बुंदेलखंड की डायरी
बुंदेलखंड में बन रहे सूखे के हालात
रवीन्द्र व्यास
बुंदेलखंड में कोरोना के बढ़ते ग्राफ से लोगों साँसेंथमरही हैं वहीँ बादलों की बेरुखी ने किसानो को बेचैन कर दिया है | हररोज कोरोनाकेबुंदेलखंडमेंबढ़तेआंकड़ोंने लोगोंकीसांसोंपरविरामलगायाहै| खुली
हवा
में घूमने वाले बुंदेलखंडी घरों में कैद हैं, रोज़गार धंधे चौपट हैं| ऐसे दौर में जब देश का अधिकांश इलाका बारिश से बेहाल है ऐसे समय भी बुंदेलखंड में बादलों की बेरुखी ने किसानो के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं | वर्षा के अब तक के आंकड़े आने वाले सूखा की ओर इशारा कर रहे हैं |
बुंदेलखंड इलाके के सागर संभाग और दतिया को मिलाकर लगभग 31 लाख हेक्टेयर में खरीफ फसल बोई जाती है | दलहन और तिलहन की फसलें बुंदेलखंड के अधिकाँश इलाकों में वर्षा पर ही आधारित मानी जाती हैं | जून माह के तीसरे हफ्ते की बारिश ने किसानो को उत्साहित किया | अच्छी वर्षा के संभावित अनुमान में किसानों ने खरीफ फसल की बुवाई की | किसानो ने बड़े इलाके में सोयाबीन , उड़द और मूंग की फसलें बोई थी | बारिश ना होने के कारण किसानो पर दोहरी मार पड़ रही है , पहले बोया गया बीज अधिकाँश इलाकों में नष्ट हो गया है खेतों में खरपतवार तेजी से बढ़ा , खरपतवार से निपटने के लिए किसान खरपतवार नाशक दवाओं का प्रयोग कर रहे हैं , कई स्थानों पर यह जान लेवा साबित हो रहा है ऐसा ही एक मामला छतरपुर जिले के लवकुश नगर इलाके में देखने को मिला |
21 जूनके बाद हुईबारिश से किसानों के चेहरे खिल गए थे | मानसून समयपर आते ही किसानो न इस साल की खरीफ फसल , दलहनी (उड़द, मूंग, सोयाबीन,तिलहन) फसल की बुवाई कर दी थी ।इस बार अच्छी बारिश का अनुमान किसानो ने लगाया और कैश क्रॉप मानी जाने वाली सोयाबीन की फसल बोई| किसानों के फसलबोते ही मानसूनने साथ छोड़दिया। अधिकांश इलाकों में फसल सूखने कीकगार पर है, कई किसानोंके बीज मरगए उन्हें दोबाराबुवाई करनी पड़ रही है । सागर के ढाना इलाके के किसान बताते हैं कि इस बार बड़े रकबा में सोयाबीन की फसल बोई थी | इसकी वजह भी उन्होंने बताई कि एक तो मानसून समय पर आया दूसरा वापस लौटे मजदूरों की खाली पड़ी जमीनों पर भी उन्होंने उड़द, मूंग, सोयाबीन बोया था | जिनकी जमीन अच्छी है उनकी फसलें तो खड़ी हैं पर जिनकी भूमि ज्यादा पानी मांगती हैं ऐसे किसानो की फसलें सूख गई | ऐसे किसानो को दोबारा फसल बुवाई करना पड़ रही है जिन्होंने सोयाबीन बोया था वे अब तीली और उर्द की बुवाई कर रहे हैं |
छतरपुर जिले के बड़ामलहरा इलाके के उपाध्याय परिवार ने अपने 50 एकड़ की जमींन में 30 एकड़ में सोयाबीन बोया था , उनका बीज तो गया ही जुताई बुवाई का खर्चा भी चला गया | वे बताते हैं की वर्षा के आश्रय के साथ जिनके पास सिचाई के भी साधन हैं उनकी फसलों को नुकसान नहीं हुआ है | अब फिर से बुआई कर उर्दा और तिली बोई है। स्वयं सेवी संस्था समर्थन के ज्ञानेंद्र तिवारी बताते हैं कि हमने बुंदेलखंड के भूमि संरचना को ध्यान में रख कर किसानो को उर्द और तीली का बीज वितरित किया था। अभी हाल की छुट पुट बारिश ने ऐसे किसानो को जीवन दान दे दिया है। सोयाबीन की फसल से अब उम्मीद नहीं रही, किसानो को बुंदेलखंड की परंपरागत फसल उर्द, मूँग और तिल से ही आशा है। बताते हैं कि बुंदेलखंड के अधिकाँश क्षेत्र की भूमि ऐसी है जिसमे फसल के लिए नियमित अंतराल से पानी की जरुरत होती है |
दरअसल बुंदेलखंड का किसान पिछले कईवर्षों से मौसम की मार झेल रहा है। कभीबेवक्त बारिश, सूखा, अतिवृष्टिऔर ओलावृष्टि जैसेहालात यहाँ की स्थाई नियति है।पिछले साल की खरीफ फसलेंबारिश से तबाहहुई थी तो इस बार बारिश के अभाव में तबाह हो रही हैं | वर्षा के आंकड़े बताते हैं कि इस बार सबसे ज्यादा बारिश पन्ना जिले में 417 मिमी ,और सबसे कम छतरपुर जिले में 201 मिमी हुई ,सागर में 288 मिमी,दमोह में 271 मिमी ,टीकमगढ़ में 233 मिमी और दतिया में 262 मिमी वर्षा हुई |
वर्षों बाद बुंदेलखंड के गाँवों में रौनक लौटी थी और वीरानी ख़त्म हुई थी | इसकी वजह थी कोरोना का संकट और लाक डाउन का अभिशाप | महानगरों में रोजगार छिनने के बाद बड़ी संख्या में मजदुर वापस गाँव लौटे , गाँव में जिनके थोड़ी बहुत जमीन थी वो अपनी खेती में जुट गए | संभावित प्रकृति के प्रकोप को देखते हुए किसानो के साथ ये मज़दूर भी बेचैन हैं दुआ कर रहे हैं की बारिश का क्रम ना टूटे | मजदूरों का वापस लौटना और खेती से जुड़ना एक अच्छी खबर इस माने में मानी जा सकती है कि पिछले एक दशक में देश में रोजाना दो हजार किसान खेती से मुंह मोड़ रहे थे | कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने इस बार खरीफ के रकबा में बढ़ोत्तरी की उम्मीद जताई थी | मंत्रालय का अनुमान है कि गत वर्ष 23 मिलियन हेक्टेयर के स्थान पर इस बार 43.3 मिलियन हेक्टेयर खरीफ फसल का रकबा देश में होगा | पर मंत्रालय के इस अनुमान पर भी ग्रहण लगता दिखाई दे रहा है कही अधिक वर्षा से फसले तबाह हो गई तो कही वर्षा की कमी से |
रवीन्द्र व्यास

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