29 जनवरी, 2024

Bundelkhand becoming a home for vultures_गिद्धों का बसेरा बनता बुंदेलखंड

 बुंदेलखंड की डायरी 



गिद्धों का बसेरा बनता बुंदेलखंड 

रवीन्द्र व्यास 

 देश दुनिया से लुप्त होते गिद्धों को लेकर दुनिया भर के पक्षी प्रेमी चिंतित थे | ईको सिस्टम  महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गिद्धों की अच्छी खबर बुंदेलखंड से है |   बुंदेलखंड में पिछले एक दशक के दौरान गिद्धों की आबादी में 100 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि हुई है |   उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड के  14 में से 10 जिले ऐसे पाए गए हैं जहां गिद्धों की आबादी तेजी से बड़ी है |   बुंदेलखंड  का इलाका गिद्धों के  लिए सबसे सुरक्षित ठिकाना माना जा रहा है |   पन्ना टाइगर रिजर्व ने  देहरादून वन्यजीव संस्थान के सहयोग से २५ गिद्धों की जीपीएस टैंगिग की थी , जिससे पता चला कि ये गिद्ध   दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से  वापस पन्ना टाइगर रिजर्व आये | 





 देश में  एक समय ऐसा भी आया था जब ९८ फीसदी गिद्ध विलुप्त हो गए थे | इस शिकारी पक्षी गिद्ध के विनाश में  पशुओं को दी जाने वाली एक दवा डाइक्लोफिन  भी  थी | उसके बाद से इस शिकारी पक्षी को बचाने के जतन  शुरू हुए जिसके अब सकारात्मक परिणाम दिखने लगे हैं |  देश में   जो  प्रजातियां पाई जाती हैं   उनमें से सात  प्रजातियां अकेले बुंदेलखंड में मिलती हैं | जिनमे ,हिमालयन जीफ्रोन  , यूरेशियन जीफ्रोन   ,   किंग वल्चर ,  टर्की बज़र्ड  , अफ्रीका और एशिया के राज गिद्ध  काला गिद्ध ,व्हाइट ब्लैक वल्चर ,  बड़ा गिद्ध या जीफ्रोन वल्चर  जैसी प्रजातियां  मुख्य हैं   



  बुंदेलखंड के बड़े प्राणी संरक्षण केंद्र पन्ना टाइगर रिजर्व में 2011 से गिद्धों की संरक्षण की दिशा में काम शुरू किया था पिछले समय में यहां के 25 गिद्धों  पर जीपीएस ट्रैकिंग भी की गई थी और जब वह वापस आए और उसका जो रिकॉर्ड खंगाल गया तो उसमें पाया गया  कि ये  नेपाल चीन उज़्बेकिस्तान कजाकिस्तान, यूरेशिया का सफर तय करके वापस आए | अच्छी बात यह है कि बुंदेलखंड के इलाकों में यह प्रजनन भी करते हैं घोंसले में अंडे भी देते हैं  |  वन्य जीव प्रबंधन गिद्धों  के लिए बुंदेलखंड को अनुकूल स्थान मानता है | यही कारण है कि  बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश के 14 जिलों में से 10 जिले  गिद्धों के रहवास के लिए अनुकूल पाए गए | अकेले पन्ना जिले में   वर्ष पूर्व की गई गणना में 722  गिद्ध  टाइगर रिजर्व एरिया में और   पन्ना जिले में 1774 गिद्ध  मिले थे | 

           बुंदेलखंड के वन्य प्राणी विशेषज्ञ और पूर्व वन अधिकारी  जे पी रावत बताते हैं कि गिद्धों के लिए  बुंदेलखंड का  क्षेत्र अनुकूल है | वे बताते हैं कि गिद्धों के लिए ,ऊँची चट्टान , ऊँचे महल , ऊँचे वृक्ष  अपने घोंसले  बनाने के लिए अनुकूल  हैं |  वे इस बात पर चिंता जताते हैं कि बुंदेलखंड में ऊँचे वृक्षों का सफाया होता जा रहा है | ओरछा के महल जो गिद्धों का अनुकूल   बसेरा  था उसको लेकर पर्यटन प्रेमियों का व्यवहार गिद्धों के अनुकूल नहीं है | दरअसल गिद्ध भी वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम १९७२ के तहत  वन्य जीव संरक्षण की जो चार श्रेणियां बनाई गई हैं उनमें नंबर एक पर है जिसमें टाइगर(बाघ } भी है | हमने ओरछा में महलों के सामने नियमों के ये बोर्ड भी लगाए थे , कुछ वर्ष तो लगे रहे बाद में ये बोर्ड भी वहां से हटा दिए गए | 

                               गिद्धों के विनाश में वे पशुओं को दी जाने वाली डाइक्लोफिन  दवा को मुख्य जिम्मेदार मानते हैं | यह दवा सस्ती होने के कारण बहुतायत में प्रयोग की जाती रही जिसके कारण  जिन पशुओं ने इसका सेवन किया और उनकी मौत के बाद अगर गिद्ध ने इनका मांस खाया तो उनकी किडनी फेल हो जाती जिसके कारण उनकी मौत हो जाती है | हालंकि अब यह दवा प्रतिबंधित कर दी गई है , इसके अच्छे परिणाम मिलेंगे |  इसके अलावा  तेज गर्मी में वे अर्ध मूर्छित अवस्था में ऊंचाई से गिरने के कारण भी उनकी मौत हो जाती है | गिद्ध दुनिया का ऐसा अकेला शिकारी पक्षी है जो मांस खाने के बाद स्नान करता है | ओरछा में बहती बेतवा नदी , और पन्ना टाइगर रिजर्व की केन नदी, इसी कारण उनका  अनुकूल बसेरा है | 


लुप्त होते गिद्धों की आबादी के लिए ख़तरा  

हालांकि गिद्धों की आबादी बढ़ने के संकेत शुभ समाचार माना जा सकता है | पर मानवीय और प्रशाशनिक  व्यवहार के कारण   गिद्ध प्रजाति पर मंडराते ख़तरे से इंकार नहीं किया जा सकता |  ओरछा की ही बात कर लें  कमलनाथ सरकार के कार्यकाल के दौरान यहाँ हुए "नमस्ते ओरछा"  उत्सव के नाम पर हुई साफ़ सफाई में ,  ऐतिहासिक छतरियों पर गिद्धों के घोंसले साफ कर दिए  गए  थे । गिट्टी के लिए विशाल पत्थरों के पहाड़ों की नष्ट किया जा रहा है , वनो  की कटाई ऐसे मुद्दे हैं जो  गिद्धों को विस्थापित कर रहा है |  असल में गिद्ध   मौसम में  सिर्फ एक ही अंडा देते हैं।  ऐसे में अगर उसके घोसले अगर नष्ट हो जाए तो वे वहा फिर से नहीं बनाते हैं |   

पारिस्थितिकी तंत्र  और गिद्ध              

  ईको सिस्टम  के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं  गिद्ध | आम तौर पर यही माना जाता है कि मृत जानवरों को अपना आहार बनाने वालों में शेर ,बाघ, चीता ,लक्कड़बग्घा , तेंदुआ , जंगली कुत्ता  भेड़िया और, गीदड़   ही प्रमुख हैं | पर  ऐसा नहीं है , ये मांसाहरी जीव  मृत  जानवरों का शिकार कर खाते तो हैं पर उनका सिर्फ 35 से 40 फीसदी हिस्सा ही खा पाते हैं | ऐसे में बाकी  बचा हुआ भाग गिद्धों के हिस्से में आता है | जिसके कारण गिद्ध इन मृत जानवरों  से फैलने वाली बीमारियों को रोकने में मददगार साबित होते हैं | गिद्धों के पेट का अम्ल इतना प्रभावी माना जाता है कि वह जानलेवा एंथ्रेक्स और हैजा के जीवाणुओं को भी नष्ट कर सकता है | 



22 जनवरी, 2024

SUN Temple of Bundelkhand_बुंदेलखंड के सूर्य मंदिर







 बुंदेलखंड के सूर्य मंदिर


रवीन्द्र व्यास 


बुंदेलखंड में मकर संक्रांति का पर्व  अलग उत्साह और श्रद्धा  से मनाया जाता है | सूर्य उपासना का यह पर्व मौसमी परिवर्तन के साथ सामाजिक और धार्मिक परिवर्तन का भी माना जाता है | बुंदेलखंड  में सृष्टि के देवता सूर्य के पूजन के अनेकों दुर्लभ प्रमाण मिलते हैं जो यह बताते हैं की यहां के लोग अनादि काल  से सूर्य की पूजा करते आ रहे हें  ये  वो इलाका है जहां ज्योतिषाचार्य  वराहमिहिर ने  विश्व प्रसिद्ध सूर्य सिद्धांत की रचना की थी  | भविष्य पुराण की माने तो कालपी के निकट यमुना के तट  पर  भगवान् श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने सूर्य उपासना करके कुष्ठ रोग से मुक्ति पाई थी |  देश में  १९८४ इ.तक देश में मात्र १४० सूर्य मंदिर के प्रमाण मिलते हें |  पर बुंदेलखंड में सूर्य मंदिर की संख्या सर्वाधिक है 



बुंदेलखंड में मकर संक्रांति और  सूर्य उपासना का  अपना एक अलग इतिहास रहा है | बुंदेलखंड क्षेत्र में ही देश के सर्वाधिक सूर्य मंदिर स्थापित किये गए  हैं | देश के जो  प्रमुख सूर्य मंदिर है उस सूची में  बुंदेलखंड के तीन  प्रमुख सूर्य मंदिर आते हैं | इनमे सागर जिले का रहली का सूर्य मंदिर ,महोबा का रहेलिया सूर्य मंदिर , इनके साथ ही खजुराहो का चित्रगुप्त सूर्यमंदिर आता है | 


 महोबा से लगभग 3 किमी दूर विचित्र रहिलिया गांव में  चंदेल  राजा राहिल देव वर्मन ने ९वी शताब्दी में   सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया था | काल खंड के हिसाब से यह  कोणार्क के सूर्य मंदिर से भी पुराना माना  जाता है। 

ग्रेनाइट से बना ये मंदिर पंचायतन शैली का मंदिर है | मुगलों द्वारा मंदिरों को नष्ट करने के प्रयास में इसे भी नष्ट करने का प्रयास  कुतुबुद्दीन ऐबक ने किया था | पुरातत्व विभाग ने अब इसकी सुध ली है | 


रहली का सूर्य मंदिर  सागर जिले की रहली   में  सुनार और देहर नदी के संगम पर स्थित  सूर्य मंदिर , देश का इकलौता ऐसा मंदिर है जो कर्क रेखा पर स्थित है ।  इतिहासकार मानते हैं कि इसका निर्माण चंदेल  राजा ने इसकी 10 वीं शताब्दी में कराया था | मंदिर में भगवान सूर्य की प्रतिमा रथ पर सवार है ,  रथ में सात घोड़ों जुते नजर आते हैं।  इस मंदिर में  सूर्य की दो पत्नियां ,  कुबेर और भगवान विष्णु की प्रतिमा है। 


चित्रगुप्त मंदिर खजुराहो _ इस  सूर्य मंदिर  में ४'१०'' ऊँची सूर्य भगवान की प्रतिमा विराजमान है। यह प्रतिमा भी  सात अश्वो के  रथ पर सवार है |  ९७५ ईसवी  में  इस मंदिर का निर्माण होना माना जाता है | मंदिर के अंदर ब्रह्माविष्णुभैरवसूर्यकुबेर तथा अन्य चतुर्भुज की प्रतिमा भी  हैं। खजुराहो के इस सूर्य मंदिर को देखने हर वर्ष बड़ी संख्या में देश विदेश से लोग  आते हैं | 


 मड़खेरा का सूर्य मंदिर 

 टीकमगढ़ शहर से लगभग 20 किलोमीटर दूर एक छोटा सा गाँव है मड़खेरा , यहाँ  ९वी शताब्दी में चंदेलकालीन  सूर्य मंदिर  है। पंचायतन शैली  में बने इस मंदिर में सूर्य प्रतिमा अपनी पूर्ण आभा के साथ विराजमान है |  इसी जिले की रहने वाली उमा भारती मध्य प्रदेश की सीएम भी रह चुकी हैं इसके बावजूद यह मंदिर एक तरह से उपेक्षित ही रहता है \ 


 बुंदेलखंड के टीकमगढ़ जिले में ९ ,छतरपुर जिले में पाँचदतिया जिले में ३सागर ,भिंड ,झांसी और हमीरपुर  में २- २,पन्ना  नरसिंहपुर,दमोह,गुनामुरैना ,बांदा,और जिला जालौन में एक -एक सूर्य मंदिर और विग्रह है  शिवपुरी में ४,और ललितपुर में ७ मंदिरों और विग्रहों  का उल्लेख मिलता है |  दतिया के  बालाजी सूर्य मंदिर का धार्मिक दृष्टि से एक अलग महत्व है |

बालाजी सूर्य मंदिर 

पहुज नदी के तट उन्नाव कस्बा में सूर्य देव का बाला जी मंदिर है कहते हें की एक टीले की खुदाई करने पर ब्राह्मण बालक को ६ इंच व्यास का सूर्य यंत्र मिला था इस चक्र के चारों ओर २१ त्रिभुज है जो सूर्य के २१ मुखों के प्रतीक हें |जिसे एक छोटा चबूतरा पर स्थापित किया गया था उस समय झांसी नरेश नारू शंकर कुष्ठ रोग से पीड़ित थे उन्होने यहाँ आकर प्रार्थना की सूर्य देव की कृपा से वे निरोगी हो गए उन्होने ही यहाँ मंदिर निर्माण शुरू कराया तब दतिया के राजा ने  उनसे कार्य बंद करने का निवेदन किया और स्वयं मंदिर का निर्माण कराया यहाँ हर रवि वार को मेला सा लगता है लोक मान्यता है की यहाँ से कोई खाली हाथ नहीं जाता है उसकी मनोती पूर्ण अवश्य होती है 


 सूर्य उपासना 

बुंदेलखंड के  कालपी (उप्र.) में   यमुना नदी के तट पर  काल्प्रियानाथ मंदिर है भविष्य पुराण के अनुसार भगवान कृष्ण के पुत्र  साम्ब ने यहाँ  सूर्य उपासना की थी ज्योतिषाचार्य  वराहमिहिर ने यहीं विश्व प्रसिद्ध सूर्य सिद्धांत का प्रतिपादन किया था |


वैदिक साहित्य में ही नही आयुर्वेद,ज्योतिष,हस्तरेखा शास्त्रों में सूर्य का महत्व प्रतिपादित किया गया है| यही वह कारण है कि वैदिक काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है.पहले यह सूर्योपासना मंत्रों से होती थी.बाद में मूर्ति पूजा का प्रचलन हुआ तो सूर्य मन्दिरों का निर्माण हुआ..अनेक पुराणों में यह लेख भी मिलता है,कि ऋषि दुर्वासा के शाप से कुष्ठ रोग ग्रस्त श्री कृष्ण पुत्र साम्ब ने सूर्य की आराधना कर इस भयंकर रोग से मुक्ति  बुंदेलखंड में ही पायी थी.प्राचीन काल में भगवान सूर्य के अनेक मंदिर भारत में बने थे.आज  देश में बने लगभग १४० सूर्य मंदिरों में यदि किसी इलाके में ये सर्वाधिक हैं तो वह है बुंदेलखंड |.

.वैदिक काल में आर्य सूर्य को ही सारे जगत का कर्ता धर्ता मानते थे.|.ऋग्वेद में  देवताओं के सूर्य का महत्वपूर्ण स्थान है.\सूर्योपनिषद की श्रुति के अनुसार संपूर्ण जगत की सृष्टि तथा उसका पालन सूर्य ही करते है.सूर्य ही संपूर्ण जगत की अंतरात्मा हैं|   सिन्धु घाटी की सभ्यता की खुदाई में भी सूर्य पूजा के प्रमाण मिले हें 


Raam_ प्रभु श्री राम का बुन्देलखण्ड से नाता






 प्रभु श्री राम का   बुन्देलखण्ड से नाता 





रवीन्द्र व्यास    

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का जितना नाता अयोध्या से माना जाता है ,उतना ही नाता उनका बुंदेलखंड से भी माना जाता है । बुंदेलखंड की पावन धरा चित्रकूट में उन्होंने अपना वनवास काल बिताया । दैत्यों के संहार के लिए  पन्ना के सारंग धाम में उन्होंने दैत्यों के सर्वनाश के लिए धनुष उठाया  ।। पन्ना के सलेहा से दस किमी दूर अगस्त्य ऋषि आश्रम हैं उनसे मिलने स्वयं श्री राम गए । वहां उन्हें अगस्त ऋषि ने  दिव्यास्त्र और धनुष बाण भेंट किया था बुंदेलखंडके ही गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस लिख कर भक्ति की गंगा दुनिया भर में प्रवाहित कर दी । 448   वर्ष पूर्व रामलला अयोध्या से ओरछा आ गए |  कहते तो ये भी हैं कि रामलला अपना दिन बुंदेलखंड के  ओरछा में बिताते हैं सोमवार को जब अयोध्या के देवालय में प्रभु श्री राम की प्राणप्रतिष्ठा होगी उस समय बुंदेलखंड की अयोध्या ओरछा में भव्य और दिव्य कार्यक्रम सीएम की उपस्थिति में होंगे।

२२ जनवरी 2024  को अयोध्या के   दिव्य राम देवालय में जब प्रभु श्री राम के दर्शनों का सौभाग्य सनातन धर्मावलंबियों को मिलने लगेगा इसके साथ ही सनातनियों की 496 वर्ष की अभिलाषा पूर्ण होगी  जिसके लिए लाखों सनातनियों ने  बलिदान दिया है असल में अयोध्या में 496 वर्ष पूर्व प्रभु श्री राम जन्म भूमि पर  सनातन धर्म की आस्था के  विशाल  देवालय  का  मुग़ल आक्रांता ने विध्वंश किया था बाबर के सेनापति मीरबाँकी द्वारा किये गए इस घृणित कार्य का बदला तो 1992 में ही ले लिया गया था किन्तु राम जन्मभूमि पर दिव्य देवालय के निर्माण के लिए ३१ वर्ष का समय लग गया प्रभु श्री राम के इस स्मृति को अक्षुण्य बनाये रखने में साधु सन्यासियों के साथ आर एस एस ,विश्व हिन्दू परिषद् ,बीजेपी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है 

446 वर्ष से रामराजा ओरछा में

 ओरछा के रामराजा मंदिर में लगे शिलालेख के अनुसार  raamको 446 वर्ष पूर्व ओरछा राज्य के तत्कालीन शासक महाराजा मधुकर शाह जू देव की रामभक्त पत्नी महारानी गणेश कुंअर भगवान श्री राम प्रभु की मूल (असली प्रतिमा) को अपनी गोद मे लेकर अयोध्या से ओरछा तक 8 माह 28 दिनों तक पैदल चलकर लाईं थीं। प्रभु श्री राम ओरछा कैसे आये और कैसे महल में रुक गए इसकी अपनी एक अलग कथा है | आज भी  प्रतिदिन प्रातः और संध्या आरती के समय पुलिस द्वारा ’’रामराजा सरकार को गार्ड ऑफ ऑनर देने की परम्परा चैत्र शुक्ल रामनवमी विक्रम संवत 1631 से लगातार चली आ रही है ।

   ऐसी मान्यता है कि रात्रि विश्राम के लिए हनुमान जी महाराज ओरछा में रात्रि भोजन के बाद अपने आराध्य श्री राम प्रभु को लेकर अयोध्या जाते हैं और प्रातः पुनः ओरछा लाकर उन्हें रामराजा मंदिर में विराजमान करा देते हैं। पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान ने ओरछा में महाकाल लोक की तरह रामलोक  को बनवाने की घोषणा की थी उनके कार्यकाल में इस योजना का काम भी शुरू हुआ था पर वर्तमान में इसमें कुछ शिथिलता आई है हालांकि वर्तमान सीएम मोहन यादव ने पूर्व की घोषणाओं के क्रियान्वयन की बात कही है देखना है बुंदेलखंड का यह रामलोक कब तक बनकर तैयार होगा 



सोमवार को जब अयोध्या के देवालय में प्रभु श्री राम की प्राणप्रतिष्ठा होगी उस समय बुंदेलखंड की अयोध्या ओरछा में  मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान  ओरछा में  मौजूद रहेंगे । दोनो ही श्री रामराजा सरकार के दर्शन करमंदिर परिसर से ही अयोध्या में आयोजित प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का सीधा प्रसारण देखेंगे।   शाम को बेतवा नदी के कंचना घाट पर 1 लाख दीप प्रज्वलित किए जाएंगेबेत्रवती नदी (बेतवा) की आरती भी होगी ।इस ऐतिहासिक मौके पर  श्री रामराजा मन्दिर को लाइटिंग व फूलों से आकर्षक ढंग से सजाया गया है।  नगर से झंडे व बैनर से इस तरह  सजाया  गया है मानो अयोध्या जी का ही छोटा रूप हो। नगर के धार्मिक स्थलों पर भक्ति रस की धारा प्रवाहित आज होगी। 

  तपो भूमि बुंदेलखंड   



बुंदेलखंड इलाका ऋषि मुनियों की तपोभूमि रहा है इसका वर्णन सतयुग से लेकर आज तक के अनेकों धर्म ग्रंथों में मिलता है । चित्रकूट में भगवान श्री राम सीता और लक्ष्मण जी ने अपने वनवास काल का अधिकांश समय बिताया था । यहां के कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा कर उन्होंने बुंदेलखंड की धारा को पावन पवित्र किया था । यहां से वे आगे बड़े और पन्ना जिले के सारंगपहाड़ इलाके में पहुंचे |  जिसे अब सारंग धाम कहते हैं यहाँ भगवान् राम ,सीताजी और लक्ष्मण जी से जुडी कई यादे आज भी ताजा हैं । यही वो स्थान भी माना जाता है जहां श्री राम ने दैत्यों के संहार केलिए धनुष उठाया था ।  धनुषाकार पहाड़ियों की आकृति की तलहटी में बने इस आश्रम में अगस्त मुनी के शिष्य सुतीक्ष्ण मुनि ने वर्षों तपस्या की थी |कहते हैं कि  जब भगवान रामयहां  पहुचे और उन्होंने दैत्यों के आतंकको जाना  तो उन्होंने धनुष उठा कर दैत्योंके संहार  का यही  संकल्प लिया था |राम चरित्रमानस  के अरण्य काण्ड में सुतीक्ष्ण मुनीसे मिलने का वर्णन मिलता है श्री राम वन गमन  मार्ग का जो नक्शा  बना है उसमे भी इस स्थान का विशेष उल्लेख है ।


सारंग धाम के महंत और पुजारियों का मानना है कि  त्रेता युग में जब भगवान श्री राम को 14 वर्ष का वनवास मिला था । उस समय सुतीक्ष्ण मुनि यहां उन्ही के लिये तपस्या कर रहे थे । रामचंद्र जी सीता जी लक्ष्मण जीने आकर उन्हें दर्शन  दिए और कुछ समय साथ में बिताया |  मुनी की तपस्या में राक्षस गण व्यवधान पैदा करते थे ,इस कारण उन्होंने यहां पर धनुष उठा कर संकल्प लिया था कि इस देश को हम राक्षसों से विहीन कर देंगे । राम का वह धनुष आज भी शिला  पर अंकित हैं यहां का राम कुण्ड सीता कुंड,लक्ष्मण कुंड सीता रसोई ,और बैठक आज भी उनकी उपस्थिति  का एहसास दिलाते हैं । वे बताते हैं कि इन कुण्डों की महिमा भी अपरंपार हैचाहे जितना सूखा पड जाये इनसे चाहे जितना पानी निकाल लो पर ये कभी खाली नहीं होते 



स्थानीय निवासी  राम कुंड में साक्षात गंगा मैया का  वास मानते  है,| 1970की बात है जब कुछ लोगों ने उसे अपवित्र  कर दिया था जिस कारण राम कुण्ड सूख गया था । तीन वर्ष  तक अखण्ड रामायण और राम धुन के बाद गंगा जी पुन;आई थी ,तब से यह कुण्ड यथावत है । राम जी कुछ समय रहने के बाद आगे चले गये थे ।वर्तमान में राम वनगमन मार्ग का जो नक्शा  तैयार किया गया है उसमें इसका उल्लेख है। सर्वेक्षण में भी सभी बातें प्रमाणित पाई गई ।आश्रम में किस तरह से राम की यादों को सहेज कर रखा गया ठीक उसी तरह से यहां मुनि  की यादों को भी सहेजा गया है। सुतीक्ष्ण मुनि की संगमरमर की प्रतिमा बरबस ही लोगों का ध्यान खींच लेती है। यहां के बाबा  कहते है कि हमें तो आज भी यही लगता है जैसे राम जानकी और लक्ष्मण जी हमारे आस पास ही हों वे दावा करते है कि मुनि के समय की धूनी आज भी वे जला रहे है ।    

          

  सुतीक्ष्ण मुनि यहां क्यों आये थे,और क्यों राम से मिलने की जिद में तपस्या की इस सवाल को जानने के लिए अनेक लोगों से चर्चा की लोगों ने  बताया कि सुतीक्ष्ण मुनि,अगस्त्य मुनि  के शिष्य  थे ।एक बार गुरू कही भ्रमण को जा रहे थे,जाते समय उन्होंने शालिग्राम ’ भगवान को सुतीक्ष्ण मुनि को सौंपते हुए कहा कि जब तक हम लौट कर नहीं आ जाते तब तक तुम  शालिग्राम जी की पूजा करते रहना ,सुतीक्ष्ण मुनि ने पूजा करने की बजाए शालिग्राम से जामुन तोड़ने लगे जिस कारण शालिग्राम  जी गायब हो गये |  अगस्त मुनी जब लौट कर आए तो उन्होंने पूछा कि  शालिग्राम जी कहां गये ,तो उन्होंने जवाब दिया कि पुन पुन चंदन पुनपुन पानी,  शालिग्राम हिरा गए हम का जानी,|  इस बात से नाराज हो कर गुरु जी ने उन्हें अपने आश्रम से निकाल दिया और कहा कि यहां तभी आना जब भगवान को ले कर आओ  तभी से सुतीक्ष्ण मुनी ने यहां तपस्या की और जबप्रभु श्री राम यहां आये तो उन्हे लेकर अपने गुरू के पास गये थे ।  

अगस्त मुनि का आश्रम  

श्री राम की वनवासी वेश में एक मात्र दुर्लभ प्रतिमा 

पन्ना के सलेहासे दस किमी दूर अगस्त मुनि का आश्रम हैं ,| सिद्धनाथ का यह स्थान अपनी अलग पहचान बनाये  है |मंदिर के गर्भगृह में एक प्राचीन शिव प्रतिमा मंदिर परिसर में भगवान रामऋषि अगस्त के छोटे-छोटेमंदिर और मूर्तियां मौजूद हैं, | अगस्त मुनि  के 108 शिष्य भी यहांसाधना किया करते थे,|  यहां की कथा भी लोग बताते  है किजब शिव विवाह हो रहा था तो धरती का संतुलन बिगड़ गया थातबभगवान के कहने पर ऋषि अगस्त यहां आये और उन्होने धरती का संतुलन बनाया और यहांतपस्या  की।   उन्हें मालूम था दशरथ पुत्र राम वनवास काल मेंयहाँ आएंगे इसीलिए उन्होंने सुतीक्ष्ण मुनि कोइसके लिए यह दंड दिया था सुतीक्ष्ण मुनि के साथ स्वयं श्रीराम अगस्त मुनि के आश्रम में पहुंचे  । ऋषिने दिव्यास्त्रों के साथ उन्हें एक धनुष बाण भेंट किया था यही से वे नासिक की ओरगए थे । यहाँ आज भी  भगवान् श्री राम कीवनवासी वेश में एक मात्र दुर्लभ प्रतिमा है । दक्षिण भारतीय लोगों में अगस्त मुनिकी अत्याधिक मान्यता के कारण बड़ी संख्या में दक्षिण भारत से लोग इस दुर्गम स्थल तकआते हैं । 

 राम पथ         

  उत्तरप्रदेश सरकार ने तो अपने इलाके के 177 किमी के रामपथ के विकाश कार्य शुरू कर दिया है किन्तु एमपी में बीजेपी सरकार २० वर्षों में सिर्फ कागजी घोड़े ही दौड़ाती रही |  बुंदेलखंड के जिसइलाके से स्वयं श्री राम की यादे जुडी ऐसे स्थलों की स्मृतियाँ राममंदिर निर्माणसे जुड़ना आवश्यक ही कहा जाएगा |  

  चित्रकूट में श्रीराम 

बुंदेलखंड के  चित्रकूट में प्रभु श्री राम ,सीता माता और लक्ष्मण जी के साथ लगभग ११ वर्ष रहे जबकि एमपी में उन्होंने अपना कुल १२ वर्ष का वनवास बिताया   |    16 जनवरी  को श्री राम पथ गमन न्यास की पहली बैठक  मुख्यमंत्री डॉ  मोहन  यादव की अध्यक्षता में चित्रकूट में हुई  |  सीएम  दिल्ली से सीधे चित्रकूट पहुंचे  थे , सियासी सूत्रों का कहना है एमपी के सीएम यह बैठक तब लेने आये जब दिल्ली दरबार में उनसे इस मामले में पूछताछ की गई |  बैठक में सीएम साहब ने कहा कि  "अयोध्या की तरह ही चित्रकूट में भी विकास कराए जाएंगे. जिन स्थानों से भगवान राम गए हैं उन स्थानों को सड़क मार्ग से जोड़ा जाएगा.| बैठक में तय किया गया है कि  चित्रकूट में कामदगिरि परिक्रमा पथबृहस्पति कुंडमंदाकिनी नदी के लिए चित्रकूट में घाटों का विकास कराया जाएगा.|  

दरअसल  मध्य प्रदेश में राम वन गमन पथ चित्रकूट से अमरकंटक तक 370 किलोमीटर का माना गया है. | 11 वर्ष चित्रकूट में वनवासी जीवन व्यतीत करने के बाद प्रभु श्री   राम  पन्ना , सतनाकटनीजबलपुरनर्मदापुरमउमरियाशहडोल और अनूपपुर ( अमरकंटक ) होते हुए दंडकारण्य की ओर गए थे | लगभग एक वर्ष तक प्रभु श्री राम ने प्रदेश के आठ जिलों में समय बिताया |    

  अयोध्या में राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के कल में जाग्रत हुई मध्य प्रदेश सरकार अब  चित्रकूट में वनवासी राम लोक  की स्थापना करेगी | इस लोक की स्थापना के लिए  राम के जीवन के बारे में जानने वाले पांच लोगों की समिति बनाई जा रही है | इस पार  एकीकृत शहरी विकास परियोजना के अंतर्गत 400 करोड़ रुपये से चित्रकूट का विकास किया जाएगा ।     

विकास की उमंग और चुनौतियों के संघर्ष का बुंदेलखंड

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