चीन की दादागिरी पर भारत का दमदार जबाब
रवीन्द्र व्यास
भारत ने काफी समय बाद कुटनेतिक तरीके से अपने पडोसी चीन को उसकी तस्वीर दिखाई है | भारत ने वियतनाम के साथ तेल खोज के करार पर काम करना शुरू किया है | वह भी उस इलाके में जिस पर चीन अपना दावा जताता है | तेल और प्राक्रतिक गेस का यह भण्डार दरअसल वियतनाम का इलाका है | तेल के पीछे चीन हर हाल में इस पर अपना कब्जा ज़माना चाहता है |
दरअसल पिछले कुछ समय से चीन ने भारत की घेरा बंदी शुरू की है , कूटनैतिक और सामरिक रण निति के तहत उसने पहले पाकिस्तान को बल प्रदान किया , परमाणु बम्ब बनाने में उसकी मदद की , यहाँ तक की उसका परमाणु परीक्षण भी अपने यहाँ करवाया | इसके पाक अधिकृत काश्मीर जो भारत का अभिन्न अंग है में सड़क ,रेल मार्ग और बाँध का निर्माण शुरू किया | जब की यह इलाका पाक गैर कानूनी तरीके से कब्जाए है | और एसे इलाके में किसी तीसरे देस जेसे चीन द्वारा कुछ भी करना अंतरास्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है | पाक के बाद चीन ने भारत के सबसे करीबी नेपाल में घुश पैठ की , वहाँ आज के हालात में चीन का सबसे ज्यादा दखल माना जाता है | इसके बाद चीन ने श्री लंका को भी अपने कुटनेतिक जाल लपेटा | दूसरी तरफ वह भारत की भूमि गाहे बगाहे अपना दावा ठोकता रहता है , कभी सिक्किम ,अरुणाचल प्रदेश ,तो कभी लेह लद्दाख तो कभी काश्मीर पर | यहाँ के लोगों को वह नत्थी बीजा देकर भारत को हमेशा से चिडाता आ रहा है | भारत की सीमा घुस कर उसके सैनिक अपनी नापाक हरकतें करने से भी बाज नहीं आते | हद तो तब हो गई थी जब उसने सिक्किम में देश के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के जाने पर ही आपत्ति की थी |
भारत की तेल कम्पनी ओ.एन.जी.सी. ने वियतनाम की पेट्रो वियतनाम के साथ एक करार किया था | इस अनुबंध के अनुसार वियतनाम के समुद्र तट पर पेट्रोल और गैस निकालने की योजना है | इस योजना पर दोनों देशों ने बड़ा निवेश किया है । चीन इसे दक्षिण चीन सागर का हिसा बताते हुए इस पर अपना हक़ जताता है | उसने इस पर आपत्ति भी जताई थी | भारत ने उसके इस विरोध को दरकिनार करते हुए साफ़ तौर पर कह दिया की वह पी.ओ.के. से दूर रहे |
दक्ष्णि चीन सागर तेल और गैस का प्रमुख्य गढ़ माना जाता है |इस इलाके को लेकर चीन और वियतनाम के मध्य विवाद काफी समय से चला आ रहा है |१९८२ के संयुक्त राष्ट्र समझौते के तहत इस इलाके के दो तेल क्षेत्रों पर वियतनाम का अधिकार माना गया है | भारत इन्ही क्षेत्रों में तेल खोज अभियान में वियतनाम के साथ जुटा है | जब की चीन को तो इस इलाके से जहाज़ों की आवाजाही पर भी आपत्ति है | पिछले महीने चीनी नौसेना ने भारतीय जहाज को रोकने का दुसाहस भी किया था |चीन के इस दादागिरी पूर्ण रुख को लेकर आशियान देश भी काफी नाराज हें |
हालांकि चीन के अलावा इस इलाके पर मलेसिया , ताइवान ,फिलिपिन्स और वियतनाम भी अपना दावा करते हें |
विश्व का हर सम्रध देश हर हाल में घटते तेल भंडारों को लेकर अपनी रण निति के तहत चल रहा है | हर देश चाहता है की उसका ऊर्जा के सबसे बडे स्रोत पर कब्जा हो | विश्व में अब तक अधिकाँश युद्ध सिर्फ तेल के लिए ही हुए हें | आने वाले दिनों में जैसी की चीन की मीडिया ने चेतावनी दी है की इसको लेकर युद्ध भी हो सकता है | इस चेतावनी को हल्के में नहीं लेना चाहिए क्योंकि चीन हर कीमत पर यहाँ से भारत को दूर भगाना चाहेगा जिसके परिणाम खतारनाक होंगे , क्योंकि कोई भी लोकतांत्रिक सरकार अपनी जनता की अजर में दब्बू का तमगा नहीं लेना चाहती | और यदि इसको लेकर युद्ध होता है तो यह युद्ध सिर्फ चीन भारत तक सिमित नहीं रहेगा बल्की इसमें दुनिया के कई देश शामिल हो जायेंगे ,|
चीन की हरकतों को और अमेरिका की रिपोर्ट को यदि देखा जाये तो कई तथ्य उजागर होते हें | पेंटागन की रिपोर्ट में काफी पहले इस बात का खुलासा किया था की चीन भारत की सीमा पर आधुनिक मिसाइलें तैनात कर रहा है | इसके अलावा चीन बड़ी तादाद में पाक को हथियार भी दे रहा है | मतलब साफ़ है की भारत की बढती शक्ति को वह कुचलने पर आमादा है | भारत पर दबाव बनाने के लिए वह हिंद माहा सागर में भी अपनी गतिविधियाँ बड़ा सकता है |
इन हालातों में भारत को अपना कूटनैतिक अभियान जारी रखना जरुरी माना जा रहा है , हालांकि यह मुददा २४ से २६ सितम्बर की भारत चीन वार्ता में छाया रहेगा , जब मोंटेक सिंह चीन जायेंगे |
