14 जनवरी, 2018

पिछड़ेपन के अभिशाप से ग्रस्त बुंदेलखंड


बुंदेलखंड की डायरी 

वित्त मंत्री का जिला भी पिछड़ेपन का शिकार

रवींद्र व्यास 

पिछड़ेपन के शिकार  बुंदेलखंड के तीन जिले नीति आयोग ने  अति पिछड़े  पाए हैं | इनमे मध्य प्रदेश के वित्त मंत्री का जिला दमोह  और  महिला  बाल विकाश राज्य मंत्री के  छतरपुर जिला के अलावा उत्तर प्रदेश का चित्रकूट जिला सम्मलित हैं | सड़क, स्वास्थ्य ,शिक्षा , पोषण, और विद्दुत व्यवस्था के मामले में ये जिले फिसड्डी साबित हुए हैं |  पिछड़ेपन के इन मानकों के अलावा और भी कई ऐसे बुनियादी आधार हैं जिनके कारण  इन जिलों में उक्त समस्याओं के अलावा और भी कई विसंगतिया हैं जिनकी ओर ध्यान देने की जरुरत ना प्रशांसन समझता है और ना जन सेवक का लबादा पहने जन प्रतिनधि | 
 1960 की आयोग की रिपोर्ट में देश के 123 जिले अति पिछड़ेपन की श्रेणी में आते थे | इनमे अधिकांश जिले बिहार ,उत्तर प्रदेश ,और मध्य प्रदेश के आते थे | आजादी के सात दशक बाद भी कमोवेश वही हालात बने हुए हैं |  नीति आयोग की यंग लाइव्स लाजीट्यूडनल सर्वे रिपोर्ट   के अनुसार इस समय बुंदेलखंड के तीन जिला सहित  देश के 115 जिले अति पिछड़ेपन के शिकार हैं |  बड़ा सवाल यही उठता है की देश में विकाश कहाँ और किसका हुआ ? क्या  समग्र विकाश की जरुरत को देश के नीती निर्धारकों ने नहीं समझा  | या सिर्फ उनके लिए विकाश का पैमाना महा नगरों के विकाश और नगरीय विकाश तक ही सीमित रहा | 2001 की  एन जे कुरियन की रिपोर्ट में देश के 100 टाप जिलों में कोई भी एम् पी ,यूपी ,अथवा बिहार से नहीं था | 2003 में  शंकर अय्यर की एक  रिपोर्ट में 100 जिलों के  अध्ययन  का विवरण दिया  गया था | उन्होंने अपनी रिपोर्ट में पाया था की पिछड़े जिलों के हालातों में  कोई बहुत ज्यादा परिवर्तन नहीं आया है  | 2007 में कांग्रेस की  मनमोहन सिंह  सरकार ने 27 राज्यों के 250 जिलों के लिए बेकवर्ड रीजन ग्रांट फण्ड (बी.आर.जी.एफ. ) योजना शुरू की थी | 2011 में जब योजना आयोग ने इसकी जमीनी सच्चाई जानी तो वह भी राज्य सरकारों के रवैय्ये को देख कर हैरान रह गई | राज्य की सरकारों ने  इस बजट का बड़ा हिस्सा अपने अन्य उपयोग में लिया और पिछड़े जिलों को  उनकी जरुरत के अनुसार  धन राशि  नहीं दी | 

                                                              दरअसल देखा जाए तो नीति आयोग की रिपोर्ट में बुंदेलखंड के सिर्फ छतरपुर , दमोह और चित्रकूट जिले ही अति पिछड़ेपन की श्रेणी में माने गए हैं |  सड़क, स्वास्थ्य ,शिक्षा , पोषण, और विद्दुत व्यवस्था के मामले में ये जिले  निचले पायदान पर हैं | वास्तविकता ये है कि  बुंदेलखंड  के  पन्ना, टीकमगढ़ , दतिया ,सागर ,उत्तर प्रदेश के ललितपुर ,झाँसी , महोबा , बांदा , हमीरपुर , उरई जिले  के भी हालात कमोवेश ऐसे ही हैं | विकाश के पैमाने पर  देखा जाए तो पोषण के हालात इन जिलों में बद से बदत्तर हैं |  सामाजिक संस्थाओं की रिपोर्टे बताती हैं की कुपोषण के मामले में  बुंदेलखंड के ये जिले  बद्द्तर हालात में हैं | यहां की 80 फीसदी ग्रामीण और 60 फीसदी शहरी महिलाये खून की कमी की शिकार हैं | आधी से ज्यादा आबादी के पास दो जून के भोजन की नियमित व्यवस्था नहीं हे |  स्वास्थ्य के मामले में भी कमाल के हालात हैं , जिलों के अधिकाँश प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र कम्पाउण्डर , ए एन एम्  और चौकीदारों के भरोशे चल रहे हैं | जहां डॉ पदस्थ हैं वहां डॉ जाते ही नहीं हैं ,  छतरपुर जिले के ही मुख्य मार्ग पर स्थित कुर्राहां  प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के हालत ये हैं कि वहां डॉ को खुद वहां का चौकीदार नहीं पहचानता |  उपस्थिति पंजी पर सिर्फ डॉ के महीने भर के हस्ताक्षर रहते हैं वह भी उनके परिवार का कोई कर जाता है | बुंदेलखंड में स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर झांसी  और सागर में मेडिकल कालेज हैं ,| सागर मेडिकल कालेज तो कागजों में ज्यादा यथार्थ में कम हैं , सागर के कई पत्रकार तो इसे नकली मेडिकल कालेज की संज्ञा देने  चूकते |  छतरपुर में मेडिकल कालेज खोलने और महोबा में  ऐम्स  खोलने के लिए वहां के स्थानीय लोगों ने लंबा संघर्ष भी किया पर उनकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं है | 
                प जवाहर लाल नेहरू कहा करते थे कि किसी भी देश  में सड़के उसकी वो धमनिया हैं जो उसको विकाश पथ पर ले जाती हैं | अटल बिहारी बाजपेई ने  सड़कों के महत्त्व को समझा था और  उनके शासन काल में प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना शुरू हुई थी | इस योजना से बुंदेलखंड के कई दूरस्थ और पहुंच विहीन ग्राम  सड़कों से जुड़े जिसका लाभ भी कई गाँव के लोगों को मिला , इससे ना सिर्फ उनका आवागमन सुलभ हुआ बल्कि उनको अपनी उपज के भी बेहतर दाम मिलने लगे | यह सब जानने के बाद भी  प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना  की रफ़्तार भी अटल जी के हटते ही कछुआ चाल हो गई | कांग्रेस शासन काल में इस योजना को एक तरह से  दफ़न करने का ही प्रयास हुआ |   मध्य प्रदेश  के मुख्यमंत्री  शिवराज सिंह चौहान ने भी गाँव को सड़कों से जोड़ने के लिए मुख्य मंत्री ग्राम सड़क योजना शुरू की पर इसकी अधिकाँश राशि भ्रस्टाचार की भेंट चढ़ गई , इस योजना की सफलता पर इसलिए भी ग्रहण लगा क्योंकि प्रदेश सरकार ने इसका प्रचार प्रसार तो खूब किया किन्तु  योजना को लेकर बजट प्रावधान ना के बराबर रहा  |  हालात ये हैं की बुंदेलखंड के सैकड़ों गाँव आज भी पहुंच विहीन हैं |
                                                आजादी के पहले बुंदेलखंड का सागर , छतरपुर, झाँसी  शिक्षा के बड़े केंद्र हुआ करते थे | छतरपुर के महराजा महाविद्यालय में लोग पड़ने के लिए भोपाल तक से लोग आते थे |  जो जिला शिक्षा के एक बड़े केंद्र के रूप में स्थापित हो सकता था उस  छतरपुर जिले के 135 स्कूल  शिक्षक विहीन हैं , 130 स्कूल ऐसे हैं जो एक शिक्षक के भरोशे चल रहे हैं |   स्कूलों  शिक्षा का आलम भी अलग है | बुंदेलखंड के इन जिलों  में दर्जनों ऐसे स्कूल हैं जहाँ पदस्थ कोई है और ठेके पर  पढ़ाता  कोई और है |  विद्दुत व्यवस्था के नाम पर  लोग सड़कों पर आते हैं संघर्ष करते हैं , पर इन जिलों के अनेकों गाँव अब भी बिजली की रोशनी से रोशन नहीं हुए हैं|   

                                        बुंदेलखंड  का दमोह जिला  प्रदेश के वित्तमंत्री का जिला होने के बावजूद पिछड़ा पन का शिकार है , वही छतरपुर जिला  महिला बाल विकाश राज्य मंत्री  ललिता यादव का जिला होने के बाद भी कुपोषण और पिछड़ेपन का शिकार है | हालांकि ललिता यादव को मंत्री बने ज्यादा समय नहीं हुआ है , पर वित्त मंत्री जयंत मलइय्या  बीजेपी शासन काल के स्थाई मंत्री हैं | इसके बावजूद  दमोह जिले का पिछड़ापन  प्रदेश सरकार  और मंत्री जी की कार्य प्रणाली पर प्रश्न चिन्ह जरूर लगाते हैं | सियासत में मस्त रहने वाले जन सेवकों से जनता को ज्यादा उम्मीद भी अब शायद नहीं रही हैं , पर सरकार की रीति नीति को लागू करने वाले प्रशासन तंत्र से उसकी बहुत सारी उम्मीदें रहती हैं | पिछले कुछ वर्षो में जनता ने देखा है की बुंदेलखंड के हर जिले में एक तरह से प्रशासनिक निष्क्रियता का आलम रहा है | अब जब पिछड़ेपन का पैमाना बना  और केंद्र से सख्त चेतावनी मिली तो  छतरपुर,दमोह  और चित्रकूट के कलेक्टर अब एक्शन मोड़ में आए  हैं |  छतरपुर कलेक्टर  रमेश भंडारी ने तो शनिवार को बैठक कर अपनी नाकामियों का गुस्सा अपने अधीनस्थों पर उतारा , वहीँ दमोह जिला के कलेक्टर श्रीनिवास शर्मा ने अपने अधीनस्थों काफी पहले पावर पॉइंट प्रजेंटेशन देकर 2022 तक की रूप रेखा समझाई  और संकल्प लिया की दमोह को अग्रणी जिलों में लाना है | 
                  
                     बुंदेलखंड के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए  प्रशासनिक अधिकारियों को सिर्फ    सड़क, स्वास्थ्य ,शिक्षा , पोषण, और विद्दुत व्यवस्था तक सीमित नहीं रहना होगा | बल्कि  जल संरचानो के विकाश , जल श्रोतों के संरक्षण , कृषि की  समस्यायों  और उसके वास्तविक समाधान ,  जंगल  के संरक्षण और संवर्धन  , जमीन के बेहतर उपयोग की कार्य योजना  के साथ  स्थानीय जरुरत के कृषि आधारित  उद्योगों  व्यवस्था पर  जोर देना होगा |  साथ ही बुंदेलखंड के पारम्परिक कुटीर  उद्योगों  को  पुनः जीवन देना होगा |  





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