जनता की सांस छीनती डिस्टलरी पर प्रशासन का अंकुश
रवीन्द्र व्यास
मध्यप्रदेश के छतरपुर जिला के नौगांव के हालिया घटनाक्रम से एक गहरा सवाल उभरता है—क्या वाकई आम आदमी की सांसों की कीमत इतनी सस्ती है कि वर्षों तक जहरीली हवा और पानी के जहर को उसके नसीब का हिस्सा मान लिया जाए? जैकपिन ब्रेवरीज कॉक्स डिस्टलरी के खिलाफ हुआ यह प्रशासनिक आदेश सिर्फ एक फैक्ट्री की सीलिंग नहीं, बल्कि उस जूझती हुई जनता की जीत है, जिसने बगैर किसी बड़े नेता या सत्ता के, अपने जीने के अधिकार के लिए साहस दिखाया।
वर्षों की चुप्पी टूटी, आवाज़ बनी ताक़त
नौगांव और आसपास के क्षेत्र महीनों नहीं, कई वर्षों से कॉक्स डिस्टलरी से निकलने वाली बदबू में तनाव, बीमारी और हताशा के बीच जीवन जी रहे थे । जब कभी आवाज उठी, वह कुचल दी गई, या धनबल या बाहुबल के सामने दम तोड़ गई। पर इस बार महिला हों, युवा हों या सामाजिक संगठन सबने बदबू मुक्त नौगांव के बैनर तले एकजुटता दिखाई। शायद प्रशासन भी महसूस कर सका कि जनता अब सरकारी फाइलों में कैद रहने वाली नहीं है।
प्रशासनिक कार्रवाई
एसडीएम स्तर पर हुए इस साहसी कदम को सिर्फ व्यक्तिगत कार्रवाई कहना भूल होगी। यह स्पष्ट है कि सार्वजनिक दबाव सोशल मीडिया मुहिम, बीजेपी ,कांग्रेस द्वारा ज्ञापन, केंद्रीय मंत्री के वाहन को घेरने जैसी कार्रवाइयों ने मिलकर रणनीतिक माहौल बनाया। यह केस बताता है कि लोकतंत्र में प्रशासन अगर जनता के साथ खड़ा हो जाए, तो प्रभावशाली और रसूखदार कारखानों की भी जवाबदेही तय की जा सकती है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य के अधिकार का प्रतीक
निरीक्षण के समय अफसरों के मास्क पहनना प्रतीक है उस खतरे का, जिसे झेलते-जागते आम लोग बिना किसी सुरक्षा के जी रहे थे। यह घटना यह भी बताती है कि एक फैक्ट्री की लापरवाही पूरे समाज और पर्यावरण को कैसे प्रभावित करती है। स्थानीय प्रशासन का आदेश चाहे सशर्त हो या तो सुधारो या बंद करो मगर असल इम्तहान उसकी क्रियान्विति का है, ताकि यह कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित न रह जाए।
सबसे बड़ी बात यह उजागर होती है कि नागरिक अधिकार सिर्फ कागज या संविधान की किताब में नहीं, जमीन पर अमल के साथ मायने रखते हैं। नौगांव के लोगों की मांग सांस लेने का हक केवल स्थानीय सवाल नहीं, बल्कि समूचे भारत के उन लाखों-करोड़ों नागरिकों की प्रतिध्वनि है जो हर दिन किसी न किसी प्रकार के प्रदूषण के साए में जीने को मजबूर हैं।
यह मामला सिर्फ फैक्ट्री बंद कराने या गंध भगाने भर की लड़ाई नहीं यह ग्रामीण भारत में लोगों की बढ़ती जागरूकता और संगठित दबाव की जीत भी है। इस लड़ाई को मजबूती और स्थायित्व तभी मिलेगा जब प्रशासन अपने आदेश की सख्ती से अनुपालन करे ऐसे फैसले वास्तविक ज़मीन तक जाएँ, न कि केवल फाइलों, विज्ञप्तियों या ट्वीट्स तक सिमट जाएँ।
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