26 मार्च, 2017

सिलकोसिस से सिसकती जिदगिया

सिलकोसिस से सिसकती जिंदगियां  

रवीन्द्र व्यास 

मध्य प्रदेश के  बुंदेलखंड के सबसे पिछडा जिला  पन्ना  में एक गाँव है गुडियाना यहां  के आदमी की औसत उम्र 50 साल है । गाँव में आधा सैकड़ा महिलाये विधवा हैं ।  आदिवासी बाहुल्य  इस गाँव में यह कोई शाप नहीं है बल्कि ये आदिवासी अपनी जान देकर विकाश की कीमत चुकाते हैं । जिससे सरकार और सेठ तो माला माल होते हैं और इनके हिस्से आती है सिर्फ मौत । असल में पत्थर की धूल से इन्हें मिलती है टी बी और सिलकोसिस जैसी ला इलाज बीमारी जो इनकी जान लेकर ही छोड़ती है ।  बुंदेलखंड में यह अभिशाप सिर्फ इस  गाँव के लोग ही नहीं   भोग रहे हैं  बल्कि सागर ,दमोह ,छतरपुर ,टीकमगढ़ ,उत्तर प्रदेश के  झाँसी , लालितपुर ,महोबा , चित्रकूट जिले में इस तरह के सैकड़ों मामले आये हैं । पन्ना में तो लोगों को जिंदगी की भीख मांगने के लिए कोर्ट का सहारा लेना पड़ा । इस जिले में गैर सरकारी आंकड़े बताते हैं कि  लगभग 15 हजार लोग सिलकोसिस जैसी बीमारी से ग्रसित  हैं । 


                                                  बुंदेलखंड के मध्य प्रदेश इलाके में  आने वाले पन्ना जिले की पहचान देश दुनिया में हीरा के कारण मानी जाती  हैं । हीरा खादानो के अलावा यहां फर्शी पत्थर की वैध और अवैध खदानों का जाल फैला हुआ है । 7 हजार 135 वर्ग किमी में फैले पन्ना जिले में  1011 गाँव  में से 64 गाँव वीरान हो  चुके हैं । रोजगार के  साधनो नाम पर  हीरा खदान और पत्थर खदान  ही सबसे  बड़ा  रोजगार का जरिया है ।  इन  खदानों से लगभग 28 से 30 हजार लोगों को रोजगार मिलता है । इन खदानों में सुरक्षा मानकों का उपयोग नहीं किये जाने के कारण   मजदूरों और उनके परिवार की  पेट की आग तो बुझ जाती है पर बदले में मिलती है , टी बी और सिलकोसिस जैसी बीमारी । जो इनकी मौत की मुख्य वजह बनती है । 

                                                 
                                              पन्ना की समीपवर्ती पंचायत मनोर के आदिवासी बाहुल्य  गुडियाना गाँव में वर्तमान में 50 साल से ज्यादा का  कोई व्यक्ति जीवित नहीं है । गाँव के ये आदिवासी असल में पत्थर खदानों में काम करते हैं जिसके कारण पत्थर से निकलने वाली  धूल से   इनको टी बी और सिलकोसिस जैसी घातक बीमारी होती है और ये असमय काल के गाल में समा जाते हैं ।गाँव के एकलौते 49 वर्षीय सूरज आदिवासी भी अपना इलाज पन्ना और नोगांव में करा रहे हैं ।  गाँव में इस बीमारी से  होती मौतों के कारण  गाँव में 40 से ज्यादा विधवा महिलाये हैं । गाँव के अधिकाँश 40 से 45 साल के लोग इस बीमारी से जूझ रहे हैं । बेवा महिलाओं के सामने दोहरी समस्या खड़ी  होती है, अपना और अपने बच्चों का पेट पालना ,। जिसके लिए इनके सामने जंगल से लकड़ी काट कर बेचना ही जीवन निर्वाह का जरिया बचता है । इन हालातो में एक तो ये खुद कुपोषण की शिकार होती हैं इनके बच्चे भी कुपोषण के शिकार होते हैं ।  

                                                     पन्ना जिले में  सिलकोसिस और टीबी के मरीजों का आंकड़ा साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है । ऐसा भी नहीं है की इसकी रोक थाम के लिए प्रयास नहीं किये जा रहे हों । पर्यावरण और समाज सेवा के क्षेत्र में काम करने वाली कुछेक संस्थाए काम कर रही हैं । किन्तु खदान के मालिक अपने लाभ को किसी भी कीमत पर कम नहीं होने देना चाहते , जिसके चलते मजदूरो की मौत इन ठेकेदारो को मंजूर है पर उनको सुरक्षा के साधन उपलब्ध कराना मंजूर नहीं । सिलकोसिस से पीड़ित मजदूरों के लिए काम करने वाले युसूफ बेग बताते हैं की अभी हाल ही में पन्ना में सिलकोसिस पीड़ित मजदूरों की जांच के लिए सुप्रीम  कोर्ट की एक जांच समिति आई थी । जिसने  पाया की पन्ना में इस बिमारी से पीड़ित व्यक्ति के इलाज की कोई सुविधा ही नहीं है ।  सरकार के सुरक्षा के नियमो का खदान पर पालन नहीं किया जाता , मजदूरो की केस हिस्ट्री बनाने की यहां जरुरत ही नहीं समझी जाती है । केम्प में समिति  के सदस्यों ने सिलकोसिस पीड़ित 122 मजदूरों  से चर्चा भी की । वे बताते हैं की   यह एक लाइलाज बीमारी है जिसमे इसका शिकार व्याक्ति तड़प तड़प कर मरता है ।  इसके इलाज के लिए ना कोई प्रशिक्षित डॉ यहां पर है और ना ही उसके कोई उपकरण ।  उनके प्रयासों से यहां के एक डॉ सुधाकर को प्रशिक्षण के लिए उनकी संस्था ने मलेशिया भिजवाया था , पर मध्य प्रदेश सरकार ने उनके वापास लौटने के  दो माह बाद उनका ट्रांसफर रीवा कर दिया । 


                              मजदूरों की जिंदगी से यहां का स्वास्थ्य अमला किस तरह खिलवाड़ करता है इसकी बानगी देखने को मिली यहां की पत्थर खदानों पर लगे दो स्वास्थ्य शिवरो से । डॉक्टर साहब ने आला लगा कर बता दिया  की हां इसको सिलकोसिस है , जबकि इसकी जांच के लिए अलग उपकरण होते हैं । पिछले दो दशकों से इन मजदूरों के लिए काम करने वाले बेग कहते हैं इस बीमारी का कोई इलाज तो नहीं है  किन्तु सुरक्षा ही इस समस्या से निपटने का मुख्य साधन है ।
                                   दरअसल सिलिका के कणो  और पत्थरो के तोड़ने के कारण निकली धूल , स्वांस नली के द्वारा फेफड़ों तक पहुँचती है । यह पत्थर के खनन अथवा तोड़ने  , रेत खनन , कांच उद्योग, स्लेट पेन्सिल उद्योग  में काम करने वाले मजदूरों को बड़ी आसानी से हो जाती है । इस ला इलाज  बीमारी का अब तक कोई इलाज नहीं है , यहां तक की मजदूरों को दिए जाने वाले मास्क भी बारीक कणो  को फेफड़ों तक जाने से रोक पाने में सक्षम नहीं हैं । जब ये कण फेफड़ो जम जाते हैं तो इनको बाहर नहीं निकाला जा सकता । फेफड़ों में जमने के कारण   
धीरे धीरे ये मोटी परत बना लेते हैं जिस कारण सांस लेने में तकलीफ होती है और अंत में आदमी की मौत हो जाती है । पन्ना जिले के मामले में तो स्थितियां और भी भयानक हैं , यहाँ  अधिकाँश मामलों में सिलकोसिस की बीमारी को टीबी मानकर इलाज किया जाता रहा है । ज्यादा गंभीर होने पर उन्हें टी बी अस्पताल नोगांव का पता बता कर चलता किया जाता रहा है ।  एन जी ओ की सक्रियता से मामले पर  गौर  तो होने लगा पर वह भी नीम हकीम जैसा ही है । अब डाक्टर अंदाजिया तौर पर लोगों को सिलकोसिस का मरीज बताने लगे हैं ।  सरकार से लोगों की जिंदगी की भीख मांगने के लिए यहां काम करने वाले एन जी ओ को हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा  खटखटाना  पड़ा । 


19 मार्च, 2017

पर्यटन का प्रलाप


बुन्देलखण्ड की डायरी 
 रवीन्द्र व्यास 

उत्तर प्रदेश में जिस समय मुख्य मंत्री का चयन हो रहा था उसी समय   बुंदेलखंड के   खजुराहो में पर्यटन को लेकर प्रलाप जारी था । उत्तर प्रदेश के सात जिले और मध्य प्रदेश के 6 जिलों तक फैले बुंदेलखंड में सांझी संस्कृति   इलाके के पर्यटन कारोबार को बढ़ाने में महत्त्व पूर्ण कारक मानी जाती है । इसके बावजूद सरकार के सकारात्मक प्रयास सिर्फ सेमिनारों ,सम्मेलनों , और कॉन्क्लेव तक सिमट कर रह गए हैं ।  बुंदेलखंड के और देश के मुख्य पर्यटक स्थल  खजुराहो में आये दिन होने वाले पर्यटन सेमीनार और कॉन्क्लेव यहां के लोगों के लिए सिर्फ  तमाशा बन कर रह गए  हैं ।

खजुराहो के सहस्त्राब्दी वर्ष (1998 ) से खजुराहो और बुंदेलखंड के पर्यटन विकाश का प्रलाप सुन सुन कर शायद वे हताश हो गए  हैं । यहां के  पांच सितारा होटल में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिएआयोजित कॉन्क्लेव में  पर्यटन पर एक साल के अंदर पांचवी बार  मंथन हुआ  इस मंथन में भी वही सब बातें दोहराई गई जो पूर्व में दोहराई जाती रही हैं । मंथन तो होता है पर इस मंथन से क्या निकलता है यह अब भी रहस्य ही है ।  अब जब की उत्तर प्रदेश में भी बीजेपी सरकार बन गई है ।  बुंदेलखंड के समग्र विकाश की बात करने वाली बीजेपी बुंदेलखंड इलाके के सँयुक्त पर्यटन विकाश पर कार्य योजना बना सकती है और उसको अमली जामा पहनाकर देश का बड़ा टूरिज्म हब  बना सकती  है । 
  पर्यटन के  कारोबार   में रोजगार की असीम सम्भावनाये जानने के बाद भी   बुंदेलखंड इलाके में इस उद्योग को   विकसित करने  में सरकारों का रवैय्या काफी सुस्त रहा है  । जबकि बुंदेलखंड  देश का ऐसा इकलौता पर्यटन क्षेत्र  है जहाँ   स्थापत्य कला ,,धर्म ,संस्कृति , वन्य प्राणी अभ्यारण्य  , जैव विविधिता, और वाटर स्पोर्ट्स ,जैसी समग्रता समाई हुई है । 


  खजुराहो को  पर्यटन का केंद्र बना कर  पर्यटकों को  पन्ना टाइगर रिजर्व , टाइगर रिजर्व के अंदर मौजूद शील चित्रो , पन्ना के पांडव फाल ,पन्ना के मंदिर ,  कौआ सेहा , ब्रस्पति कुंड , नचना का शिव मंदिर , भगवान् राम के आश्रम सारंग धाम , अगस्त मुनि के आश्रम  जहाँ रखा भगवान् राम का धनुष , अजयगढ़ किला ,  बांदा जिले के  कालिंजर फोर्ट , चित्रकूट , गोस्वामी तुलसी  दास की जन्म स्थली राजापुर   ,चरखारी ,आल्हा उदल की नगरी महोबा , झांसी , लालितपुर जिले के रणछोर जी , देवगढ़ ,नीलकंठेश्वर मंदिर , दमोह के बांदकपुर , टीकमगढ़ के बल्देवगढ़ के किला , पपौरा , कुंडेश्वर , ओरछा, गढ़ कुढार  का किला ,सूर्य मंदिर मड़खेरा ,  दतिया के पीताम्बरा पीठ   को इस टूरिस्ट सर्किल में जोड़ा जा सकता है  ।  वहीँ छतरपुर जिले के  खजुराहों ,व्यास बदौरा के मंदिर , जटाशंकर , भीमकुण्ड , अर्जुन कुंड , नैना गिर , द्रोण गिर   धुबेला होते  हुए  ओरछा प्रस्थान का सर्किल बनाया जा सकता है ।  ये स्थान बताते हैं की यहाँ यदि खजुराहो में  काम कला का शिल्प है तो धर्म अध्यात्म से जुड़ा केंद्र भी है बुंदेलखंड में , जरूरत इन स्थलों के विकास की । और खजुराहो में हर साल आने वाले  औसतन एक लाख विदेशी और तीन लाख देशी पर्यटकों को बुंदेलखंड के और स्थलों तक पहुँचाने के लिए विस्तृत कार्ययोजना की जरुरत है  ।   



   1998  जब खजुराहो का सहस्त्राब्दी वर्ष मनाया गया तो उस समय जटकारा गाँव में  टीले में दफ़न मंदिर खोजा गया । पुरातत्व के अधिकारियों ने दावा किया था की अगले पांच साल में इस मंदिर को पूर्ण स्वरुप में तैयार कर दिया जायगा । ना वो मंदिर पूर्ण हुआ और ना ही उस समय दिखाए गए सपने पूर्ण हुए । और ना ही आस पास के ४० गाँव हेरिटेज विलेज का रूप ले सके ।  खजुराहो डेवलपमेंट एसोसिएसन के अध्यक्ष सुधीर शर्मा चर्चा के दौरान इस बात से दुखी हो जाते हैं की बुंदेलखंड में नेताओं का ध्यान इस इलाके की ओर  नहीं है । ब्रिक्स  का पर्यटन  सम्मलेन हुआ पर हासिल कुछ नहीं हुआ ,। वे असल में मानते हैं की इस तरह के सम्मलेन ,सेमीनार  वगेरह अधिकारियों के घूमने फिरने के मकसद  होते हैं । वे यहां आते हैं और पांच सितारा होटलों में  ठहर कर  कागजी खाना पूर्ति कर चले जाते हैं । 

 बात सिर्फ लोगों के भरोषा तोड़ने का ही नहीं है बल्कि उनके साथ धोखा किये जाने का भी है । भारत सरकार का पर्यटन मंत्रालय भी जानता है की मध्य प्रदेश में सर्वाधिक विदेशी टूरिस्ट खजुराहो आते हैं । यह जानने  के बावजूद यहां का  केंद्रीय टूरिस्ट कार्यालय इंदौर शिफ्ट कर दिया गया , इसके पीछे कोई देश हित नहीं था बल्कि अधिकारियों का स्वहित था , उनके बच्चों को शिक्षा में दिक्कत आती थी जिसके कारण कार्यालय शिफ्ट किया गया था । शिवराज ने भरोषा दिलाया था की डायमंड पार्क खजुराहो में बनेगा वह भी इंदौर चला गया । पर्यटकों के मनोरंजन के लिए शुरू किया गया लोकरंजन समारोह बंद कर दिया गया । अब अगला नंबर खजुराहो डांस फेस्टिवल का हो सकता है , इस बार के आयोजन देख कर तो ऐसी ही शंकाये  जताई जा रही हैं । 
                 
पर्यटन बढ़ाने और पर्यटकों को ज्यादा से ज्यादा समय तक रोकने के लिए यह जरुरी माना जाता है की इन स्थलों तक के पहुंच मार्ग बेहतर हो । रेल और एयर कनेक्टिविटी ज्यादा से ज्यादा हो , पर खजुराहो में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का एयर पोर्ट होने के बावजूद भी एयर इंडिया की रेगुलर फ्लाइट नहीं है । अन्य स्थानों से कनेक्टिविटी की बात तो भूल ही जाईये ।  ब्रिक्स देशों के सम्मिट में   उत्तर प्रदेश से आये पर्यटन मंत्रायलय के लोगों ने  दावा किया था  की  हम एक ऐसा टूरिस्ट सर्किल बना  रहे हैं जिसमे बनारस को देख कर पर्यटक इलाहबाद ,चित्रकूट , खजुराहो ,और ओरछा होते हुए झांसी पहुंच जाए  इस टूरिस्ट सर्किल में भविष्य मेंपन्ना , कालिंजर , अजयगढ़ , महोबा  और चरखारी को  जोड़ने की बात भी कही गई थी  साल भर का समय बीत गया  फिर भी योजनाओ को लेकर मंथन और मजे का दौर जारी है । 


13 मार्च, 2017

बुन्देलखण्ड का विश्वास बीजेपी के साथ

बुन्देलखण्ड की डायरी  

रवीन्द्र व्यास 

उत्तर प्रदेश के साथ बुंदेलखंड ,में  अब तक के राजनैतिक दलों ने इतना कीचड़ समाज और शासन में फैलाया की कमल का फूल लहलहा उठा ।  बीजेपी की ऐसी आंधी चली की  बुंदेलखंड की सभी 19 सीटों पर कमल खिल गया । मोदी और अमित शाह की सामाजिक सर्जरी ने ऐसा कमाल किया की जातीय राजनीति का गणित  ही फ़ैल हो गया । जो कल तक बुंदेलखंड को अपने जातीय गणित से अपना गढ़  बता रहे थे उन्हें भी मतदाताओं ने करारा जबाब दिया है । उत्तर प्रदेश  की इस ऐतिहासिक विजय का जश्न देश भर में बीजेपी मना रही  है ।  
                                     
                                         बेबस बुंदेलखंड ने दशकों तक जातिय  वर्गों के आतंक और अत्याचार  को झेला,। लूट के नज़ारे भी देखे और पंगु प्रशासन को भी देखा । राहुल की खाट पर भी बैठा और अखिलेश से   फ़रियाद भी की ,माया के मोह में भी फसा पर हालात और बदत्तर ही होते गए । बुंदेलखंड की बिजली से सैफई  और रामपुर तो रोशन होता रहा पर बुंदेलखंड अँधेरे में डूबा रहा । अंचल में ऐसा अंधेरा छाया की लोग आत्म ह्त्या को मजबूर होने लगे , पेट की आग बुझाने महानगरो की और पलायन करना  मज़बूरी हो गई । वहीँ दूसरी मज़बूरी भी देखने को मिली मध्यम वर्गीय परिवार भी शिक्षा के लिए पलायन को मजबूर हुए । 
                                        


  यह मोदी के चुनाव प्रचार का तरीका ही था की वे सभा में बोलने के पहले अपने लोगों से उस इलाके की समग्र समास्याओं को जान लेते थे । बुंदेलखंड की समस्याओं को जानने और समझने के बाद प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी चुनावी सभाओं में लोगों के बीच आम जन के मुद्दे उठा कर यह एहसास दिला दिया था की उनकी समास्याओं का समाधान केवल बीजेपी ही कर सकती है ।    इसके लिए उन्होंने इस  बिजली ,पानी , खनिज लूट , भ्रस्टाचार , अन्ना जानवरों की समस्याओं , तीन तलाक के मुद्दे को भी उठाया । उन्होंने लोगों  भरोषा दिलाया था की उत्तर प्रदेश में सरकार  बनते ही पहली बैठक में बुंदेलखंड विकाश बोर्ड का प्रस्ताव पास किया जाएगा ।  विकाश की ऐसी गंगा बहेगी  यहां के किसानों  आत्म ह्त्या नहीं करनी पड़ेगी । उन्होंने  लोगों का सिर्फ वोट के लिए उपयोग करने पर सपा ,बसपा और कांग्रेस  आड़े हाथ लिया था ।
                    बीजेपी ने  अपने घोषणा पत्र जिसे अमित शाह अब  संकल्प पत्र  कहते हैं जिसमे में वायदा किया है की किसानों  कर्जा माफ़ होगा । बिना ब्याज के कर्ज मिलेगा ।  बुंदेलखडं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा , पलायन रोका जायगा ,एंटी भूमाफिया  टास्क फ़ोर्स और खनन माफियाओ के लिए टास्क फ़ोर्स बनेगा । बुंदेलखंड की तस्वीर बदलने के लिए बुंदेलखंड विकाश बोर्ड बनेगा । बीजेपी  संकल्प पत्र में समाज के हर वर्ग को लुभाने का प्रयास किया गया । ख़ास तौर पर किसानों , युवाओ , महिलाओ और छात्राओं को । उत्तर प्रदेश में ६ एम्स खोलने का वायदा भी किया गया ।  एम्स की सूचि में बुंदेलखंड का नाम रहता है या नहीं ?  यह सब समय बताएगा । 
                                        बुंदेलखंड में जहां पिछले चुनाव में एक सीट पर बीजेपी , चार पर कांग्रेस ,छह पर बीएसपी ,और 8 पर सपा का कब्जा था । बीजेपी के वायदों पर  भरोषा कर एक सीट वाली बीजेपी ने ललितपुर , झाँसी ,महोबा ,बांदा ,हमीरपुर ,चित्रकूट ,और जालौन जिले की सभी सीटों पर अपना झण्डा लहरा दिया । इस इलाके के  सभी सांसद और विधायक सिर्फ बीजेपी के ही हैं । 
          बुंदेलखंड की इन अहम् बातों के अलावा  बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र (संकल्प पत्र ) में  यूपी में किसानों की  शत-प्रतिशत कर्ज माफ़ी , बिना ब्याज  कर्ज , धान के लिए किसानों के शोषण को रोकना ,धान को शत-प्रतिशत समर्थन मूल्य पर खरीदेंगे,भूमिहीन किसान को दो लाख का बीमा ,कृषि विकाश फंड ,गन्ना किसानों का भुगतान 14 दिनों में चेक से करेंगे, अमूल की तरह यू पी में डेयरी शुर की जायेगी ,यूपी में पुलिस के खाली पद तुरंत भरे जाएंगे.,पशुओं का कत्ल बंद होगा.यांत्रिक कत्लखाने को बंद किया जाएगा,,45 दिनों में सभी अपराधी जेल में बंद होंगे,100 नंबर की सेवा को और मजबूत किया जाएगा.,40 हजार से अधिक अपराधी 40 दिनों के भीतर जेल में होंगे.,स्नातक तक लड़कियों और 12वीं तक लड़कों को मुफ्त में शिक्षा.मुख्यमंत्री सिंचाई फंड की शुरूआत करेंगे.एक साल तक लैपटॉप के साथ 1 जीबी डाटा मुफ्त,5 साल में 24 घंटे बिजली का वादा,स्कूल-कॉलेज सहित यूनिवर्सिटी में फ्री वाई-फाई की सुविधा होगी.,हर गांव तहसील से जुड़ेंगे.लखनऊ और मेट्रो शहर का विस्तार होगा.कानपुरझांसी़मेरठ और गाजियाबाद में मेट्रो सेवा देंगे,हर घर में एलपीजी पहुंचाने का वादा,2019 तक यूपी के हर घर में होगी बिजली,पर्यटन स्थलों पर हेलीकॉप्टर सेवा की शुरुआत,अवैध खनन पूरी तरह बंद होंगे,गरीब परिवार की बेटी को जन्म के साथ ही 5000 रुपए की मदद देंगे,विधवा पेंशन 1000 रुपए की जाएगी,विधवा पेंशन के लिए उम्र की सीमा खत्म करेंगे,हर जिले में तीन महिला थाने बनेंगे, तीन तलाक के मुद्दे पर प्रदेश की मुस्लिम महिलाओं से राय लेंगे,गरीबों को फ्री में एलपीजी सिलेंडर देंगे,हर गांव को तहसील सेंटर से जोड़ा जाएगा,यूपी में 25  नए सुपर स्पेशलिस्ट अस्पताल बनेंगे ,6 एम्स बनाने की व्यवस्था करेंगे। और संवैधानिक तरीके राम मंदिर बनाने की कोशिश करेंगे । 

       मोदी की इन मोहक बातों में  आ कर बुंदेलखंड के लोगों ने बसपा और सपा के इस गढ़ से सभी दलों का सफाया कर दिया । बुंदेलखंड के लोगों ने अब की बार बीजेपी  पर पूर्ण विश्वास जताया है । अब देखना ये है की  लोगों के इस विश्वास पर  देश की और प्रदेश की  सुपर पावर सरकार कितनी खरी उतरती  है ।बुंदेलखंड की तक़दीर और तस्वीर कैसी बदलती है । उमा भारती कैसे प्रथक बुंदेलखंड राज्य के   अपने वायदे  पूर्ण कराती है ।  पर इतना जरूर है की मोदी की इस सामाजिक सर्जरी के कारण देश और प्रदेश की राजनैतिक दशा  दिशा में बड़ा परिवर्तन आएगा । बीजेपी ने जिस तरह का  राजनैतिक धुर्वीकरण किया है उससे  जातिय वर्ग की राजनीति करने वालों को एक बार फिर से पुनर्विचार करना होगा । जिस तरह के राजनैतिक संकेत मिल रहे हैं  यह साफ़ इशारा करते हैं देश अब राजनैतिक धुर्वीकरण की ओर चल पड़ा है ।   

08 मार्च, 2017

अन्ना प्रथा से परेशान किसान

बुन्देलखण्ड की डायरी  

रवीन्द्र व्यास 


बुन्देल खंड  में   अन्ना प्रथा अब किसी विपदा से काम नहीं रह गई है ।  सदियों से चली आ रही इस प्रथा में पहले चैत्र  मॉस में फसल कटाई के बाद , गोवंश को खुला छोड़ा जाता था , पिछले दो दशको में इस प्रथा को किसानों ने हमेशा के लिए अपना लिया ।  हालात ये बने  खुले छूटे जानवर सड़को पर घूमने लगे ,  फसलों को उजाड़ने लगे , किसानों में आपसी संघर्ष होने लगे , मसला सरकार के मुखियाओ तक पहुंचा , लोक सभा में भी इसकी गूंज सुनाई दी ,कुछ ने मसले के निपटाने के जातन  किये पर कुछ ने इस पर ध्यान देना ही जरुरी नहीं समझ । देखा जाए तो समस्या के मूल में बुंदेलखंड के किसानों के आर्थिक हालात , सरकार की नीतियां ही मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं । 



   बुंदेलखंड इलाके में  यह प्रथा थी की जब  चैत्र मास में फसल कट जाती थी , और खेत खाली हो जाते थे ,उस समय जानवरो को खुला छोड़ दिया जाता था । इसके पीछे किसानों का  एक कृषि ज्ञान काम करता था । खुले खेतों में इन जानवरो के विचरण करने और चरने  से उन्हें अपने खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में मदद मिलती थी ।  खेत में इन जानवरों का गोमूत्र और गोबर खाद का काम करता था । हालात बदले और किसानों ने मशीनो से दोस्ती कर ली , गो वंश से नाता तोड़ लिया । नतीजा ये हुआ कि दूध देने वाले जानवरो के अलावा सभी को खुले मे छोड दिया गया । गोवंश को जब अधिकांश किसानों ने हमेशा के लिये खुला छोड़ा तो यही जानवर   किसानों के लिए एक बड़ी समस्या बन गया  है ।

इस लावारिश  पशु धन को जहां पानी मिला वहां अपनी प्यास बुझा ली  जो खेत मिला उसी से अपने पेट की आग बुझा ली ।  जब खेतो की फैसले उजड़ने लगी तो किसानों को ये समस्या किसी विपदा से कम नहीं जान पड़ी ।  किसान को अब  अपनी फसलें बचाने के लिए दोहरी मेहनत करनी पड़ने लगी , पहले से ही नील गाय से परेशान किसान अब इस गो वंश पर लाठियाँ लेकर जुट पड़ा । एक गाँव से दूसरे गाँव भगाने लगा , इस का असर ये हुआ की गाँव के गाँव आपस में दुश्मन होने लगे । लोगों में लाठियां चलने लगी ,गाली गलौच होने लगी । छतरपुर जिले के खजुराहो के पास ललगुवाँ  गाँव में ऐसा ही एक मामला कुछ दिनों पहले सामने आया था । जब एक किसान के खेत में गायों का जंद घुस गया ,। खेत मालिक इस पर इतना नाराज हुआ की अपने परिजनों के साथ गांव में निकालकर गाली गलौच करने लगा । गाँव के एक समझदार नेता और वकील रतन सिंह ने किसी तरह उसे समझाया तब कहीं जा कर मामला निपटा । 
 फरवरी के पहले हफ्ते में हमीरपुर जिले के ऐंझी गाँव और महोबा जिले के बसौठ गाँव के  लोगों के बीच जानवरो को लेकर जम कर संघर्ष हुआ । खरेला थाना पुलिस को जैसे ही इस संघर्ष की जानकारी लगी वह मौके पर पहुंची । पुलिस ने ऐझी गाँव के लोगों पर लाठियाँ बरसाई , इस संघर्ष में  चार किसान घायल हो गए । खबर पाकर ऐझी गाँव की महिलाये भी संघर्ष के लिए मैदान में आ गई , किसी तरह मुस्करा थाना प्रभारी ने माले को निपटाया । बाद में घायल किसानों ने महोबा के पुलिस कप्तान से शिकायत कर खरेला थाना की   पुलिस पर कार्यवाही की मांग की । 
    
                                              बुंदेलखंड इलाके में भटकते पशुधन के कारण हर साल औसतन 25 से 35  फीसदी फसल नष्ट होती है । किसानों के सामने यह समस्या इतनी जटिल है की वे इसके लिए कई बार सूबे के मुखिया , अपने इलाके के नेता विधायक और सांसद ,प्रशासन तक से गुहार लगा चुके हैं ।  बांदा के सांसद ने लोकसभा में  और इसी जिले के तिंदवारी विधायक ने विधान सभा में अन्ना जानवरो का मुद्दा   उठाया था, पर हालात जस के तस बने रहे  । इस गंभीर समस्या के जनक किसानों  की मज़बूरी ये है की  बढ़ते परिवार और बटवारे के कारण उनकी खेती की जमीन तो घटती गई । प्रकृति के प्रकोप ने भी उनकी समस्याओ को और बढ़ाया खुद के अनाज और जानवरों के लिए भूसे की समस्या उत्पन्न हो गई । , खुद उनके और उनके परिवार के लिए दो जून की रोटी की जुगाड़ मुश्किल हो गई , मजदूरी के लिए पलायन करना पड़ा सो अलग ऐसे में जानवरो को खुला छोड़ने के अलावा और कोई विकल्प उन्हें नहीं समझ आया  । किसानों के सामने इसके अलावा एक और भी समस्या थी गाँव की चरनोई भूमि के पट्टा वितरण की जिसके कारण गाँव की चरनोई भूमि समाप्त हो गई और जानवरो के लिए खेत ही सहारा रह गए ।  
                                                 
                                                   उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बुंदेलखंड इलाके में इस समस्या से निपटने के लिए हमीरपुर और बांदा जिले में अभियान शुरू  करवाया है । दिसंबर में कनकुआ में अपनी चुनावी सभा में सी एम्  अखिलेश यादव ने महोबा जिले के किसानों को भरोषा दिलाया था की हमीरपुर जिले की तरह महोबा जिले के किसानों को अन्ना पशुओं की समस्या से जल्द से जल्द छुटकारा दिलाया जाएगा । इस  समस्या के निराकरण के लिए  झाँसी के भारतीय चारागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान के    अधिकारियों से चर्चा की जाएगी । 

            हालांकि कुछ इलाको में इसके लिए प्रयास किये जा रहे हैं । बांदा जिले के बबेरू क्षेत्र के पिंडारण गाँव में किसानों ने १२ बीघा में एक गौशाला बनाई , किसानों ने चन्दा जोड़कर गाँव के प्रधान को ६० हजार रु दिए , उसने भी पंचायत निधि और मनरेगा से ढाई लाख रु जुटाकर गौशाला तैयार की है ।  छतरपुर जिले के बारीगढ़ नगर पंचायत  और नगर वासियों ने मिलकर एक अनुकरणीय पहल की है।  इन गौवंश  के लिए नगर पंचायत  और नगर वासियों ने मिलकर इनके चराने की और भोजन की व्यवस्था की है।   पार्षदों, अध्यक्ष और ,उपाध्यक्ष ने अपना मानदेय इन गौवंश के लिए समर्पित कर दिया है । इनके लिए 7 चरवाहे नियुक्त किये गये है जो दिन में इनहे चराने का काम करते है ।  नपा  ने जन सहयोग से लगभग 2 हजार गौवंश के दाना पानी की भी व्यवस्था कर एक मिसाल कायम की है। नपा की इस पहल से  किसान भी  खुश हैं,की उसकी फसल जानवरो  से बच गई ।,



                        मध्य प्रदेश सरकार इस मसले पर मौन व्रत धारण किये है , इसके पीछे तर्क दिए जाते हैं की इस समस्या से निपटने के लिए प्रदेश सरकार ने पहले ही गौशालों की व्यवस्था कर रखी है । पर मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में बनी ये गौशालाएं किसी  अभिशाप से कम नहीं हैं । सरकार के जिन कृपा पात्रों  के हाथो इन गौशालों की जिम्मेदारी है वे सिर्फ कागजी ज्यादा हैं यथार्थ में कम । कुछेक गौशालों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश  गौशालाएं   लोगों के कमाई का जरिया बन गई हैं । पिछले साल पन्ना के पवई इलाके की अहिंसा गौशाला इसका जीता जागता प्रमाण था । जहां मौत के बाद भी गौ माता को गौशाला में सड़ने के लिए छोड़ने का और दो दर्जन से ज्यादा गायों का मामला सामने आया था । 
                        इसे बदलते दौर की विडम्बना ही कहेंगे की जहां गौ वंश की पूजन से वर्तमान और भविष्य को सुरक्षित बनाया जाता था वहीँ आज गौ वंश को किसान आज मुसीबत के तौर पर देखने लगा है । जरुरत है इस समस्या के सकारात्मक समाधान की ,। मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री की पहल पर मालवा इलाके में दॆश का पहला  गौ अभ्यारण्य शुरू किया गया है \ 2017 तक  इस अभ्यारण्य से गौ मूत्र से बने कॉस्मेटिक उत्पादों का काम शुरू करने की योजना भी है । सवाल बुंदेलखंड के लोगों का सिर्फ यही है क्या बुंदेलखंड में इस तरह के अभ्यारण्य नहीं खोले जा सकते जिससे लावारिश गौ धन के नस्ल सुधार का अभियान भी जुड़ा हो । पर शायद सियासत के संख्या बल की कमी के कारण उसकी आवाज नहीं सुनी जाती ।