बुन्देली लोक चेतना के कवि छत्रसाल
- डॉ. बहादुर सिंह परमार
भारत के मध्यवर्ती क्षेत्र में अवस्थित बुन्देलखण्ड अपनी आन-बान और शान के लिए ख्यात रहा है। यहां अतीत में षिषुपाल, आल्हा-ऊदल जैसे अनेक वीर-पुत्र पैदा हुए जो अपने समय के तमाम योद्धाओं को ललकारते रहे हैं। यह भूमि अपने स्वाभिमान की खातिर लम्बे समय से संघर्ष करती रही है और आज भी कर रही है। मध्यकाल में मुगल सत्ता को चुनौती देने का काम दक्षिण में जो वीर षिवाजी ने किया था, वही काम मध्य भारत में छत्रसाल ने किया । छत्रसाल के पिता चम्पतराय अपने समय के महान योद्धा तथा अन्याय के विरुद्ध खुलकर संर्घ ा करने वाले थे जिससे उन्हें बागी करार दे दिया गया था। इन्हीं बागी योद्धा के पुत्र छत्रसाल का जन्म मोर पहाड़ी के जंगल में हुआ था। इन्होंने बुन्देलखण्ड की सीमा को न केवल तय किया बल्कि अपनी तलवार का लोहा संपूर्ण भारत में मनवा लिया था। छत्रसाल जहाँ तलवार के धनी थे, वही वे कलम में सिद्धहस्त थे।
उन्होंने स्वयं काव्य रचकर अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया। कहा तो यहाँ तक जाता है कि उनके दरबार में तीन सौ कवियों को संरक्षण प्राप्त था। वह महाराजा छत्रसाल ही थे जिन्होंने उस कालखण्ड के राष्ट्रकवि भूषण की पालकी को स्वयं कन्धा लगाया था यह उस भावना का द्योतक है कि वे कलमकारों की कितना मान देते थे। महाराजा छत्रसाल स्वयं कहा करते थे कि ‘कवि कीरति के विरवा हैं, इन्हे कभऊँ मुरझान न दीजै।’ महाराजा छत्रसाल स्वयं अच्छे कवि है। उनकी प्रमुख रचनायें जो प्राप्त होती है। वे हैं - कीर्तन श्री रामयष चन्द्रिका, हनुमत-विनय, अक्षर अनन्य के प्रश्न और तिनकौ उत्तर, नीति मंजरी, द्रोपदी अष्टक तथा फुटकर पद्य। इन रचनाओं के अध्ययन से ज्ञात होता है कि छत्रसाल बुन्देली लोक चेतना के कवि है इनके काव्य में वहीं दर्षन, भाव, प्रस्तुति विद्यमान है जो बुन्देलखण्ड के आम जन में व्याप्त है। बुन्देलखण्ड का लोक सर्वदेव समभाव का संरक्षक रहा है, वहां राम कृष्ण का उपासक है, राम के परम सेवक हनुमान यहां के कण कण में पूज्य व स्वीकार्य है। नीति ज्ञान आदि की बातों में लोक में परम पूज्य है। नैतिकता का मान यहां सर्वोच्च, नैतिक रूप से पतित व्यक्ति न केवल निदंनीय है बल्कि त्याज्य है।
छत्रसाल की काव्य रचनाओं का संपादन कर श्री वियोगी हरि ने छत्रसाल गं्रथावली में संकलित किया है। इनकी रचनाओं की महत्ता को रेखांकित करते हुए श्री वियोगी हरि जी लिखते कि ‘‘महाराज छत्रसाल एक ऊँचे कवि थे। प्रेम और भक्ति इनकी रचनाओं में कूट-कूट कर भरी है। इनकी रचना में तन्मयता की अच्छी मात्रा है। इनकी दृष्टि निःसंदेह कवि दृष्टि थी। राजनीति पर इन्होंने जो पद्य रचे हैं, वे आज भी हमारे पथ प्रदर्षक कहे जा सकते हैं,’’ इससे पता चलता है कि छत्रसाल अपने समय के कितने बड़े कवि थे। छत्रसाल के इष्ट व आराध्य राधाकृष्ण रहे हैं। वे उनकी शरण में आम बुंदेली श्रेष्ठ भक्त की तरह अपने को समर्पित करते हुए लिखते हैं -
दया सिन्धु सुनिये, अरज श्री राधे ब्रजरानि।
छत्रसाल पायनि पर्यौ, सरन राखिये आनि।।
कृष्ण प्रिया राधे को स्मरण करते हुए दया सिन्धु कृष्ण से अपनी अरजी सुनाते हुए उनके पैरों पर शरणागत भाव से पड़कर उनकी शरण में जाते हैं और उनसे उन्हें स्वीकारने की विनती करते हैं। इसमें प्रेम, भक्ति के साथ और अपने को हीन प्रस्तुत कर उन्होंने श्रेष्ठ भाव प्रकट किया है। वे राधा को प्रेम का उच्चतम मान बताते हैं, इसीलिए उनके काव्य में राधा गुण गान के कई छन्द विद्यमान है। वे मानते है कि देवियों की जमातें इकट्ठी होकर, रास्तों में घटा सी घुमड़ती हैं। शंभु रानी यानि पार्वती, इन्द्राणी, विधि रानी यानी सरस्वती और रमा रानी आदि उसी पर प्रसन्न होती हैं जिस पर राधा रानी की कृपा दृष्टि होती है। राधा की कृपा दृष्टि से रिद्धि-सिद्धि दौड़ी चली आती है, और सभी संपदायें उस (भक्त) को प्राप्त हो जाती हैं। वे राधा के बिना कृष्ण की भक्ति को अधूरा मानते हैं। वे कृष्ण के मुख से ही कहलवाते है कि राधा के बिनु मैं क्षण भर नहीं रह सकता अर्थात् राधे को याद करने पर ही कृष्ण सहाय होंगे। छत्रसाल का यह पद देखें -
राधा के सनेह-हित गेह तजि आयौ इतै,
और कहा कहों गाय विपिन चरायौ मैं।
जायौ जौन जनक तौन तनिक न मान्यौ मैं,
राधा के सनेह नंदलाल हूँ कहायौ मैं।।
राधा के सनेह मेह-नायक कौ जीत्यौ जाय,
कहै कृष्ण ‘छत्रसाल’ गिरि कौ उठायौ मैं।
मौंकों कहे लाख बार भाखि-भाखि साखि दै-दै,
राधा बिनु ताहि नैक भूलिहूँ न भायौ मैं।।
इस तरह से छत्रसाल कृष्ण के मुखारबिंदु से कहलाते है कि वे राधा के प्रेम के वशीभूत होकर वे अपना गृह त्याग कर जंगल में गायों को चराते हैं। अपने पिता के घर को त्यागने में बिना देर किए नन्द का लाल राधा के प्रेम कारण ही इन्द्र को परास्त करने गिरि को धारण किया। भक्त मुझे लाखों-लाख बार विश्वास व गवाही देकर भी याद करें तो मैं बिना राधा के मैं उन्हें भूल से भी पसंद नहीं करूँगा। छत्रसाल ने कृष्ण भक्ति के कई छन्द लिखकर अपनी काव्य प्रतिभा को सिद्ध किया है। वे कृष्णको विभिन्न रूपों में याद कर उनसे विनय करते हैं। वे अपने को सही भक्त बताते हुए यहाँ तक कह उठते हैं कि आपने दानवों का वध किया है, तो हमने भीयवनों का संहार किया है देखिये -
तुम घनश्याम हम जाचक मयूर मत्त,
तुम सुचि स्वाँति हम चातक तुम्हारे हैं।
चारु चंद्र प्यारे तुम लोचन चकोर मोर,
तुम जग तारे हम छतारे उचारे हैं।।
छत्रसाल, मीत मित्रजा के तुम ब्रजराज,
हमहूँ कालिंदजा के कूल पै पुकारे हैं।
तुम गिरिधारी हम कृष्ण व्रतधारी तुम
दनुज प्रहारे हम यवन प्रहारे हैं।।
बुन्देलखण्ड लोकांचल में कृष्ण-लीलाओं के विभिन्न प्रकरण बहुत लोक प्रसिद्ध हैं। उन सभी की झाँकी छत्रसाल के काव्य में दिखाई देती है। छत्रसाल विनयावनत भाव से भव-सागर से तारने की एक ओर गुहार कृष्ण से लगाते हैं, वहीं दूसरी ओर कृष्ण की विभिन्न छवियों में सखा की छवि को वे आत्मसात करके उनसे मित्रवत् व्यवहार की अपेक्षा करते हैं। कंस वध, कृष्ण की बाल लीलाओं तथा मथुरा पर ब्रज वनिताओं के विरह का वर्णन भी छत्रसाल की लेखनी ने किया है। वे राम के रूप की उपासना भी करते हैं। वे राम से विनती करते हैं कि उन्हें इस संसार से वैसे ही तारे जिस प्रकार उन्होंने गीध, व्याध, धन्ना, सदना और रैदास को तारा। राम की महिमा का वर्णन तथा उनसे विनती उसी शैली में की है, जिस प्रकार तुलसीदास ने विनय पत्रिका में की है। बुन्देलखण्ड अँचल में राम नाम के आधार को कई भक्त कवियों ने निरूपित किया है। उसी का अनुगमन करते हुए महाराज छत्रसाल ने भी राम नाम की महत्ता को रेखांकित करते हुए लिखा है कि राम का स्मरण सदना कसाई और कबीर जुलाहा ने किया है। रैदास ने परम पद राम नाम के कारण प्राप्त किया। ग्राह से ग्रसित गज ने राम नाम से मुक्ति प्राप्त की इसीलिए सभी से अपेक्षा है कि हम सब राम नाम को स्मरण कर अपने दुःख से मुक्ति पायें -
राम कह्यौ सदन, कबीर राम-राम कह्यौ,
राम रैदास कह्यौ, परम पदु पायौ है।
राम कह्यौ गज जब रज में मिलन लाग्यौ,
पाछैं परी टेर आपु अग्रहीं सिधाऔ है।
ग्राह तें छुड़ाय पुचकारि पार ठाढ़ो कियौ,
छत्रसाल राज ऐसो बिरद बढ़ायौ है।
राम कहौ, राम कहौ, भूलि जनि जाब कोऊ,
राम के कहैयनि में कानै दुख पायौ है।।
महाराजा छत्रसाल ने श्री रामयश चन्द्रिका में अड़सठ छन्दों में राम के यश का मार्मिक व प्रभावी वर्णन किया है। इसमें वे वेद, पुराण, निगम, स्मृतियों तथा अन्य स्त्रोतों का जिक्र करते हैं, जिससे प्रतीत होता है कि वे योद्धा के साथ अच्छे अध्येता भी थे। राम भक्त हनुमान बुन्देलखण्ड के वे लोक देवता है, जो लोक के हर कष्ट का निवारण करते हैं। विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी लोकमन वीर हनुमान में आस्थावान रहकर संघर्षों से पार पाता है। इसी भावना को समादृत करते हुये महाराजा छत्रसाल ने हनुमत-विनय संबंधी 37 छन्दों की रचना की है। वे सदा सर्वदा हनुमान को याद करने का परामर्श देते हैं। राम रावण युद्ध में हनुमान की भूमिका, उनका समर्पण, उनका भक्तों के प्रति भाव आदि भाव महाराज छत्रसाल की काव्यवस्तु बने हैं। एक डमरू छंद के माध्यम से हनुमत वंदना अद्भुत ढंग से महाराज छत्रसाल ने लिखी है। देखें -
गिरि-धर दिषि-चर प्रभुवन-उर-धर,
रघुवर-चर-वर, जय जय जय-कर।
प्रभु-पद- रज-धर, जय-धुज-कर-धर,
जय जय जसधर, जय भव-भय हर।।
जयति बिजय-धुज, छतहि करहु कुज,
जयति जयति अज जय मम मन भर।
जय जय पवन-तनय त्रिभुवन कह,
जय प्रनमत सब पद सिर धर-धर।।
महाराजा छत्रसाल लोकमानस का समादर करते हुये वीर हनुमान के प्रति अटूट भक्ति का भाव रखते हैं। वे बाल ब्रह्मचर्यधारी हनुमान को धर्म रक्षक तथा अन्यायी के भक्षक मानते हैं। उनके काव्य में बुन्देली लोक कहावतों और मुहावरों के प्रयोग से चमत्कार उत्पन्न हो गया है। वे हनुमान का स्तवन करते हुये उनको सौगंध रखाते हुये कहते हैं कि सच्चे शूरवीर हैं तो उन्हें साक्षात् दर्शन दें। आप भी इस छंद को देखें -
असन अघाय पाय तृप्त होय भूखो जब,
अंगद-सुमूरि भूरि तबहि चखा करै।
बूसिन-विदृान वस्त्र पायकै सिहावै जब,
छत्रसाल, तबै सीत आतप लखा करै।।
बाल-ब्रह्मचारी तू ही धर्म-धुर-धारी धीर,
गहन मलेच्छ फारि क्यौ न दो फका करै।
जगत दिखाय कहै, ‘सुर को प्रकाश भयौ’,
सूर तबै जानें, जब आँखनि दिखा परै।।
इस तरह वीर हनुमान की स्तुति में कवि छत्रसाल ने कई छन्द लिखे हैं। अपने समकालीन संत तथा कवि अक्षर अनन्य से निर्गुण पंथ तथा ज्ञान की अन्य स्थितियों पर काव्य मय पत्र-व्यवहार होता है, जिसमें छत्रसाल की आस्तिकता के प्रति निष्ठा झलकती है। महाराजा छत्रसाल ने बुन्देलखण्ड के लोक चिन्तन में व्याप्त सत्य, ईमानदारी, त्याग, तपस्या तथा पारस्परिक सहयोग के विचारों की अभिव्यक्ति अपने नीतिपरक काव्य में की है। साहस को कभी नहीं त्यागना चाहिये क्योंकि मन के हारे हार और मन के जीते जीत होती है। वे कहते हैं कि हमें कुल की साख नहीं समाप्त होने देना चाहिये। ऐसा कोई कृत्य नहीं करना चाहिये जिससे कुल में कलंक लगे। देखें एक छन्द -
लाख घटै, कुल-साख न छाँडि़ये, वस्त्र फटै प्रभु औरहुँ दैहै।
द्रव्य घटै, घटता नहीं कीजिये, दैहे न कोऊ पै लोक हँसै है।।
भूप छता जल-राशि कौ पैरिबो, कौनिहुँ बेर किनारे लगै हैं।
हिम्मत छोड़े तें किम्मत जाएगी, जायगो काल, कलंक न जैहै।।
अर्थात् कुछ भी हो जाये साख को नहीं त्यागें। वस्त्र फटने पर दूसरे प्रभु कृपा से मिल जायेंगे, धन घटने पर चिंता नहीं करना चाहिये लोगों से माँगने पर वे सहयोग न कर मात्र खिल्ली उड़ाएँगे। महाराज छत्रसाल कहते हैं कि विपरीत जलराषि में तैरने से कभी न कभी पार लग ही जायेगें, प्रयत्न नहीं छोड़ना चाहिये क्योंकि हिम्मत छोड़ दी तो कीमत चली जायेगी तथा कुल कलंकित हो जायेगा। बुन्देलखण्ड में पत और सत की रक्षा के लिये अतीत में अनेक यु़द्ध होते रहे हैं। आज भी लोकांचल में वचनों की रक्षा के लिए लोग कुछ भी करने को तत्पर रहते हैं। महाराज छत्रसाल मानते हैं कि परमार्थ के समान इस धरा पर कोई पुण्य कार्य नहीं है और स्वार्थ सिद्धि के लिए ही जीना सबसे बड़ा पाप है। इस दोहे को देखें -
निज स्वारथ सो पाप नहिं, पर स्वारथ सो पुन्न।
दिये इकाई सुन्न ज्यों, होत छता दस गुन्न।।
राज काज में नीति अर्थात् नैतिकता प्रमुख आधार होना चाहिये। दोगलापन से जनता राजा से कभी प्रेम नहीं कर सकती। यह राजकाज के लिए पतन की कारक बनती है। वे कहते हैं कि -
छत्रसाल राजन को, बर्जित सदा अनीति।
द्विरद दंत की नीति सों, करत न रैयत प्रीति।।
इस तरह महाराज छत्रसाल के काव्य में नीतिपरक बातें कूट-कूट कर भरी हैं। उनकी कहन लोक कहावतों और मुहावरों से सुसज्जित हैं। वे काव्य शास्त्रीय समझ भी रखते हैं। कई स्थलों पर वे बताते हैं कि कवि को क्या लिखना चाहिये ? क्यों नहीं। एक जगह वे लिखते हैं कि कवि को सत्य का पथ नहीं त्यागना चाहिये, इसके साथ कवि का मन संतुलित व धर्म हित-नित्य होना चाहिये -
अविचल चित्त भलो, धर्म हित-नित्य भलो।
छत्रसाल सत्य भलो, भाषवो सुकवि को।।
महाराज छत्रसाल के समग्र रचना कर्म की गहन पड़ताल की आवश्यकता है। आज हमें उनके काव्य कर्म की परख करके उसकी रचनाओं में बुन्देली लोकमन झाँकता है। उनका काव्य उस काल से आज ज्यादा प्रासंगिक तथा प्रेरणाप्रद है। वे जिस समर्पण भाव से कर्म तथा राजकाज संचालित करते हैं, वह अतुलनीय है। उनके क्षात्र धर्म से कवि कर्म कहीं नीचा नहीं है। उनकी तलवार ने जहाँ भी अन्याय देख उसका समूल नाश किया लेकिन नैतिकता के साथ। यही सब उनके काव्य में प्रदर्शित है। ऐसे लोक चेतना के धनी कवि को शत्-षत् प्रणाम।
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