बुंदेलखंड की डायरी
बहुउपयोगी महुआ वृक्ष पर संकट का साया
रवीन्द्र व्यास
उत्तर भारत के जंगलों में एक वृक्ष पाया जाता है जिसे लोग महुआ के नाम से जानते हैं | विशाल वृक्ष महुआ एक ऐसा वृक्ष है जिसके फल ,फूल ही नहीं बल्कि वृक्ष के सभी अंग उपयोगी हैं | इस वृक्ष की उपयोगिता और अर्थतंत्र गाँव में जाकर ही समझा जा सकता है | इसीलिए इसे बुंदेलखंड में कई गाँव के लोग कल्प वृक्ष भी कहते हैं | मार्च अप्रेल का महीना इसके पुष्पों के टपकने का समय होता है | ग्रामीण क्षेत्रो में इस समय का लोग बड़ी ही बेसब्री से इन्तजार करते हैं | इस बार ग्रामीण इलाकों में भी इसके संग्रहण में लोगो को लाक डाउन की समस्या आई | ग्रामीणों की अर्थव्यवस्था को सम्बल देने वाले इस वृक्ष पर भी दबंगों का काला साया मंडराने लगा है |
महुआ के ये पुष्प इतने रसीले और मीठे होते हैं कि आदमी तो ठीक जानवर भी यदि इसका स्वाद ले ले तो बार बार उसी वृक्ष के नीचे पहुँच जाता है | मधु जैसी मिठास लिए इस पुष्प की मादकता का ही असर है कि इससे बड़े पैमाने पर शराब भी बनाई जाती है | इसके फूलने के दौरान ही जंगल में अजब तरह की मादकता छा जाती है | बंजर जमीन पर भी उग जाने वाला यह वृक्ष जब लोगों को संम्पन्नता दे, उनको निरोगी बनाये तो लोग इसे कल्प वृक्ष क्यों ना कहें |
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वृक्षों पर दबंगो का कब्जा
इस गुणकारी वृक्ष की महिमा ही कुछ ऐसी है कि लोगों की नियत डोल ही जाती है | जब लोगों की नियत सिर्फ स्वयं के विकाश और संम्पन्नता तक सिमट जाये तो कुछ भी हो सकता है | ऐसा ही एक वाक़या बताया बड़ामलहरा (छतरपुर ) के रामकृपाल शर्मा ने | वे बताते हैं कि सरकार ने लघु वनोपज के तहत आने वाले आचार, महुआ फूल फल (गुली) आदि को मुक्त रखा है | सभी वर्गो को जंगल से सग्रहण करने की छूट दी हुई है | सरकार की मंशा साफ़ है कि इससे गाँव के लोगों की आर्थिक दशा में सुधार होगा | र बड़ामलहरा वन उप संभाग के इलाके में महुआ वृक्षों के जंगलों पर और वृक्षों पर दबंगों ने कब्जा कर लिया है । हालात ये हो गए हैं कि दंवग कब्जा वाले महुआ बृक्षो को पांच -पांच सौ रुपये
नीलाम करने लगे हैं | क्षेत्र के दबंगो ने अपनी दबंगई के हिसाब से बटवारा कर लिया है | दबंग जंगलो से महुआ फूल संग्रहण करने बालों से बतौर टैक्स के रूप मैं आधा बसूल कर रहे हैं।
कलौथर एवं जसगुवा के ग्रामीणों ने वन मंडलाधिकारी छतरपुर से इस मामले की शिकायत भी की थी | इसके बावजूद कोई कार्यवाही नहीं हुई । दो वर्ष पूर्व बड़ामलहरा क्षेत्र की आधा दर्जन वन सुरक्षा समितियों ने अलग अलग प्रस्ताव पारित कर वन परिक्षेत्र कार्यालय एवं वन मंडल कार्यालय भेजा था | प्रस्ताव में उल्लेख किया गया था कि इस क्षेत्र के जंगलों मैं महुआ के पेड़ अधिकता मैं पाये जाने की वजह से महुआ के जब फल फूल आते हैं उस समय कुछ लोगो अपना कब्जा कायम कर लेते हैं | परिणामतः अन्य लोगों को इसका लाभ नहीं मिल पाता।इसलिए वन सुरक्षा समितियों के माध्यम से प्रत्येक वन बीट मैं पाये जाने बाले महुआ के पेड़ों की गणना करवाई जाए | बीट मैं निवास करने बाले लोगों को फूल फल संग्रहण करने के साथ ही उनकी सुरक्षा का जिम्मा भी सौंपा जाए | वन सुरक्षा समितियों के इस प्रस्ताव पर वन मंडल कार्यालय ने कार्यवाही तो दूर जबाब देना भी उचित नहीं समझा।
महुआ के औषधीय गुण
संस्कृत में महुआ को मधुक वृक्ष के नाम से जाना जाता है | वानस्पतिक नाम मधुका लोंगफोलिया है | औषधीय गुणों की खान महुआ वृक्ष की छाल ,पत्तियां, फल, बीज और फल भी अद्भुत गुणकारी हैं | महुआ के फूल में प्रोटीन , कैल्शियम ,फास्फोरस और शुगर प्रचुर मात्रा में पाया जाता है | सर्दी जुकाम खांसी ,पेट ,बवासीर और श्वसन सम्बन्धी रोगों में इसके फलों और फूलों का उपयोग किया जाता है | इसके बीजों का उपयोग निमोनिया ,त्वचा रोग के लिए किया जाता है | इस वृक्ष की छाल का काढ़ा भी त्वचा,डायबटीज़ ,अल्सर,और गठिया रोग में भी बहु उपयोगी है | महुआ के बीजो का तेल भी गठिया रोग में लाभदायक माना जाता है | पशुओ के रोग नाशक के साथ ही दुधारू पशुओं के दूध में वृद्धि भी महुआ के पुष्प करते हैं |
बढ़ती आबादी और घटते वृक्ष
अभी हाल ही में 22 अप्रेल को अंतर्राष्ट्रीय पृथ्वी दिवस मनाया गया , पृथ्वी को बचाने की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपील की गई | दरअसल पृथ्वी का श्रृंगार वृक्ष हैं और विकाश की इस दौड़ में पृथ्वी के श्रृंगार को कोई कसर नहीं छोड़ी | बुंदेलखंड इलाके में महुआ , अचार ,तेंदू , हर्र ,बहेरा के वृक्ष जंगलों में बहुतायत में पाए जाते थे | अब हालात ये हैं कि तेंदू , आचार , ,हर्र ,बहेरा के वृक्ष बिलुप्त होने के कगार पर पहुंच गए हैं। जिस हिसाब से महुआ के वृक्ष काटे जा रहे हैं वह दिन दूर नहीं जब महुआ प्रजाति के पेड़ भी संकट ग्रस्त प्रजाति मैं शुमार हो जायेंगे।




