24 अगस्त, 2025

बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं

 बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं 

रवीन्द्र व्यास 

  विश्व में इन दिनों मानवीय और   प्राकृतिक आपदाओं का दौर जारी है , जो ना  केवल पर्यावरण को ही नहींबल्कि समाज की नींव को भी हिला रही  हैं। भारत ही नहीं दुनिया भर के देश   बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहे हैं , सिर्फ  जलवायु परिवर्तन के कारण नहीं हैं , बल्कि इसके लिए दोषी  मानवीय गलतियां भी प्रमुख तौर  पर जिम्मेदार हैं जिनके  कारण प्राकृतिक आपदाओं की घटनाओं में वृद्धि हो रही हैं | मामला चाहे जंगलों में लगती आग हो , ज्वाला मुखी विस्फोट ,चक्रवात और तूफ़ान ,बाढ़ और भारी वर्षा ,हिमखंड पिघल रहे हैं , समुद्र का तापमान बाद रहा है और आये दिन भूकंप की घटनाएं बढ़ रही हैं | 

                                                                 भारतीय दर्शन में प्रकृति की अवधारणा अत्यंत गहन और महत्वपूर्ण है। सामान्य लोक में 'प्रकृतिशब्द का प्रयोग अक्सर 'नेचरया 'एनर्जीके अर्थ मेंकिया जाता हैकिंतु शास्त्रीय दृष्टि से यह परिभाषा अधूरी  है। वस्तुतः प्रकृति  मूलभूत जड़ तत्व हैजिससे यह सम्पूर्ण जगत निर्मित होता है जो  परिवर्तनशील और नश्वर मानी जाती  है। जो  प्रकृति स्वयं के लिए नहींबल्कि जीवों के भोग हेतु कार्य करती है उसके साथ ही मानव का व्यवहार क्या किसी से छिपा है |  भारत ही दुनिया का ऐसा देश है जहाँ  पृथ्वीजलवायुअग्नि आदि जड़ देवताओं की पूजा को पूजा जाता है | इसके पीछे की छिपी अवधारणा को अगर हम समझे तो लोगों को यह बताना कि  अगर जीवन चाहिए तो उनका  सदुपयोग और संरक्षण करते रहें | आज के दौर में मानव प्रकृति  के विनाश में जुटा है , अब अगर आप किसी का विनाश करेंगे तो वह भी बदला तो लेगा ही |  


 बड़े प्राकृतिक संकट

बाढ़चक्रवातबादल फटनासूखाभूस्खलनलू जैसी आपदाएं हालिया वर्षों में तेजी से बढ़ी हैं। भारत में ही 2025 के अगस्त महीने में जम्मू-कश्मीरउत्तराखंड जैसे इलाकों में बादल फटनेभूस्खलन व बाढ़ से दर्जनों जानें जा चुकी हैं। साल 2025 में अब तक हाइड्रो-मौसमी आपदाओं में 1600 से अधिक लोगों की मौत हुई है।अत्यधिक हीटवेवसमुद्र-जलस्तर में वृद्धिहिमालय के हिमनद का तेजी से पिघलनावनाग्निजैव विविधता का क्षरणजल संकटभूकंप का खतरा ये सब भारत समेत पूरी दुनिया के सामने गंभीर संकट हैं।अकेले 2025 की पहली छमाही में दुनियाभर में प्राकृतिक आपदाओं से 135 अरब डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ है।

वैज्ञानिकों और ज्योतिषियों की बात 

वैज्ञानिक और पर्यावरणविद मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन अनियोजित शहरीकरणपेड़ों की कटाईगलत जल प्रबंधनऔर जनसंख्या वृद्धि ये प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता और  संख्या  को बढ़ा रहे हैं। इसरो  जैसे संस्थानों की रिपोर्ट  को माने तो  बारिश का पैटर्न बदला हैबर्फ़ रहित सर्दियाँ व असमय लू जैसी समस्याएं गंभीर होती जा रही हैं।ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जनतापमान वृद्धि और उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषण से वातावरण का संतुलन प्रभावित हुआ है। नतीजतनमौसम अनिश्चितबेमौसम बरसातअचानक बाढ़लू और जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ रही हैं।

ज्योतिषियों की दृष्टि में  प्राकृतिक संकटों को ग्रह-नक्षत्रों की चालसूर्य-चंद्र ग्रहणया विशेष ग्रह योग के कारण यह स्थिति निर्मित हो रही है।बहुत से ज्योतिषाचार्य प्राकृतिक आपदाओं के लिए महादशासंक्रमण कालग्रहों की युति व राशि परिवर्तन को जिम्मेदार मानते हैं |  विज्ञान इसे भले ही नहीं माने किन्तु  जन  मानस और लोक  परंपरा में इन सब को बहुत ही गंभीरता से लिया जाता  है।

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