22 मार्च, 2022

Kashmir Fail_ काश्मीर फ़ाइल से बेनकाब हुए कई चेहरे

 



काश्मीर फ़ाइल से बेनकाब हुए कई चेहरे 
रवीन्द्र व्यास 

  बात जनवरी 2020 की है जब फिल्म निर्माता निर्देशक और लेखक विवेक अग्निहोत्री ने खजुराहो लिट्रेटचेर फेस्टिवल में भाग लेने खजुराहो आये थे |  विवेक जी  ने एक  चर्चा  में  ताशकंद फ़ाइल और  द काश्मीर फ़ाइल को लेकर  स्पष्ट कहा था कि भारत के हर व्यक्ति का यह मौलिक अधिकार होना चाहिए कि वह हर सच को जाने | विवेक  अग्निहोत्री ने  देश के सामने द काश्मीर फ़ाइल के माध्यम से वह  सत्य जन जन तक पहुंचा दिया है जिसे  देश  के  तथा कथित  राज  नेता , बुद्धिजीवी  दफ़न करना चाहते थे |  इतना ही नहीं अब इस फिल्म पर राजनीति भी खूब हो रही है | 

                                                 "अल सफा  हिन्दू दफा"   19 जनवरी 1990 की वह काली रात जब  काश्मीर की वादियों में खुले आम हिन्दुओं का  नर संहार हुआ , महिलाओं के साथ रेप , बच्चों तक को नहीं छोड़ा गया | नृशंसता और क्रूरता की सारी हदें काश्मीर  के मुस्लिम तबके ने पार कर दी थी |  इन सत्य घटनाओं पर आधारित द काश्मीर फ़ाइल  फिल्म  का निर्माण करने के लिए विवेक अग्निहोत्री  को एक बड़ा रिसर्च वर्क करना पड़ा | वर्षों की मेहनत के बाद उन्होंने इसकी पटकथा लिखी  और इस फिल्म का निर्देशन किया |  भारत में फिल्म प्रदर्शन के पहले  विवेक   यह फिल्म दुनिया के कई देशों में दिखला  दी थी |  उनका यह कार्य भी निश्चित तौर पर प्रशंसनीय है कि उन्होंने दुनिया के लोगों को यह बताने का कार्य किया कि  जिन लोगों के लिए आप मानवात की बात करते हैं वह इस धरा  पर कितने बड़े दानव हैं | 

                                         भारत में इस फिल्म का प्रीमियर २६ जनवरी को होना था किन्तु  कोरोना लहर के कारण नहीं हो सका | ४ मार्च को फिल्म का विशेष प्रीमियर हुआ और 11 मार्च को फिल्म  भारत के सिनेमा घरो में प्रदर्शित की गई |  हालांकि बॉलीवुड  ने इस फिल्म  के प्रदर्शन पर रोक लगाने के तमाम तरह के जतन किये |  कुछ लोगों ने तो  फिल्म को नफरत फैलाने वाली बताकर कोर्ट में भी दस्तक दी | जब कोर्ट ने फिल्म के प्रदर्शन रोकने से इंकार कर दिया तो  यही सब लोग  अब मैदान में आ गए |  दरअसल इस फिल्म को देखने के लिए जिस तरह से भीड़ उमड़ रही है खासकर नोजवानो की वह  देश के  कुछ राजनेताओं को नागवार गुजर रहा है | फिल्म में वही सब कुछ दिखाया गया है जो हुआ था  | फिल्म के कुछ दृश्य इतने विचलित करने वाले हैं कि लोग अपने आंशू रोक नहीं पाए | यह दिल दहलाने वाली फिल्म ना सिर्फ काश्मीर के  नरसंहार को दिखाती है , बल्कि उन खतरों की चेतावनी भी देती है ,जिसका सामना प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से  देश  के लोग और मानव सभ्यता कर रही है | देश के इन हालातों और देश के राजनैतिक चरित्र को देखते हुए  लोग एक दूसरे से फिल्म को  देखने और भविष्य के खतरों से निपटने के लिए सतर्क ,सजग और सशक्त होने की अपील भी कर रहे हैं | 

राजनैतिक विवाद 

फिल्म के प्रमोशन  के साथ ही विवाद शुरू हो गया था | काश्मीर फ़ाइल को लेकर  जहां बीजेपी और उसके सहयोगी संगठन एक अच्छी  और सही पहल बता रहे हैं , वहीँ गैर भाजपाई  इस फिल्म को नफरत फैलाने वाली बताने से नहीं चूक रहे हैं | आये दिन टीवी डिबेट हो रही हैं  जहाँ राजनैतिक प्रवक्ता बैठ कर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं | कांग्रेसी नेता यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि उस समय केंद्र में बीजेपी के सहयोग से वी पी सिंह की सरकार थी और जगमोहन राज्यपाल थे | कांग्रेस ने काश्मीर के इन शरणार्थियों के लिए क्या क्या किया इसका हिसाब देकर बीजेपी से पूंछ रही है कि आठ सालों में आपने क्या किया इनके लिए बताएं | 

                               काश्मीर के बेकाबू हालात राजीव गांधी और फारुख अब्दुल्ला के शासन काल में ही 1988 से शुरू हो गए थे | 1989 के आम चुनाव में राजीव गांधी चुनाव हारे ,केंद्र में वी पी सिंह की सरकार  बनी जिसे वाम दल और बीजेपी ने बाहर से समर्थन दिया था | २ दिसम्बर से वीपी सिंह सरकार ने काम काज शुरू किया , केंद्र में गृह मंत्री बनाये गए मुफ़्ती मोहम्मद सईद | गृह मत्री बेटी को जेकेएलएफ ने अगवा किया और पांच आतंकवादियों को रिहा कर  गृह मंत्री की बेटी को मुक्त कराया गया | 19 जनवरी 1990 की घटना के ठीक एक दिन पहले 18 जनवरी को फारुख अब्दुला इस्तीफा देकर तत्काल लन्दन चले गए | हालात बेकाबू  हुए तो वी पी सिंह ने  दुबारा जगमोहन को राजयपाल नियुक्त कराया | 21 जनवरी को जब वे काश्मीर पहुंचे तब तक हालात  नियंत्रण से बाहर हो गए थे | 

                                               देखा जाए तो  दिसंबर 1988 से काश्मीर में  हिन्दुओ को निशाना बनाने का काम शुरू हो गया था | जब राजीव गांधी केंद्र  फारुख अब्दुल्लाह  काश्मीर में  शासन कर रहे थे तभी टपलू ,जस्टिस गंजू  और दर्जनों हिन्दुओ  की नृशंश ह्त्या हुई थी |  हत्याओं के इस दौर के बावजूद  जुलाई से दिसंबर 1989 के मध्य 70 से ज्यादा आतंक वादियों को रिहा किया गया | अब्दुल्ला साहब और  जम्मू काश्मीर लिबरेशन फ्रंट के रिश्तों को लेकर  हमेशा  चर्चाये चलती रही हैं |  अब इसे देश का दुर्भाग्य ना समझा जाए तो क्या समझा जाए कि काश्मीर के तमाम खुफिया इनपुट होने के बावजूद देश के राजनेता  उदासीन बने रहे जिन लोगों को  जेल के सींकचों में होना चाहिए था वह सरकार चलाते रहे |  


09 मार्च, 2022

Bundelkhand_बुंदेलखंड राज्य की मांग संसद से सड़क तक

 


बुंदेलखंड राज्य की मांग 

संसद से सड़क  तक 

रवींद्र व्यास 

 पृथक बुंदेलखंड राज्य को लेकर जितनी उग्रता  उत्तर प्रदेश वाले क्षेत्र में दिख रही  है उतनी  मध्य प्रदेश वाले क्षेत्र में नहीं दिख रही है | इसके पीछे के अपने कारण हो सकते हैं | सड़क से संसद तक बुंदेलखंड राज्य की गूंज इन दिनों बुंदेलखंड इलाके में गूंज रही है | इसी महिने के पहले हफ्ते में बुंदेलखंड विकाश बोर्ड(उत्तर प्रदेश) के उपाध्यक्ष राजा बुंदेला ने 2024 तक अलग बुंदेलखंड राज्य बनने की बात कह कर सबको चौंका दिया है | ये अलग बात है कि अब यहां के लोगों को राजनेताओं की बातों पर भरोषा नहीं रह गया है |  

                पिछले दिनों बांदा में क्षत्रिय महा सभा का एक कार्य्रक्रम था | 5 मार्च शनिवार को हुए इस आयोजन में हिस्सा लेने बुंदेलखंड विकाश बोर्ड (यू पी ) के उपाध्यक्ष राजा बुंदेला भी पहुंचे थे | उनकी पृथक बुंदेलखंड राज्य आंदोलन में सक्रियता और निष्क्रियता को लेकर पत्रकारों ने उनसे तीखे सवाल किये | सिनेमा जगत के कलाकार और राजनेता ने जबाब देते हुए कहा कि 2024 तक हर हाल में अलग बुंदेलखंड राज्य बन जाएगा | उन्होंने पत्रकारों को यह भी बताया कि असल में अभी सरकार का राज्य सभा में बहुमत नहीं है इस कारण यह बिल पास नहीं हो सकता | एक दशक से ज्यादा समय तक अलग बुंदेलखंड राज्य के लिए समर्पित रहने वाले राजा बुंदेला , इन दिनों अपनी अलग भूमिका में हैं संभवतः इसी लिए वे इस मुद्दे पर बात तो करते हैं पर कलाकारी के साथ | 

क्या संसद में बुंदेलखंड राज्य के मुद्दे पर होगी बहस :

राजा बुंदेला की बात को अगर माना जाए तो  आगामी 13 मार्च से शुरू होने वाले संसद  सत्र में पृथक बुंदेलखंड राज्य के मुद्दे पर बहस होगी | हमीरपुर से बीजेपी सांसद पुष्पेंद्र सिंह चंदेल ने 4 फरवरी  को अलग बुंदेलखंड राज्य का मुद्दा संसद में उठाया था , जिसे लोक सभा अध्यक्ष ने मंजूर कर लिया है | जब बिल पर बहस होगी तो  राजनैतिक दलों के चेहरे बेनकाब हो जाएंगे | 

दरअसल हमीरपुर सांसद चंदेल ने   4 फरवरी को  एक  निजी विधेयक के माध्यम से अलग बुंदेलखंड राज्य निर्माण की मांग को संसद में रखा था |  संसदीय चर्चा के नियम 377 के अंतर्गत और अति लोक महत्त्व के  मुद्दों पर चर्चा के संसद संसदीय नियम के तहत शून्य काल  में 12 फरवरी को भी यह मांग  उठाई थी | 

हमीरपुर महोबा  के  बीजेपी  सांसद पुष्पेंद्र सिंह चंदेल ने 2019  के बजट सत्र में भी  बुंदेलखंड राज्य का मुद्दा उठाया था । उन्होंने  छोटे राज्यों के निर्माण के लिए राष्ट्रीय बोर्ड गठित करने की मांग संसद में उठाई थी ।  उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के सभी 19 विधायकों ने विधानसभा  में  अलग बुंदेलखंड  राज्य की मांग उठाई थी। वहीँ बुंदेलखंड इन्साफ सेना के प्रमुख और पूर्व मंत्री बादशाह सिंह मध्य प्रदेश के राजयपाल के सामने अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग रख चुके हैं ८०_९०  के दशक में कांग्रेस के विट्ठल भाई पटेल अलग बुंदेलखंड राज्य बनाने की मांग विभिन्न मंचो से करते रहे थे |   

बुंदेलखंड के मसले पर सांसदों का अभियान और उमा का मौन 

इन दिनों बुंदेलखंड राज्य की मांग करने वाले तमाम  संगठन  उमा भारती के 2014  के  चुनावी  बयान को जम कर वायरल कर रहे हैं ,|  असल में उमा जी ने नरेंद्र मोदी के साथ झांसी में मंच साझा करते हुए कह दिया था कि  में तीन वर्ष में  अलग बुंदेलखंड राज्य बनवाकर ही  दम  लूंगी |  अब वही उमा भारती  इस मुद्दे पर कहती हैं कि  बुंदेलखंड के मध्यप्रदेश इलाके के लोग  इस अलग राज्य के लिए सहमत नजर नहीं आते | जब तक एक राय नहीं बनती  तब तक अलग राज्य बनना  संभव  नहीं है | जबकि उन्ही की पार्टी के उत्तर प्रदेश के सांसद  अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग को  संसद में मुखरता से उठा रहे हैं | 

बुंदेलखंड राज्य : 

 १ नव १९५६ को राज्यों का विभाजन कर दिया गया था और बुंदेलखंड को दो भागों में बाँट कर देश के नक़्शे से बुंदेलखंड राज्य गायब कर दिया गया था इस दिन मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड में सरकारी स्तर पर जश्न मनाया जाता है |  

 आजादी के  समय १९४७ में  बुंदेलखंड राज्य था जिसका अस्तित्व १२ मार्च १९४८ तक रहा बुंदेलखंड की राजधानी नौगांव थी और चरखारी के रहने वाले कामता प्रसाद सक्सेना इसके मुख्य मंत्री बने  थे १२ मार्च १९४८ को इसका नाम बदलकर विन्ध्य प्रदेश कर दिया गया और इसमें बघेलखंड को जोड़ दिया गया और राजधानी रीवा बना दी गई । नवम्बर १९५६  को  बुंदेलखंड  के दो टुकड़े कर आधा हिस्सा यूपी और आधा हिस्सा एमपी में शामिल कर दिया गया था।

असल में  नेहरू सरकार के समय गठित राज्य पुनर्गठन आयोग ने बुंदेलखंड राज्य की सिफारिश  की थी  आयोग ने ३० सितम्बर १९५६ को  केंद्र सरकार को सौंपी रिपोर्ट में १६  राज्य और केंद्र शासित प्रदेश बनाने प्रस्ताव सरकार को दिया था । सरकार ने आयोग की रिपोर्ट को दरकिनार कर १४  राज्य व ५  केंद्र शासित प्रदेश बना दिए।

  बुंदेलखंड राज्य  निर्माण के लिए अलग अलग  सत्याग्रह अभियान  पिछले कई वर्षो से उत्तर प्रदेश वाले बुंदेलखंड इलाके में  जारी है | बुंदेलखंड के विभाजन  और  असमानता ने लोगो को   अलग  बुदेलखंड राज्य की मांग के लिए मजबू किया है  उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके वाले जिले झाँसी ,ललितपुर ,महोबा ,बांदा ,हमीरपुर ,चित्रकूट और जालौन में अपनी जड़ें जमा चुका |  बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चाबुंदेलखंड निर्माण मोर्चा ,राज्य निर्माण सेना ,क्रान्ति सेना ,विकाश सेना ,क्रान्ति दल और बुंदेली समाजबुंदेलखंड इन्साफ सेना  जैसे संगठन इस अभियान में जुटे हैंबुंदेलखंड राज्य के लिए  संयुक्त मोर्चा भी बना और बिखरा भी  


वर्तमान में बुंदेलखंड राज्य की मांग करने वाले आंदोलन कारी मध्य प्रदेश के सागर ,दमोह ,छतरपुर ,टीकमगढ़ ,निवाड़ी और पन्ना तथा उत्तर प्रदेश के ललितपुर,झाँसीजालौन ,हमीरपुर ,बांदा ,चित्रकूट और महोबा को मिलाकर एक अलग राज्य की मांग कर रहे हैं हालांकि मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ से सबसे पहले अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग उठी थी अब उसी मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड  भूभाग में अलग राज्य की मांग पर लगभग लोग मौन हैं ,जबकि उत्तर प्रदेश वाले बुंदेलखंड इलाके में यह मांग दिनों दिन जोर पकड़ती जा रही है || 

 

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