24 नवंबर, 2019

बदहाल होता बुंदेलखंड का फर्नीचर उद्योग

बुन्देलखण्ड की डायरी

बदहाल होता  बुंदेलखंड का फर्नीचर उद्योग

रवीन्द्र व्यास 

बुंदेलखंड के छतरपुर ,पन्ना और टीकमगढ़ के सागौन वृक्ष  की खाशियत है कि यह देश और प्रदेश के अन्य सागौन वृक्षों की तुलना में अलग तरह का है | वैसे तो सागौन की लकड़ी से बने फर्नीचर का मजबूती से ज्यादा सम्बन्ध नहीं माना जाता है , किन्तु  यहां के सागौन की खासियत है कि यह ना सिर्फ मजबूत होता है बल्कि इसमें चिकनाहट और चमक अन्य क्षेत्रो के मुकाबले ज्यादा होती है | यही कारण है कि  छतरपुर के बने सागौन फर्नीचर की मांग कभी कम नहीं होती | तमाम तरह की परेशानियों के बावजूद भी यहाँ  सबसे ज्यादा फर्नीचर निर्माण का काम होता है | समय के साथ वनो के और ख़ास कर सागौन वृक्षों की बेतहासा कटाई के बाद  अब  फर्नीचर कारोबारियों को लकड़ी के लिए खासी जद्दोजहद करनी पड़ रही है |




                                  बुंदेलखंड  के सागौन  के फर्नीचर निर्माण  का काम सिर्फ छतरपुर नगर में  ही नहीं होता है , बल्कि पन्ना ,टीकमगढ़. दमोह ,सागर , निवाड़ी , ललितपुर ,झांसी  के अलावा  बुंदेलखंड के अनेको  कस्बों और  गाँवों में फर्नीचर  निर्माण का काम होता है | वहीँ चित्रकूट में  एक विशेष तरह की लकड़ी से खिलौनों का निर्माण होता है | उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्य नाथ ने हाल ही में चित्रकूट के खिलौना बनाने के इस कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने की घोषणा की है | हालांकि मध्य प्रदेश सरकार ने विश्व स्तरीय  फर्नीचर निर्माण के कारोबार को बढ़ावा देने की अब तक कोई सार्थक पहल नहीं की है | 


 छतरपुर  फर्नीचर निर्माण और कलात्मकता के लिए इतना विख्यात हो चुका है कि  , आपको देश प्रदेश के अनेक शहरो में छतरपुर अथवा बुंदेलखंड  फर्नीचर के नाम से शो रूम मिल जाएंगे | 1948 में हिन्द फर्नीचर के नाम से जमुना प्रसाद श्रीवास्तव ने कारोबार शुरू किया था ।  फर्नीचर निर्माण के काम को  एक व्यवस्थित तरीके से शुरू कर  एक नई दिशा जमुना प्रसाद जी ने दी || उनके यहाँ बने फर्नीचर प्रदेश के राजयपाल ,मुख्यमंत्री ,  आई ए एस ,आई पी एस , सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाते हैं | ऐसा नहीं है कि इसके पहले बुंदेलखंड या छतरपुर में फर्नीचर नहीं बनते थे , इसके पहले भी राजशाही काल से ही यहाँ कुशल कारीगरों द्वारा फर्नीचर निर्माण का काम होता रहा है | पर वह तब होता था जब मांग होती थी तभी निर्माण का काम होता था |



घटती लकड़ी और बढ़ती आबादी के इस दौर में   अकेले छतरपुर शहर में  ही  फर्नीचर निर्माण और विक्रय के लगभग ४ -५ सौ  कारोबारी हैं | फर्नीचर के इस कारोबार से लगभग ४-५ हजार लोगों की रोजी रोटी चलती है | यदि यह कहा जाए की  बुंदेलखंड के खनिज उत्खनन के अलावा यह एक मात्र ऐसा उद्योग समूह है जो हजारों लोगों को रोजगार प्रदान करता है | बुंदेलखंड के इस  उद्योग समूह के  लिए और इसके कार्य में लगे कुशल कारीगरों के लिए शासन स्तर पर कोई बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई गई हैं | हालात ये हो गए हैं की लकड़ी के कुशल शिल्पी अब  लकड़ी से नाता तोड़ कर प्लाई फर्नीचरों से नाता जोड़ने लगे हैं | लकड़ी के शिल्प में अपनी उम्र खपाने वाले राम लाल बताते हैं कि  लकड़ी की नक्काशी और तमाम तरह की मेहनत के बाद बा मुश्किल रोज के ३सो रु मिल पाते थे , जब कि प्लाई के काम में रोज के हजार 15 सो रु मिल जाते हैं |

 हिन्द फर्नीचर के शशांक कश्यप कहते  हैं कि  अब इस उद्योग में कुशल कारीगरों की कमी के साथ लकड़ी की समस्या से भी जूझना पड़ता है | शासन स्तर पर कोई सहयोग नहीं मिलता जब कि यह सबसे बड़ा रोजगार उपलब्ध कराने वाला उद्योग है | उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार शासन काल में  सहारनपुर के काष्ठ  कला उद्योग को टेक्स फ्री किया गया था , पर यहां इस तरह की कोई व्यवस्था नहीं है और ना ही मजदूरों ,कारीगरों के कल्याण की कोई व्यवस्था है | वर्षों पहले बने फर्नीचर उद्योगिक क्षेत्र को अब तक नहीं शुरू किया जा सका है | वहां ना लाइट है ना पानी है ना सड़क है | अगर एक जगह प्रॉपर इकाइयां हो जाएँ और उनके बेहतर प्रदर्शन की व्यवस्था हो जाए तो एक बड़ा काम जिले के लिए हो जाएगा |

                  छतरपुर जिले में फर्नीचर कारोबार को देखते हुए तत्कालीन कलेक्टर अजात शत्रु श्रीवास्तव ने एक योजना बनाई थी | फर्नीचर कारोबार के लिए अलग उद्योगिक क्षेत्र विकसित करने के लिए चंद्रपुरा का चयन किया गया था | उनका मानना था बुंदेलखंड और छतरपुर का  फर्नीचर  अनेको  विशेषताओं के कारण  देश और विश्व में अपना स्थान बना सकता है , इसी के चलते उन्होंने  इस योजना के लिए प्रयास किये थे | उनके जाने के बाद  यह सारा काम एक तरह से  ठप्प  सा हो गया |   उद्योग विभाग के सूत्रों का कहना है की  अब वहां सिर्फ फर्नीचर के लिए नहीं बल्कि  सभी तरह की उद्योगिक इकाइयां स्थापित की जा रही हैं |  २००६-०७ में बनी योजना के तहत  260 प्लाट बनाये गए थे ,जिसमे १६० फर्नीचर इकाइयों के लिए रखे गए थे और आवंटित किये गए थे | जब उन्होंने  शुरू नहीं किये तो अधिकाँश निरस्त हो गए | बिजली कनेक्शन के लिए 1. 75 करोड़ रु विद्युत मंडल में जमा कर दिए हैं। आधे से ज्यादा इलाके में सड़क बन गई है |  जल्द ही कनेक्शन की शुरुआत हो जायेगी |

वैसे तो सागौन वृक्ष भारत के अलावा म्यांमार , थाईलैंड ,फिलीपींस ,जावा , और मलाया  में भी पाए जाते हैं | भारत में मद्रास ,कोचीन ,त्रावणकोर , मैसूर ,महराष्ट्र और मध्य प्रदेश के अलावा उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के जंगलो में पाए जाते हैं |  सागौन की लकड़ी की खासियत बताई जाती है कि  यह सिकुड़ती कम है और हल्की , मजबूत  होती है | पानी में पड़ी रहने के बाद यह पत्थर जैसी कठोर हो जाती है | वर्षो बाद भी इसकी  चमक में कोई फर्क नहीं पड़ता | वन विभाग के रिटायर्ड अधिकारी जे पी रावत  बताते हैं कि   बुंदेलखंड के सागौन वृक्ष  काफी पुराने होने के साथ अपनी अलग तरह की खाशियत रखते हैं | इनकी मजबूती ,चमक ने इसे अलग पहचान  दी है |

देखा जाए तो बुंदेलखंड इलाके के इस तरह के कई उद्योग और कुटीर उद्योग यहां के  लोगों के रोजगार के कभी बड़े साधन हुआ करते थे | आधुनिकता की चमक के चलते ये धीरे धीरे  समाप्त हो गए या समाप्ति की कगार पर पहुंच गए | ऐसा ही काष्ठ  कला का का चित्रकूट का कुटीर उद्योग जब अपनी अंतिम साँसे लेने लगा तो ,उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री  योगी आदित्य नाथ ने  चित्रकूट के लकड़ी से खिलौने बनाने वाले उद्योग को एक जिला एक उत्पादन योजना में शामिल कर नव जीवन प्रदान किया | ये अलग बात है कि मध्य प्रदेश   सरकार ने इस कष्ट  कला उद्योग के विकाश और संवर्धन के लिए कोई जतन  नहीं किये | घटते सागौन वृक्ष ,और वन बढ़ती आबादी के बोझ से कैसे  उद्योग को जीवन्त बनाये रखा जा सकेगा यह एक बड़ा सवाल खड़ा है  | 

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