30 अगस्त, 2025

BKD_Talab_बुंदेलखंड में 4250 तालाब चोरी हो गए ?

 बुंदेलखंड की डायरी 

बुंदेलखंड में 4250 तालाब  चोरी हो गए ?

रवीन्द्र व्यास 



 बुंदेलखंड के सात जिलों के जिलाधिकारी इन दिनों गायब हुए तालाबों की खोज में जुटे हैं | तालाबों के गायब होने का ये सनसनीखेज मामला बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश वाले भू भाग से आया है |  इलाहाबाद हाई कोर्ट  के संज्ञान में आने के बाद  तालाबों के गायब होने का मामला उजागर हुआ | अब १७ सितम्बर २०२५ को हाई कोर्ट  सुनवाई करेगा | बुंदेलखंड और पानी का नाता एक दूसरे से जुड़ा हुआ है , ये वो इलाका है जो पानी की त्रासदी से सदियों से जूझ रहा है | असल में बुंदेलखंड चाहे उत्तर प्रदेश का हो अथवा मध्य प्रदेश का यहाँ  पानी ही है जो लोगों को भूखा मारता है ,आत्म ह्त्या   और पलायन के लिए मजबूर करता है

     बांदा के लुकतरा गांव में खोदे गए 42 तालाबों की सूची उन्हें दी गई। इसमें मौके पर ज्यादातर तालाब नदारद मिले। प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी ने अपने ‘मन की बात’ के 102वें एपीसोड में बांदा के लुकतरा  गांव का जिक्र करके प्रशंसा की थी। इस गाँव में ४२ तालाब बनाने की बात कही गई थी , जब इसकी जमीनी पड़ताल जब बांदा के समाजसेवी और पत्रकारों ने की तो उनमे से अधिकाँश गायब थे

 मामला कैसे उठा?

 मीडिया में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार बुंदेलखंड क्षेत्र में लगभग 4250 तालाब गायब हो चुके हैं | कोर्ट ने इसमुद्दे को स्वत: संज्ञान में लेकर जनहित याचिका दर्ज की है। अधिवक्ता प्रदीप कुमारसिंह और एस.सी. वर्मा को न्यायमित्र नियुक्त किया गया है ,ताकि वे मामले कीनिष्पक्ष जाँच करें।तालाबों के गायब होने के कारण कई क्षेत्रों में तालाबों की भूमि चकबंदी मेंआवंटित की जा चुकी है।अतिक्रमण के कारण तालाब सिकुड़ गए या पूरी तरह खत्म हो चुके हैं।कुछ तालाबों में कचरा और मलबा भर गया है , जिससे इनका अस्तित्व खतरे में है।जल संरक्षण योजनाओं के बावजूद कई पुराने तालाबोंको संरक्षण नहीं मिला।स्थानीय हालात और प्रशासनिक प्रयास कई गांवों में तालाब खोदने और जल संरक्षण मुहिम के बावजूद तालाबों की संख्या घट रही है।

 

तालाबों की खोज 

          ललितपुर और झांसी जिलों में तहसील स्तर पर भू-अधिपत्य विभाग के अधिकारी तालाबों का स्थलीय सर्वे कर रहे हैं।बुंदेलखंड के कई तालाब जो  कभी पेयजल  और सिंचाई का स्रोत थेअब अतिक्रमणकूड़ा-करकट और जल प्रदूषण के शिकार हो रहे हैं।बांदा जिला प्रशासन ने तालाबों के संरक्षण को लेकर अभियान चलाए हैंलेकिन पुराने तालाबों की बदहाली बनी हुई है।  इलाहाबाद हाई कोर्ट के संज्ञान और नोटिस के बाद उम्मीद की जा रही है कि जिला प्रशासन अपनी रिपोर्ट देकर इस संकट से निपटने के उपाय सुझाएगा तथा गायब तालाबों के पुनः संरक्षण व पुनर्निर्माण पर ज़ोर देगा।यह मामला बुंदेलखंड की जल संरक्षण और पारंपरिकजल स्रोतों की सुरक्षा के लिए एक गंभीर चेतावनी है। कोर्ट के आदेश ने स्थानीयप्रशासन और सरकार के सामने जल संचयन की ज़िम्मेदारी को और बढ़ा दिया है। 

बुंदेलखंड में गायब तालाबों की संख्या लगभग 4250 इस तरह आंकी गई थी:

 यह आंकड़ा मीडिया में प्रकाशित खबरों पर आधारित हैजिसमें बुंदेलखंड क्षेत्र के सात जिलों में तालाबों के तेजी से गायब होने की स्थिति बताई गई थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस रिपोर्ट का स्वत:संज्ञान लेकर जनहित याचिका दायर की। कोर्ट ने 1359 फसली वर्षसे लेकर पिछले 20 सालों तक के विस्तृत सर्वे कराने के आदेश दिए हैं। सर्वे के लिए  झांसीललितपुरबांदा,चित्रकूटमहोबाहमीरपुर और जालौन  जिलाधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे व्यक्तिगत हलफनामे में अपने-अपने जिलों में मौजूद और गायब तालाबों का विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत करें और गायब होने के कारणों की भी जानकारी दें। अभी तक का यह अनुमान पिछले रिकॉर्डग्रामीण और राजस्व अभिलेखोंसर्वे रिपोर्ट तथा स्थानीय शिकायतों के आधार पर स्थापित किया गया है। अदालत ने  संबंधित जिलाधिकारियों कोनोटिस जारी कर गंभीर जांच आदेश दिए  है ताकि सही और विस्तृत आंकड़े सामने आ सकें। 

संक्षेप मेंयह आंकड़ा स्थायीऔर सटीक सर्वे से नहींबल्कि मीडिया रिपोर्ट और पुराने रिकॉर्ड के आधार पर प्रारंभिक अनुमान के तौर पर सामने आया है, |।बुंदेलखंड में गायब तालाबों की संख्या 4250 के आंकड़े को लेकर अब तक उपलब्ध जानकारी में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला हैकि इस गिनती को किसी पूर्णतया स्वतंत्र टीम या संस्था ने क्रॉस-चेक किया हो।फिलहाल यह आंकड़ा एक औपचारिकसर्वे या स्वतंत्र जांच से वैरीफाई (क्रॉस-चेक) नहीं हुआ हैबल्कि कोर्ट के निर्देशानुसार अब इसे उचित तरीके से जांचा और पुष्ट किया जाएगा। 

तालाबों की व्यथा :  

तालाब कहीं के हो चाहे उत्तर प्रदेश वाले बुंदेलखंड के हो  अथवा मध्यप्रदेश वाले बुंदेलखंड के अथवा देश प्रदेश के किसी भी क्षेत्र के , इनका सृजन मानव ने किया और इनका विनाश करने में भी मानव पीछे नहीं है | बुंदेलखंड के एम् पी वाले इलाके से भी गायब होने वाले और सिकुड़ने वाले  तालाबों की संख्या सैकड़ों में नहीं हजार में है | पर इनका ना तो कोई विस्तृत लेखा जोखा है और ना किसी को चिंता है | शासकीय तंत्र और राजनैतिक तंत्र  जिस पर  देश गाँव की धरोहर बचाये रखने की जिम्मेदारी है वह भी इस विनाश प्रक्रिया में सहभागी बनी है | छतरपुर नगर में एक तालाब है किशोर सागर , इसे लोग पीडियों से जिस दिशा में देखते आये  तंत्र की कलाकारी से इसे उसके उलट दिशा में बताया जाने लगा ये कहानी सिर्फ छतरपुर तक सीमित नहीं है , हर नगर कसबे में इस तरह के हालात और कथाएं सुनने को मिल जाती हैं

                                असल में  बुंदेलखंड क्षेत्र में  तालाबों के महत्त्व को गौड़ और चंदेलकाल में बहुत अच्छे से समझ लिया गया था इसी कारण इस इलाके में हजारों की संख्या में तालाब बनाये गए , और उनसे निकली नहरें किसान के खेत तक पहुंची | इन तालाबों की इंजिनयरिंग देख कर आज के इजीनियर दांतो टेल ऊँगली दबा लेते हैं पर आधुनिक समाज ने तालाबों , कुओं ,बावड़ी को कूड़ा दान समझ लिया , उन्हें पाट  कर घर बना लिए |

24 अगस्त, 2025

बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं

 बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं 

रवीन्द्र व्यास 

  विश्व में इन दिनों मानवीय और   प्राकृतिक आपदाओं का दौर जारी है , जो ना  केवल पर्यावरण को ही नहींबल्कि समाज की नींव को भी हिला रही  हैं। भारत ही नहीं दुनिया भर के देश   बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहे हैं , सिर्फ  जलवायु परिवर्तन के कारण नहीं हैं , बल्कि इसके लिए दोषी  मानवीय गलतियां भी प्रमुख तौर  पर जिम्मेदार हैं जिनके  कारण प्राकृतिक आपदाओं की घटनाओं में वृद्धि हो रही हैं | मामला चाहे जंगलों में लगती आग हो , ज्वाला मुखी विस्फोट ,चक्रवात और तूफ़ान ,बाढ़ और भारी वर्षा ,हिमखंड पिघल रहे हैं , समुद्र का तापमान बाद रहा है और आये दिन भूकंप की घटनाएं बढ़ रही हैं | 

                                                                 भारतीय दर्शन में प्रकृति की अवधारणा अत्यंत गहन और महत्वपूर्ण है। सामान्य लोक में 'प्रकृतिशब्द का प्रयोग अक्सर 'नेचरया 'एनर्जीके अर्थ मेंकिया जाता हैकिंतु शास्त्रीय दृष्टि से यह परिभाषा अधूरी  है। वस्तुतः प्रकृति  मूलभूत जड़ तत्व हैजिससे यह सम्पूर्ण जगत निर्मित होता है जो  परिवर्तनशील और नश्वर मानी जाती  है। जो  प्रकृति स्वयं के लिए नहींबल्कि जीवों के भोग हेतु कार्य करती है उसके साथ ही मानव का व्यवहार क्या किसी से छिपा है |  भारत ही दुनिया का ऐसा देश है जहाँ  पृथ्वीजलवायुअग्नि आदि जड़ देवताओं की पूजा को पूजा जाता है | इसके पीछे की छिपी अवधारणा को अगर हम समझे तो लोगों को यह बताना कि  अगर जीवन चाहिए तो उनका  सदुपयोग और संरक्षण करते रहें | आज के दौर में मानव प्रकृति  के विनाश में जुटा है , अब अगर आप किसी का विनाश करेंगे तो वह भी बदला तो लेगा ही |  


 बड़े प्राकृतिक संकट

बाढ़चक्रवातबादल फटनासूखाभूस्खलनलू जैसी आपदाएं हालिया वर्षों में तेजी से बढ़ी हैं। भारत में ही 2025 के अगस्त महीने में जम्मू-कश्मीरउत्तराखंड जैसे इलाकों में बादल फटनेभूस्खलन व बाढ़ से दर्जनों जानें जा चुकी हैं। साल 2025 में अब तक हाइड्रो-मौसमी आपदाओं में 1600 से अधिक लोगों की मौत हुई है।अत्यधिक हीटवेवसमुद्र-जलस्तर में वृद्धिहिमालय के हिमनद का तेजी से पिघलनावनाग्निजैव विविधता का क्षरणजल संकटभूकंप का खतरा ये सब भारत समेत पूरी दुनिया के सामने गंभीर संकट हैं।अकेले 2025 की पहली छमाही में दुनियाभर में प्राकृतिक आपदाओं से 135 अरब डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ है।

वैज्ञानिकों और ज्योतिषियों की बात 

वैज्ञानिक और पर्यावरणविद मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन अनियोजित शहरीकरणपेड़ों की कटाईगलत जल प्रबंधनऔर जनसंख्या वृद्धि ये प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता और  संख्या  को बढ़ा रहे हैं। इसरो  जैसे संस्थानों की रिपोर्ट  को माने तो  बारिश का पैटर्न बदला हैबर्फ़ रहित सर्दियाँ व असमय लू जैसी समस्याएं गंभीर होती जा रही हैं।ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जनतापमान वृद्धि और उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषण से वातावरण का संतुलन प्रभावित हुआ है। नतीजतनमौसम अनिश्चितबेमौसम बरसातअचानक बाढ़लू और जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ रही हैं।

ज्योतिषियों की दृष्टि में  प्राकृतिक संकटों को ग्रह-नक्षत्रों की चालसूर्य-चंद्र ग्रहणया विशेष ग्रह योग के कारण यह स्थिति निर्मित हो रही है।बहुत से ज्योतिषाचार्य प्राकृतिक आपदाओं के लिए महादशासंक्रमण कालग्रहों की युति व राशि परिवर्तन को जिम्मेदार मानते हैं |  विज्ञान इसे भले ही नहीं माने किन्तु  जन  मानस और लोक  परंपरा में इन सब को बहुत ही गंभीरता से लिया जाता  है।

10 अगस्त, 2025

BKD_जब बारिश वरदान नहीं, अभिशाप बन गई — बुंदेलखंड की डूबती ज़मीन और टूटती ज़िंदगियाँ

 जब बारिश वरदान नहीं, अभिशाप बन गई बुंदेलखंड की डूबती ज़मीन और टूटती ज़िंदगियाँ

रवींद्र व्यास

अधिकांश समय अवर्षा और सूखा का सामना करने वाला बुंदेलखंड इन दिनों अत्याधिक वर्षा से बेहाल है | वर्षा ने पिछले सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं , बुंदेलखंड में बने बांध और तालाब लबालब हो गए हैं ,| बांधो के गेट भी खोले गए हालात तटवर्ती इलाकों में  जमीन का कटाव और लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा | खरीफ की फसल पुरे बुंदेलखंड इलाके में चौपट हो गई | हालांकि सरकार हर जिले में नुकशान का सर्वे कराने  में जुटी है | औसत वर्षा का आंकड़ा भी कई  जिले ने पूर्ण कर लिया है , कुछ जिले ऐसे भी जहाँ औसत से ज्यादा वर्षा सिर्फ १५ दिन में हो गई | दो दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत बाढ़ और वर्षा के दौरान बुंदेलखंड में हुई | बाढ़ बनाम जल त्रासदी के भौतिक और आर्थिक पक्ष को तो हर कोई देख रहा है ,पर इसके दूसरे पक्ष को नजरअंदाज किया जाता रहा है | 

"सारी फसल पानी में गल गई, अब बच्चों को क्या खिलाएंगे?"यह कहते हुए छतरपुर जिले के किसान गोविन्द के चेहरे पर नमी सिर्फ बारिश की नहीं थी, उसमें चिंता और बेबसी की धाराएँ भी थीं। कभी पानी की एक-एक बूंद को तरसने वाला बुंदेलखंड, इस बार पानी से त्रस्त है। ये कहानी अकेले गोविन्द की नहीं है बल्कि बुंदेलखंड के हर किसान के चेहरे पर इ ही बेबसी और निराशा देखने को मिल रही है |  

 खड़ी फसलें बिछी, उम्मीदें धंसी 

इस साल जुलाई और अगस्त में बुंदेलखंड के कई जिलों में सामान्य से  70 से 200  प्रतिशत अधिक वर्षा दर्ज की गई। बांदा, हमीरपुर, निवाड़ी ,टीकमगढ़ और छतरपुर आदि बुंदेलखंड के जिलों में यह पानी खेती के लिए वरदान नहीं बन पाया मक्का, मूंग, उड़द, तिल, मूंगफली जैसी खरीफ फसलें या तो बीज पड़ते ही गल गई, या पौधा बनते  ही मर गईं।|   | बुंदेलखंड की 78 फीसदी आबादी का अर्थ तंत्र खेती से चलता है , दशकों तक सूखे की मार झेलने वाला बुंदेलखंड के किसान इस बार अत्याधिक वर्षा से बेहाल हो गए हैं खरीफ की फसल  उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है , मक्का, ज्वार ,बाजरा ,मूंगफली तिल, मूंग,उड़द  की फसल चौपट हो गई है | इसके साथ ही बुंदेलखंड क्षेत्र में होने वाली पान की फसल को भी नुकसान पहुंचा है टीकमगढ़ की किसान रामसखी  कहती हैं —"हमने बीज कर्ज़ लेकर खरीदे थे। पहली बारिश में खेत बोए और दूसरी ही बारिश में बहा ले गई सब कुछ।" कर्ज लेकर बीज और खाद लेने वाले किसानों ने इस बार मानसून से अच्छी फसल की उम्मीद लगाई थी | वर्षा ऐसी मेहर बान हुई कि सारे सपने तबाह कर दिए | 

घर भी गिरे और उम्मीदें भी टूटी

, बाँध ,तालाब- नदी नाले उफान पर आए तो शहर और गांवों की गलियाँ गंधाती जलभराव से भर गईं।बारिश की मार सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रही।  बुंदेलखंड के हर जिले से  कच्चे घर गिरने के समाचार के साथ इससे होने वाली  मौतों की ख़बरें भी सामने आई हैं | लोगों के घरों में जब पानी भरा और गाँव जलमग्न हुए तो  कुछ लोगों की मौत तो सिर्फ इस कारण से हो गई क्योंकि उनके पास इलाज के लिए पहुँचने का रास्ता नहीं था | उलटी दस्त का प्रकोप बड़ा सो अलग से | बाढ़ और अति वृष्टि के कारण बुंदेलखंड के दो दर्जन से ज्यादा लोग असमय काल के गाल में समा गए | 

वर्षा का दौर 

बुंदेलखंड में 1982 और  1992 के बाद इतनी अधिक  बारिश देखने को मिली है , १९९२ में  बुंदेलखंड ने  बाढ़ का सामना तब किया था जब वर्षा का दौर लगभग  खत्म हो चुका था | सितम्बर माह में हुई बारिश ने  सैकड़ों घरो और गाँवों को नष्ट कर दिया था | इस बार की   भारी बारिश  मानसून के शुरुआत में ही आ गई | जिसने  ना सिर्फ घर खेत बर्बाद किये बल्कि  नदी ,तालाबों और बांधो के भराव क्षेत्र में बने घरों को भी नुकशान पहुंचाया  |  तालाबों के भराव क्षेत्र में आलीशान बाजार और मकान बन गए हैं, जो बारिश के पानी को रोकने या संग्रहित करने में विफल हैं। हालांकि इस बार प्रकृति ने बांधतालाब,नदी ,नालों का सीमांकन कर दिया है, सरकारी अमला इन पर कब कार्यवाही करता है,यह देखने वाली बात होगी।

   आपदा का अन्धकार 

    जब इस तरह की प्राकृतिक आपदाएं आती हैं , तो प्रारंभिक  तौर  पर  हर कोई उससे हुए नुकसान का आंकलन करने लगता है | जिनमे मुख्य रूप से मौतों का आंकड़ा , गिरे घर और इमारतें , बाँध , पुल , पुलिया ,सड़कों, फसलों  आदि के  नुक्सान पर चर्चा शुरू हो जाती है | आपदा का यह वह भौतिक और जीवंत पक्ष है जो सबसे ज्यादा नीति निर्माण में प्रभावी रहता है | इसके विपरीत अगर इसके दूसरे पक्ष को देखें तो वह हालात कही ज्यादा भयावह  प्रभाव छोड़ते हैं |  बड़ामलहरा के वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल शर्मा बताते हैं कि  छतरपुर जिले  के बड़ामलहरा क्षेत्र   1979--80 के दौरान भयंकर सूखा पड़ा था,|   जुलाई  मे मानसूनी वर्षा  के चलते  बोई गई खरीफ फसल , बाद मे वर्षा ना होने के चलते फसलें नष्ट हो गई |  भयंकर अकाल पड़ने से अपराधिक प्रवृति के लोगो ने लूटपाट का रास्ता चुन लिया , जिसके चलते जिले मे एक दर्जन डकैत गिरोह पनप उठे जिनमें चितर सिह,सौबरन सिंह, सूरज,मथुरा,भैयन गुरु, गब्बर सिंह आदि गिरोहों के आतंक के चलते एक वार फिर बुन्देलखण्ड की वादियां काप उठी थी  लूटपाट से लोग सहम उठे ।सूखे से उत्पन्न हालात तो एक वर्ष मे समाप्त हो गये किन्तु डकैती समस्या को समाप्त होने मे दस  वर्ष से अधिक का समय लग गया ।इसी  दशक मे  किसान खेतिहर मजदूरों ने रोजगार की तलाश मे पहली बार महानगरों की ओर पलायन  किया ।इसके पूर्व लोग काम की तलाश मे महानगरों को पलायन नहीं करते थे । पचास फीसदी से अधिक पलायन जब हो  चुका तब सरकार की नीद खुली  और   राहत कार्य  शुरू हुए  ।गरीब तबके के लोगों ने जहां काम की तलाश मे पलायन किया वहीं उस दौर मे बड़ती डकैती समस्या लूटपाट से त्रस्त होकर गांव मे आर्थिक रुप से सम्पन्न लोगों ने शहरों एवं कस्बों मे पलायन कर अपना आशियाना बना लिया जिसके चलते शहरों एवं कस्बों की जनसंख्या का अनुपात बड़ गया एवं गांव वीरान हो गये ।  राम कृपाल  कहते है कि इतिहास की पुनरावृत्ति होती है वर्तमान परिवेश मे कुछ इस तरह की स्थितियां निर्मित हो रही है ।लगातार हो रही बारिश के चलते नब्बे फीसदी खेत खाली पड़े है । रोजगार की तलाश मे पलायन का सिलसिला शुरू हो चुका है ।गांव मे अपराधों का ग्राफ बढ़ने लगा है जो अच्छे सकेत नही ।अगर समय रहते प्रशासन सजग नहीं हुआ तो परिणाम खतरनाक साबित हो सकते है ।

पलायन , के दूरगामी असर भी देखने को मिलते हैं , यह ना सिर्फ सामाजिक विघटन का कारण बनता है अपितु  आर्थिक और सामजिक शोषण का भी एक बड़ा कारण बनता है | इन पर किसी भी काल की सरकार के नीति निर्माताओं का ध्यान नहीं जाता |  


   दरअसल बुंदेलखंड सदियों से पानी की कमी  के लिए मशहूर रहा है। यहाँ कभी तालाबों, झीलों और कुओं की अद्भुत परंपरा थी।आज अति वर्षा से यह प्रश्न उठता है:क्या समस्या बारिश की है, या हमने अपनी परंपराओं और संसाधनों को संभालने में चूक की है?

बुंदेलखंड जैसी भौगोलिक दृष्टि से संवेदनशील जगह पर अति वर्षा किसानों के लिए आपदा और आम जनता के लिए संघर्ष की कहानी बन जाती है। एक ओर जहाँ सूखे से लड़ने की योजनाएँ बनाई जाती हैं, वहीं अब अति वर्षा से होने वाली बाढ़ और नुकसान पर भी उतनी ही गहराई से सोचने की जरूरत है। जरूरत है  नीतियों में संवेदनशीलता और जमीनी हकीकत की

 

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