31 दिसंबर, 2020

Farmar _Soside_मेरे अंग बेच कर कर्ज चुका ले सरकार


 

मरने के बाद मेरा शरीर शासन को दे दें ,मेरा एक एक अंग बेच कर कर्जा  चुका लें 

रवींद्र व्यास
छतरपुर। // ३१ दिसंबर २० //   मेरी तीन  पुत्री और एक पुत्र हैं किसी की उम्र 16 वर्ष से ज्यादा नहीं है | मेरी परिवार से प्रार्थना है कि मेरे मरने के उपरान्त मेरा शरीर शासन के सुपुर्द कर दे , जिससे मेरे शरीर का एक एक अंग वो  बेच सके ,जिससे शासन का कर्जा चुक सके | यह अंतिम पत्र उस किसान का है जिसने बिजली विभाग द्वारा की गई कुर्की और बेइज्जती से त्रस्त होकर लिखा और खेत पर जा कर आत्म हत्या कर ली | जिला प्रशासन ने मृतक के परिजनों को 25 हजार की आर्थिक सहायता दी है l अपने दूसरे प्रेस नोट में प्रशासन ने यह सिद्ध करने का जतन भी किया है कि मृतक के नाम कोई जमीन नहीं है l

   छतरपुर से 17 किमी दूर मातगुवां में किसान मुनेंद्र राजपूत { 35} ने दोपहर करीब 1:00 बजे अपने खेत पर लगे आम के पेड़ पर फांसी का फंदा डालकर  कर आत्महत्या कर ली |  आत्म ह्त्या के पहले अपने लिखे पत्र में मृतक ने ना सिर्फ अंग बेचकर कर्जा चुकाने की बात लिखी है बल्कि मीडिया की कार्य प्रणाली पर भी प्रश्न चिन्ह लगाया है | उसने लिखा है कि एक प्रार्थना मीडिया वालों से है कि आप शासन की अच्छाइया तो बहुत टी वी और मीडिया में दिखाते हैं एक गरीब की चिट्ठी को मीडिया टी वी में दिखाने की कृपा करें सभी मीडिया वालों को मेरा अंतिम नमस्कार  - राम राम | कर्ज ना चुका सकने का कारण भी उसने लिखा है कि मेरी एक भैंस करेंट लगने से मर गई ,तीन भैंस चोरी हो गई , आषाढ़ में ( खरीफ फसल ) खेती में कुछ नहीं मिला ,लाकडाउन में कोई काम नहीं ना ही चक्की चली इस कारण हम बिल नहीं दे सके | 


मृतक के भाई लोकेन्द्र राजपूत ने बताया मेरे भाई ने आत्म ह्त्या की है , बिजली बिल साल भर से ना भरने के कारण बिजली विभाग ने कुर्की वारंट जारी कर  सोमवार को चक्की और मोटरसाइकिल जप्त कर ली गाँव में बेइज्जती की और जलील किया | वो निवेदन करते रहे की कुछ समय दे दो पर उनकी एक नहीं सुनी |  असल में साल भर से नुक्सान था खरीफ की फसल हुई नहीं थी , गुजारा करने के लिए चक्की चलाते थे , बिजली वाले साल भर से एवरेज बिल दे रहे थीं हजार चार हजार का ,रीडिंग से भी नहीं दे रहे थे | ज्यादा बिल और फसल ना होने से उनके पास देने के लिए कुछ भी नहीं था | ऐसे में उनने खेत पर पेड़ से फ़ासी लगाकर बुधवार को आत्म ह्त्या कर ली | 

                       मातगुवां  पुलिस ने  किसान द्वारा आत्महत्या के मामले में मर्ग कायम कर विवेचना शुरू कर दी गई है | उन्होंने  सुसाइड नोट मिलने की बात को भी स्वीकार किया है। बिजावर के क्षेत्रीय विधायक राजेश शुक्ला ने घटना को दुखद बताते हुए मुख्य मंत्री से बात करने की बात कही है ,उन्होंने दोषियों के विरुद्ध कार्यवाही करने और पीड़ित परिवार को आर्थिक सहयोग दिये जाने के लिए मुख्य मंत्री से बात करने की बात कही है l
 मृतक के नाम कृषि भूमि नहीं है

कलेक्टर छतरपुर शीलेन्द्र सिंह ने बताया कि ग्राम मातगुवां के मृतक मुनेन्द्र राजपूत के परिजनों को 25 हजार रूपए की आर्थिक सहायता दी गई है। मृतक की मां श्रीमती हरबाई के नाम 5 एचपी विद्युत कनेक्शन स्वीकृत है जिस पर 88 हजार 508 रूपए का भुगतान 3 वर्षों से लंबित है। बकाया राशि वसूली के लिए अक्टूबर एवं नवम्बर माह में नोटिस जारी किए गए तथा दिसम्बर में आर.आर.सी. जारी की गई। मृतक मुनेन्द्र राजपूत के नाम स कोई जमीन नहीं है। इनके पिता धनश्याम के नाम 2 हेक्टेयर जमीन है।
मृतक मुनेन्द्र और इनके भाई लोकेन्द्र राजपूत की पत्नियों के नाम संयुक्त रूप से 0.027 हेक्टेयर भूमि है, किन्तु इन्हें पीएम किसान का लाभ नहीं मिल रहा है। मृतक मुनेन्द्र का नाम पीएम आवास सूची में नाम था परंतु इनका पक्का आवास होने के कारण अपात्र होने से उन्हंे लाभ नहीं मिला। मृतक के पिता धनश्याम द्वारा अक्टूबर 2020 में सेवा सहकारी समिति मातगुवां से खाद के लिए 14 हजार 200 रूपए का ऋण सहकारी समिति से लिया गया।
मृतक मुनेन्द्र राजपूत की मां ग्राम में आटा पीसने की चक्की संचालित करती थी। विद्युत खपत की राशि का भुगतान नहीं किया गया था। मृतक के पिता घनश्याम लोधी को पीएम-सीएम किसान योजना का लाभ प्राप्त होता है। उन्हें अभी तक 5 किश्तों के रूप में 10 हजार रूपए की किसान सम्मान निधि दी जा चुकी है। वह पेंशनर होकर विद्युत वितरण कम्पनी से सेवानिवृत्त हुए हैं, जिसकी मासिक पेंशन 25 हजार 90 रूपए है और उसका भाई लोकेन्द्र वितरण केन्द्र छतरपुर ग्रामीण 1 में मीटर रीडर के पद पर बिजली विभाग में कार्यरत है।
               

28 दिसंबर, 2020

तेंदुए का शिकार


सतना/MP/ 28 /12/20

जिले के रामनगर थाना क्षेत्र के जंगल में  तेंदुआ का शव मिला l  आशंका जताई जा रही है कि तेंदुए का शिकार किया गया है,l देर रात सूचना मिलने पर वन  अधिकारी मौके पर पहुंचे ,और  तेंदुए की लाश को कब्जे में लेकर जाँच शुरू की

 

राम नगर के गौहानी के जंगल में तेंदुए का शव  संदिग्ध परिस्थितियों में  जंगल सर्चिंग मे बीट गार्ड ने देखा l  तेंदुए के शव  की सूचना मिलते ही वन विभाग के डीएफओ और मुकुंदपुर वाइट टाइगर रिजर्व की टीम भी मोके पर पहुंची l  बताया जा रहा है कि तेंदुए का शव 4 दिन पुराना है, उम्र लगभग 4 वर्ष है, l

 कुछ दिन पूर्व ही सफेद टाइगर सफारी मे एक सफेद बाघ का शव मिला था l 

27 दिसंबर, 2020

निर्यात होने लगा बुंदेलखंड का गेंहू

 बुंदेलखंड की डायरी 

निर्यात होने लगा  बुंदेलखंड का गेंहू 


रवीन्द्र व्यास 

बुंदेलखंड  का गेंहू अब बांग्लादेश  जाने लगा है , बांग्लादेश के लोगों को यह गेंहू इतना पसंद आया कि पिछले वर्ष की तुलना में इसके निर्यात में चार गुना से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है | दशकों पहले बुंदेलखंड का पान  पाकिस्तान को निर्यात होता था  संघर्ष और विवादों के कारण पान निर्यात तो बंद हो गया अब गेंहू निर्यात होने लगा है |   रेत के खेल के लिए जाना पहचाना बुंदेलखंड अब  रेत  राजस्थान भेजने लगा है | दूसरी तरफ बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे निर्माण के नाम पर लगभग दो लाख वृक्षों की बलि चढ़ा दी गई |  यह सब उस बुंदेलखंड में हो रहा है जहां का किसान बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है |  प्रकृति पर निर्भर अधिकांश किसान  प्रशासन की  मार का भी शिकार हो रहा है |  



                बुंदेलखंड का कठिया गेंहू   अपनी कई विशेषताओं के जाना जाता है ,  कठिया गेंहू ना सिर्फ पाचक होता है बल्कि इसमें प्रोटीन की मात्रा भी सामान्य गेंहू से लगभग दो गुनी होती है , इस गेंहू से बना दलिया  औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है |    पिछले पांच महीनो के दौरान सबसे ज्यादा कठिया गेंहू वा सामान्य गेंहू   बांग्लादेश  भेजा गया  |   कठिया  गेंहू में इतनी सारी  विशेषताओं के पीछे बताया जाता है की इसका उत्पादन मुख्यतः प्राकृतिक  होता है इसमें किसी भी तरह की रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं होता है | पहले तो इस गेंहू के उत्पादन के लिए  वर्षा जल पर ही किसान निर्भर रहता था पर अब इसमें सिचाई भी की जाने लगी है |  कृषि के जानकार कहते हैं की इस गेंहू के उत्पादन के लिए अधिक जल की आवश्यकता नहीं होती है | 

          बुंदेलखंड के सागर जिले के खुरई का गेंहू पहले से ही काफी विख्यात रहा है  ,खुरई के गेंहू की मांग देश के अनेक हिस्सों में काफी व्यापक है | अब बुंदेलखंड के ही  झाँसी ,ललितपुर , महोबा, चित्रकूट, ,बांदा ,हमीरपुर ,जालौन , छतरपुर, टीकमगढ़, दतिया  जैसे जिलों  के  गेहूं की मांग  देश ही नहीं   विदेशों तक में होने लगी  है।  बुंदेलखंड का गेहूं   बांग्लादेश के लोगों को ऐसा  भाया कि  गेहूं की मांग लगातार बढ़ती जा रही  है। बीते पांच माह में  बुंदेलखंड के गेंहू की  20 मालगाड़ी बांग्लादेश भेजी गई  है। इन मालगाड़ियों में गेहूं दतिया, ललितपुर, मुरैना  स्टेशन  से लोड किया गया। बुंदेलखंड के गेंहू  से लदी ये मालगाड़ियां  बांग्लादेश की बेगमपुर दर्शना रेलवे साइट पर  अनलोड की जाती हैं   रेलवे के आधिकारिक लोग बताते हैं की प्रत्येक मालगाड़ी पर रेलवे को 55  लाख का मुनाफ़ा होता है | बुंदेलखंडी गेंहू की जावक पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष ज्यादा होने से  रेलवे के मुनाफ़ा में भी बढ़ोतरी हुई है | गेंहू के साथ खली और अन्य बुंदेलखंड के खाद्य पदार्थ भी बांग्लादेश भेजे जा रहे हैं | 

प्रकृति के भरोषे  खेती 

      बुंदेलखंड देश का  वह इलाका  है  जिसकी अधिकाँश भूमि  पथरीली  है |  भू संरचनाओं की बात करें  तो जमीं से 100 फिट नीचे  ग्रेनाइट का स्ट्रेटा पाया जाता है ,जो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि अगर  भू जल की उपलब्धता है तो सिर्फ 100 फिट तक ही है इसके नीचे  चट्टानों में  पानी की आशा ना के बराबर है | यह स्थिति बुंदेलखंड के  अधिकाँश क्षेत्रों में मानी जाती है |  पथरीली भूमि के कारण  यहां सिचाई के लिए पानी की  जरुरत कहीं ज्यादा है |  सैकड़ों वर्ष पहले बुंदेलखंड की इस बुनियादी समस्या को समझ लिया गया था , और बुंदेलखंड के अधिकाँश इलाकों में बड़ी संख्या में सिचाई के लिए तालाबों और नहरों का निर्माण किया गया था | इतना ही नहीं  तालाबों के निर्माण के साथ ही तालाबों के मध्य में एक कुँए का भी निर्माण कराया जाता था ,ताकि किसी भी प्रकार के अकाल के हालात में जल की उपलब्धता बनी रहे |                                                                           समय के साथ आधुनिकता का खुमार  शासकों पर हावी हुआ और तालाब  नष्ट होते चले गए |  आज बुंदेलखंड इलाके में तमाम तरह के बाँध होने के बावजूद किसान पानी के लिए परेशान है ,| बुंदेलखंड का अधिकाँश किसान छोटी जोत का है जो ना तो ट्यूब वेळ लगवा सकता है और ना कुआ खुदवा सकता है |  ऐसे किसान पडोसी खेत वाले से पानी की हिस्सेदारी तय करता है और  अपनी उपज का बड़ा हिस्सा पानी के एवज में पडोसी को देने को मजबूर होता है | पिछले दिनों छतरपुर जिले के बक्स्वाहा  ब्लॉक  सुनवाहा  गाँव के किसान  नाथू राम विश्वकर्मा ने प्रधान मंत्री मोदी जी को एक पत्र लिखा कि मेरे पास  एक एकड़ की कृषि भूमि है | साल भर की एक फसल की कमाई बा मुश्किल  ११ हजार रु छह माह में होती है |  आप बताइये के ये दुगनी कैसे होगी |  पत्र में उसने वे तमाम तरह के खर्चे भी लिखे जो खेती में होते हैं ,   और आय में फसल के वेस्टेज  और फसल से होने वाली आय को भी लिखा | 

                                                     दरअसल हालात से मजबूर बुंदेलखंड का किसान  आज भी प्रकृति के भरोसे ही है | इस बार की खरीफ फसल  वर्षा की अनियमितता के कारण  चौपट हुई थी | रवि फसल अब तक  के हालात  उनके ठीक हैं जिनके पास सिचाई के साधन हैं , जिनके पास सिचाई के साधनो का अभाव है वे मायूस है  वहीँ बिजली की अनियमित आपूर्ति भी किसानो के सामने कई तरह की समस्याएं खड़ी  कर रही हैं |  बुंदेलखंड के कई इलाकों में इसको लेकर प्रदर्शन भी हो चुके हैं | ऐसे इलाके से अगर  कृषि पैदावार का निर्यात होने लगे तो एक अच्छी खबर ही मानी जा सकती है , जरुरत इस बात की है कि  निर्यात होने वाली  पैदावार को बढ़ाने की दिशा में किसानों को प्रोत्साहित  किया जाए | 

रेतीले राजस्थान  में जायेगी बुंदेलखंड की रेत 


           25 दिसंबर को बांदा से राजस्थान के भरतपुर के लिए एक मालगाड़ी भरकर केन की रेत  भेजी गई |  केन की यह रेत  निर्माण कार्यों के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है , यही कारण है कि केन नदी  के यह रेत  जो बाहरी इलाकों में खजुराहो सेंड के नाम से जानी जाती है  नेपाल बार्डर तक डम्परों के माध्यमों से अब तक पहुँचती थी | रेल से रेत  भेजने का पहले भी कई बार प्रयास हुआ है , एक बार सिंहपुर स्टेशन से भेजी जाने वाली रेत को प्रशासन ने अवैध मान कर जप्त कर लिया था |   

                      ललितपुर स्थित बजाज पावर प्लांट से एश (राख) रूपनगर पंजाब, गाजियाबाद, मैहर सतना  भेजी जाने लगी है। बुंदेलखंड के कई ऐसे उत्पाद हैं जो रेलवे की कमाई का एक बड़ा साधन बन गए हैं |  रेलवे के सूत्र बताते हैं कि  बुंदेलखंड  मिनिरल्स और  खाद्य वस्तुओ के परिवहन से  झाँसी रेलवे मंडल को 60 से 95 करोड़ रु की सालान आय होती है | परिवहन व्यवस्था के लिए 138  लोग रेलवे  में पंजीकृत हैं | 

दो लाख वृक्ष विकाश की भेंट चढ़े 

बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे निर्माण के  लिए  उत्तर प्रदेश के चित्रकूट ,बांदा ,हमीरपुर ,महोबा ,जालौन ,ओरैया ,और इटावा  जिले  के लगभग दो लाख वृक्षों  को काटा गया | सरकार कह रही है की इनकी एवज में  दो लाख 70 हजार नए वृक्ष लगवाए जाएंगे |  इटावा से चित्रकूट जिले तक बन रहे  296 किलोमीटर  लम्बे इस एक्सप्रेस वे के  निर्माण पर सरकार 14 हजार 849 करोड़ रु  व्यय  कर रही है | इसी तरह  झाँसी खजुराहो  एक्सप्रेस वे के निर्माण  में भी हजारों वृक्ष काटे गए |  मजे की बात ये है की सरकार कहती है की काटे गए वृक्षों की भरपाई के लिए बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे पर दो लाख सत्तर हजार नए वृक्ष सड़क के दोनों और लगाए जाएंगे |   
                                                                   वर्षो पुराने वृक्ष  आम नीम महुआ ,पीपल बरगद के वृक्षों को उजाड़ने के बाद  नए वृक्ष कब लगाए जाएंगे और कौन से लगाए जाएंगे इनका कोई  हिसाब नहीं है | ग्रीन ट्रिब्यूनल की गाइड लाइन कहती है की जितने वृक्ष कटे जाएँ उसके पांच गुना वृक्ष लगाए जाने चाहिए , पर यहाँ तो दुगने वृक्ष भी लगाने की भी योजना नहीं है | दरअसल सरकार  सड़क निर्माण करने वाले के भरोसे  ही वृक्ष लगाने  का दावा करती है | ठेकेदार सड़क निर्माण के बाद  वृक्ष लगा कर और गिनवाकर अपने कर्तव्य की इति श्री कर लेता है | होना यह चाहिए की सड़क के ले आउट के साथ ही  नवीन  वृक्षों का रोपण  निर्धारित स्थल पर हो |  इससे सड़क निर्माण के दौरान ठेकेदार उन वृक्षों की देख भाल भी कर लेगा और वृक्षों की सुरक्षा भी संभव हो सकेगी | 
                                                         
  

विकास की उमंग और चुनौतियों के संघर्ष का बुंदेलखंड

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