बात जनवरी 2020 की है जब फिल्म निर्माता निर्देशक और लेखक विवेक अग्निहोत्री ने खजुराहो लिट्रेटचेर फेस्टिवल में भाग लेने खजुराहो आये थे | विवेक जी ने एक चर्चा में ताशकंद फ़ाइल और द काश्मीर फ़ाइल को लेकर स्पष्ट कहा था कि भारत के हर व्यक्ति का यह मौलिक अधिकार होना चाहिए कि वह हर सच को जाने | विवेक अग्निहोत्री ने देश के सामने द काश्मीर फ़ाइल के माध्यम से वह सत्य जन जन तक पहुंचा दिया है जिसे देश के तथा कथित राज नेता , बुद्धिजीवी दफ़न करना चाहते थे | इतना ही नहीं अब इस फिल्म पर राजनीति भी खूब हो रही है |
"अल सफा हिन्दू दफा" 19 जनवरी 1990 की वह काली रात जब काश्मीर की वादियों में खुले आम हिन्दुओं का नर संहार हुआ , महिलाओं के साथ रेप , बच्चों तक को नहीं छोड़ा गया | नृशंसता और क्रूरता की सारी हदें काश्मीर के मुस्लिम तबके ने पार कर दी थी | इन सत्य घटनाओं पर आधारित द काश्मीर फ़ाइल फिल्म का निर्माण करने के लिए विवेक अग्निहोत्री को एक बड़ा रिसर्च वर्क करना पड़ा | वर्षों की मेहनत के बाद उन्होंने इसकी पटकथा लिखी और इस फिल्म का निर्देशन किया | भारत में फिल्म प्रदर्शन के पहले विवेक यह फिल्म दुनिया के कई देशों में दिखला दी थी | उनका यह कार्य भी निश्चित तौर पर प्रशंसनीय है कि उन्होंने दुनिया के लोगों को यह बताने का कार्य किया कि जिन लोगों के लिए आप मानवात की बात करते हैं वह इस धरा पर कितने बड़े दानव हैं |
भारत में इस फिल्म का प्रीमियर २६ जनवरी को होना था किन्तु कोरोना लहर के कारण नहीं हो सका | ४ मार्च को फिल्म का विशेष प्रीमियर हुआ और 11 मार्च को फिल्म भारत के सिनेमा घरो में प्रदर्शित की गई | हालांकि बॉलीवुड ने इस फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगाने के तमाम तरह के जतन किये | कुछ लोगों ने तो फिल्म को नफरत फैलाने वाली बताकर कोर्ट में भी दस्तक दी | जब कोर्ट ने फिल्म के प्रदर्शन रोकने से इंकार कर दिया तो यही सब लोग अब मैदान में आ गए | दरअसल इस फिल्म को देखने के लिए जिस तरह से भीड़ उमड़ रही है खासकर नोजवानो की वह देश के कुछ राजनेताओं को नागवार गुजर रहा है | फिल्म में वही सब कुछ दिखाया गया है जो हुआ था | फिल्म के कुछ दृश्य इतने विचलित करने वाले हैं कि लोग अपने आंशू रोक नहीं पाए | यह दिल दहलाने वाली फिल्म ना सिर्फ काश्मीर के नरसंहार को दिखाती है , बल्कि उन खतरों की चेतावनी भी देती है ,जिसका सामना प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से देश के लोग और मानव सभ्यता कर रही है | देश के इन हालातों और देश के राजनैतिक चरित्र को देखते हुए लोग एक दूसरे से फिल्म को देखने और भविष्य के खतरों से निपटने के लिए सतर्क ,सजग और सशक्त होने की अपील भी कर रहे हैं |
राजनैतिक विवाद
फिल्म के प्रमोशन के साथ ही विवाद शुरू हो गया था | काश्मीर फ़ाइल को लेकर जहां बीजेपी और उसके सहयोगी संगठन एक अच्छी और सही पहल बता रहे हैं , वहीँ गैर भाजपाई इस फिल्म को नफरत फैलाने वाली बताने से नहीं चूक रहे हैं | आये दिन टीवी डिबेट हो रही हैं जहाँ राजनैतिक प्रवक्ता बैठ कर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं | कांग्रेसी नेता यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि उस समय केंद्र में बीजेपी के सहयोग से वी पी सिंह की सरकार थी और जगमोहन राज्यपाल थे | कांग्रेस ने काश्मीर के इन शरणार्थियों के लिए क्या क्या किया इसका हिसाब देकर बीजेपी से पूंछ रही है कि आठ सालों में आपने क्या किया इनके लिए बताएं |
काश्मीर के बेकाबू हालात राजीव गांधी और फारुख अब्दुल्ला के शासन काल में ही 1988 से शुरू हो गए थे | 1989 के आम चुनाव में राजीव गांधी चुनाव हारे ,केंद्र में वी पी सिंह की सरकार बनी जिसे वाम दल और बीजेपी ने बाहर से समर्थन दिया था | २ दिसम्बर से वीपी सिंह सरकार ने काम काज शुरू किया , केंद्र में गृह मंत्री बनाये गए मुफ़्ती मोहम्मद सईद | गृह मत्री बेटी को जेकेएलएफ ने अगवा किया और पांच आतंकवादियों को रिहा कर गृह मंत्री की बेटी को मुक्त कराया गया | 19 जनवरी 1990 की घटना के ठीक एक दिन पहले 18 जनवरी को फारुख अब्दुला इस्तीफा देकर तत्काल लन्दन चले गए | हालात बेकाबू हुए तो वी पी सिंह ने दुबारा जगमोहन को राजयपाल नियुक्त कराया | 21 जनवरी को जब वे काश्मीर पहुंचे तब तक हालात नियंत्रण से बाहर हो गए थे |
देखा जाए तो दिसंबर 1988 से काश्मीर में हिन्दुओ को निशाना बनाने का काम शुरू हो गया था | जब राजीव गांधी केंद्र फारुख अब्दुल्लाह काश्मीर में शासन कर रहे थे तभी टपलू ,जस्टिस गंजू और दर्जनों हिन्दुओ की नृशंश ह्त्या हुई थी | हत्याओं के इस दौर के बावजूद जुलाई से दिसंबर 1989 के मध्य 70 से ज्यादा आतंक वादियों को रिहा किया गया | अब्दुल्ला साहब और जम्मू काश्मीर लिबरेशन फ्रंट के रिश्तों को लेकर हमेशा चर्चाये चलती रही हैं | अब इसे देश का दुर्भाग्य ना समझा जाए तो क्या समझा जाए कि काश्मीर के तमाम खुफिया इनपुट होने के बावजूद देश के राजनेता उदासीन बने रहे जिन लोगों को जेल के सींकचों में होना चाहिए था वह सरकार चलाते रहे |
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