20 मार्च, 2016

Bundelkhand Dayri


सामाजिकता से दूर  सामाजिक पंचायते  


रवीन्द्र व्यास
बुंदलेखंड में  गाँव और समाज की पंचायतों का अपना एक अलग महत्व छत्रसाल के शासन काल में रहा है गाँव -गाँव में छत्रशाली चबूतरों  पर पंच बैठ कर सामाजिक और आपसी संघर्ष का निपटारा करते थे पचो के निर्णय को राज्य की मान्यता थी और आज के दौर में पंचायत के फैसले सामाजिकता से दूर  ऐसे हो रहे हैं की सभ्य समाज शर्मिंदा हो रहा है
  पिछले दिनों  बुंदेलखंड  के   टीकमगढ जिले  मे एक महिला को  समाज की पंचायत के फैसले के कारण आत्महत्या  मजबूर होना पड़ा सामाज की पंचायत के फैसले के कारण आत्म हत्या का बुंदेलखंड इलाके में यह संभवतः पहला मामला है अब तक के  इस तरह के पंचायती फैसलों में  पंचायते  व्यक्ति और उसके परिवार को सामाजिक दंड  देकर अपनी चौधराहट कायम रखती थी
यह  व्यवस्था  बुंदेलखंड के ग्रामीण ही नहीं शहरी इलाकों में भी कई जगह देखने को मिल जाती है टीकमगढ़ की इस घटना के बाद एक और घटना छतरपुर नगर में सामने आई  जिसमे एक युवक की शादी सिर्फ इस कारण टूट गई क्योंकि उसके परिवार का हुक्का पानी समाज के लोगों ने बंद कर रखा था
  टीकमगढ़ के कारी बुजरुआ गाँव की  सखी पाल (३८) के  चरित्र पर पंचायत ने  ऊँगली उठाई थी   उस पर तीन हजार रु जुर्माना किया गया बाद में  दंड को अपर्याप्त मानते हुए   महिला को गाँव से कुंडेश्वर ( बुंदेलखंड का प्रमुख धर्म स्थल ) तक दंडवत करते हुए जाना - आना होगा, वहां का प्रसाद गाँव वालों को खिलाना होगा, इसके बाद भागवत कराने की सजा सुना  दी  झूठे चरित्र लांछन  ने  और इस कठोर दंड ने महिला को मौत को गले लगाने पर मजबूर कर दिया  



  इस मामले में सती पाल का पति राकेश पाल गाँव वालो और समाज के लोगों को चीख चीख कर बताता रहा की उसकी पत्नी चरित्र हीन नहीं है मजदूरी करने दोनों साथ साथ जाते हैं , पर उसकी एक नहीं सुनी गई और उसे समाज से बहिस्कृत कर दिया गया हद तो तब हो गई  जब उसके ही  चाचा  ने 27  फरवरी  को आयोजित  शादी समारोह  में  उसे  वा उसके परिवार को नहीं बुलाया पूंछने पर उसे जबाब मिला  तेरी पत्नी चरित्र हींन है   
 पुलिस ने मामले में सात(पंचो ) लोगो के विरुद्द आत्म ह्त्या के लिए प्रेरित करने का मामला दर्ज किया मामला  दर्ज होते ही सभी आरोपी फरार हो गए दूसरी तरफ समाज ने फिर पंचायत जोड़ी और दोषी पंचो के  विरुद्ध  १२ वर्ष के लिए  बहिष्कृत करने का फैसला लिया गया   पंचायत लगाने वाले समाज के मठाधीशों से प्रशासन के किसी  तंत्र ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि  समाज की पंचायत को किसी को चरित्र हीन अथवा किसी को सजा देने का अधिकार किसने प्रदान कर दियापंचायत के कथित फैसले के बाद  विरोध करने वालो का विरोध करने का साहस पंच प्रमुखों ने क्यों नहीं किया ? एक पंचायत में इतना बड़ा हादसा
हो जाने के बाद दूसरी  पंचायत पुलिस और प्रशासन के मौजूदगी में कैसे लग गई और फिर कैसे उन्होंने दंड सुना दिया ? इन सवालों के जबाब लाचार तंत्र के पास नहीं हैं   
क्या है समाज पंचायत ?
वैदिक काल से समाज और गाँव की पंचायतों का उल्लेख मिलता है वैदिक काल से मध्य काल तक इन ग्राम पंचायतो के  अधिकार और कर्तव्य  गाँव और समाज की व्यवस्था के लिए बहुत मह्त्व् पूर्ण माने जाते थे मनु ने समाज पर नियंत्रण के लिए सामाजिक पंचायत की एक व्यवस्था बनाई थी जिसमे मुखिया को न्यायाधीश के रूप में माना गया दरअसल यह सामाजिक प्रशासन की एक व्यवस्था है जो देश के  कई राज्यों में अनादि काल से चली रही है , इसका मकसद  सामाजिक व्यवस्थाओ को बनाये रखने का था ,ताकि सामाजिक मान्यताये , परम्पराए  और मर्यादा बनी रहे इसी अधर पर बाद में ग्रामपंचायत का जन्म हुआ था
.अंग्रेजो के शासन काल में ग्राम पंचायतो और उनकी व्यवस्था  छिन्न -भिन्न  हो गई पर इस दौर में भी सामाजिक  , जातीय और वर्गों की पंचायतें अपना अस्तित्व बनाये रही , बल्कि ये और  ज्यादा सबल हो गई   ऐसी सामाजिक पंचायतों की दंड प्रणाली और भी कठोर  थी काफी समय बाद अंगेजों को हिन्दुस्तान की विकेन्द्रित कार्य प्रणाली का आभाष हुआ  और उन्होंने 1907 में नगर पालिका बोर्ड , और 1920 में ग्राम पंचायत अधिनियम जरूर  बनाये पर उनमे जातीय अथवा सामाजिक पंचायतों का कोई स्थान नहीं था   
                 देखा  जाए  तो जिन  सामाजिक   जातीय पंचायतो को सामाजिक मर्यादाओं और परम्परा का पालन करना था वे ही अपनी मर्यादा को तार -तार करने में जुट गई    इस तरह से तुगलकी निर्णय लेती रहेंगी तो  वह समय भी दूर नहीं होगा जब इनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा लोग  भी ऐसी पंचायतों के पंचो पास जाने की अपेक्षा  प्रशासन और पुलिस के पास जाने में ही अपनी भलाई समझेंगे  
. बुन्देलखण्ड में पंचायत के तुगलकी फरमान: का यह कोई पहला मामला नही है। इसके पहले भी इस तरह के मामले सामने आते रहे है। यह स्थिति तब है जब की  सरकार द्वारा समाज मे जागरुकता लाने के लिये बाकायदा अलग से पंचायत न्याय विभाग की स्थापना की गई है। जिसके लिये राज्य सरकार द्वारा हर साल बडी रकम के तौर पर बजट भी मुहैया कराया जाता है। लेकिन बुन्देलखण्ड मे रहे पंचायत के तुगलकी फरमानो से नही लगता कि पंचायत न्याय विभाग क्षेत्रो मे काम कर रहा है। आजादी मिले भले ही 69 साल गुजर गये हो लेकिन बुन्देलखण्ड मे लोग  आज भी सामाजिक कुरुतियों के जाल में उलझे  है। इसी की परिणतीहे आज भी समाज ऐसे फरमान सुनाता है जिसमे पीडित को अपनी जान तक देनी पडती है।


इसके पहले  एक टीकमगढ़ जिले के बल्देवगढ़ थाना इलाके के जटेरा गाँव में सितम्बर 13 में एक पंचायत बैठी पंचयात में बाकायदा एक तांत्रिक को बुलाया गया , तांत्रिक के कहने पर पंचायत ने एक महिला के भरी पंचायत में कपडे उतरवाकर निशाँन देखे गए थे जिस पुलिस को मामले की जांच कर दोषियों को दण्डित कराना था उसने राजीनामा का प्रयास किया था
 टीकमगढ़ जिले में सितम्बर १३ में मणिकपुरा गांव में रैकवार समाज के  एक परिवार का कुटुंब सहित मुंडन कराने का फरमान जारी हुआ था इस परिवार के एक सदस्य के ट्रेक्टर के नीचे गाय मर गई थी
टीकमगढ़  जिले के स्यावनी गाँव में एक दलित बालिका से रेप और गर्भपात का मामला सुलझाने के लिए पंचयात ने 5 हजार का दंड बलत्कारी डॉ पर लगाकर छोड़ दिया था लड़की के पिता ने जब पुलिस में शिकायत की तो गाँव की पंचायत ने हुक्का पानी बंद करने की धमकी दी थी खैर बाद में पुलिस ने डॉ नकता विश्वास , उसकी पत्नी और एक अन्य आरोपी को गिरफ्तार किया था
  टीकमगढ जिले के निवाड़ी थाना इलाके के चुरारा गाँव में अक्टूबर १५ में  पंचायत  केफैसले के बाद से एक परिवार सामाजिक  बहिष्कार की सजा भुगतने  को मजबूर हुआ    पिछड़े वर्ग  के परिवार की  नाबालिग लड़की को   वंशकार  समाज का लड़का भगा  कर ले गया था  इसमें दोष लड़की वालों का माना गया और उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया गया
 ये तो सिर्फ टीकमगढ़ जिले के कुछ चद उदाहरण हैं  जो सामाजिक पंचायतों के  समाज में बढ़ते प्रभाव को दर्शाते हैं पर यह कहानी सिर्फ टीकमगढ़ जिले तक सीमित नहीं है इस तरह की  पंचायतें बुंदेलखंड के हर जिले के गाँवों में आये दिन होती रहती हैं   सामाजिक पंचायतों का खौफ इतना जबरदस्त होता है की पीड़ित लोग इसके फैसले को स्वीकारने में ही अपनी भलाई समझ लेते हैं इस तरह की पंचायतों की ख़बरें तब बाहर आती हैं जब दंड सहन शक्ति के बाहर हो जाता है टीकमगढ़ के कारी बजरुआ  सामाजिक पंचायत की भनक भी शायद लोगों को नहीं लगती यदि सखी बाई आत्म ह्त्या नहीं करती

जिस प्रशासनिक तंत्र को समाज  तरह की कुरीतियाँ रोकने का अधिकार है वह इस तरह के मामले से दूर ही रहने में अपनी भलाई समझता है यह जानते हुए भी की इस तरह की पंचायतो के माध्यम से किसी को दंड देने का अधिकार किसी भी व्यक्ति अथवा समाज को नहीं है । 

Pakistan Katas Raaj Dharm Sthal

पाक का कटास राज तीर्थ स्थल 



लाहौर से 280 किलो मीटर दूर स्थित श्री कटास राज तीर्थ स्थल ै। जहां पर अज्ञात वास के समय ान्डवो द्वारा निर्मित प्रतिष्टित 

शिवलिंग तथा पवित्र झील है। जिसके बारे में धार्मिक ग्रंथो मे कथा प्रचलित है की राजा दक्ष की पुत्री सती के शरीर त्याग के उपरान्त

 भगवान शंकर जब सती के शरीर को गोद मे लिये आकाश मार्ग से जा हे थे तो उनके नेत्रो से जल की दो बुंदे गिरी थी एक बूंद भारत

 की पुष्कर झील में तथा दूसरी ूंद कटास राज झील में गिरी थी  उन्ही बूंदो से उक्त झीलो का निर्माण हुआ था । यहां की यात्रा कर 

लौटे पन्ना के विवेक खरे ने पत्रकारों के साथ अपने अनुभव साझा किये । 



             श्री खरे ने बताया की पाकिस्तान की आम जनता भी समाजिक शांति तथासौहार्द पूर्ण वातावरण चाहती है,।  

 पाकिस्तान के आम जन भी हम आप की तरह शांति प्रिय तथा संवेदनशील   हैं ।  उन्होने   बताया   की   भारत   से   गये   सभी  

 तीर्थ यात्रियो का  स्वागत पाकिस्तान सरकार के निर्देश पर लाहौर के चैयरमेन श्री सिद्दिक अल फारूख ने  अपने प्रशासनिक अमले 

 के साथ आत्मीय ढंग से किया। वहां के नागरिको ने प्रसन्नता जाहिर करते हुये कहा की तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी 

के समय से प्रारम्भ की गई शांति सद्भाव तथा मित्रता को आगे बढाने मे वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी जी की सेली सराहनीय हैपाकिस्तान

 के नागरिक भारत की तरह क्रिकेट के दिवाने हैवहां के खेल प्रेमी भारतीय खिलाडी विराट कोहरी तथा कप्तान महंेन्द्र सिंह धोनी के 

जबर जस्त प्रशंसक है। 


 प्रति वर्ष पाकिस्तान सरकार महा शिवरात्रि एवं कार्तिक पुर्णिमा के पर्व पर अलग अलग दौ सौतीर्थ यात्रियो को कटास राज झील की

यात्रा पर भारत के लोगो को  आमत्रिंत करती है। इा वर्ष भी शिवरात्रि के पर्व पर  देश के एक सौपॉच लोग गये थे।  मध्य प्रदेश से पॉच 

सदस्य जिसमें पन्ना के विवेक खरे तथा उनकी चाची पुर्णिमा खरे गयी हुई थी । 


 श्री खर ने बताया की लाहौर चैयरमेन के निवास पर रात्रि भोज में संगीतभजनएवं गजलो काभी कार्यक्रम हुआ जिसको वहां के 

लोगो ने काफी प्रशंसा की।

06 मार्च, 2016

BKD_Dayri_Sonar Rivar


बेदम होती  सुनार नदी 


रवीन्द्र व्यास 
आज जब भी नदियों की   बात होती है तो बड़ी नदियों को केंद्र में रखा जाता है किन्तु इन बड़ी नदियों को जीवंतता देने वाली सहांयक नदियों को हम भूल जाते हैं । ये छोटी छोटी नदिया और नाले ही होते हैं जो ना सिर्फ बड़ी नदियों की अविरल जल धारा को बनाये रखते हैं बल्कि आस पास के सरोवरों को भी जल से भरपूर बनाये रखते हैं ।  बुंदेलखंड इलाके की महत्व पूर्ण केन नदी की जल धारा में  ऐसी ही कई  सहायक  नदीयां अपना योगदान देती हैं   । जिसके तट पर बुंदेलखंड के कई गाँवों की संस्कृति और सभ्यताओ का विकाश हुआ है । सहायक नदियों के अस्तित्व पर यदि संकट होगा तो मुख्य नदी कैसे जीवन्त रहेगी  ।  
                         कैमूर की पहाड़ियों से निकलने वाली केन नदी की अविरल जल धारा को बढ़ाने में उसकी सहायक  नदियों  महत्व पूर्ण योगदान माना जाता है । अकेले मध्य प्रदेश इलाके से इस नदी में 24472 हे वर्ग किलो मीटर और उत्तर प्रदेश में 3586 हे वर्ग किमी जल ग्रहण क्षेत्र है । इस विशाल जल ग्रहण क्षेत्र का जल केन की सहायक नदियों और नालो से ही पहुंचता है । एशिया की सबसे गैर प्रदूशित इस नदी तक  , व्यारमा , मिडासन ,सोनार , श्यामरी ,बन्ने , कुटनी ,केल ,उर्मिल , और चंद्रावल जैसी सहायक नदियां  अपनी जल राशि के साथ केन नदी में विलीन होती हैं । और यह केन नदी उत्तर प्रदेश के बांदा में चिल्ला में यमुना में विलीन होती है । 
                        केन में विलीन होने वाली  सुनार नदी की भी कहानी कुछ ऐसी ही है । सागर जिले के टडा केसली गौरझामर से निकलने वाली सुनार  नदी का इस सूखे के साल में जल स्तर प्रवाहमान नहीं रह गया है । दमोह  जिले के हटा , नरसिंह गढ़ और सागर जिले के रहली जैसे कस्बे के लोगों की प्यास बुझाने वाली सुनार नदी का पानी चुराने का आरोप  मायसेम सीमेंट फैक्ट्री वालों पर लगा था  ।  पिछले दिनों नदी से सीमेंट फैक्ट्री वालों द्वारा पानी चुराने की जब शिकायत गाँव वालों ने कलेक्टर से की थी । कलेक्टर के आदेश पर उनके पम्प सील कर दिए थे । सागर और दमोह जिले के सौ से भी ज्यादा  गाँव के जीवन का आधार ही सोनार नदी है ।                 
                                दमोह जिले की मुख्य नदियों में शुमार सुनार नदी के बारे में कई तरह की किवदंतियाँ भी प्रचलित हैं । कहते हैं की इस नदी में हर  तीन साल में बाढ़ आती है और एक कुपात्र की बली लेती है । नदी की बाढ़ तभी शांत होती है जब नदी के सीतानगर  तट पर गाँव के प्रतिष्ठित पुरुष और महिलाये पूर्ण सुसज्जित होकर पूजन करते हैं । पूजन की यह विधि भी कम दिलचस्प नहीं है ।  पूजन के समय एक दही की हांड़ी  पूर्णतः सुसज्जित कर नदी में अर्पित की जाती है , और पूजन किया जाता है , जिसके बाद  नदी की बाढ़ का पानी घटना शुरू होता है । 

         दमोह के वरिष्ठ पत्रकार राम शरण पाराशर बातचीत के दौरान कहने लगे कि सूखा के कारण नदी  कई जगह सूख गई है  पर सीतानगर और मडकोलेशवर मे  पानी का अच्छा खासा भराव है । सीतानगर के पास ही में इस नदी में कोपरा और जूडी नदी आ कर मिलती हैं । इसी नदी के तट पर बसा है दमोह जिले का मुख्य नगर हटा । दमोह जिले में सुनार नदी पर तीन जगह स्टॉप दम भी बनाये गए हैं । इस पर एक बड़ी सिचाई योजना पंचम नगर प्रस्तावित है । 
                            हर  तीसरे साल बाढ़ से बेहाल होती और सूखा से सूखती सुनार नदी की कहानी सिर्फ यही नहीं रूकती दरअसल इस नदी को इससे भी बड़ा ख़तरा प्रदुषण का भी है । 27 मई 2008 में मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हटा दौरे के समय   इस नदी में बढ़ते प्रदुषण की रोकथाम और सफाई के लिए 50 लाख रु स्वीकृत करने की घोषणा  की थी  । नगर पालिका की कर्तव्य परायणता के कारण तीन साल तक इस राशि का कोई उपयोग नहीं हुआ और ना ही सफाई हुई । सागर संभाग के आयुक्त ने जब इस पर पहल की तो पैसा तो खर्च हो गया पर हालात जस के तस हैं । नगर पालिका को मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मंडल सागर ने एक ड्राइंग डिजाइन करके और प्रोजेक्ट बना कर सौंपा था । किन्तु नगर पालिका ने अपनी व्यवस्था के तहत अपने ठेकेदार से काम कराया ,जिसका परिणाम ये हुआ की ट्रीटमेंट प्लांट   जहां से नाले का गंदा पानी साफ़ होकर नदी में मिलना था वह सिर्फ दिखावटी ही रहा ।
       

        हटा के युवकों  ने इस नदी को बचाने  संकल्प लेते हुए जनवरी के अंतिम सप्ताह में  सफाई अभियान शुरू किया । नदी में मिल रहे नाले गंदे पानी को रोकने के लिए बोरी बंधान भी बनाया । कुछ समय तक चले इस अभियान से भी नदी की दशा  कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं हो सका । नदी में बढ़ते  प्रदूषण के कारण इसके स्थाई साथी  जलचर भी यहां से दूर ही हो  गए । स्थानीय लोग नदी में नहाने से कतराने लगे क्योंकि इसके जल के उपयोग से कई लोगो को त्वचा सम्बन्धी बीमारियो का सामना करना पड़ा । अब लोगों की जागरूकता पर निर्भर करता है वे नदी में जा रहे गंदे नाले और गंदगी को कैसे रोकते हैं । और कैसे उप काशी कहे जाने वाले हटा की इस नदी की पवित्रता और स्वक्षता बरकरार रख पाते हैं । 
           दरअसल  सुनार नदी की  स्थिति को देख कर यह कहा जा सकता है की इसके जल प्रबंधन की महती जरुरत है । नदी से लिंक केनाल के जरिये आस पास के गाँवों के तालाब को जोड़ा जाए , ताकि जब भी इसका पानी तट बंध तक लगे  तो उस पानी को तालाबों को भरने में उपयोग किया जा सके । 

02 मार्च, 2016

BKD_ Dayri


बजट में नहीं दिखी  बुंदेलखंड की त्रासदी 
रवीन्द्र व्यास 

   बुंदेलखंड इलाक दो राज्यों में विभक्त बुन्देलखंडियों की किस्मत का फैसला भी दो सरकारें करती हैं ।
 एक है उत्तर प्रदेश की और दूसरी है मध्य प्रदेश की । इन दोनों सरकारों के ऊपर है  एक केंद्र सरकार ,बुंदेलखंड
 में केंद्रीय मंत्रियो के दौरों से यह उम्मीद बुन्देलखंडियो ने लगा ली थी की इस बार केंद्र के बजट में  के लिए कुछ
 विशेष प्रावधान रखे जाएंगे । मोदी के इस  बजट में भी बुंदेलखंड को बदहाल ही रखा गया है ।    एक और जहाँ
 उत्तर प्रदेश सरकार मुक्त हाथ से  जनता के दुःख दर्द दूर करने में जुटी है वहीँ मध्य प्रदेश इलाके की सरकार 
बुन्देलखंडियों को  अकाल से मुकाबला के लिए भगवान के रहमो करम पर छोड़े है । इसके पीछे राजनैतिक 
जानकार कहते हैं की दरअसल उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव सर पर हैं और मध्य प्रदेश में अभी दूर हैं । 
                                 


  सोमवार को जब केंद्र की मोदी सरकार के बजट से लोगों को लग रहा था इस बार 
बुंदेलखंड के लिए कुछ खाश होगा ।  इस सोच के पीछे कुछ वजह भी मानी जाती है < पहली बार बजट के पहले 
केंद्र  मंत्रियों ने बुंदेलखंड का दौरा किया । केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति  ने तो बाकायदा स्पस्ट टूर पर कहा 
भी था की बजट में बुंदेलखंड की दशा को ध्यान में रखा जाएगा । इसके बाद आई केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने टीकमगढ़ ,
महोबा और छतरपुर जिले का दौरा किया था । दोनों मंत्री किसानो और बुंदेलखंड की दशा देख कर चली गई थी । मंत्री 
के इस मजमे के कारण ही लोगों को लगा था की बुंदेलखंड का कुछ भला होने वाला है केंद्र के बजट में ।
               असल में बुंदेलखंड के लोग  मोदी सरकार की भाषा को समझने में चूक कर गए । मोदी जी  ने कुछ दिनों 
पहले किसानो की रैली में कहा था 2022 तक देश के किसानो की आय दो गुनी कर देंगे उसमे बुंदेलखंड भी आता है । 
अब कम से कम मोदी जी की बात पर भरोषा कर सात साल तो इन्तजार कर ही सकते हैं । मोदी सरकार क्षेत्रीयता वाद 
में नहीं पड़ती , इस लिए उसने बजट में  समग्र भारत को ध्यान में रख कर किसानो के कर्ज को कम करने के लिए 15 
हजार करोड़ का प्रावधान रखा  है । देश के कुछ जिलों में खाद की सब्सिडी सीधी किसानो के खाते में भेजने की बात भी 
कही है  , अब यह एक रहष्य है की इसमें बुंदेलखंड के कितने जिले सम्मलित  किये जाएंगे । गांव के विकाश के लिए
 87795 करोड़ रुपये ,सड़को के लिए 19  हजार करोड़ और मनरेगा के लिए 38500 करोड़ रु  का प्रावधान किया गया है ,
 मनरेगा के बजट में इस बात का भी ध्यान रखा जाएगा की एक वर्ष में तालाब और कुँए देश में बने । सरकार ने गिरते 
भूजल स्तर पर भी चिंता जताई है और इसके लिए 60 हजार करोड़ का प्रावधान किया गया है । पांच साल में देश में 28 
लाख हेक्टेयर में सिचाई सुविधा  उपलब्ध कराने के लिए 86500 करोड़ रु का बजट में प्रावधान किया गया है । ,
 मई 2018  तक देश के सभी गाँवों तक बिजली पहुचाने के लिए 8500 करोड़ रु व्यय होंगे । फसल बीमा के लिए 
55 सौ करोड़ और दाल उतपादन के लिए 500 करोड़ रु रखे गए हैं । जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए जातां किये जाएंगे । 
                                       
                                   

   देश के सन्दर्भ में बनी सरकार की इन नीतियों का लाभ बुंदेलखंड इलाके के लोगों को कितना  
 मिलेगा  यह आने वाले समय में ही साफ़ होगा । किन्तु मोदी सरकार का यह बजट बताता है की सरकार  धरती से गायब 
होती नमी को लेकर चिंतित है ।  और सूखे का मुख्य कारण  जल प्रबंधन का अभाव मानती है । शायद इसी कारण सरकार
 ने भू जल रिचार्जिंग , तालाब और कुआ ,निर्माण , पांच वर्ष में सिचाई लक्ष बढ़ाने के लिए बजट में विशेष प्रावधान किये हैं ।  
                                     सवाल फिर वही सामने आकर खड़ा होता है की हर सरकार की नीतियाँ तो अच्छी होती हैं
 उसका क्रियान्वन गड़बड़ होता है । योजना को लागू करने वाली अफसर शाही पर निर्भर रहता है की वह योजना को किस 
तरह से क्रियान्वित करते हैं ।  बुंदेलखंड के लोग  राहुल गांधी के बुंदेलखंड पैकेज के बंटाधार को शायद भूले ना होंगे ।
 पैकेज से बने स्टॉप डेम में अधिकाँश में फाटक ही नहीं लगाए गए । बनाये गए तालाबों में पानी के श्रोत को समझने 
का प्रयास ही नहीं किया गया । वृक्षारोपड जैसे कार्य कागजों पर सम्पन्न हुए । मनरेगा के तहत बने कुए में कई ऐसे 
भी कुए थे जो पुराने थे उनको नया बताकर पैसा निकाला गया ।  नल जल योजनाओ के भ्रष्टाचार की जांच के लिए 
हाईकोर्ट को आदेश देना पड़ा था । जांच में यह पाया गया था की मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके की  नल जल योजनाओ
 का वास्तविक लाभ ग्रामीणो को नहीं मिल पा रहा है ,क्योंकि अधिकाँश बंद पाई गई थी ।  उम्मीद की जा सकती है की 
मोदी सरकार की योजनाओ का क्रियान्वयन बेहतर ढंग से हो । 

Political_bangal _election_बंगाल का फैसला: सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, राजनीतिक चेतावनी भी

  बंगाल का फैसला: सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं , राजनीतिक चेतावनी भी रवीन्द्र व्यास  पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों ने भारतीय राजनीति को एक ब...