21 अप्रैल, 2020

कोरोना प्रभाव _ बिन अर्थ सब व्यर्थ


बुंदेलखंड की डायरी



रवीन्द्र व्यास

बुंदेलखंड के अधिकांश जिले ग्रीन जोन  में हैं फिर भी यहाँ  एक अजब सा सन्नाटा छाया है , गालियां सूनी हैं ,बाजार बंद हैं ,कारोबार ठप्प हैं , खेत खलिहाँन सूने पड़े हैं | किसान परेशान हैं उनको अपनी उपज  को  कम दरों पर बेचने को मजबूर होना पड़ रहा है | सब्जी किसानो की हालात तो और भी खराब है ,| लोगों की जेबें खाली  हैं  बुंदेलखंड के ग्रामीण इलाकों में  लोग वस्तु विनमय से अपनी जरुरत की पूर्ति करने को मजबूर हो रहे हैं | बिन अर्थ सब व्यर्थ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है | | हालांकि इन सब हालातो से निपटने के लिए शासन ,प्रशासन , सामजिक सरोकार से जुड़े लोग और जन प्रतिनधि अपने अपने स्तर से प्रयास करने में जुटे हैं |                                                      बक्स्वाहा के राजू दुबे बताते हैं कि इस बार हमने  टमाटर और शिमला मिर्च लगाईं थी | फसल भी अच्छी हुई थी , लाकडाउन की वजह से  टमाटर  और शिमला मिर्च नहीं बिक पाई जिसके चलते हमें करीब चार लाख का नुकशान हुआ | वो बताते हैं कि असल में बक्स्वाहा से  हमारे टमाटर सागर ,दमोह ,टीकमगढ़ और छतरपुर की मंडियों में आसानी से पहुंच जाते थे जिस कारण अच्छे दाम भी मिल जाते थे |  यह कहानी अकेले राजू की नहीं है इस तरह के हालात अनेकों  गाँवों  में देखने को मिले |  कहीं किसानो ने माटी मोल टमाटर बेंचे तो कहीं जानवरो को फसलें  खिला दी | यह हालात सिर्फ किसी एक जिले में नहीं बल्कि बुंदेलखंड के हर जिले में देखने को मिल रहे हैं |  एक दिन बाद खुलते बाजारों और परिवहन के प्रतिबंधों ने इनकी मुश्किलें बड़ाई हैं |  गर्मियों के मौसम में टमाटर,भिंडी ,लौकी ,तोरई टिंडा ,करेला,पालक ,शिमला मिर्च की खेती होती है |  जल की पर्याप्ता के कारण इस बार फसलें अच्छी हुई थी | पर लोक डाउन के कारण किसानो के अरमानो पर पानी फिर गया |  हर दिन टूटने वाली फसल अगर एक भी दिन आगे पीछे होती है तो इसका असर  उस फसल पर देखने को मिलता है | ऐसी दशा में वह बेचने में योग्य नहीं रह पाती है |                                                 
असर सिर्फ सब्जियों पर ही देखने को नहीं मिला बल्कि  पान और फूलों पर भी देखने को मिला है | बुंदेलखंड के छतरपुर ,पन्ना, दमोह , सागर ,टीकमगढ़ , महोबा ,ललितपुर के कई इलाकों में बड़े भू भाग पर पान की फसलों का उत्पादन होता है | पान की फसल सर्वाधिक नाजुक फसलों में से एक मानी जाती है | पान दुकानों के बंद रहने के कारण  पान अपने बरेजे में ही नष्ट हो रहा है \  यही हालात फूलों की फसलों का भी है |                                                                                             
सरकार ने आम  लोगों  की  परेशानी को देखते हुए तीन तीन माह  की  राशन सामग्री बांटने का आदेश दिया था|  संकट के इस  दौर  मे कई  समाज सेवी गरीबों और  भूखों को राशन वितरण कर मदद कर रहे है|  यहां तक बुंदेलखंड में कई जिलों में वृहन्नलला भी सामग्री बाँट कर पुण्य कमा रहे हैं |  वही धवाड समिति की तीन उचित मूल्य की दुकानों में जरुरत मंन्दो के एक माह का  राशन  हड़पा जा रहा है | सरकार  ने तीन माह की राशन सामग्री बांटने का आदेश दिया था , किन्तु इस समिति में मात्र दो माह का ही राशन लोगों को दिए जाने की शिकायत गाँव वालों ने की है  छतरपुर जिले के राजनगर तहसील क्षेत्र की |धवाड सोसाइटी की  उचित मूल्य की दुकानों पर एक ही परिवार के नाते रिस्तेदार सेल्स मेन हैं |   गाँव बालो ने कई बार अधिकारियो से शिकायत की पर  इस  संकट काल में किसी को सुनने की फुर्सत नहीं हैं |   जिस जिले में अधिकारियों की नियत 30 किलो चावल के लिए खराब हो जाए उस जिले में समितियों के कारिंदों की नियत खराब हो जाए तो क्या आश्चर्य | छतरपुर जिले के लवकुशनगर जनपद के  भगौरा गाँव में अजब नजारा  देखने को मिला था | गाँव की शासकीय राशन वितरण  केंद्र से जनपद सीईओ सिकंद्दर खान  30 -40 किलो चावल की बोरी ले गए | ये सब नजारा एक ग्रामीण ने  अपने मोबाइल फोन में रिकार्ड कर लिया | खान साहब तो  बच्चो के मध्यान्ह भोजन के चावल का हिस्सा  ले गए थे | मामले की शिकायत पर छतरपुर कलेक्टर ने जांच करवाई  और जांच में दोषी पाए जाने पर उन्हें  निलंम्बित कर दिया गया |   
गेंहू की खरीद फरोख्त
सरकार ने १५ अप्रेल से गेंहू की खरीद का कार्य शुरू किया है |  पहले छह किसानो को एसएमएस भेज कर खरीद केंद्र पर अनाज लेकर आने को कहा गया था बाद में यह संख्या बढ़ाई गई | खरीद बिक्री के इस खेल में प्रशासन और किसान दोनों ही सामने आई चुनौतियों का सामना कर रहें हैं  | समितियों और मंडी के लोग इस बात को लेकर परेशान हैं कि  उनके पास  पर्याप्त श्रमिक नहीं हैं | लॉक डाउन के कारण  बिहार से आने वाली  श्रमिकों की टीम नहीं आई है |  बिहारी श्रमिकों की यह टीम तौलने , पल्लेदारी और बोरियों को सिलने में निपुण होती थी , उनके ना आने के कारण अब  स्थानीय स्तर पर श्रमिकों को जुटाया जा रहा है जिनके कार्य की गति थोड़ी धीमी है |                                         
    दूसरी तरफ बेबस किसान व्यापारियों को कौड़ियों के दाम पर अपनी फसल बेचने को मजबूर हैं || इसके पीछे किसानो की मज़बूरी के साथ ही अर्थतंत्र का वह प्रवाह भी है जिसके चलते किसान को तत्काल पैसे मिलते हैं | जो उनकी तात्कालिक जरूरतों की पूर्ति के लिए आवशयक होते हैं | पिछले दिनों सागर जिले में ऐसे ही एक व्यापारी को पुलिस ने पकड़ा भी था |                   
 मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के   बुंदेलखंड के 14 जिलों में  सिर्फ तीन  जिलों में ही कोरोना संक्रमित व्यक्ति पाए गए हैं | अधिकाँश जिले  ग्रीन जोन में हैं यह बुंदेलखंड के लिए राहत की बात है | पर लोकडाउन के कारण  किसानो , कारोबारियों ,रोज कमाने खाने वालों  में  अर्थाभाव की पीड़ा देखने को मिल रही है |             
 रवीन्द्र व्यास

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