28 अगस्त, 2015

लुप्त होती बुंदेली परम्पराए


अब नहीं डलते सावन के झूले _ चपेटा को भूली बालिकाए 
रवीन्द्र व्यास 

बुंदेलखंडी जीवन शैली  वैसे तो प्रकृति  से सामंजस्य की अदभुत  जीवन शैली है ।  यहां का हर त्यौहार , प्रकृति  और  लोक  रंजन से जुड़ा है ।  पर अब शायद बुंदेलखंड की  इस जीवन परम्परा को भी आधुनिकता का ग्रहण लग गया है । सावन की कई परम्पराए  जो कभी लोगों के प्रकृति प्रेम और आपसी समन्वय  और  प्रेम को दर्शाती थी अब सिर्फ किस्से कहानियो तक सिमट कर रह गई हैं । 
                           वर्षा ऋतू  में जब चारों और हरियाली व्याप्त हो ऐसे में किसका मन प्रफुल्लित ना होगा । ऐसे में बुंदेलखंड के घर - घर में ऊँचे वृक्ष की डाल पर झूले डाले जाते थे ।  धीरे - धीरे ये गाँव के झूलो तक  पहुँच गए । और अब किसी किसी गांव में ही ये झूले  और झूलों पर झूलती बालाएं देखने को मिलती हैं |    सावन का महीना  उल्लास और उमंग का महीना बुंदेलखंड में माना जाता  था ।गाँव - गाँव में महिलाये और बालिकाए गाँव में लगे मेहँदी के पेड़ से मेहँदी तोड़ कर लाती थी , उसे पीस कर आपस में लगाती थी , लोक मान्यता थी जिस कन्या के हाथ में जितनी गहरी मेहँदी रचेगी उसे उतना ही सुन्दर पति मिलेगा ।  पहले गाँव -गाँव में  बाल _गोपाल  चकरी , भौरा (लट्टू) चलाते  , तो कोई बांसुरी की धुन छेड़ते  मिल जाता था । वहीँ बालिकाए  लाख के कंगन  और  चपेटों से खेलते मिल जाती थी ।  अब  मेहँदी के वृक्ष बचे नहीं तो बाजार से अपनी सामर्थ्य अनुसार मेहँदी ले आती हैं , ना ही  वो घूमते लट्टू रहे और ना चपेटे  के साथ  हंसती खिलखिलाती  बालिकाए । बुंदेलखंड के नगरीय इलाकों से तो परम्पराए काफी पहले लुप्त हो गई थी । 
           लोक जीवन की इन परम्पराओ की समाप्ति के पीछे  का जो मुख्य कारण है वह   आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में हम सब प्रकृति से अलग हो गए हैं । गाँव के घरो में लगे पेड़ कट गए , गाँव में लगे कुछेक वृक्ष किसी ना किसी की बपौती हो गए , उस पर उनके घर के लोगों के अलावा दूसरा  कोई जा नहीं सकता । इस तरह से झूला की परम्परा समाप्त हो गई ।  लट्टू और चकरी पहले गाँव का बढ़ई बना दिया करता था  फिर  बाजार में मिलने लगे अब वे भी नहीं मिलते । बांसुरी की तान बांस से बनी बांसुरी से ही आ सकती है , उसका स्थान प्लास्टिक ने ले लिया है । चपेटा जरूर खेला जाता है पर बहुत कम क्योंकि लोगों को अब टीवी से ही फुर्सत नहीं मिलती । 
लुप्त हुई सावनी भेजने की परम्परा :_
  प. रामकृपाल शर्मा बताते हैं की  सावन के महीना में  बुंदेलखंड में सावनी भेजने की परम्परा थी ।  यह भी अब समाप्त सी हो गई है इसका स्थान अब पैसों ने ले लिया है ।  इस परम्परा में  विवाहित महिला पहली बार जब  सावन के महीने में अपने मायके  आ जाती है । तब उसके पति के घर से  उसके लिए सोने -चांदी की राखी , कपडे , लकड़ी के खेल खिलौने आदि भेजे जाते हैं ।ससुराल से आई राखी ही बहिन अपने भाई की कलाई पर बांधती है ।  इसका बाकायदा गाँव के लोगों को निमंत्रण दिया जाता था , वे लोग आकार सावनी में आये सामान को देखते थे ।   अब  सावनी के सामान के स्थान पर  पैसा भेज दिया जाता है ।  
                                परम्पराए  आपसी सम्बन्ध को मजबूत करने की एक कड़ी थी किन्तु  अब ये सिर्फ ओप्चारिक्ताये बन कर रह गई हैं ।  वे कहते हैं की दरअसल  इस दौर में  वही सब कुछ हो रहा है जो लोग सुबह से साम तक देखते हैं ?           

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