15 अक्टूबर, 2023

EL_2023सन्यासी की सियासत

 बुंदेलखंड की डायरी 

EL_2023सन्यासी की सियासत 

रवीन्द्र व्यास 

25/9/23

सनातन धर्म में  संन्यास का  बीजेपी की राष्ट्रीय नेता और पूर्व मुख्यमंत्री  साध्वी उमा भारती  फिर चुनाव के समय पार्टी के सामने  मुश्किलें खड़ी करती नजर आ रही हैं | इस बार उनके निशाने पर केंद्र की मोदी सरकार है | उनका यह  राजनैतिक  अभियान क्यों और किसके इशारे पर चल रहा है  इसको लेकर सियासी अटकलों का दौर जारी है |  पिछड़ा वर्ग के  नाम पर अपनी ही पार्टी के विरुद्ध अब वे हमलावर हो गई हैं , वह भी ऐसे समय में जब तीन प्रमुख राज्यों में चुनावी शंखनाद हो चुका है | 

                           उमा श्री भारती एक सन्यासी हैं और सनातन धर्म में  संन्यास का अर्थ सांसारिक बन्धनों से मुक्त  जीवन की सर्वोच्च अवस्था माना  गया है। आमतौर पर यह माना जाता है कि  सन्यासी  एक साधारण जीवन जीता है, उसे ना  किसी भौतिक संपत्ति की चाहत होती और ना ही किसी से भावनात्मक लगाव होता है  वह अपने में ही मस्त होता है |  वर्तमान दौर के सन्यासी  कुछ अलग तरह से सांसारिक बंधनों में लिप्त नजर आते हैं | संन्यास लेकर अपना शेष जीवन परम तत्व की अनुभूति प्राप्त करने में लगा देने वाला काल , कलयुग में समाप्त हो गया | आजकल  ज्यादातर  लोगों  के लिए  यह  प्रतिष्ठा और  हित साधना  का एक साधन बन गया है.|| 

                                     बीजेपी की साध्वी उमा भारती ने चुनाव के ठीक पहले केंद्र की मोदी सरकार के सामने मुश्किलें  खड़ी  करने का काम शुरू कर दिया है | हालंकि यह उनका कोई पहला विद्रोह नहीं है इसके पहले भी वे अनेक मौकों पर पार्टी और प्रदेश  सरकार की रीति  नीति पर सवालिया निशान खड़ी  करती रही हैं |  देश के सर्वोच्च सदन में महिला आरक्षण बिल पास होने के बाद , उमा जी ने महिला आरक्षण बिल  पर मीडिया से कहा कि  ओबीसी महिलाओं को आरक्षण दिया जाना चाहिए |  कांग्रेस की मांग पर सुर मिलाने वाली  उमा भारती ने हालांकि यह भी कहा कि वह पार्टी को कमजोर नहीं करना चाहती ,  महिलाओं को ओबीसी आरक्षण दिलवाकर रहूंगी |  सियासत में सत्ता का  विरोध करना  विपक्षी दल का  दाइत्व माना जाता है |  उनका यह दर्द समझा भी जा सकता है कि जिस बिल को को वर्षो तक  सदन में पास नहीं करा पाए उस बिल को पी एम् नरेंद्र मोदी ने एक झटके में  दोनों सदनों में पास करा दिया | बीजेपी सरकार ने ऐसी स्थितियां निर्मित कर दी थी की सभी को बिल के समर्थन में आना पड़ा | 

                                           महिला आरक्षण बिल  के अनुसार यह परिसीमन के बाद 2029 से लागू होगा | पर विपक्षी दल के नेताओं को लगता है कि इससे  बीजेपी 2023 ,2024 और 2029 के चुनावों  में  लाभ ले लेगी |  ये नेता यह भी जानते हैं कि परिसीमन की प्रक्रिया चुनाव आयोग करता जिसमे सरकार का दखल ना के बराबर होता है | सदन में भी विपक्षी दल के नेताओं को यह बात सरकार ने समझाने का  जतन भी  किया था | इस मुद्दे को लेकर जिस तरह से राजनैतिक बयान बाजी हो रही हैं उससे तो यही लगता है कि सरकार अपनों को ही सही ढंग से समझा नहीं पाई | 

 सन्यासी  उमा भारती  ओबीसी नेताओं के साथ  बैठक करती  है. और दावा करती हैं  की 60% आबादी को उनके अधिकार दिलाकर रहूंगी.| साध्वी उमा ने   33%  में से 27% ओबीसी महिला  को आरक्षण की  मांग की साथ ही  मध्य प्रदेश में बीजेपी जनरल सीटों पर भी SC,ST और OBC को टिकट देने की मांग करते हुए कहा कि महिला आरक्षण बिल हम ओबीसी आरक्षण संशोधन के साथ ही लागू होने देंगे  | उनका यह बयान सीधे तौर पर मोदी सरकार को चुनौती देने वाला माना जा रहा है | उनके बयान बाजी के बाद सियासी दलों की राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन देखने को आने वाले समय में मिलेगा |  सियासत के जानकार मानते हैं कि उमा भारती दबाव की राजनीति करती हैं इसी के चलते उन्होंने अपने भतीजे राहुल को मंत्री बनवाया था | जब उन्हें लगने लगा कि  उनका दबाव काम करेगा तो उन्होंने मोदी सरकार के विरुद्ध ही मोर्चा खोल दिया | 

लोधी वर्ग की  उमा भारती  

 लोधी वर्ग से आने वाली साध्वी उमा भारती  जानती हैं कि  एमपी और यूपी में पिछड़ा वर्ग का  लोधी समाज  बीजेपी का एक बड़ा वोट बैंक है। इस वोट बैंक को बनाने में  बीजेपी  नेता कल्याण सिंह और उमा भारती की अहम भूमिका मानी जाती है | ये दोनों ही  अपने अपने राज्य में पार्टी का ओबीसी का बड़ा चेहरा थे । उमा भारती यह भी जानती हैं कि  कल्याण सिंह के बाद  लोधी समाज की वे ही  बड़ी नेता हैं | इसके बावजूद भी जब उन्हें पार्टी से विशेष महत्व नहीं मिला  तो उनका नाराज होना स्वाभाविक माना जाता है । यही कारण है कि वे समय समय पर   अपनी राजनैतिक शक्ति का प्रदर्शन करती रहती हैं | लोधी समाज के एक कार्यक्रम में तो उन्होंने यहां तक कह दिया था कि  चुनाव के समय मेरी फोटो दिखाकर लोधियों के वोट लिए जाते हैं।  सभाओं में हम  भाजपा के लिए वोट मांगेंगे, क्योंकि मैं पार्टी की निष्ठावान सिपाही हूं। फिर भी आप अपना हित देखकर वोट देना, क्योंकि आप भाजपा के निष्ठावान सिपाही नहीं हैं।

दरअसल साध्वी उमा भारती  जन आशीर्वाद यात्रा की शुरुआत का निमंत्रण नहीं मिलने  से नाराज हो गई थी | उन्होंने   दिग्गज नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। उमा को यहाँ तक कहना पड़ा था कि  औपचारिकता ही  निभा देते  भले ही  आने के लिए मना कर देते,  मैं नहीं आती।  ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सरकार बनवाई तो हमने भी बीजेपी को एक पूरी सरकार बनाकर दी थी। वर्तमान में मध्य प्रदेश की एक दर्जन से ज्यादा सीटें ऐसी हैं जहाँ  लोधी समाज के मतदाता हार जीत में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं | इसी को देखते हुए उन्होंने अपने 19 समर्थकों को टिकट के लिए दावेदारी भी ठोकी है | बीजेपी भी यह जानती है कि उमा भारती को एकदम से अलग करना पार्टी के लिए नुकसानदायक हो सकता है इसी को देखते हुए उनकी बात को पार्टी और शिवराज सरकार द्वारा  अनदेखा भी नहीं किया जाता है | मामला चाहे प्रीतम लोधी का हो अथवा शराब  का | शिवराज को अपना बड़ा भाई कहने वाली उमा भारती यह भी कहती हैं अगर शिवराज कहेंगे तो प्रचार करने भी जाउंगी | शिवराज भी यह जानते हैं कि उमा जी का स्वास्थ  इतना अच्छा नहीं है कि उन्हें पहले से चुनावी प्रचार में लगा दिया जाए और  एन  वक्त पर उन्हें कोई समस्या हो जाए | 

बुंदेलखंडी साध्वी उमा भारती 

बुंदेलखंड  के टीकमगढ़ जिले के डूंडा गाँव की रहने वाली उमा भारती  ने अपनी राजनैतिक यात्रा 1984 से शुरू की थी | २५ वर्ष की उम्र में उन्होंने पहला लोकसभा चुनाव लड़ा और कांग्रेस की विद्यावती चतुर्वेदी से चुनाव हार गई थी | 1989 में  उन्होंने विद्यावती को हराकर अपनी हार का बदला चुकता कर लिया था | 1991, 1996 और 1998 के चुनावों में इस सीट से लगातार जीती । 1999 में वे भोपाल लोकसभा से चुनी गई | 2003 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने उमा भारती को मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में मैदान में उतारा था | इस चुनाव में उनके प्रचार अभियान ने कांग्रेस की दिग्विजय सरकार को इतनी बुरी तरह से पराजित किया कि दिग्विजय ने १० वर्ष तक कोई चुनाव ना लड़ने की बात कह डाली | मध्य प्रदेश की मुख्य मंत्री बनी आजादी के बाद पहली बार बुंदेलखंड को यह बड़ा दाइत्व मिला था , पर दुर्भाग्य से यह बुंदेलखंड के भाग्य में नहीं रहा | 1994 के हुबली के  मामले में उनके विरुद्ध  गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ  था , अगस्त 2004 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। कुछ समय बाद ही पार्टी से उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया | उन्होंने राम रोटी यात्रा भी निकाली , 2006 में उन्होंने अपनी खुद की पार्टी भारतीय जनशक्ति पार्टी भी बनाई | जिन लोगों के सहयोग से उन्होंने यह पार्टी बनाई थी वह भी ज्यादा दिन तक उनके साथ नहीं रहे | 2008 के चुनाव में उन्होंने अपने प्रत्याशी भी उतारे थे | 2011 में अपनी पार्टी का बीजेपी में विलय कर दिया और बीजेपी ने २०१२ में उन्हें उत्तर प्रदेश के चरखारी विधानसभा से प्रत्याशी बनाया | 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्हें झांसी लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीती |  बीजेपी की नरेंद्र मोदी  सरकार में केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्री बनाया गया |  2019 में उमा भारती को भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष के पद पर नियुक्त किया गया था ।2019 के लोकसभा चुनावों के  पहले उन्होंने घोषणा कर दी कि वह चुनाव नहीं लड़ेंगी | 

                                                    अपने राजनैतिक जीवन से लेकर सामाजिक जीवन में अनेको उतार चढ़ाव देखने वाली साध्वी उमा श्री भारती को  एक जुझारू नेता के रूप में  जाना जाता है | 

EL_2023 बुंदेलखंड में बदलाव की बयार

 बुंदेलखंड की डायरी

EL_2023 बुंदेलखंड में  बदलाव की बयार 

रवीन्द्र व्यास 

2/10/23

  बुंदेलखंड में जैसे जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं , बदलाव की बयार हर स्तर  पर देखने को मिलने लगी है |  सागर संभाग के नेताओं में भी बदलाव का असर तो काफी पहले से  था ,| सागर के कई नेताओं ने कांग्रेस पार्टी से पाला बदल कर बीजेपी का दामन थामा तो कुछ ने बीजेपी त्याग कर कांग्रेस का दामन थामा | दमोह ,टीकमगढ़ ,निवाड़ी पन्ना के बाद अब छतरपुर में भी बदलाव की बयार ने असर दिखाना शुरू कर दिया है | हाल ही में बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष डॉ घासीराम पटेल ने बीजेपी से त्याग पत्र दे दिया | जिले के कुछ और बीजेपी नेताओं और कांग्रेस के कुछ नेताओं के भी हृदय परिवर्तन की चर्चाएं जोरों पर हैं | 

 भारतीय जनता पार्टी के दो बार  जिलाध्यक्ष और एक बार खजुराहो विकाश प्राधिकरण के अध्यक्ष  रह चुके डॉ  घासीराम पटेल ने एक बार  फिर  भारतीय जनता पार्टी से नाता तोड़ लिया  है। डॉ पटेल  अपने इस कदम के लिए एक तरह से संघठन  और आला नेताओं को ही दोषी मानते हैं |  दरअसल  २०१८ के चुनाव में राजनगर विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी हमेशा की तरह कांग्रेस से हार गई थी | सियासी जानकारों का कहना है कि बीजेपी के आला नेताओं ने इस पराजय के लिए उन्हें ही दोषी ठहराया था | इस बार वे बीजेपी से सशक्त दावेदार थे , कहते हैं को जो पहली सूचि जारी होना  थी उसमे डॉ पटेल का नाम था, पर  एन  मौके पर उनका नाम काट दिया गया | इसके पीछे सियासी कारण बताये जाते हैं कि बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा नहीं चाहते थे कि राजनगर से अरविन्द पटेरिया के अलावा किसी और को प्रत्यासी बनाया जाए |  दूसरी सूचि में  अरविन्द पटेरिया का नाम घोषित हो गया | इस घोषणा के बाद से ही अटकलें लगने लगी थी कि अब घासीराम जी बीजेपी को राम राम कह  ही देंगे  , और हुआ भी वही |  असल में वे यह जानते हैं कि अरविन्द पटैरिया ने अपने पिछले पांच साल के काल में जो  अच्छा बुरा किया है उसका खामियाजा पार्टी को भुगतना  होगा और उसका दोष पटेल के सर पर आता ,  इसीलिए उन्होंने पार्टी से दूर होने में ही अपनी भलाई समझी | हालंकि यह उनकी कोई पहली बगावत नहीं है , 1998 के चुनाव में भी उन्होंने बगावत की थी और निर्दलीय प्रत्यासी के रूप में छतरपुर विधानसभा सीट से  चुनाव लड़ा था , चुनाव में उन्हें  ५८३६ वोट से ही संतोष करना पड़ा था | इस चुनाव में बीजेपी के उमेश शुक्ला चुने गए थे | 

                     डॉ पटेल , बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष वी डी शर्मा के संसदीय क्षेत्र राजनगर विधानसभा क्षेत्र के रहने वाले हैं | शर्मा जी के खजुराहो संसदीय क्षेत्र में यह कोई पहली बगावत नहीं है इसके पहले अजा के लिए सुरक्षित पन्ना जिले की गुनौर विधान सभा सीट पर भी बगावत देखने को मिली थी | यहाँ के पूर्व विधायक महेंद्र बागरी ने बीजेपी छोड़ कांग्रेस का दामन थाम लिया है | पवई  के लिए अपनी दावेदारी जाता रहे डॉ अमित खरे ने बीजेपी छोड़ समाजवादी पार्टी की सदस्य्ता ले ली | सपा के अध्यक्ष और  उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के खजुराहो दौरे के दौरान उन्होंने  समाजवादी पार्टी की सदस्यता ली। खरे भाजपा चिकित्सा प्रकोष्ठ के जबलपुर इकाई में सहसंयोजक थे । पिछले एक वर्ष से वे अपने गृह क्षेत्र पवई  में अपनी राजनैतिक जमीन  तैयार कर रहे थे | 

                   समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव  अपने दल बल के साथ  मध्यप्रदेश के दौरे पर आए थे, खजुराहो में उन्होंने कई मायूस  कांग्रेस और बीजेपी नेता जिनमे कांग्रेस के शंकर प्रताप सिंह बुंदेला , डीलमणि सिंह , बीजेपी के घासीराम पटेल जैसे नेताओं को  सियासी संजीवनी प्रदान की | हालंकि बाद में शंकर प्रताप सिंह ने कहा कि हम ना तो प्रत्याशी थे और ना हैं, हम तो सामान्य शिष्टाचार मुलाकात के लिए  गए थे |  

 खजुराहो में  समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पत्रकारों के सवालों के  जवाब तो दिए पर अहम् मुद्दों पर वे बातों को घुमाते रहे | हालंकि उन्होंने यह जरूर कहा कि  मध्य प्रदेश में समाजवादी पार्टी  उन स्थानों पर प्रमुख तौर पर चुनाव लड़ेगी जहां बीजेपी को हम हारने की स्थिति में होंगे । पर इंडिया गठबंधन के साथ एमपी में सीटों के बंटवारे पर उन्होंने कोई साफ़ जबाब नहीं दिया, हालांकि इस मसले पर  सियासी तौर पर यह माना जा रहा है कि उनकी बात कांग्रेस से चल रही है और यही कारण है कि सपा ने कुछ सीटों की घोषणा के बाद  एक तरह से वेट एन्ड वॉच की पॉलसी अपना ली है  |  चुनावी दौर में सक्रियता दिखाने वाली सपा के अखिलेश को  मध्य प्रदेश में समाजवादी पार्टी के लिए एक बड़ी गुंजाइश नजर आती है, कहसकर उत्तर प्रदेश से सटे इलाकों में  | पत्रकार वार्ता में वे बीजेपी पर हमलावर रहे तो कांग्रेस पर कटाक्ष करने भी नहीं चूके | 

आक्रोश यात्रा : बीजेपी की जन आशीर्वाद यात्रा के बाद कांग्रेस ने जन आक्रोश यात्रा निकाली है | इस यात्रा का जगह कांग्रेस के नेताओं ने स्वागत भी किया | दोनों ही यात्राओं में जुड़ा "जन" यात्रा में नदारद  रहा | पार्टी के नेता और कार्यकर्ता  अपना आक्रोश व्यक्त करते जरूर नजर आये | हालंकि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव के व्यक्तिगत प्रभाव का असर उनकी आक्रोश यात्रा में जरूर देखने को मिला | उनके साथ जुटी भीड़ उन लोगों की जरूर थी जो पार्टी से टिकट की दावेदारी कर रहे हैं | जहाँ जान आशीर्वाद यात्रा में विकाश की बात हुई वही आक्रोश यात्रा में भ्रष्टाचार , बढ़ती महंगाई , बेरोजगारी ,जैसे प्रमुख मुद्दे हावी रहे , वही सागर के खुरई और बिना इलाके में राजनैतिक आतंकवाद प्रमुखता से रहे |  

                                            सियासत के इन समीकरणों के बीच अगर देखा जाए तो दोनों ही प्रमुख दल  कांग्रेस और बीजेपी में आंतरिक अंतरकलह  जम कर है | बीजेपी इस पर लगाम लगाने के लिए तरह तरह के जतन  भी कर रही है | वहीँ  कांग्रेस इस मामले में कमजोर साबित हो रही है | बीजेपी का सारा ध्यान अब जिला और ग्राम स्टार के उन प्रमुख मुद्दों की ओर है जो उसके लिए नुकसानदायक साबित हो सकते हैं |  

EL_2023_बुंदेलखंड में २०२३ के चुनाव एक बड़े परिवर्तन का आगाज

 

EL_2023_ बुंदेलखंड की डायरी 

बुंदेलखंड में २०२३ के चुनाव एक बड़े परिवर्तन का आगाज 

रवीन्द्र व्यास 

 देश प्रदेश के साथ बुंदेलखंड में जब भी  चुनावी दौर आता है तो कई तरह के परिवर्तन देखने को मिलते हैं | ये वो दौर होता जब लोगों के साथ दलों के चाल चरित्र और चेहरे भी जन मानस  के सामने आ जाते हैं | 2023 का ये चुनाव  सियासी लिहाज से बड़े परिवर्तन का सन्देश देने वाला होगा | मध्य प्रदेश के दोनों प्रमुख दल हर कीमत पर सत्ता  पर कब्जा करना चाहते हैं , इसके लिए कोई मुफ्त की गारंटी दे रहा है , तो कोई कर्ज लेकर मुफ्त की रेवड़ियां बाँट रहा है , वहीँ  कुछ दल ऐसे भी हैं जो देश और जातियों को बांटने में लगे हैं ||  बगैर यह जाने कि इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे | इसी तरह स्थानीय स्तर के नेता भी अपनी अहमियत जताने से नहीं चूक रहे हैं किसी को धन का अभिमान है तो किसी को अपनी बिरादरी का अहंकार है |                                      

एक बार फिर बुंदेलखंड से  बनेगा  मुख्यमंत्री ?

पिछले माह जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मध्यप्रदेश के दौरे पर आये थे तो उन्होंने पत्रकारों के एक सवाल पर  जवाब  दिया था कि अभी तो शिवराज मुख्यमंत्री हैं ,आगे कौन होगा इसे पार्टी तय करेगी |  इसके बाद जब बीजेपी ने दूसरी सूची जारी की तो तीन केंद्रीय मंत्रियों सहित 7 सांसदों को विधानसभा का टिकट देकर चुनाव मैदान में उतार दिया | बीजेपी की इस सूची को देखकर कई तरह की  अटकलें लगाई जाने लगी है |  बीजेपी की इस रणनीति का असर जमीनी धरातल पर भी साफ़ दिखाई देने लगा है | अलग अलग इलाकों के प्रमुखों को टिकट देने का असर यह हुआ कि हर क्षेत्र से  मुख्यमंत्री के दावेदार नजर आने लगे | पर इतना तो तय है कि बीजेपी  मुख्य मंत्री चयन में भी 2024 के लोकसभा के सियासी समीकरणों को साधेगी | 

                              बुंदेलखंड के दमोह लोकसभा से सांसद और केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल को नरसिंहपुर से  चुनावी मैदान में उतारा है | प्रहलाद पटेल लोधी समाज से ताल्लुक रखते हैं | बीजेपी की नजर काफी पहले से इस समाज को अपने से जोड़े रखने की थी | यही कारण है कुछ समय पहले उनको बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाने की चर्चा जोरों पर थी पर बाद में बीजेपी की ही एक नेता के विरोध के चलते उनकी नियुक्ति पर विराम लग गया था | विधानसभा चुनाव में उनको उतारने के बाद पार्टी ने कई लोगों को सीधा सन्देश दे दिया है | प्रदेश की एक  नेता  जो  कभी हिंदुत्व के  पैरोकार के रूप में जाने जाते थे |  वर्तमान  समय में  वे सिर्फ अपनी बिरादरी तक सिमित हो गए उन्हें भी यह बता दिया गया कि उनके विकल्प कई हैं | दरअसल प्रह्लाद पटेल बीजेपी के उन नेताओ में हैं जिनकी राजनैतिक छवि कर्मवीर की और बेदाग़ मानी जाती है | 

पटेल के बाद  बुंदेलखंड के ही रहली से विधायक और प्रदेश सरकार में मंत्री गोपाल भार्गव भी मुख्य मंत्री की दौड़ में शामिल हैं | भार्गव जी ने विधानसभा क्षेत्र  के रहली में  देवी सिद्ध पीठ टिकीटोरिया में  रोपवे निर्माण के लिए भूमि पूजन करने गए थे |  यहाँ  जन समूह को संबोधित करते हुए उन्होंने  लोगों को यह जताने का प्रयास किया कि  यह चुनाव हम  गुरु जी के आदेश पर लड़ रहे और यह अंतिम चुनाव होगा | प्रदेश में  किसी को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट  नहीं करना और    गुरु का आदेश ,, हो सकता है और गुरु की कुछ इच्छा हो ईश्वर की तरफ से यह बात आई हो | उन्होंने कहा कि  भगवान ने तो मुझे सब कुछ बनाया है नगर पालिका अध्यक्ष बनाया इतने साल विधायक और मंत्री  बनाया |   सबसे बड़ा पद जो मुख्यमंत्री के बराबर होता है मुझे नेता प्रतिपक्ष बनाया |  हर चीज का मुहूर्त होता है हो सकता है कि मेरी हस्तरेखा में भाग रेखा में ना हो लेकिन समय पता नहीं कब कैसा आ जाए तो हो सकता है जगदंबा जी के  परिसर से आपकी आवाज सुन ली जाए ,| 

भाजपा और कांग्रेस  नेता की हाथी की सवारी 

छतरपुर जिले के बीजेपी के पूर्व जिला अध्यक्ष डॉ घासीराम पटेल और कांग्रेस नेता डीलमणि सिंह खजुराहो गए तो थे साइकिल की सवारी करने पर दोनों ही नेताओं को जेट युग में साइकिल की सवारी रास नहीं आई , अब दोनों ही हाथी पर सवार हो गए | कल तक जो राजनैतिक विरोधी थे अब राजनैतिक मित्र हो गए | दोनों की मित्रता छतरपुर जिले के राजनगर और छतरपुर विधानसभा क्षेत्र में एक अलग तरह के समीकरण बनेंगे  |  अब घासीराम राजनगर से ,वही डीलमणि सिंह छतरपुर से  चुनावी मुकाबले में कांग्रेस और बीजेपी  को  चुनौती देंगे | 

 सागर जिले की बंडा विधानसभा में भी  भाजपा को बड़ा झटका लगा है, | यहाँ भूपेंद्र सिंह के खास और  पूर्व भाजपा मंडल अध्यक्ष रंजोर सिंह बुंदेला ने भी बीजेपी से नाता तोड़ लिया है | उन्होंने  प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देकर  बंडा विधानसभा से बहुजन समाज वादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर उन्होंने चुनाव लड़ने का ऐलान किया है | वहीँ छतरपुर जिले के पूर्व किसान मोर्चा अध्यक्ष गोविन्द सिंह टूरया ने भी बीजेपी की प्राथमिक सदस्य्ता से त्यागपत्र दे दिया है | आने वाले समय में बीजेपी के एक पूर्व  विधायक की भी बीजेपी छोड़ने की चर्चा  जोरों पर है | 

टिकट घोषित करने में बीजेपी ने बड़ाई बढ़त 

मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों को लेकर बीजेपी ने प्रत्याशी  घोषित करने में जिस तरह से तेजी दिखाई है उससे बीजेपी ने एक तरह से बढ़त जरूर बनाई है |  भाजपा ने सागर की रहली विधानसभा से 8 बार से लगातार विधानसभा चुनाव जीत रहे पीडब्ल्यूडी मंत्री गोपाल भार्गव को , खुरई विधानसभा से मंत्री भूपेंद्र सिंह  का सांतवा चुनाव है ।  सुरखी से चार चुनाव ,और खुरई से लगातार तीसरा चुनाव लड़ेंगे ।  सुरखी विधानसभा से मंत्री गोविंद सिंह राजपूत को मैदान में उतारा है। मंत्री गोविंद सिंह का यह  सातवां चुनाव होगा। इसमें उपचुनाव भी शामिल है। पांच चुनाव  कांग्रेस के टिकट पर लड़े थे ।  सागर  विधायक शैलेंद्र जैन और नरयावली से विधायक प्रदीप लारिया  दोनो लगातार चौथी दफा चुनाव मैदान में उतरे है। 

सागर की देवरी और बंडा विधानसभा में भाजपा पहले ही प्रत्याशी घोषित कर चुकी है।  देवरी विधानसभा सीट पर  कांग्रेस से बीजेपी में आये  बृज बिहारी पटेरिया को  टिकट दिया गया है । उनका मुकाबला यहां के दो बार से लगातार विधायक रहे कांग्रेस के हर्ष यादव से होगा |    बंडा से पूर्व सांसद और विधायक स्व शिवराज सिंह लोधी के पुत्र  वीरेंद्र सिंह लोधी को प्रत्याशी बनाया है।  वीरेंद्र सिंह को बीजेपी के आंतरिक असंतोष का सामना करना पद सकता है | 

बीजेपी  छतरपुर जिले की बड़ामलहरा विधानसभा सीट से प्रदुम्न लोधी को वही टीकमगढ़ जिले की खरगापुर सीट से उमाभारती के भतीजे और मंत्री  राहुल सिंह  लोधी को ,पन्ना से मंत्री ब्रजेन्द्र सिंह को प्रत्यासी बनाया है | बीजेपी दमोह  की पथरिया सीट पर ही प्रत्यासी घोषित कर पाई है | बीजेपी के लिए चुनौती पूर्ण सीटों में शुमार निवाड़ी , पृथ्वीपुर , बीना , टीकमगढ़ , जतारा , पवई , हटा ,दमोह , जबेरा और छतरपुर  जिले की बिजावर ,और  चंदला विधानसभा   हैं |  

बसपा ने पथरिया से  एक बार फिर रामबाई परिहार पर विश्वास जताया है, छतरपुर से डीलमणि सिंह ,राजनगर से डॉ घासीराम पटेल ,और खरगापुर से हृदेश कुशवाहा को प्रत्याशी बनाया है | आम आदमी पार्टी ने भी अपने प्रत्याशी घोषित किये हैं , बिजावर से अमित भटनागर  छतरपुर विधानसभा से  सरपंच संघ के जिला अध्यक्ष भागीरथ पटेल , बड़ा मलहरा से  चंदा किन्नर को अपना प्रत्याशी बनाया है,|  आम आदमी पार्टी रामजी पटेल को पहली सूची में ही अपना प्रत्याशी घोषित कर चुकी है छतरपुर जिले की 6 सीटों में से आप चार सीटों पर  अपने प्रत्याशी घोषित कर प्रत्याशी घोषणा में कांग्रेस व भाजपा सहित सभी दलों को काफी पीछे छोड़ चुकी है

 किसका असर कौन रहेगा बेअसर 

2023 के चुनाव को लेकर लोगों ने देखा  सरकार के खुले खजाने को जिसने बुंदेलखंड में लाखों करोड़ की योजनाओं का भूमि पूजन ,और लोकार्पण देखे हैं | वहीँ कांग्रेस भी मतदाताओं को खरीदने बनाम लुभाने में पीछे नहीं रही |   चुनाव परिणाम बताएँगे कि विकाश पर भारी क्या होगा | 

01 जून, 2023

Political_नेताओं की अंतर्कलह की आग में तपता बुंदेलखंड

 



नेताओं  की अंतर्कलह की आग में तपता बुंदेलखंड 

रवीन्द्र व्यास 

इन दिनों बुंदेलखंड प्रकृति के प्रचंड ताप से तप रहा है , वहीं राजनेता चुनावी ताप और अंतरकलह की आग  से तप रहे हैं | बीजेपी  जैसे जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं रूठने मनाने का सिलसिला जारी  है, | मुख्य मंत्री शिवराज सिंह ने बीते  ९ दिनों में बुंदेलखंड के ३ दौरे कर यह जताने का प्रयास किया है कि  हर कीमत पर चुनाव जितना है  | इस दौरान उन्होंने सैकड़ों करोड़ की योजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण भी किया | महाकाल लोक की तर्ज पर बुंदेलखंड में भी कई लोक बनाये जाने के सब्ज बाग़ भी दिखाए | असल में कर्नाटक का करेंट इतना तेज लगा है कि कोंग्रेसी बौरा गए हैं तो बीजेपी विचलित हो गई है | जिसका असर लोक व्यवहार में दिखने लगा है |  

                                 

 सागर जिला संभाग का सबसे बड़ा जिला है यहां से तीन कैबिनेट मंत्री सरकार में हैं | यहाँ  पिछले एक दशक से जिस तरह के हालात बीजेपी  के नेताओं ने देखे और समझे उसको लेकर असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है |  यहां की खुरई विधानसभा से चुने गए बीजेपी के प्रमुख नेता और मंत्री भूपेंद्र सिंह की अपने ही जिले के मंत्री गोपाल भार्गव और गोविन्द राजपूत और विधायक प्रदीप लारिया , शैलेन्द्र जैन और महेश राय से नहीं बनती | असंतोष इतना बड़ा कि पिछले दिनों भोपाल में हुई केबिनेट बैठक के बाद लोकनिर्माण मंत्री गोपाल भार्गव , राजस्व मंत्री गोविन्द राजपूत और विधायक शैलेन्द्र जैन ,प्रदीप लारिया  मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान  से मिलने पहुँच गए | इन लोगों ने नगरीय विकास मंत्री भूपेंद्र सिंह पर अनेकों गंभीर आरोप लगाते हुए  साफ़ कह  दिया कि  सागर के हालात अगर नहीं सुधरे और भूपेंद्र सिंह को नहीं समझाया गया तो हम लोग सामूहिक इस्तीफा देने को मजबूर होंगे | बीजेपी के ये नाराज नेता प्रदेश संगठन मंत्री हितानन्द , और प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष वी डी शर्मा से भी मिले | 

हालंकि बाद में मंत्री गोपाल भार्गव ने एक बयान जारी कर स्पष्ट किया कि बैठक में  चुनावी चर्चा हुई , हमने बीते ४३ वर्षों में पार्टी की सेवा अपनी माँ की तरह से की है , बीजेपी के सभी मंत्री विधायक एक मुट्ठी की तरह हैं | उनका यह बयान जारी होने के दूसरे ही दिन गोविन्द राजपूत के पुत्र आकाश राजपूत का एक स्क्रीन शॉट वायरल होने लगा कि " अच्छा है हम खुरई में नहीं हैं ,वरना बात करने पर जेल चले जाते " हालंकि बाद में आकाश ने अपनी यह पोस्ट डिलीट कर दी | इस पर गोविन्द राजपूत ने साफ़ कहा कि ऐसी टिपण्णी नहीं करनी चाहिए | आकाश का यह विवाद शान्त भी नहीं हुआ था कि  सागर बीजेपी के जिला मंत्री देवेंद्र फुसकेले ने फेसबुक पर खुरई में चल रही तालिबानी विचारधारा पर लिख डाला | उन्होंने लिखा कि "" श्री बागेश्वर धाम की कृपा से खुरई क्षेत्र में चल रही तालिबानी विचारधारा से शीघ्र मुक्ति ,आप सभी का कल्याण , साधु जी सीताराम \\ |  

                                               दरअसल सागर  में जो कुछ भी होता है उसका असर  देर सवेर  संभाग के अन्य जिलों में भी देखने को मिलता है |  सागर के लोग और यहाँ के बीजेपी नेता  इस बात को बहुत अच्छे से जानते हैं कि  यहां  मंत्री भूपेंद्र सिंह किसके इशारे पर इतने  बलशाली हुए , और किसके इशारे पर  सागर के अन्य नेताओं और मंत्रियों को उपेक्षित किया गया  | इसमें  लोग सीधे तौर पर सीएम शिवराज सिंह चौहान का नाम लेने से भी संकोच नहीं करते | दूसरी तरफ अगर कांग्रेस को देखा जाए तो पिछले दिनों जब यहां कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने दौरा किया था उनके निशाने पर मंत्री भूपेंद्र सिंह ही थे | दिग्विजय ने खुरई विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेसियों पर दर्ज हो रहे झूठ प्रकरण के मुद्दे पर मंत्री भूपेंद्र सिंह पर निशाना साधा था |  अब तो बीजेपी के नेता ही कहने लगे हैं कि खुरई में तालिबानी विचारधारा चल रही है | पिछले दिनों सागर दौरे पर आये  बीजेपी के संघठन से जुड़े  एक पदाधिकारी ने सागर में चल रहे इस संघर्ष को महीनो पहले समझ लिया था सूत्रों की माने तो उन्होंने भूपेंद्र सिंह को सीधे तौर  पर समझाइस और चेतावनी भी दी थी , इसकी जानकारी  भी सीएम को दी गई थी | चुनाव के तीन माह पहले बीजेपी के अंदर मचे  घमासान को लेकर बीजेपी के सामने स्थिति " इधर गिरें तो कुआं उधर गिरें तो खाई " वाली हो गई है    ? 

 

 विवादों के बीच  बुंदेलखंड के गढ़ को मजबूत बनाने के लिए  मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान जुटे हैं | 9 दिनों में  बुंदेलखंड के  तीन  जिला का दौरा कर उन्होंने करोड़ों की योजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण किया | पन्ना में महराज छत्रसाल की जयंती पर पन्ना गौरव दिवस मनाया गया | यहां उन्होंने घोषणा की पन्ना में बाबा महाकाल की तर्ज पर  जुगल किशोर लोक बनाया जाएगा | पन्ना में भी लोगों ने मेडिकल कालेज की मांग की इस पर  मुख्यमंत्री  श्री चैहान ने कहा कि जब 10 लाख तक की आबादी वाले शहरों जिलों में मेडिकल काॅलेज खोले जाने का फैसला होगा, तब उसमें पन्ना को भी शामिल किया जाएगा। दरअसल मेडिकल कालेज की ऐसी मांग है जिसकी हर जिले से मांग उठ रही है |  पन्ना आने के चार दिन  पहले  ही सीएम पृथ्वीपुर गए थे वहां उन्होंने कहा की 500 करोड़ से अधिक की लागत से ओरछा में राम राजा लोक का निर्माण किया जाएगा | 

      जाएगा निवाड़ी आने के तीन दिन पहले ही वे सागर आये थे उन्होंने सागर में उन्होंने कुशवाहा समाज के सम्मलेन में हिस्सा लिया और यहाँ उन्होंने लवकुश मंदिर बनाने के लिए 10 रूपये की राशि देने की घोषणा की | जिसमे 5 करोड़ की राशि मंदिर के लिए और 5 करोड़ की राशि धर्मशाला बनाने पर व्यय  होगी | कुशवाहा समाज कल्याण बोर्ड के गठन की घोषणा भी की | इसी दिन उन्होंने मुख्य मंत्री किसान ब्याज माफ़ी योजना का भी शुभारम्भ किया | सागर जिले की 866 करोड़ की तीन नल जल योजना का  भूमि पूजन किया |   करोड़ों की योजनाओं के माया जाल  का कितना असर होगा मतदाताओं पर होगा यह आने वाला वक्त ही बताएगा |


                               बीजेपी में  विवाद के हालातों के बाद  कांग्रेस के नेता जरूर खुश हैं , पर अंदरूनी हालात कांग्रेस के भी कुछ कम नहीं है | कांग्रेस में भी अंतर्कलह खुलकर सामने आने लगा है | इसकी बानगी संभाग के प्रभारी के सामने भी  कई जिलों में देखन को मिले हैं | कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद से तो कांग्रेस के नेता कुछ ज्यादा ही उत्साहित हो गए हैं ,  यही कारण है कि पिछले कुछ दिनों में चुनावी रण में उतरने वाले दावेदारों की संख्या बड़ी है , जो ना सिर्फ दीवाल लेखन कर रहे हैं बल्कि गाँव गाँव जनसम्पर्क अभियान में भी जुटे हैं | कांग्रेस में बढ़ते दावेदारों के कारण अब कांग्रेस में गुटबाजी भी खुलकर सामने आने लगी है | जिसका नुक्सान कांग्रेस को उठाना पढ़ सकता है | 

                       दरअसल इन दिनों बुंदेलखंड में  सत्ता  के समीकरण  कांग्रेस के अनुकूल माने जा रहे हैं  इसके पीछे  लोग  अपने अपने तरह से कारण भी  बताते हैं | 

   

 

Political_BINA_35बीना विधानसभा क्षेत्र _ आसान नहीं है बीजेपी के इस गढ़ को तोड़ना


  35_बीना (क्रं.35 )  

 मध्यप्रदेश के   सागर   जिले की 8  विधानसभा सीटों में से एक  बीना  विधानसभा  सीट है  |  बुंदेलखंड  की  सबसे चर्चित सीटों में शुमार यह विधानसभा क्षेत्र   एक अलग राजनैतिक चरित्र के लिए जाना जाता  है   |  2003 तक यह विधानसभा क्षेत्र सामान्य रहा इस दौरान यहां से अनेकों दिग्गज विधान सभा में पहुंचे |  जनसंघ के भगीरथ बिलगैया , श्याम नारायण मुश्रान  , सुधाकर बापट , प्रभु सिंह ठाकुर , और  ब्रजकिशोर पटेरिया  जैसे राजनेता विधानसभा पहुंचे इनमे से ज्यादातर मंत्री भी बने  |   परिसीमन के बाद 2008  में इसे अजा  के लिए सुरक्षित कर दिया  गया |  1977 के बाद से ही यह  बीजेपी के  बर्चस्व वाली विधानसभा सीट बन गई  |  अजा के लिए सुरक्षित  सीट होने के बाद भी यहाँ बीजेपी का ही कब्जा रहा | पिछले दस चुनावों में यहां से एक बार जनता पार्टी ,दो बार कांग्रेस और ७ बार बीजेपी जीती है | 2018 के चुनाव में   बीजेपी के महेश राय  के मामूली अंतर से जीतने के कारण अब हर कोई यहां से अपनी दावेदारी जाता रहा है | 

 बीना का  अपना एक अलग  राजनैतिक और  ऐतिहासिक महत्व है |  यहाँ  लगी बीना रिफाइनरी के कारण इसे देश दुनिया में जाना पहचाना जाता है | इसी विधानसभा क्षेत्र की  ऐतिहासिक धरोहर  एरण  है ,  जिसका वर्णन पुराण में भी मिलता है , यह भी कहा जाता है कि  देश में पहली सति यहाँ के एरण में ही हुई थी | बीना के निकट खिमलासा का किला एक महत्वपूर्ण स्थल है |  बीना भी गेहूं की श्रेष्ठ फसलों के लिए प्रसिद्ध है | बीना रेलवे जंक्शन के कारण यहां की अपनी एक अलग पहचान है |  राजनैतिक तौर पर यह इलाका गुना अशोक नगर क्षेत्र से लगा होने के कारण यहाँ सिंधिया राजघराने का  भी वर्चस्व माना जाता है | ग्रामीण क्षेत्र वाले इस  विधानसभा क्षेत्र में बीना तहसील और खुरई तहसील के  खिमलासा आर आई सर्कल के गाँव आते हैं | 


1962  में  अस्तित्व में आई बीना   विधानसभा सीट  से पहला विधायक जनसंघ पार्टी के भागीरथ रामदयाल बिलगैया  को चुना गया , हालांकि वे 1977 में जपा के टिकट पर भी चुनाव जीते || 1962 से 2003 तक यह सामान्य सीट रही | परिसीमन के बाद २००८ के चुनाव में यह अजा के लिए सुरक्षित विधानसभा सीट हो गई |  1977 से अब तक हुए विधानसभा के दस चुनावों में यहाँ से कांग्रेस के अरविंद भाई 1980 और प्रभु सिंह ठाकुर 1993  में चुनाव जीते |  बीजेपी के सुधाकर बापट यहाँ से तीन बार विधायक चुने गए    १९८५. 1990 और 1998 में  , 2003 में सुशीला राकेश सिरोठिया  यहां से चुनाव जीती |2008 में अजा के लिए सुरक्षित होने के बाद यहां से बीजेपी की   से 2018 तक लगातर चुनाव जीत रही है | इसे एक तरह से बीजेपी का गढ़ माना जाने लगा है |  1998 से यहाँ बीजेपी लगातार चुनाव जीत रही है | 2013 में बीजेपी के महेश राय जीते तो 2018 में भी , पर उनके मत प्रतिशत में बड़ी गिरावट देखने को मिली वे  कांग्रेस के शशि कथोरिया से  मात्र 460  मत के अंतर से चुनाव पाए ,|  मत के आधार पर अगर कहा जाए तो इस विधानसभा क्षेत्र में  एक राजनैतिक परिवर्तन की आहट सुनाई दे रही है | जमीनी धरातल पर यहाँ के लोगों का मानना है की बीजेपी विधायक सहज सरल हैं | जबकि कांग्रेस के जिन प्रत्यासी शशि कथोरिया  ने जबरदस्त टक्कर दी थी वे भी सिंधिया के साथ बीजेपी में आ आगये | इस समय उन्हें बीजेपी का बड़ा दावेदार माना जा रहा है | 

अतीत को देखे तो    1998  के विधानसभा चुनाव में 5. 66  % वोट पाने वाली बीएसपी ने  2003 के चुनाव में 19. 96  फीसदी वोट लेकर त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बना दी थी | उस समय यह सामन्य सीट ही थी , दोनों ही दलों के सामने  एक बड़ी चुनौती बीएसपी के रूप में खड़ी हो गई थी | हालंकि मत प्रतिशत को लेकर बना यह संशय  2008 के चुनाव में भी देखने को मिला  था | 2008 में यह सीट अजा के लिए सुरक्षित हो गई थी और बीएसपी ने 20 . 74 फीसदी वोट लेकर कांग्रेस के सारे समीकरण बिगाड़ दिए थे | बीते २५ वर्षों से जिस विधानसभा सीट पर कांग्रेस लगातार हार का सामना कर रही है अब उस पर फिर कब्जा करने की जुगत में लगी है  

 1998  के विधानसभा चुनाव में 5. 66  % वोट पाने वाली बीएसपी ने  2003 के चुनाव में 19. 96  फीसदी वोट लेकर त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बना दी थी | उस समय यह सामन्य सीट ही थी , दोनों ही दलों के सामने  एक बड़ी चुनौती बीएसपी के रूप में खड़ी हो गई थी | हालंकि मत प्रतिशत को लेकर बना यह संशय  2008 के चुनाव में भी देखने को मिला  था | 2008 में यह सीट अजा के लिए सुरक्षित हो गई थी और बीएसपी ने 20 . 74 फीसदी वोट लेकर कांग्रेस के सारे समीकरण बिगाड़ दिए थे | 


 विधान सभा क्षेत्र में एक बड़ा मुद्दा बीना को जिला बनाने की मांग को लेकर है  | पिछले चुनाव के समय कम शिवराज सिंह ने यहां के लोगों को आशवस्त किया था कि बीना को जिला बनाया जाएगा | बीना वालों की यहाँ मांग बहुत पुरानी है | अब इस मांग को लेकर राजनीति भी खूब होने लगी है |  पिछले दिनों पूर्व मुख्य मंत्री ने बीना ने बीजेपी सरकार को इसी मुख्य मुद्दे पर आड़े हाथ लिया था , उन्होंने घोइश्ना भी की  कि कांग्रेस सरकार बानी तो बीना को जिला बनाया जाएगा जो उसका हक़ भी है |  राजनीति में  समय पर किया गया वार ज्यादा घातक होता है , कांग्रेस  ने इसी मौके का फायदा उठाया |  उसे मालुम था कि यहाँ के खुरई विधायक और मंत्री भूपेंद्र सिंह खुरई को जिला बनवाने के अभियान में जुटे हैं |     पानी ,बिजली , स्वास्थ्य ,शिक्षा, बेरोजगारी  जैसे बुनियादी मुद्दे  हैं |  बीना रिफायनरी में स्थानीय लोगों को रोजगार ना मिलना , सिचाई परियोजनाओ में विस्थापन का मुद्दा , एरण जैसे पुरातात्विक स्थल का विकाश ना हो पाना | ऐसे मुद्दे हैं जो लोगों को सोचने पर मजबूर कर देते हैं | 

 विधान सभा सीट पर जातीय समीकरण को लेकर क्षेत्र में लोगों की सक्रियता बड़ी है  | पिछले कुछ समय से यहाँ अहिरवार समाज से प्रत्यासी बनाये जाने की मांग तेजी से उभरी है | इसके अलावा यहाँ इस बात को लेकर भी लोगों में नाराजगी देखने को मिल रही है कि यहां की बीना रिफायनरी से उन्हें प्रदूषण तो मिल रहा है पर स्थानीय लोगों को रोजगार की दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं हुई है | बीना शहर में लोगों को अब रात में निकलने से डर लगता है , कारण हे आवारा कुत्ते जिनने  2021 में एक हजार ,2022 में 1250 लोगों को अपना शिकार बनाया |   सबसे बड़ी मांग और समीकरण बीना को जिला बनाये जाने की मांग को लेकर है जिसे लेकर यहाँ  ज्ञापन बाजी होती रहती है |  

                                                        लगभग पौने दो लाख मतदात वाले इस विधान सभा क्षेत्र में समय के साथ जातीय समीकरण भी अपना असर दिखाने लगे हैं | हिन्दू बाहुल्य विधान सभा क्षेत्र में 96 . 66 फीसदी हिन्दू हैं | जिनमे  सामान्य वर्ग में  38. 66  % ओबीसी- 35  %, एस सी. 21   % एस  टी 2   % अन्य 1 % मुस्लिम 2. 34   %

यहां की अधिकाँश आबादी  कृषि  और कारोबार पर आश्रित  हैं | बीना रिफाइनरी के कारण नगरीय क्षेत्र में बड़ी  संख्या में लोग नोकरियो और व्यापार पर आश्रित हैं |   वहीँ ग्रामीण क्षेत्र की आबादी पूर्णतः कृषि और कृषि मजदूरी पर आश्रित है | बीना  रेलवे का एक बड़ा जंक्शन है , | यहाँ के ग्रामीण इलाके में  अनाज के साथ दलहन और तिलहन का उत्पादन यहाँ के किसानो की आर्थिक समृद्धि का मुख्य आधार माना जाता है |  |  


बीना के अब तक के विधायक 

1962 _      भागीरथ बिलगैया     _ जनसंघ 

1964 उप    श्याम नारायण मुश्रान _ कांग्रेस 

1967         ब्रज किशोर पटेरिया  _  कांग्रेस 

1972         डालचंद्र भगवानदास  _कांग्रेस 

1977         भागीरथ बिलगैया  _    जनता पार्टी 

1980         अरविन्द भाई          _कांग्रेस 

1985        सुधाकर बापट         _ बीजेपी 

 1990         सुधाकर बापट        _ बीजेपी 

1993        प्रभु सिंह ठाकुर        _ कांग्रेस 

1998         सुधाकर बापट        _ बीजेपी  

2003  सुशीला राकेश सिरोठिया _ बीजेपी 

2008 (सु)  डॉ श्रीमती विनोद पंथी _बीजेपी 

2013 (सु) महेश  राय                _बीजेपी 

 2018  (सु) महेश  राय                 _बीजेपी 

                               दावेदारों  की दम :: बीजेपी  से अब यहां कई दावेदार उभरकर सामने आने लगे हैं जिनमे शशि कथोरिया , पूर्व विधायक धरमु राय अपने पुत्र को टिकट   दिलवाना चाहते हैं , इनके अलावा गजेंद्र राय का नाम भी सुर्ख़ियों में है | कांग्रेस से निर्मला सप्रे और उमा का नाम प्रमुख  तौर पर  बताया जा रहा है  | २०२३ की चुनावी बिसात इतनी आसान नहीं मानी जा रही है | इसके पीछे माना जा रहा है की बिना के सहज सरल महेश राय का अगर पार्टी टिकट काटती है तो इसका असर बिना के अल्वा खुरई में सबसे ज्यादा देखने को मिलेगा | 

 


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