छोड़ना पड़ा । 

टीकमगढ़ नगर का  जामनी नदी पर बने  फ़िल्टर प्लांट में भी पानी भर गया । जिस कारण नगर  लोगों को पानी की सप्लाई अवरुद्ध हुई । पन्ना जिले में अमानगंज कस्बा मिढ़ासन नदी के तट पर बसा है जब यह नदी उफान पर आई तो इसका पानी यहां के थाने तक जा पहुंचा । छतरपुर जिले के बिजावर  विलाके के धरमपुरा और जैतपुर गाँव में जब पानी भरा तो विधायक गुड्डन पाठक  खुद गाँव तक पहुंचे और लोगों को भरोषा दिलाया और गाँव से पानी निकालने की व्यवस्था कराई । खजुराहो की खुडर नदी पर बना स्टाप डेम ही बह गया । नोगांव में दिलीप बिल्डकॉम द्वारा निर्मित पुलिया और सड़क क्षति ग्रस्त हो गई । 

                                       बारिश के पूर्वानुमान से  आपदा प्रबंध तो किये गए ,। वहीँ बारिस ने निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर भी सवाल खड़े किये हैं । साथ ही निर्माण एजेंसियों के दूरगामी दृष्टिकोड का अभाव भी साफ़ नजर आया ।  यह सभी जानते हैं की यदि सड़क मार्ग अवरुद्ध होंगे  तो किसी भी स्थान पर भीषण विपत्ति के समय प्रशासन का पहुंचना असम्भव होगा । इसके बावजूद  अनेकों स्थानों पर सड़क से निचे रपटे , पुल ,पुलिया , और निर्माणाधीन पुल पुलिया  के ऊपर से बहता पानी लोगों का मार्ग रोके रहा । 
                                        पिछले तीन चार साल से  सूखा की त्रासदी झेलने वाला बुंदेलखंड इलाका अब बारिस की त्रासदी से दो चार हो रहा है ।  अति वर्षा , और खेतों पर हुए पानी के भराव ने  उडद , तिल की फसलों को पूर्णतः चौपट कर दिया है । बुंदेलखंड के किसानों की हालत सर  मुड़ाते ही ओले पड़े जैसी हो गई है ।  






15 अगस्त, 2016

BUndelkhand Dayri

बुंदेलखंड की डायरी :- 
आजादी के 70 साल और "बुंदेलखंड" ?
रवीन्द्र व्यास 

बुंदेलखंड _ भी आजादी की 70 वी  वर्षगाँठ मना रहा है ,। इस दिन बुंदेलखंड की अधिकाँश रियासतों के वाशिंदों को दोहरी गुलामी से मुक्ति मिली थी । "आजादी " का यह शब्द यहां के लोगों के लिए एक अलग ही मायने रखता था । समय बीता , देश में जब बीते सात दशकों में विकास का पहिया तेजी से घूमा ,और बुंदेलखंड की रफ़्तार सुस्त रही तो अनेक सवाल बुन्देलखंडियो के मन में खड़े होने लगे । उन  कमियाँ  और कारणों की तलाश होने लगी जिसके चलते बुलंद बुंदेलखंड - बदहाल  हुआ । लोगों को हर बदहाली के मूल में राजनैतिक नक्कारापन ,और विभाजन की टीस नजर आई । इसको लेकर बुंदेलखंड के लोगों को छला भी गया , अपने ही लोगों ने अपना स्वार्थ सिद्ध भी किया , पर जिसका हकदार बुंदेलखंड था वह उसे कभी नहीं मिला , बल्कि यहां से छीना ही गया । 
                                    अतीत के पन्ने पलटे जाए तो  बुंदेलखंड का इलाका ऋषि मुनियों की तपो भूमि रहा है । यहां भगवान् राम ने वनवास बिताया तो भक्त प्रह्लाद ने  यहां की भूमि में जन्म लेकर धरा को पावन किया । गोस्वामी तुलसीदास  ने रामायण की रचना कर दुनिया को एक अनोखा ग्रन्थ दिया ।  वहीँ आल्हा_ उदल ,छत्रसाल और  रानी लक्ष्मी बाई जैसे वीर योद्धाओ ने बुंदेलखंड का नाम इतिहास में अमर कर दिया । अपनी ही धरती के गामा पहलवान और हॉकी के जादूगर ध्यानचंद्र को भला कौन भूल सकता है । अग्रेजो से युद्ध में यहां के लोगों ने भी जालियां वाला बाग़ की तरह शहादत दी , खून से लाल हुई उर्मिल नदी को देखने वाले कुछ लोग आज भी जीवित हैं । 



            
                                
                             उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 13 जिलों वाला यह बुंदेलखंड इलाका तक़रीबन 70 हजार वर्ग किमी में फैला है । इस विशाल भू _ भाग में हीरा , ग्रेनाइट , फर्शी पत्थर , पयरोफेलाईट , डोलोमाइट की खादानें, लोह अयस्क , रॉक फास्फेट की खदाने  संचालित हैं । वहीँ भू - वैज्ञानिकों ने बुंदेलखंड इलाके के छतरपुर,पन्ना , टीकमगढ़ , और दमोह जिले में हीरा के बड़े भण्डार होने का पता लगाया । मिनिरल्स और माइंस विभाग की रिपोर्ट बताती है की ललितपुर जिले में सोने और प्लेटिनम के भंडार हैं , तो झांसी जिले में सिलिका के भंडारो का पता चला है । इसके अलावा पोटाश,एस्बेस्ट्स के भंडारो की भी जानकारी लगी है । पिछले कुछ समय से छतरपुर जिले में  यूरेनियम की खोज का काम चल रहा है । छतरपुर और दमोह जिले की सीमा पर गैलिना और माइका (अभ्रक )  के पॉकेट डिपॉजिट होने का भी पता चला है । पन्ना की हीरा खदानों से आज भी दुनिया का सबसे बेहतरीन किस्म का हीरा निकलता है । वही सागर के ब्लेक स्टोन , ललितपुर के फर्शी पत्थर और ग्रेनाइट की मांग दुनिया के अनेक देशों में है । यहां से निकलने वाले पायरोफलाइट  की मांग देश की अनेको सौंदर्य प्रसाधन का कारोबार करने वाले उद्योगों में हैं । रेत का तो कहना ही क्या है ।
 बड़े उद्योग के नाम पर 70 के दशक में झांसी में बी एच ई एल और 80 के दशक में दमोह में बिड़ला का सीमेंट उद्योग और हाल के वर्षों में बीना रिफायनरी जैसे गिने चुने उद्योग ही हैं ।
                                       दरअसल आजादी के 69 साल बाद भी बुंदेलखंड इलाके में इस बात का सर्वेक्षण ही नहीं किया गया कि इस इलाके में किस किस तरह के उद्योगों की सम्भावनाये हैं ।  उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए किसी तरह की छूट देने की जरुरत ही नहीं समझी  गई । पन्ना और फिर खजुराहो में  डायमंड पार्क को यहां राजनैतिक नक्कारेपन के कारण इंदौर जाने दिया  गया । मध्य प्रदेश सरकार ने बड़े बड़े इन्वेस्टर सम्मिट किये जिसमे दो बार खजुराहो में भी ये स्वांग हुआ , कहा  गया की कई इन्वेस्टर ने इसमें रूचि भी दिखाई , सरकार ने दावा किया  बुंदेलखंड में कई उद्योगों की आधार शिला रखी जायगी , स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा, किन्तु क्या हुआ पन्ना में सीमेंट उद्योग और छतरपुर में स्पंज आयरन का उद्योग लगाने में अपनी सहमति जताने वाले उद्योग पति आज भी अपनी फ़ाइल लिए घूम रहे  हैं ।
                                                     
                                                                इस इलाके में 70 से 80 फीसदी लोग कृषि पर आश्रित हैं , मौसम ने साथ दिया तो खाने का जुगाड़ हो गया नहीं दिया तो मजदूरी के लिए पलायान का रास्ता खुला है । और ज्यादा हुआ  तो खुद को गिरवी रख दिया या बच्चों को गिरवी रख दिया । ऐसा ही एक मामला पिछले दिनों सामने आया , सवर्ण जाति के  युवक ने बुंदेलखंड के एक पूंजीपति से ढाई लाख रु कर्ज में लिए , कर्ज  एवज में वह पिछले पांच साल से सिर्फ दो वक्त के भोजन पर काम करने को मजबूर है । मामले में दिलचस्प ये है की ना तो बंधक युवक कुछ बोलने को तैयार है और बंधक बनाने वाले  ।  ये तो सिर्फ एक नमूना है इस तरह के और  ना जाने कितने मामले हैं , जहाँ आपसी सहमति से बंधक जीवन जीने को लोग मजबूर हैं । 
                                                  आजादी के पूर्व के  हालात गांधी के सपनो को साकार करने वाले थे । अपने आप मे  आत्मनिर्भर इन गांवों  में खेती किसानी के साथ  लोग अपने समाज के परंपरागत कार्यो को करते , एक तरह से ये  छोटे कुटीर उद्योग थे  जो  लोगो को आत्मनिर्भर बनाते थे । कागज, बरतन, धातु शिल्प , काष्ठ,लौह, मिट्टी  शिल्प , वस्त्र  जैसे कई कुटीर उद्योग , वनोपज ,लोगों की आय के अतरिक्त  और प्रमुख साधन थे । आजाद हुए तो गांधी के सपनो के ये कुटीर  उद्योग धीरे धीरे नष्ट हो गए । कृषि के सत्यानाश की योजना चली और कृषि उत्पाद बढ़ाने  के नाम पर ऐसे ऐसे खाद और रसायनों का प्रयोग हुआ की भूमि बंजर होने लगी । अब जरूर परम्परागत खेती को जैविक खेती का नाम देकर बढ़ावा देने का प्रयास हो रहा है ।  
                                                   आजादी के समय जो बुंदेलखंड राज्य था जिसकी राजधानी नोगांव बनी आजादी के बाद उसी बुंदेलखंड को पहले विन्ध्य प्रदेश और फिर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में विभाजित कर दिया गया । प्रथक बुंदेलखंड राज्य के नाम पर सशत्र संघटन से ले कर गांधी वादी आंदोलन भी चले । किन्तु प्रातःक बुंदेलखंड राज्य को जो समर्थन उत्तर प्रदेश वाले बुंदेलखंड इलाके में मिला वह मध्य प्रदेश वाले इलाके में नहीं मिला । उमा भारती के झांसी से सांसद बनने के समय यह बात जरूर कही गई की जल्द ही बुंदेलखंड अलग राज्य बनेगा किन्तु यह सपना ही रह गया । फिर से उत्तर प्रदेश में विधान सभा के चुनाव आ रहे हैं , बी एस पी जैसे दल प्रथक राज्य पर सहमति जता रहा है , जब की बीजेपी जिसके घोषणा पात्र में छोटे राज्यों की कभी बात कही जाती थी अब पसोपेस में है । 
                                                        देखा जाए तो नीति और नियत ही लोगों को बुनियादी  सुविधाएं और उनकी आर्थिक प्रगति में सहायक होती हैं । पर बुंदेलखंड के मसले पर सरकार और नेताओं की नीति और नियत दोनों ही  दिखावटी रही । जिसका परिणाम है की  आजादी की 70 वी वर्ष गाँठ मनाते समय भी बुंदेलखंड बदहाल है , भय भूख और भ्रस्टाचार की गिरफ्त में है ।        

विकास की उमंग और चुनौतियों के संघर्ष का बुंदेलखंड

  बुंदेलखंड की डायरी  विकास की उमंग और चुनौतियों के  संघर्ष का  बुंदेलखंड  रवीन्द्र व्यास  दो राज्य में बटे बुंदेलखंड के लिए    2025  में कई...