बुंदेलखंड की डायरी
गिद्धों का बसेरा बनता बुंदेलखंड
रवीन्द्र व्यास
देश दुनिया से लुप्त होते गिद्धों को लेकर दुनिया भर के पक्षी प्रेमी चिंतित थे | ईको सिस्टम महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गिद्धों की अच्छी खबर बुंदेलखंड से है | बुंदेलखंड में पिछले एक दशक के दौरान गिद्धों की आबादी में 100 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि हुई है | उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड के 14 में से 10 जिले ऐसे पाए गए हैं जहां गिद्धों की आबादी तेजी से बड़ी है | बुंदेलखंड का इलाका गिद्धों के लिए सबसे सुरक्षित ठिकाना माना जा रहा है | पन्ना टाइगर रिजर्व ने देहरादून वन्यजीव संस्थान के सहयोग से २५ गिद्धों की जीपीएस टैंगिग की थी , जिससे पता चला कि ये गिद्ध दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से वापस पन्ना टाइगर रिजर्व आये |

देश में एक समय ऐसा भी आया था जब ९८ फीसदी गिद्ध विलुप्त हो गए थे | इस शिकारी पक्षी गिद्ध के विनाश में पशुओं को दी जाने वाली एक दवा डाइक्लोफिन भी थी | उसके बाद से इस शिकारी पक्षी को बचाने के जतन शुरू हुए जिसके अब सकारात्मक परिणाम दिखने लगे हैं | देश में जो 9 प्रजातियां पाई जाती हैं उनमें से सात प्रजातियां अकेले बुंदेलखंड में मिलती हैं | जिनमे ,हिमालयन जीफ्रोन , यूरेशियन जीफ्रोन , किंग वल्चर , टर्की बज़र्ड , अफ्रीका और एशिया के राज गिद्ध , काला गिद्ध ,व्हाइट ब्लैक वल्चर , बड़ा गिद्ध या जीफ्रोन वल्चर जैसी प्रजातियां मुख्य हैं ।
बुंदेलखंड के बड़े प्राणी संरक्षण केंद्र पन्ना टाइगर रिजर्व में 2011 से गिद्धों की संरक्षण की दिशा में काम शुरू किया था पिछले समय में यहां के 25 गिद्धों पर जीपीएस ट्रैकिंग भी की गई थी और जब वह वापस आए और उसका जो रिकॉर्ड खंगाल गया तो उसमें पाया गया कि ये नेपाल चीन उज़्बेकिस्तान कजाकिस्तान, यूरेशिया का सफर तय करके वापस आए | अच्छी बात यह है कि बुंदेलखंड के इलाकों में यह प्रजनन भी करते हैं घोंसले में अंडे भी देते हैं | वन्य जीव प्रबंधन गिद्धों के लिए बुंदेलखंड को अनुकूल स्थान मानता है | यही कारण है कि बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश के 14 जिलों में से 10 जिले गिद्धों के रहवास के लिए अनुकूल पाए गए | अकेले पन्ना जिले में 2 वर्ष पूर्व की गई गणना में 722 गिद्ध टाइगर रिजर्व एरिया में और पन्ना जिले में 1774 गिद्ध मिले थे |
बुंदेलखंड के वन्य प्राणी विशेषज्ञ और पूर्व वन अधिकारी जे पी रावत बताते हैं कि गिद्धों के लिए बुंदेलखंड का क्षेत्र अनुकूल है | वे बताते हैं कि गिद्धों के लिए ,ऊँची चट्टान , ऊँचे महल , ऊँचे वृक्ष अपने घोंसले बनाने के लिए अनुकूल हैं | वे इस बात पर चिंता जताते हैं कि बुंदेलखंड में ऊँचे वृक्षों का सफाया होता जा रहा है | ओरछा के महल जो गिद्धों का अनुकूल बसेरा था उसको लेकर पर्यटन प्रेमियों का व्यवहार गिद्धों के अनुकूल नहीं है | दरअसल गिद्ध भी वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम १९७२ के तहत वन्य जीव संरक्षण की जो चार श्रेणियां बनाई गई हैं उनमें नंबर एक पर है जिसमें टाइगर(बाघ } भी है | हमने ओरछा में महलों के सामने नियमों के ये बोर्ड भी लगाए थे , कुछ वर्ष तो लगे रहे बाद में ये बोर्ड भी वहां से हटा दिए गए |
गिद्धों के विनाश में वे पशुओं को दी जाने वाली डाइक्लोफिन दवा को मुख्य जिम्मेदार मानते हैं | यह दवा सस्ती होने के कारण बहुतायत में प्रयोग की जाती रही जिसके कारण जिन पशुओं ने इसका सेवन किया और उनकी मौत के बाद अगर गिद्ध ने इनका मांस खाया तो उनकी किडनी फेल हो जाती जिसके कारण उनकी मौत हो जाती है | हालंकि अब यह दवा प्रतिबंधित कर दी गई है , इसके अच्छे परिणाम मिलेंगे | इसके अलावा तेज गर्मी में वे अर्ध मूर्छित अवस्था में ऊंचाई से गिरने के कारण भी उनकी मौत हो जाती है | गिद्ध दुनिया का ऐसा अकेला शिकारी पक्षी है जो मांस खाने के बाद स्नान करता है | ओरछा में बहती बेतवा नदी , और पन्ना टाइगर रिजर्व की केन नदी, इसी कारण उनका अनुकूल बसेरा है |
लुप्त होते गिद्धों की आबादी के लिए ख़तरा
हालांकि गिद्धों की आबादी बढ़ने के संकेत शुभ समाचार माना जा सकता है | पर मानवीय और प्रशाशनिक व्यवहार के कारण गिद्ध प्रजाति पर मंडराते ख़तरे से इंकार नहीं किया जा सकता | ओरछा की ही बात कर लें कमलनाथ सरकार के कार्यकाल के दौरान यहाँ हुए "नमस्ते ओरछा" उत्सव के नाम पर हुई साफ़ सफाई में , ऐतिहासिक छतरियों पर गिद्धों के घोंसले साफ कर दिए गए थे । गिट्टी के लिए विशाल पत्थरों के पहाड़ों की नष्ट किया जा रहा है , वनो की कटाई ऐसे मुद्दे हैं जो गिद्धों को विस्थापित कर रहा है | असल में गिद्ध मौसम में सिर्फ एक ही अंडा देते हैं। ऐसे में अगर उसके घोसले अगर नष्ट हो जाए तो वे वहा फिर से नहीं बनाते हैं |
पारिस्थितिकी तंत्र और गिद्ध
ईको सिस्टम के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं गिद्ध | आम तौर पर यही माना जाता है कि मृत जानवरों को अपना आहार बनाने वालों में शेर ,बाघ, चीता ,लक्कड़बग्घा , तेंदुआ , जंगली कुत्ता भेड़िया और, गीदड़ ही प्रमुख हैं | पर ऐसा नहीं है , ये मांसाहरी जीव मृत जानवरों का शिकार कर खाते तो हैं पर उनका सिर्फ 35 से 40 फीसदी हिस्सा ही खा पाते हैं | ऐसे में बाकी बचा हुआ भाग गिद्धों के हिस्से में आता है | जिसके कारण गिद्ध इन मृत जानवरों से फैलने वाली बीमारियों को रोकने में मददगार साबित होते हैं | गिद्धों के पेट का अम्ल इतना प्रभावी माना जाता है कि वह जानलेवा एंथ्रेक्स और हैजा के जीवाणुओं को भी नष्ट कर सकता है |

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