बुंदेलखंड की डायरी
रवीन्द्र व्यास
देख तमाशा शासन का
बुंदेलखंड का जन मानस हैरान है ।
उसे यह नहीं समझ आ रहा है कि यहां भूख से लोग यहां जान गँवा रहें हैं |
भूख मिटाने के लिए घर व्दार छोडने को मजबूर हैं |
उस बुंदेलखंड मे सरकारी आनंद महोत्सव लोगों के जख्मों पर नमक से कम नहीं लग रहे |
जनता आनंदित हो ना हो पर आनंदम तो जारी है
बेशर्मी का आलम ये है कि यहां के नेता भी खेल खिला रहे ।
बुंदेलखंड के जिले सूखे की मार से त्रस्त हैं ,दाना _ पानी के लिए लोग पलायन कर रहें हैं | इसके ठीक विपरीत मध्य प्रदेश सरकार द्धारा आयोजित आनंद उत्सव मनवाने के लिए प्रशासन मजबूर है | कहते हैं ना कि आनंद जीवन में हो ना हो पर महशूस करो कि हम आनंद में हैं , पर मध्य प्रदेश सरकार तो बुंदेलखंड में जबरिया तौर पर आनंद की अनुभूति दिलाने में जुटी है | छतरपुर जिले का एक दलित उपसरपंच अपने परिवार के साथ दिल्ली में मजदूरी करने को मजबूर है | वहीँ जिले का एक मात्र दलित विधायक अपनी और अपने इलाके की जनता की उपेक्षा से दुखी है | दोनों के ही जीवन में आनदं का अभाव है |
छतरपुर में जन प्रतिनिधि की दशा कैसी है इसकी एक तस्वीर जिला कलेक्टर कार्यालय से महज 13 किमी दूर खड़गांय गाँव में देखने को मिली । इस गांव की उप सरपंच मंजू अहिरवार पिछले 8 माह से दिल्ली के नोयडा मे मजदूरी करने को मजबूर हैं ।हाल ही में नोयडा से लौट कर आए मंजू के पति कंसू लाल अहिरवार ने अपने वापस आने की जो मजबूरी बताई वह भी कम हैरान करने वाली नही थी । उसने बताया कि घर मे शौचालय बनवाने के लिए आना पड़ा है । अगर घर मे हम शौचालय नही बनवाते तो हमारे परिवार का राशन कार्ड निरस्त हो जाता, जिस कारण हमारे परिवार के भूखे मरने की स्थिति बन जाती, इसी कारण मजबूर हो कर आना पड़ा । उसने बताया कि हम भले ही उप सरपंच (पत्नी ) है पर पेट तो भरना ही है । साड़े तीन एकड़ जमीन तो है, पर इस बार पानी ही नही है खेत खाली पड़े है । मनरेगा मे मजदूरी के सवाल पर उसने बताया कि काम ठेका पर होता है, बड़ा काम मशीन से होता है मजदूरी नही मिलती । 3_4 लाख का कर्ज है वह भी चुकाना है इसलिए मजदूरी के लिए बाहर जाना पड़ा है । शौचालय बनने के बाद फिर चले जायेंगे ।
लगभग 800 वोटर वाले इस गांव मे पिछले छः माह से मातमी सन्नाटा पसरा है । इस गाँव के हालातों की तस्वीर तो उप सरपंच पति ने दिखला दी | गांव की 88 वर्षीय दलित वृद्धा सुकरति अहिरवार बताने लगी की ऐसा सूखा हमने अपने जीवन में पहली बार जाना है | हमारे पास 8 _9 एकड़ जमींन है पर खाली पड़ी है , तीन में से दो लड़का बहू मजदूरी के लिए परदेस चले गए हैं | एक लड़का और नाती हमारी देखभाल के लिए रुक गए हैं | व्रद्धावस्थ पेंशन पहले तो मिल जाती थी पर साल भर से नहीं मिली | कारण जानने पर पता चला की वृद्धा के आधार कार्ड के लिए हाथ का निशान नहीं बन पा रहा है | गाँव के उदल ने अपने पुत्र मेघराज को 11 तक पढ़ाने के बाद मजदूरी के लिए दिल्ली भेज दिया , उसका बड़ा लड़का और बहू पहले से ही मजदूरी के लिए गए हुए थे | बताने लगा पढ़ाई नहीं छुड़ाते तो क्या करते ,पांच लाख का कर्जा देना है , पानी है नहीं सब सूखा है | गाँव का 82 साल का नेत्रहीन नन्नू अहिरवार अपने द्धार पर इस आस में पड़ा है की उसे कोई सहारा दे दे | उसे भी वृद्धावस्था पेंशन अंगूठा निशान के कारण नहीं मिल पा रही है | गाँव के पंच संजय शर्मा कहते हैं कि 60 फीसदी दलित आबादी और 30 फीसदी ब्राम्हण वर्ग के लोग गाँव से मजदूरी की तलाश मे पलायन कर गये है । पलायन करने वाले परिवार मे जो लोग बचे है वे बूढ़े और बच्चे ही बचे है ।
जहां एक ओर बुंदेलखंड के किसान सूखा के संताप से ग्रसित है वहीं सरकार जगह जगह आनंद महोत्सव करवा कर किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम कर रही है । हद तो तब हो गई जब आनंद उत्सव के नाम पर मंच पर बार बालाएं और बेडनियां नृत्य करने लगी ।सागर से 20 किमी दूर चितौरा के माध्यमिक विद्यालय में आनदं उत्सव के नाम पर बेड़नियो का नृत्य कराया गया । इसकी जानकारी लगते ही अभिभावको ने आपत्ति भी जताई पर आनंद मे सरबोर तंत्र इसकी कहां परवाह करता है ।
बुंदेलखंड में किसानो की दुर्दशा और सरकार के आनंद महोत्सव को लेकर नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने सरकार को आड़े हाथो लिया | टीकमगढ़ जिले के पृथ्वीपुर में उन्होंने पत्रकारों से चर्चा में मध्य प्रदेश और बुंदेलखंड में किसानो की दशा पर चिंता जताई और सरकार पर संवेदन हीनता का आरोप लगाया | कांग्रेस के ये नेता जी पृथ्वीपुर में एक पूर्व विधायक द्वारा आयोजित खेल प्रतियोगिता के आयोजन में प्रदेश अध्यक्ष जी के साथ आये थे | यहां उनका यह प्रवचन "पर उपदेश कुशल बहुतेरे " से कम नहीं लगा |
छतरपुर जिले के चंदला विधान सभा से सत्ता धारी दल बीजेपी के विधायक आर डी प्रजापति यह कहने में कतई संकोच नहीं करते कि मै एक दलित समाज से आता हूँ इसलिए प्रशासन न तो हमारी बात सुनता है और ना ही हमारे पत्रो का जबाब देता है । यह दर्द किसी कांग्रेसी विधायक का नहीं बल्कि सत्ता धारी दल बीजेपी विधायक का है । प्रशासन की कारगुजारियो से खफा विधायक जी आर पार के मूड मे है| विधायक जी के इस दर्द के राजनैतिक मायने कई हो सकते हैं , पर उनके उठाये गए जायज मुद्दों को उनपर तरह तरह की तोहमत लगाकर दरकिनार करना प्रशासन वा सरकार की एक कला ही मानी जा सकती है |
विधायक जी प्रशासन से गुहार लगाते हैं कि रेत खदानो का सीमांकन करवाकर उनके स्वीकृत क्षेत्र तार फेंसिंग (बारी) लगाने , रेत खदानो पर मजदूरों से कार्य कराने , ओवर लोड ट्रक पर कार्यवाही करने | रेत खदानों पर बोर्ड लगाकर पूर्ण जानकारी दर्शाने | रेत खदानों पर काम करने वाले मजदूरों की जानकारी , वा मोबाइल न सहित प्रशासन मंगाए उसकी जानकारी मुझे दी जाए | विधायक जी ने अपने चंदला विधान सभा क्षेत्र में रेत के अवैध उत्खनन पर रोक लगाने और जांच कराने बावत कलेक्टर छतरपुर रमेश भंडारी को 14 नव 17 को पत्र लिखा था | कलेक्टर साहब ने इस पत्र पर ना तो कोई कार्यवाही की और ना ही इस पत्र का जबाब देना उचित समझा | कलेक्टर की इस हरकत से खफा विधायक ने 19 जनवरी को कलेक्टर के नांम फिर पिछले सन्दर्भ का पत्र लिखा । और चेतावनी दी है की हालातों से मजबूर होकर २२ जनवरी से अनशन पर बैठेंगे |
विधायक ने चंदला इलाके में केन और केल नदी से हो रही रेत अवैध उत्खनन के मामले को विधान सभा में भी उठाया था , यहां तक की इस्तीफा भी सौंपा था | मामले की जांच के लिए जांच कमेटी भी बनी पर उस कमेटी ने क्या जांच की विधायक जी को ही नहीं पता |
अब आप कल्पना कीजिए कि छतरपुर जिले में सरकार का तंत्र किस प्रकार से चल रहा है । एक ओर दलित उपसरपंच मजदूरी के लिए पलायन को मजबूर हैं , दूसरी तरफ जिले के दलित विधायक को अपनी बात मनवाने के लिए अनशन की चेतावनी देनी पढ रही है । आम आवाम की दशा क्या होगी अंदाजा लगाया जा सकता है ।



