29 सितंबर, 2025
एमपी में गरबा पंडालों में घुसपैठ पर हंगामा: सागर में कश्मीरी ‘आफताब’ पकड़ा गया, हिंदू संगठनों ने लगाया ‘बदनीयत’ का आरोप
28 सितंबर, 2025
जनता की सांस छीनती डिस्टलरी पर प्रशासन का अंकुश
जनता की सांस छीनती डिस्टलरी पर प्रशासन का अंकुश
रवीन्द्र व्यास
मध्यप्रदेश के छतरपुर जिला के नौगांव के हालिया घटनाक्रम से एक गहरा सवाल उभरता है—क्या वाकई आम आदमी की सांसों की कीमत इतनी सस्ती है कि वर्षों तक जहरीली हवा और पानी के जहर को उसके नसीब का हिस्सा मान लिया जाए? जैकपिन ब्रेवरीज कॉक्स डिस्टलरी के खिलाफ हुआ यह प्रशासनिक आदेश सिर्फ एक फैक्ट्री की सीलिंग नहीं, बल्कि उस जूझती हुई जनता की जीत है, जिसने बगैर किसी बड़े नेता या सत्ता के, अपने जीने के अधिकार के लिए साहस दिखाया।
वर्षों की चुप्पी टूटी, आवाज़ बनी ताक़त
नौगांव और आसपास के क्षेत्र महीनों नहीं, कई वर्षों से कॉक्स डिस्टलरी से निकलने वाली बदबू में तनाव, बीमारी और हताशा के बीच जीवन जी रहे थे । जब कभी आवाज उठी, वह कुचल दी गई, या धनबल या बाहुबल के सामने दम तोड़ गई। पर इस बार महिला हों, युवा हों या सामाजिक संगठन सबने बदबू मुक्त नौगांव के बैनर तले एकजुटता दिखाई। शायद प्रशासन भी महसूस कर सका कि जनता अब सरकारी फाइलों में कैद रहने वाली नहीं है।
प्रशासनिक कार्रवाई
एसडीएम स्तर पर हुए इस साहसी कदम को सिर्फ व्यक्तिगत कार्रवाई कहना भूल होगी। यह स्पष्ट है कि सार्वजनिक दबाव सोशल मीडिया मुहिम, बीजेपी ,कांग्रेस द्वारा ज्ञापन, केंद्रीय मंत्री के वाहन को घेरने जैसी कार्रवाइयों ने मिलकर रणनीतिक माहौल बनाया। यह केस बताता है कि लोकतंत्र में प्रशासन अगर जनता के साथ खड़ा हो जाए, तो प्रभावशाली और रसूखदार कारखानों की भी जवाबदेही तय की जा सकती है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य के अधिकार का प्रतीक
निरीक्षण के समय अफसरों के मास्क पहनना प्रतीक है उस खतरे का, जिसे झेलते-जागते आम लोग बिना किसी सुरक्षा के जी रहे थे। यह घटना यह भी बताती है कि एक फैक्ट्री की लापरवाही पूरे समाज और पर्यावरण को कैसे प्रभावित करती है। स्थानीय प्रशासन का आदेश चाहे सशर्त हो या तो सुधारो या बंद करो मगर असल इम्तहान उसकी क्रियान्विति का है, ताकि यह कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित न रह जाए।
सबसे बड़ी बात यह उजागर होती है कि नागरिक अधिकार सिर्फ कागज या संविधान की किताब में नहीं, जमीन पर अमल के साथ मायने रखते हैं। नौगांव के लोगों की मांग सांस लेने का हक केवल स्थानीय सवाल नहीं, बल्कि समूचे भारत के उन लाखों-करोड़ों नागरिकों की प्रतिध्वनि है जो हर दिन किसी न किसी प्रकार के प्रदूषण के साए में जीने को मजबूर हैं।
यह मामला सिर्फ फैक्ट्री बंद कराने या गंध भगाने भर की लड़ाई नहीं यह ग्रामीण भारत में लोगों की बढ़ती जागरूकता और संगठित दबाव की जीत भी है। इस लड़ाई को मजबूती और स्थायित्व तभी मिलेगा जब प्रशासन अपने आदेश की सख्ती से अनुपालन करे ऐसे फैसले वास्तविक ज़मीन तक जाएँ, न कि केवल फाइलों, विज्ञप्तियों या ट्वीट्स तक सिमट जाएँ।
ग्रेटर पन्ना लैंडस्केप योजना से कितने सुरक्षित होंगे वन्य जीव
बुंदेलखंड की डायरी
ग्रेटर पन्ना लैंडस्केप योजना से कितने सुरक्षित होंगे वन्य जीव
रवीन्द्र व्यास
ग्रेटर पन्ना लैंडस्केप मैनेजमेंट प्लान और केन-बेतवा लिंक परियोजना भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाएं हैं, जो बुंदेलखंड क्षेत्र के सतत विकास, वन्यजीव संरक्षण तथा जल संरक्षण के उद्देश्य से बनाई गई हैं। पन्ना टाइगर रिजर्व का लगभग 25% हिस्सा (५८०० हेक्टेयर भूमि) केन-बेतवा लिंक परियोजना के डूब क्षेत्र में आ रहा है।वन क्षेत्र में बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई (लगभग 23 लाख पेड़) की जाएगी, जो जैव विविधता पर विपरीत प्रभाव डाल सकती है और वन्य जीवों के लिए आवश्यक प्राकृतिक आवासों को कम कर सकती है। जिससे बाघों के प्राकृतिक आवास का बड़ा हिस्सा नष्ट हो सकता है। घड़ियालों के प्रमुख आवासों में से एक केन नदी का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है,| इसके लिए ग्रेटर पन्ना लैंडस्केप मैनेजमेंट प्लान कितना कारगर होगा यह आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा |
वर्ष 2023 में प्रारंभ हुआ इस योजनाओं का उद्देश्य पन्ना टाइगर रिजर्व और आसपास के जिलों के जैव विविधता एवं वन्यजीव आवास को संरक्षण देना है, और क्षेत्र में जल संकट को दूर करने के लिए नदी जोड़ो परियोजना का क्रियान्वयन करना है।योजना को २०३२ तक पूर्ण होने का लक्ष्य तय किया गया है | इस परियोजना पर 3186 करोड़ की राशि व्यय की जायेगी |
ग्रेटर पन्ना लैंडस्केप मैनेजमेंट प्लान मध्यप्रदेश के पन्ना, सतना, टीकमगढ़, कटनी, छतरपुर, दमोह, सागर, रीवा तथा उत्तर प्रदेश के बांदा, चित्रकूट, ललितपुर जिलों में लागू किया गया है । इसका उद्देश्य इन क्षेत्रों में बाघ, गिद्ध, घड़ियाल जैसी प्रमुख प्रजातियों के आवास संरक्षण हेतु वैज्ञानिक रणनीति को अपनाना है। लगभग 47,000 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र का संरक्षण किया जाना है।
असल में पन्ना टाइगर रिजर्व का लगभग 25% हिस्सा केन-बेतवा लिंक परियोजना में डूबना तय है। जिसके चलते पन्ना टाइगर रिजर्व के वन्य जीवों का आशियाना भी उजड़ेगा , सरकार ने इसके प्रभावों की भरपाई और वन्य जीवों के संरक्षण हेतु आसपास के जिलों में नए वन, जल स्रोत, बाघ गलियारे और पुनर्वास केंद्र स्थापित करने के लिए यह योजना शुरू की है | जिसमे पन्ना में 3,000 से अधिक गिद्धों के संरक्षण के लिए विशेष क्लस्टर और पुनर्वास केंद्र बनाए जाएंगे। घड़ियालों की संख्या बढ़ाने के लिए जल स्रोत बनाए जाएंगे। इंटीग्रेटेड रिसर्च एन्ड लर्निंग सेंटर (IRLC) , जो निगरानी, डाटा संग्रह, अनुसंधान और प्रबंधन का कार्य करेगा।वही भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) जैसी संस्थाएँ इस योजना के वैज्ञानिक पक्ष को संभाल रही हैं, जो पुनर्वास कार्य को प्रभावी बनाने में मदद कर रही हैं।वन्यजीव आवास संरक्षण, मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने के लिए जागरुकता अभियान और प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाएंगे।
पन्ना नेशनल पार्क
पन्ना नेशनल पार्क पन्ना और छतरपुर जिला में 542.67 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला यह पार्क , बाघों और अन्य संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण का केंद्र है और भारत के जैविक धरोहर स्थलों में प्रमुख स्थान रखता है। केवल पर्यटन स्थल ही नहीं बल्कि मध्य भारत की पारिस्थितिकी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रकृति की धरोहर और पर्यावरण संरक्षण की गवाही देता पन्ना टाइगर रिजर्व यह न केवल अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है, बल्कि मध्य भारत में वन्यजीवों के लिए एक सुरक्षित जगह भी है।
इसे वर्ष 1994 में भारत के 22वें टाइगर रिजर्व और मध्य प्रदेश के पांचवें रिजर्व के रूप में घोषित किया गया।वर्ष 2007 में भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय द्वारा इसे भारत का सबसे अच्छी तरह से संरक्षित राष्ट्रीय उद्यान होने का एक्सीलेंस अवार्ड मिला।वर्ष 2011 में इसे बायोस्फीयर रिजर्व घोषित किया गया।
यह पार्क कई दुर्लभ और विलुप्तप्राय जीवों का प्राकृतिक निवास स्थान है।बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, क्योंकि पूर्व में यहां बाघों की पूरी तरह से समाप्ति हो गई थी, लेकिन सफल पुनर्स्थापन कार्यक्रम से आबादी बढ़ी है।तेंदुआ (Indian Leopard)स्लॉथ भालू (Sloth Bear)चीतल (Spotted Deer)चिंकारा (Indian Gazelleनीलगाय (Blue Bull)सांभर हिरण (Sambar Deer) की संख्या हजारों में है |
घड़ियाल और भारतीय पाइथन जैसी सरीसृप प्रजातियाँ भी केन नदी में पाई जाती हैं। ब्लॉसम-हेडेड पैराकीट, हॉक-ईगल जैसे अनेक पक्षी पक्षियों की प्रजातियाँ यहाँ पाई जाती हैं |
वन संरक्षण और विस्तार
योजना से सरकार को भरोसा है कि ग्रेटर पन्ना योजना के तहत पन्ना टाइगर रिजर्व और आसपास के क्षेत्रों में बाघ आवास क्षेत्र में लगभग 22% की वृद्धि होगी । नौरादेही, दुर्गावती, और रानीपुर अभयारण्यों के बीच वन गलियारों का विकास होगा, जिससे वन्यजीवों का सुरक्षित आवागमन संभव होगा और मानव-वन्य जीव विवाद घटेगा। जल स्रोतों का संरक्षण भी किया जाएगा ताकि वन्य जीवों को आवश्यक जल प्राप्त हो सके।योजना में लगभग 47,000 वर्ग किलोमीटर (4.7 लाख हेक्टेयर) क्षेत्र वन्यजीव संरक्षण में शामिल है, जिसमें नए वन बनाए जाएंगे और वनीकरण किया जाएगा। यह वन विस्तार कार्यक्रम बुंदेलखंड के प्रमुख जिलों जैसे पन्ना, सतना, टीकमगढ़, छतरपुर, दमोह, सागर, रीवा, कटनी, बांदा, चित्रकूट और ललितपुर में केंद्रित रहेगा।
यह योजना बुंदेलखंड के भविष्य के लिए एक नए युग की शुरुआत मानी जा रही है, जहां विकास और संरक्षण दोनों सामंजस्य से आगे बढ़ेंगे।हालंकि केन-बेतवा लिंक परियोजना बाघ और घड़ियाल जैसे संवेदनशील प्रजातियों के लिए जोखिम भरी है, लेकिन संरक्षण प्रयासों के जरिए इन खतरों को कम करने की योजना बनाई गई है। वन्यजीव आवासों की सुरक्षा, पुनर्वास केंद्र और गलियारों के विकास के माध्यम से इन नुकसान को संतुलित करने की कोशिश की जा रही है।वन्यजीव संरक्षण के लिए नौरादेही, दुर्गावती और रानीपुर अभयारण्यों के बीच कनेक्टिविटी बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि बाघ और अन्य प्रजातियों के आवागमन में बाधा न आए। सारी योजना पर भारत वन्यजीव संस्थान ने परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव का गहन अध्ययन किया है, और ग्रेटर पन्ना लैंडस्केप के लिए एकीकृत प्रबंधन योजना बनाई है जिससे संभावित नुकसान को कम किया जा सके।
24 सितंबर, 2025
मध्य प्रदेश जहां कानून हुआ बेबस
मध्य प्रदेश जहां कानून हुआ बेबस
रवीन्द्र व्यास
छतरपुर // -भारत जैसे महान देश में संविधान और कानून सब के लिए समान है। पर यहाँ कुछ महान लोगों के द्वार पर क़ानून भी सलाम ठोककर लौट आता है। छतरपुर के राजनगर में 2023 चुनाव के दौरान ‘राजनीतिक रफ्तार’ इतनी तेज निकली कि कांग्रेस विधायक के ड्राइवर की जान ही ले गई , लेकिन उसी रफ्तार से पुलिस, प्रशासन और जांच कभी चल नहीं पाईं ।मामला है छतरपुर जिले के राजनगर सीट का। 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस विधायक के ड्राइवर सलमान खान की गाड़ी से कुचलकर हत्या हो गई थी। एफआईआर हुई, आरोप लगे, धारा 302, 307 समेत आधा दर्जन धाराओं का केस लगाया गया। लेकिन आरोपी कौन? जी हाँ, वही जो बाद में चुनाव जीतकर विधायक बन गए भाजपा के अरविंद पटेरिया।
राजनगर की जनता ने न्याय और अपराध का फ़ैसला चुनावी ईवीएम से किया, आरोपी कहे गए भाजपा प्रत्याशी अरविंद पटेरिया सीधे विधायक की कुर्सी पर जा पहुंचे। उधर सलमान की विधवा रजिया अली तमाम सरकारी दफ्तरों, दरबारों, सोन चिड़िया अभ्यारण जैसी हीरण सी भागती रहीं, पर न तो गिरफ्तारी हुई न ही न्याय की उम्मीद दिखी। आखिरकार, हारकर "न्यायालय" की चौखट पर आईं। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, अब तक गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई? सवाल है ऐसा, जिसका उत्तर खोजने के लिए गोमुख से संसद तक पैदल यात्रा करनी पड़े।
असल में यह घटनाक्रम 17 नवम्बर 2023 की रात से शुरू हुआ, रात में सलमान खान की हत्या वाहन से कुचल कर हो गई।18 नवम्बर को धरना, नारेबाजी, ज्ञापन दिए गए। 19 नवम्बर को जवाबी एफआईआर, एक-एक कर कई दिग्गज अभियुक्त बन गए । तीन दिसंबर को वही आरोपी चुनाव जीत गया, अब संविधान की शपथ! फिर शुरू हुआ जांच का खेल गाड़ियां जब्त, फोरेंसिक जांच, कागज-कागज, पत्राचार। फाइलों में जो आरोपी था अब उसी कुर्सी पर बैठा, जिस पर थाना प्रभारी की शिकायत धुँधली हो जाती हैं। सत्ता का कवच जांच का ढाल बन गया |
इतिहास गवाह है,जिसे सरकार सुरक्षा दे देती है, उसे कानून छू भी नहीं पाता। सुप्रीम कोर्ट नोटिस देता है, पुलिस स्टेटस रिपोर्ट बनाती है, आरोपी माननीय बनकर शपथ लेता है। पीड़ित परिवार नालायक़ समझौतावादी ठहरा दिया जाता है और जनहित में साधारण जनता को सलाह दी जाती है,आपका मामला पुलिस देख रही है |
संविधान और न्याय
मध्यप्रदेश में चुनाव नतीजे लोकतंत्र का उत्सव हैं, पर राजनगर हत्याकांड लोकतंत्र के इस मुखौटे की पहली दरार है जिसमें पीड़ित की झोली खाली और आरोपित की जैकेट वीआईपी होती है। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि डेढ़ साल में गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई? इसका जवाब विपक्ष के पास लोकतंत्र संकट में है, और प्रशासन के पास जांच चल रही है, से आगे कभी जाएगा भी नहीं।
जिस देश में विधायक शब्द ही सबसे बड़ा बेल बांड हो, वहाँ न्याय की आस रखना मासूमियत है। सलमान की मौत अगर वोटों से नहीं रुकी, तो समझ लीजिए कि भविष्य में कानून-सम्मानित अपराधी और अपराध ग्रस्त नागरिक दोनों बराबरी से चुनाव लड़ पाएंगे! यह पूरा मामला बताता है जांच भी कभी-कभी लोकतंत्र की तरह प्रतीकात्मक होती है। हर चुनावी जीत के बाद, लोकतंत्र का विजय-गीत गाया जाता है सत्ता की रफ्तार, कानून पर भारी! हमारे लोकतंत्र में चुनाव जीतना शायद सबसे बड़ा ‘क्लीन चिट’ है। सुरक्षा घेरा पाने के बाद गिरफ्तारी का डर तो वैसे ही खत्म हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट भी पूछ रही है “गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई?” लेकिन जवाब में शायद वही आएगा—“माय लॉर्ड, चुनाव लड़ना भी तो बहुत बड़ा संघर्ष है, क्या इसे सजा से कम माना जाए?”
Panna_जे के सीमेंट फैक्ट्री में मजदूर की मौत
जे के सीमेंट फैक्ट्री में मजदूर की मौत
23 सितंबर, 2025
पहचान खोते नौरता और मामुलिया
पहचान खोते नौरता और मामुलिया
रवीन्द्र व्यास
गुजरात का प्रसिद्ध गरबा नृत्य नवरात्रि के समय पूरे देश में अपनी संस्कृति का परिचय देता है| गरबा की तरह बुंदेलखंड की धरती पर नौरता और मामुलिया जैसे लोकोत्सव कभी बुंदेलखंड की लोक संस्कृति की पहचान थे | जो नवरात्रि के दिनों के ख़ास उत्सवों में सम्मलित थे | नवरात्रि के नौ दिन बुंदेलखंड के गाँव की चौपालों और शहरों में एक ऐसा रंग बिरंगा संसार बस जाता था जो हर किसी का मन मोह लेता था | जो संस्कार से रचे बसे होते , लोकचित्रों में बुन्देली गरिमा होती थी । कुवारी कन्याएँ एक साथ गीत संगीत, नृत्य चित्रकला और मूर्ति कला, साफ-सफाई संस्कारों से मिश्रित लोकोत्सव नौरता मनाती थी , आज गाँव के अधिकाँश चौपाल इस लोक संस्कृति से अछूते हैं तो शहरों में आधुनिकता का ऐसा नशा छाया कि नव पीढ़ी तो इसे जानती ही नहीं है |
दरअसल नौरता और मामुलिया केवल उत्सव नहीं हैं, और ना ही केवल नवरात्रि में खेले जाने वाला कन्याओं का एक खेल भर है, बल्कि लोकजीवन की गहराइयों से उपजी भावनाओं, भय और श्रद्धा का अनोखा संगम है। बेटियों के मन की लय, लोकजीवन की सच्चाई और आत्मा की झंकार हैं। इनमें भय भी है, आस्था भी है, खेल भी है और दर्शन भी। यही बुंदेली संस्कृति की खासियत है कि साधारण-सा लोकगीत भी जीवन और मृत्यु, सुख और दुख, स्त्रीत्व और मातृत्व की गहन कथा कह जाता है।
नौरता – भय और आस्था का संगम
अश्विन शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होते नौ दिनों की भोर जब ओस की बूंदों में चमकने लगती है, तो गांवों की चौपाल और नगरों के चबूतरे जीवंत रंगमंच बन जाते हैं। कुंवारी बेटियां गोबर-लिपे आँगन में रंग बिरंगे चौक सजाती हैं और मिट्टी से भयंकर दैत्याकार मूर्ति गढ़ती हैं, जिसे सुअटा कहते हैं। यह दानव रूप है, फिर भी पूजा में उसे बुलाया जाता है। लाल आंखें, विकृत चेहरा — किंतु बेटियों के हाथों में चना, ज्वार, रंगोली और गीतों की कोमलता उसके भयावह रूप को ढक देती है।लोकमान्यता है कि कन्याओं की गुहार सुनकर माँ गौरी ने उस भयानक भय, उस दानव का नाश किया। यह आश्वासन कन्याओं को हर वर्ष यह खेल दोहराने को प्रेरित करता है।
गीतों की गूंज —
"नारे सुअटा… गौरा देवी क्वांरे में नेहा तोरा..."
यह केवल गाना नहीं, बल्कि भय और विश्वास का संवाद है। लोक कथाओं के अनुसार यह दैत्य कन्याओं को निगल जाता है, इसलिए उससे बचाव की प्रार्थना मां गौरा से की जाती है। बेटियों की आस्था, उनकी निश्चल हंसी-ठिठोली, कदमों की थिरकन और चौक की रंगत—सब मिलकर लोक संस्कृति का एक अनोखा पुल बना देते हैं।
नौरता लोकदृष्टि का गहरा सत्य प्रकट करता है—जिस संकट को मिटा न सको, उसे आस्था और उत्सव से घेर लो। भय को भी खेल बना दो और देवी को उसमें आमंत्रित कर लो। यही बुंदेलखंड का लोक ज्ञान है, जो दैत्य को भी लोकमंगल के उत्सव में ढाल देता है।
मामुलिया – नारीत्व की मूर्ति
क्वांर मास के कृष्णपक्ष में बुंदेलखंड की रातें एक और अद्भुत लोक पर्व की साक्षी बनती हैं—मामुलिया। बेटियाँ बेरी की काटेदार डाल तोड़कर लाती हैं, उसे फूलों, फलों और मेवों से सजाती हैं। वह कांटेदार टहनी उनकी बहन, सखी और देवी का रूप ले लेती है। चौक रचकर, हल्दी और अक्षत से यह पूजन किया जाता है।
गीत गूंजता है —
"मामुलिया के आगये लिवउआ, झमक चली मोरी मामुलिया..."
यह गीत नारी जीवन का साक्षात दर्शन है—फूलों जैसी कोमलता, काँटों जैसी संघर्षशीलता और फलों जैसी सृजनशीलता। मामुलिया जीवन की क्षणभंगुरता और बेटियों की यात्रा का प्रतीक है। श्रृंगार से सजी लड़की की तरह वह डाल विधि-विधान से पूजी जाती है, और फिर उसके "लिवउआ" आ जाते हैं—जैसे कन्या का बिदा हो जाता है।
मामुलिया स्त्रीत्व का शाश्वत संदेश है—संस्कार, संघर्ष और उदारता का। इसमें बेटी, सखी और देवी—तीनों रूप समाहित हो जाते हैं। यही कारण है कि लोकमानस ने मामुलिया को देवी का स्वरूप माना।
भावनात्मक समन्वय
नौरता और मामुलिया दोनों की धुरी बेटियाँ ही बनती हैं। नौरता में वे सुअटा से रक्षा की प्रार्थना करती हैं और माँ गौरा को पुकारती हैं, तो मामुलिया में अपने जीवन-संसार की गहरी सच्चाई को रूपाकार देकर देवी के रूप में पूजती हैं।
ये उत्सव इस बात के साक्षी हैं कि बुंदेलखंड की लोक संस्कृति कितनी संवेदनशील और गहन है। भय को भी उत्सव बना लेना और जीवन को दर्शन में ढाल देना—यही बुंदेली संस्कृति का भावात्मक वैभव है।
नवरात्र के वे नौ दिन जब कन्याएँ संग-संग गीत गाती हैं, उसकी पुकार करती हैं, और आखिरी दिन उसकी “मरग” करती हैं — तो यह लोक का भावनात्मक नाटक है। भय का उल्लंघन है। असुर पर विजय का उत्सव है। और भोले गाँव का विश्वास है कि माँ गौरी सदा उनकी रक्षा करेंगी।
20 सितंबर, 2025
मोदी को खून से लिखी बधाई
बुंदेलखंड की डायरी
मोदी को खून से लिखी बधाई
रवीन्द्र व्यास
बुंदेलखंड के महोबा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 75वें जन्मदिन पर एक अनोखा नजारा देखने को मिला। बुंदेली समाज ने इस मौके को खास बनाने के लिए अपने खून से 75 पत्र लिखकर प्रधानमंत्री को बधाई दी। आल्हा चौक स्थित अंबेडकर पार्क में आयोजित कार्यक्रम में समाज के सदस्यों ने न केवल पत्र लिखे, बल्कि मिठाई और फल भी वितरित किए।
बुंदेली समाज के संयोजक तारा पाटकर कहते हैं कि यह छठवीं बार है जब उन्होंने प्रधानमंत्री को खून से खत लिखकर शुभकामनाएं भेजीं। उन्होंने कहा,चूंकि यह प्रधानमंत्री जी का 75वां जन्मदिन है, इसलिए हमने 75 खत लिखकर भेजे है। मोदी जी ने 2047 तक विकसित भारत का जो सपना दिया है, हम इसमें उनके साथ हैं।वे अब तक वह प्रधानमंत्री को 48 बार खून से खत लिख चुके हैं। उनका कहना है कि यह सिलसिला तब तक जारी रहेगा जब तक बुंदेलखंड को विशेष पैकेज, औद्योगिक विकास के लिए टैक्स-फ्री जोन और एम्स जैसी उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिलती। तारा पाटकर मानते हैं कि जब तक बुंदेलखंड पिछड़ा रहेगा, भारत का विकास अधूरा रहेगा, क्योंकि बुंदेलखंड भारत का दिल है।
परंपरा बनी प्रतीक
बुंदेली समाज ने इससे पहले भी प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर पांच बार खून से खत लिखे हैं। उनका मानना है कि यह अनोखा तरीका न सिर्फ सम्मान और शुभकामनाएं व्यक्त करता है, बल्कि उनकी भावनाओं और क्षेत्र की मांगों को सीधे सरकार तक पहुंचाने का प्रतीक भी है। तारा पाटकर ने अपना जीवन एक पत्रकार के रूप शुरू किया था , लखनऊ विश्वविद्यालय से एम् जे करने के बाद उन्होंने देश के प्रमुख समाचार पत्रों में काम किया | बुंदेलखंड की दुर्दशा देख कर उन्होंने महोबा से अपना नया अभियान शुरू किया |
दरअसल बुंदेलखंड क्षेत्र उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच विभाजित है, जिससे प्रशासनिक नियंत्रण और विकास योजनाओं में असंतुलन बना रहता है | स्वतंत्र भारत में 1956 तक बुंदेलखंड एक अलग प्रशासनिक इकाई रहा, जिसे राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर विभाजित कर दिया गया | बुंदेलखंड को अलग राज्य बनाये जाने की मांग हालांकि काफी पुरानी है पर १९८० के दशक से इसने जोर पकड़ा, एमपी की अपेक्षा यूपी में यह मांग ज्यादा प्रबल है |
बुंदेलखंड अलग राज्य की मांग के पीछे मांग करने वालों के तर्क हैं कि क्षेत्र में बेरोजगारी और संसाधनों की कमी के कारण लोगों का बड़े शहरों की ओर पलायन लगातार बढ़ा है, जो सामाजिक-आर्थिक संकट को बढ़ावा देता है। अलग राज्य बनने से स्थानीय स्तर पर योजनाओं का क्रियान्वयन बेहतर होगा। बड़े राज्यों में बुंदेलखंड की राजनीतिक ताकत कमजोर रह गई है, जिससे यहां के मुद्दे आम जनमानस तक प्रभावी रूप से नहीं पहुंच पाते। अलग राज्य राजनीतिक आवाज़ को सशक्त करेगा। क्षेत्र की विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत और बोली को संरक्षित करने के लिए स्थानीय प्रशासनिक इकाई की आवश्यकता को प्रमुख तर्क माना जाता है।
देश में हरियाणा, हिमाचल, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, झारखंड जैसे छोटे राज्य बन चुके हैं। बुंदेलखंड के लिए भी यही तर्क दिया जाता है कि अलग राज्य बनने पर क्षेत्रीय भाषा, संस्कृति, और स्थानीय प्रशासन को बढ़ावा मिलेगा | अलग राज्य के समर्थक मानते हैं कि राष्ट्रीय दलों की घोषणा-पत्र में मांग रह-रहकर उठती है, पर सत्ता में आने के बाद प्राथमिकता नहीं दी जाती | क्षेत्रीय पार्टियां और विधायक बार-बार सदन में यह विषय भी उठाते रहे हैं|
डिस्टलरी से फैला जल-जहर
छतरपुर ज़िले के नौगांव कस्बे और उसके आसपास बसे गांवों में बीते कुछ महीनों से एक असहनीय माहौल बना हुआ है। जैसे ही सूरज ढलता है, हवा में घुली बदबू और ज़हर लोगों का जीना दूभर कर देता है। यह बदबू किसी प्राकृतिक स्रोत से नहीं, बल्कि नौगांव स्थित कॉक्स इंडिया डिस्टलरी से निकलने वाले अपशिष्ट से आ रही है।
बदबू और बीमारी का गाँव
नौगांव से लेकर चंद्रपुर, शिकारपुरा, चांदोरा, दोरिया, खम्मा, रावतपुरा और धवर्रा — लगभग आधा दर्जन से अधिक गांव अब इस फैक्ट्री के असर से कराह रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि सुबह-शाम तो स्थिति और भी भयावह हो जाती है।घरों के आँगन में बैठना मुश्किल।बच्चों का पढ़ाई पर ध्यान नहीं लगना।बुज़ुर्गों को आंखों से पानी, सिरदर्द और सांस लेने में तकलीफ।जितनी गहरी बदबू है, उतनी ही गहरी चिंता भी लोगों के मन में बैठ चुकी है।
पानी जो जीवन नहीं, मौत देता है
कॉक्स डिस्टलरी से निकलने वाला केमिकलयुक्त पानी पास की सीलप नदी और खुले नालों में डाला जा रहा है। एक किलोमीटर का जलस्रोत पूरी तरह प्रदूषित हो चुका है। कुएं, हैंडपंप, यहां तक कि ट्यूबवेल तक दूषित हो गए हैं। स्थिति यह है कि लोग कहते हैं, “अब तो नहाने के बाद भी शरीर से बदबू आती है।किसानों के खेत बर्बाद हो रहे हैं। फसलें सूख रही हैं। मवेशी बीमार होकर गिर रहे हैं। किसान नरेंद्र यादव कहते हैं, इस पानी से सिंचाई कर देंगे तो फसल पलभर में जल जाती है।
नौगांव स्वास्थ्य विभाग के बीएमओ का भी कहना है कि दूषित जल से किडनी की बीमारी और दीर्घकालिक स्वास्थ्य संकट बढ़ रहा है। गरीब मजदूर वर्ग और महिलाएं इसका सबसे बड़ा शिकार हैं।
संगठनों का प्रतिरोध और प्रशासन की सक्रियता
इस संकट पर राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने भी आवाज़ बुलंद की। भाजपा मंडल अध्यक्ष गजेंद्र सोनकिया से लेकर कांग्रेस नगर अध्यक्ष कुलदीप यादव तक कई नेताओं ने ज्ञापन देकर कार्रवाई की मांग की। यहां तक कि केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र खटीक को भी रास्ते में रोककर निवेदन किया गया।
जनदबाव बढ़ने पर प्रशासन हरकत में आया। एसडीएम, तहसीलदार और एसडीओपी मौके पर पहुंचे, निरीक्षण किया और जांच का आश्वासन दिया। लेकिन, गांवों में लोगों का भरोसा इतना कमजोर हो चुका है कि वे इसे केवल औपचारिकता मानते हैं।
कानून और कागज़ बनाम जमीनी सच
पिछले आठ साल से नियम कह रहे हैं कि फैक्ट्री की 33% ज़मीन ग्रीन बेल्ट में बदलनी चाहिए थी। लेकिन ग्रामीण दिखाते हैं उस बंजर ज़मीन को, जहां न एक पौधा है और न कोई हरियाली। आठ साल में ग्रीन जोन बस कागजी दस्तावेजों पर ही पोषित होता रहा।
एक सवाल, कई जवाब
फैक्ट्री की मौजूदगी अब सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन का सवाल बन गई है।क्या ग्रामीणों की आवाज़ इस बार सुनी जाएगी?क्या प्रशासन सचमुच कड़ी कार्रवाई करेगा या फिर मामला फाइलों में दब जाएगा?और सबसे अहम – क्या हमारी नदियाँ और ज़मीनें कभी इस जहरीले असर से मुक्त हो पाएंगी?
नौगांव का यह संकट किसी एक फैक्ट्री तक सीमित नहीं है। यह उस मॉडल का आईना है, जहां उद्योग के नाम पर गांव का जीवन, खेत की मिट्टी और बच्चों का भविष्य दांव पर लगा दिया जाता है। यह कहानी चेतावनी है – अगर समय रहते कदम न उठे तो जहरीला पानी सिर्फ गांवों में ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों की रगों में भी उतर जाएगा।
13 सितंबर, 2025
एक गाँव जहाँ पसरा है मौत का खौफ
बुंदेलखंड की डायरी
एक गाँव जहाँ पसरा है मौत का खौफ
रवीन्द्र व्यास
बुंदेलखंड में विकास, प्रशासन और सामाजिक विषयों को लेकर कई महत्वपूर्ण घटनाएं सामने आईं, जिनसे जिले का प्रशासनिक और जनजीवन दोनों प्रभावित हो रहे हैं। इसी इलाके के छतरपुर जिले का एक गांव है जहां ग्रामीण मौत के खौफ से भय भीत है | नरयावली क्षेत्र में विकास कार्यों में तेजी और मुख्यमंत्री के समर्थन से उम्मीदें बढ़ी हैं, वहीं प्रशासनिक टकराव, कर्मचारियों की समस्याएं और शैक्षिक संस्थानों की चुनौतियां प्रगति में बाधा बन रही हैं। इन मामलों के समाधान के लिए समन्वित प्रयास और पारदर्शिता जरूरी तो हैं पर उनका अभाव देखने को मिल रहा है |
भय और बेबसी की जिंदगी
गाँव में ४० लोगों की कैंसर से मौत
गांव की आबोहवा आमतौर पर शुद्ध मानी जाती है , लेकिन छतरपुर जिले के मढ़ा गांव में शुद्ध हवा में भी हादसों और आंसुओं की कहानी सुनने को मिलती है। जिले के लवकुशनगर ब्लॉक के मढ़ा ग्राम पंचायत में ग्रामीण पिछले चार दशकों से दहशत के साए में जी रहे हैं | यहां 1980 से अब तक लगातार कैंसर के मरीज सामने आते रहे हैं और अब तक गांव के करीब 40 लोग कैंसर से जान गंवा चुके हैं।
1980 में पहली बार गांव में कैंसर का मामला सामने आया, जब दयाराम की मां इस बीमारी से पीड़ित हुई थीं।तब से हर साल एक न एक नया मामला सामने आता रहा है। उमाशंकर पटेल के परिवार के लगभग 10 लोग अब तक कैंसर से अपनी जान गंवा चुके हैं।वर्तमान में भी कुसुम रानी पटेल कैंसर से जूझ रही हैं और भोपाल में उनका इलाज चल रहा है।
हर उम्र के लोग चाहे वे जवान हों अथवा अधेड़ या बुजुर्ग इसकी चपेट में आ चुके हैं। इन परिवारों को इलाज के लिए जमीन-जायदाद और जेवर तक बेचना पड़ा, लेकिन कोई भी मरीज अब तक नहीं बच सका।गांव के बुजुर्ग लड़का बिटिया की शादी को लेकर भी चिंतित हैं, क्योंकि लोग इस गांव से रिश्तेदारी करने से कतराने लगे हैं।
ग्रामीणों का मानना है कि गांव के पानी या मिट्टी में कोई ऐसा जहर या तत्व है जो कैंसर को जन्म दे रहा है।पास के गांव रनमऊ, देवपुर, गुढ़ा और मुंडेरी में एक भी कैंसर का केस सामने नहीं आया है। इसी के चलते ग्रामीण अब गांव की प्राकृतिक स्थिति को जिम्मेदार मानने लगे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि पानी और मिट्टी का वैज्ञानिक परीक्षण कराया जाए।बीमारी के कारण और स्रोत का पता लगाया जाए।सरकार-प्रशासन तत्काल हस्तक्षेप कर लोगों को उपचार व रोकथाम की दिशा में ठोस कदम उठाए।अगर समय पर समाधान न हुआ, तो ग्रामीण गांव छोड़ने को मजबूर हो जाएंगे।
स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन को गाँव के इन हालातों की भनक तक नहीं है | लवकुश नगर के बीएमओ इस मामले की जानकारी अब जिला में पहुंचाएंगे और जिला से जैसा मार्गदर्शन मिलेगा उस पर कार्यवाही करेंगे |
विकास कार्यों में प्रशासनिक टकराव
सागर में स्मार्ट सिटी के विकास कार्यों को लेकर कलेक्टर संदीप जी आर और नगर निगम कमिश्नर राजकुमार खत्री के बीच शीत युद्ध जारी है। दोनों अधिकारियों के बीच कार्यों के ठेकों और निर्णय प्रक्रिया में मतभेद सामने आ रहे हैं | कलेक्टर ने निगम कमिश्नर को नोटिस भी जारी किया है, जबकि निगम कमिश्नर के खिलाफ भोपाल लोकायुक्त में आधा दर्जन से अधिक शिकायतें भी जांच के दायरे में हैं। स्थानीय राजनेताओं का मानना है कि प्रशासनिक तालमेल ना होने से विकास की गति प्रभावित हो रही है |
वैश्विक समस्याओं का समाधान सनातन दर्शन के पास
आज के वैश्विक संकटों का समाधान भारतीय सनातन दर्शन में निहित है, यह मूल सन्देश सागर के पद्माकर सभागार में आयोजित युवा संवाद में निकलकर सामने आया | ‘‘वैश्विक चुनौतियों का समाधान और भारत का दृष्टिकोण’’ विषय पर युवा संवाद आयोजित हुआ यह कार्यक्रम सामाजिक जिम्मेदारी की महत्वपूर्ण कड़ी मानी जा रही है | स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक शिकागो संदेश की 132वीं वर्षगांठ पर युवाओं, विचारकों और शिक्षाविदों ने मिलकर समाज व युवा पीढ़ी को सकारात्मक संदेश देने का प्रयास किया |
पूज्य श्री समर्थ दादा गुरू ने अपने विचारों से युवाओं में नवजागृति पैदा करते हुए समझाया कि ‘‘संस्कृति प्रकृति प्रधान है—वैश्विक चुनौतियों का समाधान भारतीय दर्शन ही प्रस्तुत करता है। अपने अस्तित्व, माटी और संस्कृति से जुड़ा युवा ही समाज को जागृत कर सकता है। आज बुंदेलखंड का युवा ऐसे गंभीर विषय पर संवाद कर रहा है। जो अपनी माटी और संस्कृति के निकट है उसके अस्तित्व को कोई चुनौती नहीं दे सकता। यह चिंतन समाज का संदेश हो जाये, एक सार्थकता हो जाये। हमारा देश जिसे देवधरा भारत कहते है, उसकी तरफ सारी दुनिया देख रही है कि आखिर ऐसी कौन सी शक्तियां है, जो इन भयावह आपदाओं के दौर में भी भयमुक्त जीवन जी रहे हैं, बड़े आनंद के साथ रहते हैं। हम विश्व को परिवार मानते हैं और परिवार के कल्याण की भावना सिर्फ हमारे भारतीय सनातन दर्शन में है। केवल भारत ही ऐसा देश है जहां यह बोला जाता है कि धर्म की जय हो, विश्व का कल्याण हो। भारत की संस्कृति जीवन को बनाने की मिसाइल है। दुनिया में ऐसी कौन सी परम्परा और दर्शन है जो माटी को पूजता है। हमें गर्व है कि हम माटी का वंदन करते हैं माटी को माँ कहते हैं।
कार्यक्रम के अध्यक्ष रानी अवंती बाई विश्वविद्यालय के कुलगुरु विनोद मिश्रा ,युवा थिंकर्स फोरम के निदेशक आशुतोष सिंह, युवा चिंतक अविराज भूपेन्द्र सिंह ने अपने विचारों की एक नव जागृति पैदा की उनके सहित क्षेत्र के प्रबुद्ध वर्ग और युवा छात्र-छात्राओं ने भाग लिया |
सुनो सरकार
मध्य प्रदेश पंचायत सचिव संगठन ने गुरुवार को सागर में मंत्री गोविंद सिंह राजपूत के निवास पर अपनी मांगों के समाधान हेतु पांच सूत्री ज्ञापन सौंपा। मंत्री राजपूत ने सचिवों की ग्रामीण विकास में भूमिका को "रीढ़" बताते हुए समस्याओं को शासन स्तर पर शीघ्र निराकरण का आश्वासन दिया।
दरअसल मंत्री जी अपने सागर के निज निवास मातेश्वरी पर जनसुनवाई करते हैं | गुरूवार को संगठन के जिला अध्यक्ष जगन्नाथ प्रसाद गौर ने ज्ञापन सौंपते हुए कहा कि पंचायत सचिव पूरी ईमानदारी एवं निष्ठा से शासन-प्रशासन की योजनाओं को अंतिम छोर तक पहुंचाते हैं | हमारी वर्षो पुरानी मांग है कि सचिवों के लिए आयुष्मान कार्ड योजना का शीघ्र लाभ,(कार्ड योजना संबंधी आदेश 2023 में जारी हुए थे) समयमान वेतनमान एवं वेतन संशोधन, अन्य कर्मचारियों के समान सुविधाएं, और लोक कल्याणकारी योजनाओं में सचिवों की भागीदारी सुनिश्चित करना शामिल है।
मंत्री जी ने सचिव संगठन को विश्वास दिलाया कि सभी जायज़ मांगों का उचित निराकरण शासन स्तर पर किया जाएगा |
108 एम्बुलेंस चालक का आत्मदाह प्रयास
सागर में जनसुनवाई के दौरान 108 एम्बुलेंस के ड्राइवर अभय राज ने ड्यूटी न मिलने और वेतन न मिलने से परेशान होकर आत्मदाह का प्रयास किया। पुलिसकर्मियों ने समय रहते उसे रोका। मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर ने उच्च स्तरीय जांच के आदेश दे दिए हैं। ड्राइवर ने अधिकारियों पर रिश्वत मांगने और मानसिक प्रताड़ना का आरोप लगाया है,|
नरयावली में विकास के नए आयाम
नरयावली विधानसभा क्षेत्र के विधायक इंजी. प्रदीप लारिया ने भोपाल में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से क्षेत्र के पेयजल आपूर्ति स्थायी परियोजनाओं, सड़क मार्गों के निर्माण और मजबूतीकरण, शैक्षिक संस्थानों के उन्नयन की मांग की। मुख्यमंत्री ने इन विकास कार्यों को शीघ्र स्वीकृति देने का आश्वासन दिया है। इसी क्षेत्र में शासकीय महाविद्यालय के नए भवन निर्माण का शुभारंभ हो चुका है, जो उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नरयावली के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। इसके साथ ही फ्लाईओवर निर्माण की भी योजना है जो ट्रैफिक समस्या को कम करेगी।
07 सितंबर, 2025
बुंदेलखंड: 21वीं सदी में भी 18वीं सदी जैसे हालात, नेताओं की सियासत और विवाद बने सुर्खियाँ
बुंदेलखंड की डायरी
बुंदेलखंड: 21वीं सदी में भी 18वीं सदी जैसे हालात, नेताओं की सियासत और विवाद बने सुर्खियाँ
रवीन्द्र व्यास
देश जहाँ 21वीं सदी की तरक्की की ओर बढ़ रहा है, वहीं बुंदेलखंड में कई घटनाएं ऐसी सामने आ रही हैं, जो यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि यहाँ कुछ लोग अब भी 18वीं सदी जैसी मानसिकता में जी रहे हैं। बुंदेलखंड की राजनीति और समाज इन दिनों लगातार विरोधाभास की तस्वीर पेश कर रहे हैं। एक ओर धार्मिक धाम और उत्सव विकास की छवि दे रहे हैं, तो दूसरी ओर जातिगत हिंसा, दल-बदल और सांप्रदायिक तनाव समाज को पीछे खींच रहे हैं।
जातिगत तनाव: दलित युवक की पिटाई
निवाड़ी जिले के कंचनपुर गांव से चिंता बढ़ाने वाला मामला सामने आया। यहाँ एक दलित युवक अनुज खंगार ने इंस्टाग्राम पर अपने नाम के साथ "राजा" लिख दिया। इस छोटे-से कदम पर गाँव के कथित ‘राज पुत्र’ बिफर गए और युवक को इतना पीटा कि उसकी हड्डी तक टूट गई। धमकियों के बावजूद युवक ने साहस दिखाते हुए थाने में शिकायत दर्ज कराई और एसपी से न्याय भी माँगा। यह घटना आज भी उस सामाजिक मानसिकता को उजागर करती है, जो सदियों पहले की सामंती व्यवस्था में देखने को मिलती थी।
दल-बदल विवाद: बीना विधायक निर्मला सप्रे पर संकट
सागर जिले की बीना से कांग्रेस विधायक चुनी गईं निर्मला सप्रे 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान अचानक भाजपा खेमे में चली गईं। बिना इस्तीफा दिए सत्तारूढ़ दल से नज़दीकी बढ़ाना उनके लिए राजनीतिक संकट का कारण बना।संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दल-बदल विरोधी प्रावधानों का उल्लंघन मानते हुए नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार द्वारा सदस्यता रद्द करने का अनुरोध विधान सभा अध्यक्ष से किया गया था |संविधान के अनुसार अध्यक्ष को ९० दिन के अंदर निर्णय लेना होता है ,जब लोकतांत्रिक पीठ से न्याय नहीं मिला तो उन्होंने याचिका इंदौर हाईकोर्ट में दायर की थी,| नेता प्रतिपक्ष की याचिका को क्षेत्राधिकार के आधार पर खारिज कर दिया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला जबलपुर खंडपीठ के अधिकार क्षेत्र में आता है। न्याय पीठ की ये तकनीकी अड़चन न्यायिक प्रक्रिया को लंबा खींचती है और दल-बदल जैसे गंभीर मुद्दे को ठोस निर्णय से वंचित रखती है।
हेमंत खंडेलवाल के भारतीय जनता पार्टी के नए प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद वे उनसे मिलने भोपाल पहुंची | हालांकि उनकी यह मुलाकात ऐसे ही नहीं हुई थी , इसके पीछे बड़ा करना बीना के बीजेपी कार्यकर्ताओं की नाराजगी प्रमुख वजह बताई गई थी । असल में बीना और सागर के कार्यकर्ता यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि वह बीजेपी के साथ हैं अथवा कांग्रेस के साथ | हालांकि उनके फेसबुक वाल से पता चलता है कि उनकी नजदीकियां बीजेपी से ज्यादा हैं | विधायक होने के बावजूद सप्रे की पहचान 'राजनीतिक शरणार्थी' जैसी बन रही है।दोनों पार्टियों के बीच लटकी रहने से उनकी विश्वसनीयता पर असर पड़ रहा है। अब यदि भाजपा ने स्वीकार नहीं किया और कांग्रेस से तिरस्कार जारी रहा, तो उन्हें स्वतंत्र विकल्प चुनना पड़ सकता है या किसी अन्य छोटे दल का सहारा लेना पड़ सकता है।असमंजस की स्थिति में रहने से उनकी साख तो खत्म हो ही रही है , स्थानीय स्तर पर उनके समर्थक और भाजपा के लोग उनसे दूरी बनाए हुए हैं |
धार्मिक रंग में सियासत: ललिता यादव का आयोजन
छतरपुर में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव और मटकी फोड़ समारोह का आयोजन हुआ, जिसकी अगुवाई विधायक और पूर्व मंत्री ललिता यादव ने की। मंच पर मुख्यमंत्री मोहन यादव की मौजूदगी ने इस आयोजन को खासा राजनीतिक बना दिया। कहा जाने लगा कि यह कार्यक्रम धार्मिक कम और यादव समाज का शक्ति प्रदर्शन अधिक रहा। मुख्यमंत्री ने हालांकि मंच से साफ संदेश दिया कि श्रीकृष्ण किसी एक जाति या समाज के नहीं, बल्कि पूरे समाज के आराध्य हैं।
श्रीकृष्ण धाम का भूमि-पूजन
अपने दौरे के दौरान मुख्यमंत्री ने नौगांव रोड पर बनने वाले श्रीकृष्ण धाम का भूमि-पूजन किया। लगभग 2.20 करोड़ की लागत से बनने वाला यह धाम श्रद्धालुओं के लिए बड़ा स्थल होगा।
यहाँ कृष्ण जन्म से लेकर रासलीला तक की झलकियां दिखाई जाएंगी, बेटी विवाह वाटिका बनाई जाएगी और ध्यान
केंद्र भी स्थापित किया जाएगा।
देवरी पालिका अध्यक्ष को राहत
सागर की देवरी नगर पालिका अध्यक्ष नेहा अल्केश जैन को हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली। उन पर वित्तीय अनियमितताओं और गबन के आरोप लगे थे, लेकिन अदालत ने कहा कि सिर्फ संदेह किसी निर्वाचित प्रतिनिधि को हटाने का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने उन्हें पद पर बने रहने का आदेश दिया है। राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि इस विवाद के पीछे स्थानीय विधायक ब्रज बिहारी पटेरिया और भाजपा के अंदरूनी मतभेद बड़ी वजह बने।
सांप्रदायिक तनाव: ‘सर तन से जुदा’ विवाद
सागर शहर में ईद-ए-मिलाद के जुलूस के दौरान ‘सर तन से जुदा’ जैसी नारेबाजी होने से माहौल बिगड़ गया। वीडियो वायरल होने के बाद हिंदू संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई और आरोपियों पर एफआईआर की मांग की। पुलिस अब वीडियो के आधार पर पहचान कर रही है।
यह विवाद उस इलाके में हुआ जिसे शहर का संवेदनशील केंद्र माना जाता है। जनसंख्या आंकड़ों में मुस्लिम समाज की बढ़ती संख्या को लेकर फैली आशंकाओं ने भी तनाव को हवा दी।
कबड्डी मैच पर राजनीति
निवाड़ी जिले में लड़के-लड़कियों की संयुक्त टीम का कबड्डी मैच हुआ, जिसे लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। भाजपा ने इसे खेल भावना का प्रतीक बताया, जबकि कांग्रेस ने इसे भारतीय संस्कृति के विरुद्ध ठहराया।
नियमों की स्पष्टता के अभाव में यह विवाद और बढ़ गया और खेल भी राजनीतिक खींचतान का हिस्सा बन गया।
बुंदेलखंड की राजनीति और समाज इन दिनों लगातार विरोधाभास की तस्वीर पेश कर रहे हैं। एक ओर धार्मिक धाम और उत्सव विकास की छवि दे रहे हैं, तो दूसरी ओर जातिगत हिंसा, दल-बदल और सांप्रदायिक तनाव समाज को पीछे खींच रहे हैं।
विकास की उमंग और चुनौतियों के संघर्ष का बुंदेलखंड
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