27 अगस्त, 2017

माईनिग माफियाओं के लिए कुबेर का खजाना है बुंदेलखंड


बुंदेलखंड की डायरी
   माईनिग माफियाओं के लिए कुबेर का खजाना है बुंदेलखंड



रवीन्द्र व्यास

 बुंदेलखंड  का नाम लेते ही लोगों के जेहन में जो तस्वीर उभरती है वह बदहाली
और बेबसी की होती है | बदहाली और बेबसी भले ही बुन्देलखडियों के लिए हो पर देश
के माइनिंग माफियाओं के लिए यह इलाका  किसी कुुुुबेर के खजाने  से कम नहीं है
|   खनिजो के अकूूूत भंडार वाले इस  इलाके मे माईनिग  कारोबारी कितने बेेेेखौफ
है  इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि  अधिकारियों से लेकर नेेेेताओ
तक को धमकाने से नही चूूूूकते फिर  आम जनता की क्या बिसात ।जनसेेेवको के सहयोग
से  इन्हें लूूूट की छूट के साथ सामाजिक वातावरण और पर्यावरण के विनाश का भी
 अधिकार मिला है ।
                        छतरपुर   जिले के लवकुश नगर के पास एक गांव है
 प्रतापपुर इस गांव में ग्रेनाईट  पत्थर खदान ने लोगो के  जीवन का सुख चैन छीन
लिया है । 1500 की  आबादी वाले इस गांव में  अधिकांश  आबादी  दलितो की है ।
भोपाल की ड़ी जी मिनरल्स नाम की   कंपनी यहा से ग्रेनाईट का उत्खनन कर रही है ।
गांव वालों को पटाने के लिए कम्पनी ने गांव वालों को गांव में भव्य मंदिर
बनाने का भरोसा दिया था । गाँव के कई लोग इससे सहमत भी हो गए थे ।पर  खदान
शुरू करने के नाम पर कंपनी ने जिस तरह से गांव मे  विनाश का तांडव शुरू किया
 उससे गांव वाले खफा हो गए ।
  गांव के ही  नंदू पाल ने  इस खनन कार्य और पर्यावरण के विनाश को लेकर ग्रीन
ट्रिब्युनल मे मामला भी दर्ज कराया है । इसके बाद भी कंपनी के  कर्मचारियों
 का आतंक कम नही हुआ । दहशत फैलाने के लिए  फायरिंग कर  शासकीय  स्कूल की
विल्ड़िंग जेसीबी से गिरा दी ।   खेल मैदान मे ग्रेनाइट पत्थर का खुला गोदाम
बना दिया । गांव मे जिस मंदिर के निर्माण की बात कंपनी ने की थी उसका निर्माण
कार्य भी बंद कर दिया ।
असल   में गाँव मे  स्कूल भवन की समस्या को देख कर  ग्राम पंचायत और जन सहयोग
से एक बिल्डिंग बनाई गई  थी।   बाद मे दूसरी विल्ड़िंग बन जाने से ये विल्ड़िंग
खाली हो गई ,  गाँव  वाले इस खाली पड़े भवन का  उपयोग सामाजिक कार्य के लिए
करने लगे । कंपनी ने इस भवन को बगैर किसी प्रशासनिक स्वीकृति के गिरा दिया ।
 कंपनी को अपने विस्तार के लिए जमीनों की जरुरत पड़ी तो   कर्मचारियों ने
ग्रामीणों को धमकाया उनकी  जमीनों को औने पौने दामों में जबरदस्ती खरीदा  |
जिनने विरोध किया  उनकी जमींन  पर जबरन  कब्जा कर  पत्थर डाल दिए | गाँव में
सुगमता से कंपनी के वाहनो का  परिवहन हो सके  इसलिए   रास्ते में पड़ने वाले
मकानों मे  भी तोड फोड़ की गई ।  गांव वाले अपनी  फरियाद लेकर  प्रशासनिक
अधिकारियों   के पास भी पहुचे जनपद पंचायत के सीईओ ने भी माना कि कंपनी ने भवन
बगैर किसी  अनुुुुमति के गिराया है
  । पर ऐसी कंपनी के खिलाफ कार्यवाही करने की जरूरत प्रशासन ने नही  समझी।


अब सरकार के खनिज विभाग ने इसी कंपनी को लवकुशनगर के  एतिहासिक  और पुरातत्व
महत्व के बावन वाणी पहाड़ पर 11,75 हैक्टर की तीन लीज स्वीकृत कर दी है।
धार्मिक स्थल की सुरक्षा की बात करने वाली सरकार ने लीज  ऐसे स्थान पर स्वीकृत
की है जहा हनुमान जी,  शंकर जी  और सिद्ध बाबा का चबूतरा है ।

 लवकुशनगर कसबे के युवाओं ने  इस  पर्वत श्रंखला और पर्यावरण को बचाने के लिए
 पहल  शुरू की है ,।इन लोगो ने पहाड़ियों के हर पत्थर पर श्री राम   लिखना शुरू
किया है । इसके पीछे यहा के लोगों की मंशा यही है कि  राम नाम के  इन पत्थरो


को कोई  खनिज माफिया नही तोड़ेगा और इस तरह से,
 लवकुशनगर जो छोटी बड़ी बावन पहाड़ियों से घिरा है और जिसके  शिखर  पर माँ बम्बर
बेनी का प्रसिद्ध  मंदिर है वह बच जाएंगे ।
दरअसल   शिखर पहाड़ी से लगी हुई 3 पहाड़ियों के पत्थर की लीज डी जी मिनिरल्स
 नाम की कम्पनी ने गलत तथ्य दिखाकर अपने नाम करवा ली है। ,,कंपनी जहाँ अपने
काम की शुरुवात करने मे  जोर शोर से तैयारी में जुटी है ।वही नगर में इसका
 विरोध और समर्थन भी  हो रहा है।  जिन पहाड़ियों की लीज हुई है वो बस्ती से
लगभग सटी हुई है । नगर में इन पहाड़ियों का धार्मिक  महत्व  तो है ही पर ये
प्राकृतिक सौंदर्य    भी है।
 यहाँ के लोग सवाल करते हैं कि मध्यप्रदेश की जनहितकारी सरकार चाहती क्या है?
सरकार ये जानती है कि पत्थरो की ड़स्ट जानलेवा सिलकोसिस बीमारी को जन्म देती
है,। देश की  और प्रदेश की सरकार इस बीमारी के   उपचार का कोई कारगर  इलाज भी
नही खोज पाई है । यह सब जानने के बावजूद भी सरकार का एक बड़ी  आबादी के पास
ग्रेनाईट पत्थर खदान की स्वीकृति देना लोगो को मौत के मुंह मे पहुचाने वाला
कार्य ही लगता है ।
              कंपनी वाले भी अपने अर्थ तंत्र के बलबूते लोगो को रिझाने मे
जुटे है । कंपनी ने प्रतापपुर गांव में  मंदिर की   तरह  इस नगर पंचायत
क्षेत्र के लोगों को विश्वास दिलाया  है कि कंपनी, ऊंची पहाड़ी पर पहुंचने के
लिए सड़क बनायेगी  जिससे यहा देश विदेश के पर्यटक बढेगे। पर कंपनी की नीति
नियत देख कर यही कहा जा सकता है कि सड़क का हाल भी प्रतापपुरा के मंदिर जैसा न
हो।


इस इलाके मे  कटहरा के ग्रामीण एसपी फारच्यून से  त्रस्त है तो  मड़वा गांव के
लोग किसान मिनरल्स से । मड़वा गांव के तालाब को ही इस कपनी ने  वेस्ट मेटेरियल
से  भर दिया है । यही हालात सिलपतपुरा के भी है ।
बुंदेलखंड ग्रेनाईट की  देश सहित विदेशो मे भी बड़ी मांग है । खनिज कम्पनी वाले
 मुनाफा कमाने के लिए  अपने सामाजिक सरोकार को दरकिनार करती है । इनके लिए
शासन के खनन नीति का पालन करना भी  शासन-प्रशासन की कृपा से जरूरी नही होता ।
इसी कृपा का लाभ लेकर ये लोग मजदूरो से  10 से  12 घंटे काम लेते है,  मजदूरो
को सुरक्षा उपकरण देना जरूरी नही समझते । बुंदेलखंड में यह मामला सिर्फ छतरपुर
जिले का नहीं है बल्कि ऐसे ही हालात पन्ना , टीकमगढ़ , सागर , ललितपुर , झाँसी
,महोबा और बांदा जिले में भी देखने को मिलते है | इन इलाकों में ग्रेनाइट के
अलावा फर्शी पत्थर , रेत का भी कारोबार बड़े पैमाने पर अवैध रूप से संचालित
होता है |

                                                खनन के अवैधानिक कारोबार में
ऐसा भी नहीं है की सिर्फ खनिज कम्पनिया ही लिप्त हैं बल्कि इस कारोबार में
बुंदेलखंड के कई सफ़ेद पोश नेता , यहा पदस्थ होने वाले शासकीय सेवक भी लिप्त
हैं | जिनके संरक्षण में यहां वैैैैध अवैध खनन की स्ववतंत्रता    खनन
कारोबारियो को मिली हुई है ।

20 अगस्त, 2017

बुंदेलखंड मे सूखा की दस्तक


बुंदेलखंड की डायरी


रवीन्द्र व्यास 
  देश का अधिकांश इलाका  इन दिनों  वर्षा और बाढ़ की त्रासदी से जूझ रहा है| सियासत में आरोप प्रत्यारोपो की बारिस हो रही है , कोई  लोकतंत्र  लिए घातक विपक्ष विहीन बहुमत  लिए  अपने घोड़े दौड़ा रहा है | ऐसे दौर में  देश के नीति नियंत्रकों  को भला  बुंदेलखंड  का दर्द  कहाँ  नजर आएगा | बुंदेलखंड इलाके मे एक बार फिर सूखे की आहट ने लोगो को बेचैन कर दिया है । गांव गांव में लोग भगवान को मनाने में जुटे है । वर्षा की कामना को लेकर छतरपुर कलेक्टर ने भी भगवान से फरियाद की है । वर्षा के  आकड़ो की कहानी कुछ भी हो , पर जो हालात बन रहे है  उसमें  फसले तो ठीक लोग बूद बूद पानी को तरसेगे।



 देश का अधिकांश इलाका  इन दिनों  वर्षा और बाढ़ की त्रासदी से जूझ रहा है|  दूसरी तरफ   बुन्देलखण्ड इलाका   फिर सूखे  की त्रासदी भोगने  को विवश हो रहा है|  संकट से निपटने के लिये लोग अब भगवान को मनाने  में लगे हैं | इसके लिए वे ऐसा कठिन तप कर रहें हैं की  जो भी  देखता है उसकी भी आँखें नम हो जाती हैं , पर  भगवान है कि अपने इन भक्तो पर दया नहीं कर रहे हैं |


 मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले  में एक गांव है  खुमानगंज  | इस गांव में  अब सुबह से चूल्हा नही जलता है ।  इस  गांव के लोग  पिछले पांच 
दिनों से नियमित पेढ भरकर ( लेट  लेट कर भगवान के दर पर जाना ) डेढ किलोमीटर दूर शारदा  देवी मां  के पास  पहुँचते हैं | यहां ये गाँव वाले सिर्फ एक ही फ़रियाद करते हैं की हे  माता पानी बरसा दो | माता की   पूजा अर्चना करने के बाद ही गाँव वालों के घरों में चूल्हा जलता है।  गांव वालों ने   संकल्प लिया  है कि जब तक पानी नही बसरता तब तक यह क्रम जारी रहेगा। गांव के बुजुर्गो बताते  है कि 50 साल पहले  भी पानी को लेकर इस प्रकार की आराधना  देवी मां से की गई थी, उसके बाद जम कर बरिश इलाके में हुई थी।


                    बुंदेलखंड इलाके के गाँव गाँव में भगवान् के दर पर मनौतियों का यह सिलसिला अपने अपने तरीके से जारी है | कहीं अखंड रामायण पाठ हो रहा है तो कहीं शंकर जी से वर्षा की कामना की जा रही है | ऐसी ही कामना को लेकर छतरपुर कलेक्टर रमेश भंडारी  जटाशंकर धाम पहुंचे थे | शनिवार को जब वे  शिव पूजन के बाद बाहर निकले तो  उन्होंने स्थानीय पत्रकारों को बताया की  वर्षा की कामना की है | इसके पहले बिजावर के बीजेपी विधायक पुष्पेंद्र नाथ पाठक किशन गढ़ से जटाशंकर तक पद यात्रा कर अच्छी  वर्षा के लिए शिव जी से प्रार्थना कर चुके हैं |


                                दरअसल बुंदेलखंड इलाके के सागर संभाग में अब तक मानसून के 60 दिनों में औसत से कम बारिश हुई है | सबसे कम टीकमगढ़ जिले में 399  मिमी और सबसे ज्यादा पन्ना जिले में 628  मिमी वर्षा दर्ज हुई है | छतरपुर में 496  ,दमोह में 5२२  सागर में 560 मिमी वर्षा हुई है | वही चित्रकूट धाम मंडल के यदि चार जिलों का औसत देखा जाए तो सिर्फ 195 मिमी वर्षा ही हुई है | उत्तर प्रदेश वाले बुंदेलखंड इलाके के जिलों की  औसत वर्षा 356 मिमी हुई है  जो अब तक की औसत वर्षा से 40 फीसदी कम है |  सबसे कम वारिश  जालौन में 218 मिमी , हमीरपुर में 254 मिमी और सबसे ज्यादा 543 मिमी वर्षा बांदा जिले में हुई है |  बुंदेलखंड में  वर्षा का यह क्रम ऐसा रहा कि ना जल स्तर बड़ा और ना ही तालाब वा  कुओं में पानी आया है | 



             बुंदेलखंड का  इतिहास बताता  है कि 19वीं  20वीं सदी  केदौरान 12 बार सूखा और अकाल के हालत झेले हैं बुंदेलखंड ने ।औसत तौर पर कहा जा सकता है की हर 16 _17 साल में यहां सूखापड़ता था   1968 से 1992 के 24 सालों में  तीन बार सूखा पड़ामतलब हर 8 वे साल सूखा पड़ा  जलवायु परिवर्तन का असर पिछले 15 वर्षों में  यहां देखने  को मिला और लगभग  हर बार मौसम की मारयहां के लोग झेलने को मजबूर हैं   पिछले कुछ वर्षो में यहां  मानसूनअनियमित सा हो गया ।कभी कभार  अत्याधिक वर्षा तो कभी वर्षा कीकमी जो निरंतर चल रही है  ,उस पर ओला और पाला के मार , तालाबोंबांधो ,कुआँ का सूख जाना  ऐसे कुछ कारण रहे जिन्होंने यहां खेतीको पूर्णतः बर्बाद  कर दिया। परिणामतः खेती पर निर्भर 80  फीसदीआबादी  के सामने  अब भुखमरी के हालात निर्मित हो गए  सूखतेजल श्रोतो ने आने वाले दिनों के लिए एक भयानक हालात की तरफइशारा कर दिया है 


                                  अनियमित वर्षा के इस प्रभाव के चलते फसलों के सूखने और मुरझाने का क्रम तो शुरू हो ही गया है , अब फसलों पर कीट पतंगों के हमले से स्थिति और भी चिंताजनक होती जा रही है |  मौसम की इस बेरुखी के कारण  सोया बीन की फसल से तो किसानो को उम्मीद नहीं बची है पर तिल , उर्द ,मूंग  से लगी कुछ आश भी निराशा में बदलती  जा रही है |  फसल के इस चक्र में जूझते किसानो के सामने अब सिर्फ फसल की ही चिंता नहीं है बल्कि उन्हें आने वाले जल संकट और  पशुओं के लिए भूषा - चारे का संकट भी बेचैन किये है | उस पर बैंक , और साहूकारों की तकादेदारी के साथ विद्दुत कंपनियों की  मनमानी  उन्हें  जीने नहीं दे  रही है | 
         मानसून के सावन में ना वर्षा की झड़ी लगी और ना भादों के जल से खेत,  तालाब भरे |  हालांकि  मौसम के पूर्वानुमान में कहा गया था की इस बार मानसून अच्छा रहेगा , पर्याप्त वर्षा होगी पर अब तक वे सब पूर्वानुमान बुंदेलखंड को लेकर गलत साबित हुए | इस कारण  गाँव के किसान   अब  भविष्य वक्ताओं की शरण में पहुंच रहे हैं |  भविष्य वक्ताओं ने अगस्त और सितम्बर में भारी वर्षा का भविष्य तो बता दिया  है पर  यह कितना सटीक साबित होगा इसका इन्तजार बुंदेलखंड के लोगों को है | 
                              देश दुनिया के वैज्ञानिक मानते हैं की ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसम में बड़ा परिवर्तन हो रहा है | इसके प्रभाव से , कहीं अति वृष्टि तो कहीं सूखे के हालात बनेगें, ग्लेसियर पिघलने से एक अलग समस्या निर्मित होगी | इस समस्या से निपटने का तात्कालिक तौर पर एक मात्र उपाय बेहतर प्रबंधन है , पर ये दुर्भाग्य पूर्ण ही है कि सरकार और उसके तंत्र को इस तरह के प्रबंधन से कोई सरोकार ही नहीं है | छोटे मोटे स्तर पर जो प्रयास होते भी हैं वे दिखाऊ ज्यादा और काम के कम होते हैं |  हम फिर भी उम्मीद लगाए हैं की कोई तो होगा जो अपने कर्तव्य का ईमानदारी से पालन करेगा | 

06 अगस्त, 2017

Sawni_लुप्त होती बुंदेली परम्परा सावनी


बुंदेलखंड की डायरी

अब नहीं डलते सावन के झूले _ चपेटा को भूली बालिकाए 
रवीन्द्र व्यास 

बुंदेलखंडी जीवन शैली  वैसे तो प्रकृति  से सामंजस्य की अदभुत  जीवन शैली है ।  यहां का हर त्यौहार , प्रकृति  और  लोक  रंजन से जुड़ा है ।   अब शायद बुंदेलखंड की  इस जीवन परम्परा को भी आधुनिकता का ग्रहण लग गया है । सावन की कई परम्पराए  जो कभी लोगों के प्रकृति प्रेम और आपसी समन्वय  और  प्रेम को दर्शाती थी अब सिर्फ किस्से कहानियो तक सिमट कर रह गई हैं । अब ना नव वधु के घर भेजी जाने वाली सावनी की परम्परा बची और ना ही वृक्षों की डाल पर डलते झूले बचे | ना बच्चो के हाथ से घूमते लट्टू और चकरी | 
                           वर्षा ऋतू  में जब चारों और हरियाली व्याप्त हो ऐसे में किसका मन प्रफुल्लित ना होगा । ऐसे में बुंदेलखंड के घर - घर में ऊँचे वृक्ष की डाल पर झूले डाले जाते थे ।  धीरे - धीरे ये गाँव के झूलो तक  पहुँच गए । और अब किसी किसी गांव में ही ये झूले  और झूलों पर झूलती बालाएं देखने को मिलती हैं |    सावन का महीना  उल्लास और उमंग का महीना बुंदेलखंड में माना जाता  था ।गाँव - गाँव में महिलाये और बालिकाए गाँव में लगे मेहँदी के पेड़ से मेहँदी तोड़ कर लाती थी , उसे पीस कर आपस में लगाती थी , लोक मान्यता थी जिस कन्या के हाथ में जितनी गहरी मेहँदी रचेगी उसे उतना ही सुन्दर पति मिलेगा ।  पहले गाँव -गाँव में  बाल _गोपाल  चकरी , भौरा (लट्टू) चलाते  , तो कोई बांसुरी की धुन छेड़ते  मिल जाता था । वहीँ बालिकाए  लाख के कंगन  और  चपेटों से खेलते मिल जाती थी ।  अब  मेहँदी के वृक्ष बचे नहीं तो बाजार से अपनी सामर्थ्य अनुसार मेहँदी ले आती हैं , ना ही  वो घूमते लट्टू रहे और ना चपेटे  के साथ  हंसती खिलखिलाती  बालिकाए । बुंदेलखंड के नगरीय इलाकों से तो परम्पराए काफी पहले लुप्त हो गई थी । 
           लोक जीवन की इन परम्पराओ की समाप्ति के पीछे  का जो मुख्य कारण है वह   आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में हम सब प्रकृति से अलग हो गए हैं । गाँव के घरो में लगे पेड़ कट गए , गाँव में लगे कुछेक वृक्ष किसी ना किसी की बपौती हो गए , उस पर उनके घर के लोगों के अलावा दूसरा  कोई जा नहीं सकता । इस तरह से झूला की परम्परा समाप्त हो गई ।  लट्टू और चकरी पहले गाँव का बढ़ई बना दिया करता था  फिर  बाजार में मिलने लगे अब वे भी नहीं मिलते । बांसुरी की तान बांस से बनी बांसुरी से ही आ सकती है , उसका स्थान प्लास्टिक ने ले लिया है । चपेटा जरूर खेला जाता है पर बहुत कम क्योंकि लोगों को अब टीवी से ही फुर्सत नहीं मिलती । 
लुप्त हुई सावनी भेजने की परम्परा :_
  सावन के महीना में  बुंदेलखंड में सावनी भेजने की परम्परा थी ।  यह भी अब समाप्त सी हो गई है इसका स्थान अब पैसों ने ले लिया है ।  इस परम्परा में  विवाहित महिला पहली बार जब  सावन के महीने में अपने मायके  आ जाती है । तब उसके पति के घर से  उसके लिए सोने -चांदी की राखी , कपडे , लकड़ी के खेल खिलौने जिनमे चकरी, लट्टू ,बांसुरी ,  गुड्डा ,गुड़िया ,चपेटा , श्रृंगार सामग्री ,मिष्टान  आदि भेजे जाते थे  । सावनी लेकर वर पक्ष का कोई वरिष्ट  सदस्य और नाइ वधु पक्ष के घर  पहुंचता था | सावनी लेकर आये व्यक्ति  का स्वागत सत्कार भी देखते ही बनता था |   ससुराल से आई राखी ही बहिन अपने भाई की कलाई पर बांधती है ।   सावनी मे  इसका बाकायदा गाँव के लोगों को निमंत्रण दिया जाता था , वे लोग आकार सावनी में आये सामान को देखते थे ।   अब  सावनके सामान के स्थान पर  पैसा भेज दिया जाता है ।
 
दरअसल बुंदेलखंड की यह परम्परा  एक तरह से सामाजिक ताने बाने को मजबूती प्रदान करती थी | इसके माध्यम से वर और वधु पक्ष के मध्य  सिर्फ आपसी प्रेम बढ़ता था बल्कि यह एक तरह का वह सामाजिक संस्कार था जो यह बताता है की वर पक्ष का  दायित्व सिर्फ वधु पक्ष से लेना मात्र नहीं बल्कि उसे देना भी है | यह अलग बात है की परम्पराओं के तहत वधु पक्ष उतनी ही राशि की सौगात  दामाद पक्ष को दे देता है | क्योंकि उसका मानना होता है कि जिस घर में अपनी बेटी दी है उसका कुछ नहीं लेना चाहिए |
 
  सावनी की इस प्रथा को लेकर बुंदेलखंड में तरह तरह की किवदंतिया भी हैं | कहते हैं की इसकी शुरुआत त्रेता युग में तब शुरू हुई थी जब अयोध्या नरेश महराज दशरथ  जी ने अपने पुत्रो राम ,लक्ष्मण ,भरत और शत्रुघन के विवाह  बाद , पहले सावन मास में मिथिला नरेश महराज जनक जी के यहां तरह तरह के उपहार भेजे थे | एक और किवदंती है कि  12 वी सदी में महोबा के राजा परमाल ने अपने पुत्र ब्रम्हा के ससुराल में  सावन में उपहार भेजे थे | ब्रम्हा की शादी पृथ्वीराज की पुत्री बेला से होना बताया जाता है | एक और मान्यता है की शिव पुराण में उल्लेख है की भगवान् शंकर जी के गौरा से विवाह के बाद इस परम्परा की शुरुआत हुई थी |

                  परम्पराए  आपसी सम्बन्ध को मजबूत करने की एक कड़ी थी किन्तु  समय के साथ अब इसमें भी बाजार वाद का ग्रहण लग गया |   लोग कहने लगे अब समय किसके पास है सावनी लेकर जाने का इस लिए रुपये भेज देते हैं | बाजार वाद भी ऐसा बड़ा की गाँव घर में बनने वाले खिलोनो की जगह मल्टी नेशनल कंपनियों के खेल खिलौने आ गए, मतलब रोजगार भी छिना और परम्पराओं से भी दूर हुए | जबकि दुनिया भर के लोग हिन्दुस्तान आकर  यहां की लोक परमपराओं को जानना और समझना चाहते हैं | खजुराहो आने वाले ऐसे कई विदेशी पर्यटकों ने इस तरह को जानने और समझने में अपनी दिलचस्पी व्यक्त की ,पर उन्हें निराशा ही हाथ लगी थी | 

विकास की उमंग और चुनौतियों के संघर्ष का बुंदेलखंड

  बुंदेलखंड की डायरी  विकास की उमंग और चुनौतियों के  संघर्ष का  बुंदेलखंड  रवीन्द्र व्यास  दो राज्य में बटे बुंदेलखंड के लिए    2025  में कई...