12 मार्च, 2023

EL_2023_बुन्देलखण्ड में बीजेपी की राह नहीं आसान

 बुन्देलखण्ड में बीजेपी की राह नहीं आसान  

रवीन्द व्यास




मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में 2023 का चुनाव लड़ने का मन बना चुकी बीजेपी के लिए  बुंदेलखंड की पथरीली जमींन का रास्ता आसान नहीं होगा | बुंदेलखंड की  क्षेत्र  की 26 विधानसभा  सीटों पर कांग्रेस जहाँ अपनी पकड़ को मजबूत बनाने में जुटी है बुन्देलखण्ड में बीजेपी की राह  आसान नहीं है। बीजेपी अपनी 2013 वाली स्थिति में आने के लिए बेकरार है | सियासी समीकरण में  तेजी  से बदलाव हो रहा है  | हालांकि बुंदेलखंड की सीमावर्ती विधानसभा क्षेत्रो में  सपा और बसपा का  प्रभाव कांग्रेस और बीजेपी के समीकरण बनाने बिगाड़ने में अहम भूमिका अदा करते है  | 


बुंदेलखंड के  सियासी  धरातल पर   इस बार  बीजेपी के सामने चुनौतियां बड़ी हैं | इन चुनौतियों का काट निकालने के लिए बुंदेलखंड में बीजेपी ने अपने स्तर पर कई तरह के समीकरण भी बनाये हैं | सागर जिले में बीना विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेस नेता , शशि कथोरिया , सागर के नेमिचन्द्र जैन , और कुछ दिनों पहले ही कांग्रेस के दिग्गज नेता ब्रज बिहारी पटैरिया  बीजेपी में सम्मलित हो गए | दूसरी तरफ कांग्रेस के खुरई से चुनाव लड़ने वाले अरुणोदय चौबे ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था, हालांकि उन्होंने अभी तक बीजेपी की सदस्य्ता नहीं ली है  | दरअसल बुंदेलखंड के तीन कांग्रेस विधायक और बड़े नेताओं के दल बदलने के कारण कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है | इसका असर चुनाव परिणामो में देखने को मिल सकता है | सागर जिले में सुरखी और देवरी ऐसी विधान सभा सीट हैं जिन पर बीजेपी के पास कोई सशक्त प्रत्यासी नहीं था | गोविन्द राजपूत के बीजेपी में आने के बाद सुरखी में बीजेपी को लाभ मिलेगा | ये अलग बात है राजपूत के बीजेपी में आने के बाद सुरखी से 2013  में  141 वोट से चुनाव जितने वाली बीजेपी की पारुल साहू ने  बीजेपी  को  त्याग का कांग्रेस का हाथ थाम लिया था और उप चुनाव में लगभग ४१ हजार वोट से हारी थी | इसी तरह सागर जिले की एक विधान सभा सीट है देवरी जहाँ से कांग्रेस के हर्ष यादव लगातार दूसरी बार चुनाव जीते | बीजेपी ने इस क्षेत्र के लिए  कांग्रेस के पूर्व विधायक ब्रज बिहारी पटैरिया को पार्टी में सम्मलित कर  अपने मनसूबे साफ़ कर दिए हैं कि हर हाल में चुनाव जीतना है | 

                                                2018 के चुनाव परिणाम को देखें तो बुंदेलखंड की २६ विधानसभा सीटों में से कांग्रेस ने 10 , और बीजेपी ने 14 विधान सभा सीटें जीती थी | जितने वाली इन सीटों में ५ हजार से कम  के अंतर से बीजेपी 4 सीट पर और कांग्रेस 5 सीट पर जबकि बीएसपी ने एक सीट पर चुनाव जीता था | बुंदेलखंड में सबसे कम अंतर से  चुनाव जीतने वाले बीजेपी के 35 बीना के महेश राय थे जो कांग्रेस के शशि कथोरिया  से मात्र 460 मत से चुनाव जीते थे , शशि कथोरिया अब बीजेपी में सम्मिलित हो गए हैं |  कम अंतर से जीतने के कारण इस विधानसभा क्षेत्र में दावेदारों की  अच्छी खासी संख्या है |  दूसरे पर 49 चंदला के राजेश प्रजापति थे जो मात्र 1177 मत से चुनाव जीत सके थे | ये वही राजेश प्रजापति  हैं जो अपने आचरण और अपने पिता के कारण हमेशा विवादों में रहते हैं |  इसी तरह कांग्रेस में 50 राजनगर से विक्रम सिंह उर्फ़ नाती राजा  मात्र 732 मत से दमोह के राहुल सिंह 798 मत से चुनाव जीते थे | बाद में राहुल सिंह लोधी बीजेपी में सम्मलित हो गए , और उप चुनाव में वे कांग्रेस के अजय टंडन से चुनाव हार गए | बीजेपी के टारगेट में ये दस सीटें प्रमुखता से हैं |  

                                        उत्तर प्रदेश की सीमा से लगने वाली 9 विधानसभा सीट सहित 11 विधानसभा सीट पर बीएसपी और समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस और बीजेपी के समीकरणों में बड़ा परिवर्तन किया है | सबसे ज्यादा असर  निवाड़ी ,पृथ्वीपुर  और जतारा  विधानसभा  सीट पर देखने को मिला था | निवाड़ी में बीजेपी और समाजवदी पार्टी में  और पृथ्वीपुर में  सपा और कांग्रेस में मुख्य  मुकाबला था | २०२३ के चुनाव में इन पार्टियों के अलावा आम आदमी पार्टी अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराने की तैयारी में जुटी है | सियासी ख़बरों की माने तो आप ने  इस बार जातीय समीकरणों को ध्यान में रख कर और पार्टी के बागियों पर दांव लगाने की तैयारी की है | 


     बजट पर बवाल : सियासी मुद्दों की तलाश में भटकती कांग्रेस को  बीजेपी ने बजट में बैठे बैठाये मुद्दे दे दिए | दमोह के कांग्रेस विधायक अजय टंडन ने आरोप लगाया था , कि  दमोह उप चुनाव के दौरान  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह  चौहान ने  दमोह में मेडिकल कॉलेज खोलने की बात कही थी | बजट से नदारद है , अब जान आंदोलन ही एक बड़ा रास्ता बचता है | इस मुद्दे को लेकर दमोह जिला कांग्रेस हर विधान सभा क्षेत्र में  जायगी और मुख्य मंत्री को झूठा साबित करने का प्रयास करेगी | दमोह जिले में कांग्रेस अपना जनाधार मजबूत करने में जुटी है | 

                       टीकमगढ़ जिले में भी मेडिकल कॉलेज की मांग की जा रही थी इस मांग को लेकर पूर्व में कई आंदोलन भी हो चुके हैं | सरकार को टीकमगढ़  में मेडिकल कालेज बनाने का प्रस्ताव  जिले के विधायकों ने सर्व सम्मति से दिया था , किन्तु इस बजट में  इसकी कोई घोषणा नहीं हुई | इस बात को हवा देने के अभियान में कांग्रेस जुट गई है |  सागर में भी सीएम शिवराज सिंह चौहान ने राजघाट बाँध को दो मीटर ऊंचा करने की बात कही थी , किन्तु बजट में इसको लेकर कोई बजट ना होने सागर के लोगों को निराशा है | दरअसल सागर जिले के राजघाट बाँध की ऊंचाई बढ़ने का सीधा लाभ नगर की पेयजल व्यवस्था को मिलता | वर्तमान में बाँध का पानी गर्मियों में निचले स्टार पर पहुँच जाने के कारण यहाँ के लोगों को पेयजल की परेशानी का सामना करना पड़ता है | हालंकि सरकार ने दलित वोट बैंक को लुभाने के लिए  संत रविदास मंदिर के लिए 100 करोड़ का प्रावधान बजट में किया है | दूसरी तरफ आधी आबादी को साधने के लिए महिलाओं को हर माह एक हजार रु दिए जाने का प्रावधान बजट में किया गया है | इस पर भी कांग्रेस हमलावर है | 

                                           दमोह में कांग्रेस की संभागीय प्रवक्ता निधि श्रीवास्तव ने एक पत्रकार वार्ता में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर सीधा आरोप लगा दिया की मुख्यमंत्री बहनो के साथ छलावा करके एक हजार रु में उनके वोट खरीद रहे हैं | उनका कहना था कि चुनाव के कुछ माह शेष रहे हैं , महिलाओं को कागजी खानापूर्ति में ही समय निकल जाएगा |  वही टीकमगढ़ में कांग्रेस की किरण अहिरवार ने कहा है कि कांग्रेस सरकार आने पर महिलाओं को 1500 रु दिए जाएंगे | 

                         दरअसल  चुनावी वर्ष में यह आरोप प्रत्यारोप का दौर चल रहा है | जिसे जहाँ भी मौका मिलता है | बीजेपी के नेता अपनी उपलब्धियां बताने में नहीं चूक रही है , एम् पी यूपी की  54  विधानसभा क्षेत्रों को प्रभावित  करने वाली केन बेतवा लिंक परियोजना को एक बड़ी उपलब्धि के टूर पर बताया जा रहा है | इससे ना सिर्फ सिचाई होगी बल्कि बिजली और पेयजल भी लोगों को मिलेगा | छतरपुर में बनने वाले मेडिकल कालेज  को लेकर भी बीजेपी के नेता क्षेत्र के लिए एक बड़ी उपलब्धि बता रहे हैं |                  

                        

        

EL_2023_बुंदेलखंड - विकास पर भारी है मुफ्त का माल और जातीय समीकरण

 बुंदेलखंड 

विकास पर भारी है मुफ्त का माल और जातीय समीकरण 
रवीन्द्र व्यास 

मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में  २६ विधानसभा सीटें आती हैं | २०१८ के चुनाव में यहाँ से 14  सीटों पर बीजेपी और   10 पर कांग्रेस ,  सपा और बसपा एक एक सीट पर चुनाव जीती थी | आगर  इन समीकरणो को ही देखें तो बुंदेलखंड ही वह इलाका था जिसने कांग्रेस के हाथों सत्ता की बागडोर सौंपी थी | साल भर बाद ही कांग्रेस के दल बदल के कारण  सत्ता  बदल गई और सरकार बीजेपी की बन गई | जिसका बड़ा असर बुंदेलखंड में भी देखने को मिला | वर्तमान के   सियासी  हालातों को देखें तो इस बार सीएम के तमाम प्रयासों के बावजूद बीजेपी के हालातों में बड़ा परिवर्तन देखने को नहीं मिल रहा है | 
                    बुंदलखंड इलाके के सागर संभाग में सागर जिले की ८ विधान सभा सीट में से पांच पर बीजेपी और 3 पर कांग्रेस ने चुनाव जीता था | सुरखी विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे गोविन्द राजपूत ने सिंधिया समर्थकों के साथ दलबदल किया | जिसके चलते सागर में अब कांग्रेस २ विधायक रह गए   और बीजेपी 5 से बढ़कर  6 विधायक हो गए  | 
बुंदेलखंड  में सत्ता परिवर्तन के बाद बड़ा असर सियासी समीकरणो में देखने को मिला |  सागर के बाद सबसे ज्यादा विधान सभा सीट वाले छतरपुर जिले में 2018 के चुनाव में कांग्रेस के  4, बीजेपी और सपा का एक एक विधायक चुनाव जीता था | बड़ामलहरा के कांग्रेस विधायक प्रदुम्न लोधी ने कांग्रेस छोड़ बीजेपी की सदस्यता ले ली थी | उप चुनाव उन्होंने बड़े अंतर से जीता था | बिजावर से सपा के राजेश शुक्ला ने भी सपा का दामन  छोड़ बीजेपी की सदस्यता ले ली थी | दमोह में कांग्रेस के राहुल लोधी जो प्रदुम्न लोधी के रिश्तेदार लगते हैं उन्होंने भी बीजेपी का दमन थाम लिया था | पर उप चुनाव में जब उन्हें प्रत्यासी बनाया गया तो वे कांग्रेस के अजय टंडन से बुरी तरह से हार गए | निवाड़ी जिले की पृथ्वीपुर विधान सभा सीट कांग्रेस के दबंग नेता ब्रजेन्द्र प्रताप सिंह के निधन से रिक्त हुई और यहाँ हुए उप चुनाव में बीजेपी ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को दर किनार कर सपा से 2018 का चुनाव लड़ चुके  शिशुपाल यादव को प्रत्यासी बनाया और चुनाव जीता | 
                            २०२२ के अंत तक बुंदेलखंड में बीजेपी विधायकों की संख्या 14 से बढ़कर १८ हो गई , कांग्रेस की १० से घटकर ७ हो गई | सत्ता के सबलीकरण का ये असर २०२२३ के चुनाव में कितना रहता है यह तो आने वाले समय में ही स्पष्ट हो जाएगा | २४ घंटे  चुनावी मोड़ में रहने वाली बीजेपी , के लिए आने वाले विधान सभा चुनाव वर्तमान में बहुत ज्यादा उम्मीदों वाले नहीं कहे जा सकते | एन्टी इंकम्बेंसी फेक्टर के अलावा बुंदेलखंड में लोग ये कहने लगे हैं कि " काठ की हांडी बार बार चूल्हे पर नहीं चढ़ती " | इन सबके मूल में अगर देखा जाए तो एक समस्या ऐसी है जो बुंदेलखंड भर में देखने को मिल रही है वह है " कानून और व्यवस्था की स्थिति " | अपराधी तत्व बेलगाम हैं आम आदमी की कोई सुनने वाला नहीं है , बगैर दाम के काम नहीं होता |अधिकाँश  विधायकों के काम काज के तरीके को लेकर लोगों में नाराजगी देखने को मिल रही है | 
                            वर्तमान में सरकार विकास यात्रा निकाल रही है जगह जगह  शिलान्यास और लोकार्पण हो रहे हैं |   विकाश यात्रा को लेकर पन्ना कलेक्टर का बयान भले ही अलग हो पर  सरपंच और पंचायत सचिवों में नाराजगी देखने को मिली रही  है | सचिवों  का कहना है कि  चार -चार महीने से हम लोगों को वेतन नहीं मिल रहा , पंचायत के लिए कोई बजट नहीं मिला उस पर से  विकास यात्रा के लिए इंतजाम हम लोगों को करना पढ़  रहा है |  इसे विनास यात्रा कहने से भी नहीं चूकते | चुनावी साल में बिजली कम्पनी के अधिकारियों द्वारा चलाया जा रहा वसूली अभियान भी लोगों को ही नहीं बीजेपी विधायकों को भी बेचैन किये हुए है | छतरपुर जिले की  राजनगर विधानसभा सीट के हरद्वार गाँव पहुंची थी विकास यात्रा , गाँव वालों ने बीजेपी नेता अरविन्द पटेरिया को जैम कर खरी खोटी सुनाई , और कहा आज यात्रा लेकर आ गए हमारे गाँव में लाइट नहीं है कभी पूंछने तक नहीं आये | 
सागर के नरयावली विधायक प्रदीप लारिया ने तो बिजली अधिकारियों पर कांग्रेस के एजेंट होने का ही आरोप लगा दिया था | 
                        हालंकि चुनावी वर्ष में बीजेपी की शिवराज सरकार ने खजाना खोल दिया है , लाड़ली लक्ष्मी योजना के बाद लाड़ली बहना योजना | इस तरह की योजंना उत्तर प्रदेश में चलती है जिसका बड़ा लाभ बीजेपी को मिला है | उसी नक़्शे कदम पर मध्यप्रदेश में यह योजना शुरू की गई है , आप के जबाब में सी एम् राइस स्कूल | चुनावी वर्ष में दलित वोट बैंक को लुभाने के लिए सागर में बड़ा आयोजन रविदास महाकुम्भ के नाम पर किया गया | यहाँ सौ करोड़ की लागत से संत रविदास का मंदिर बनेगा , एस सी एस टी के लिए औद्योगिक क्षेत्र में २० फीसदी भूखंड आरक्षित होंगे, स्कालरशिप की आय सीमा भी 6 लाख से बढ़ाकर ८ लाख की गई है | जातीय और मतदात समीकरण को देखें तो बुंदेलखंड में  अनुसूचित जाति के लगभग 22 फीसदी मतदाता हैं | इनमे अधिकांश संत रविदास के अनुयाई हैं | बीजेपी की निगाह इन वोटों पर काफी पहले से है | 2013 में 22 सीट जितने वाली बीजेपी 2018 के चुनाव में 14 सीट पर सिमट गई थी | 4  सीट जितने वाली कांग्रेस 2018 में बढ़कर 10 पर पहुँच गई थी ,परिणामतः बीजेपी की सरकार सत्ता से बाहर हो गई थी | अब वह किसी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहती | 
                      बुंदेलखंड में उमा भारती के प्रभाव को भी नहीं नकारा जा सकता है | शराब और अपने लोधी समाज के वोटरों को लेकर भी वे सरकार पर हमलावर थी | इस माह के शुरुआत में उन्होंने ओरछा के राम राजा सरकार के मंदिर के पास से शराब दुकान को लेकर शिवराज सरकार को सीधी चेतावनी दे डाली थी , जिसका असर सरकार की नई शराब नीति में देखने को मिला | अब वही उमा भारती  शिवराज का भोपाल में सम्मान करेंगी | 
                       दरअसल बुंदेलखंड इलाके में लोधी मतदाताओं पर पकड़ बनाने वाला उमा भारती से बड़ा कोई नेता बीजेपी के पास नहीं है | बीजेपी की सत्ता में वापसी के बाद  उमा भारती के ही इशारे पर प्रदुम्न और राहुल लोधी बीजेपी में आये थे | सियासी समीकरणों के बीच बुंदेलखंड में भी मतदातओं को मुफ्त की योजना और जातीय समीकरण ज्यादा प्रभावित करते हैं |  

05 मार्च, 2023

Holi_बुंदेलखंड में होली के अनोखे रंग

 बुंदेलखंड की डायरी 

बुंदेलखंड में होली के अनोखे रंग 

रवीन्द्र व्यास 

जब मौसम में मादकता हो, पलास फूला, हो आम बोराया हो और खेत पर गदराई फसल खडी हो तब किसका मन मस्ती में नहीं डूबेगा | बुंदेलखंड के एरच से ही  होली  की परंपरा शुरू हुई थी, जहां होलिका आग में भस्म हुई थी और प्रहलाद को नया जीवन मिला था  | कालान्तर में होली के कई और अनूठे रंग बुंदेलखंड में देखने को मिलते हैं |  बुंदेलखंड की लोक परम्परा में फाग का अपना महत्व रहा है | कभी यह परम्परा बसंतोत्सव से शुरू हो जाती थी | बसंत के आगमन के साथ गाँव -गाँव में फाग के स्वर सुनाई देने लगते थे जो रंग  पंचमी तक चलते रहते थे | अब ये सिर्फ होलिका दहन के आस पास तक सीमित होकर रह गए हें | शुद्ध शास्त्रीय शैली की फागों का स्थान अब अश्लील फागों और फागों की सी.डी.ने ले लिया है | इस अंचल में बसंत पंचमी के साथ ही मस्ती का आलम शुरू हो जाता था, मस्ती के रस में सराबोर गाँव -गाँव में फागों की फड बाजी होती थी | जबाबी फागों की यह शैली अरसे से समाप्त हो चुकी है |

बुंदेलखंड के एरच से शुरू हुई थी होली 

अगर हम  कहें कि होलिका दहन की शुरुआत  बुंदेलखंड के झाँसी जिले के एरच से हुई तो अधिकाँश लोग इसे नहीं मानेंगे | क्योंकि आज जो भी दिखता है वही आधार बन जाता है , देश दुनिया में ब्रज की होली को ही प्रमुखता मिलती है | इसके चलते देश दुनिया के लोग होली परम्परा की शुरुआत ब्रज से ही मानेंगे | यह भी सत्य है कि प्रभु श्री कृष्ण जी ने रंगों के त्यौहार  होली को अनूठा रंग दे दिया | असल में एरच में  दैत्यराज हिरण्यकश्यप का राज था , उनका पुत्र था प्रहलाद जो भगवान विष्णु का भक्त था | विष्णु पुराण की कथा के अनुसार  देवताओं से वरदान प्राप्त कर हिरण्यकश्यप निरंकुश   हो गया था उसने राज्य में ये आदेश दिया था कि कोई भी उनके राज में विष्णु भगवान् की पूजा नहीं करेगा | जबकि उनका बड़ा पुत्र प्रह्लाद विष्णु भक्त था , पुत्र की इस भक्ति को देख  वह इतना क्रोधित हुआ की उसने उसे मारने के तमाम तरह के प्रयत्न किये | जब वह सीमे सफल नहीं हो पाया तो उसने अपनी बहन होलिका को ( जिसे में आग से ना जलने का वरदान प्राप्त था ) आदेश दिया की प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठे , अग्नि में जब वह प्रह्लाद को लेकर बैठी तो वह तो जल कर भष्म  हो गई पर प्रह्लाद सुरक्षित बाहर आ गए | अगले दिन भगवान् विष्णु ने नर्सिंगहावतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध कर उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई | इस तरह  यहाँ से शुरू हुई होलिका दहन और रंगों के त्यौहार होली की परम्परा

इस इलाके में मिलते पाषाण अवशेष   हिरण्यकश्यप के महल के बताए जाते हैं। यहां हुई  खुदाई में  हिरण्यकश्यप काल की शिलाएँ और होलिका की गोद में बैठे प्रहलाद की मूर्तियाँ भी मिली हैं,| उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने तो 2021 में होली एरच महोत्सव भी शुरू किया है | पांच दिवसीय इस महोत्सव में बुंदेली लोक संस्कृति से जुड़े अनेक कार्यक्रम होते हैं

वैसे तो बुंदेलखंड में होली के अनेक रंग देखने को मिलते हैं , पर इनमें सबसे प्रमुख फाग गायन की परम्परा मानी जाती है

गाँव की चौपालों पर नगड़िया -ढोलक , झींका, मजीरा, की लय पर फाग की तान अब कम सुनाई पड़ती है | बुन्देली लोक जीवन से जुडी फागों का अपना एक सम्रद्ध इतिहास है | फाग की वर्तमान परम्परा ईसुरी और गंगा धर व्यास की फागों तक सिमित सिमित हो कर रह गई हें | गाँव -गाँव में मूलतः ईसुरी रचित फागें ही गई जाती हें |ठेट- बुन्देली समरसता वा माधुर्य के साथ ईसुरी की फागों में श्रृंगार वा भावों की अभिव्यक्ति का अनूठा सम्मिश्रण देखने को मिलता है | ईसुरी रचित फागों को चोकडिया फाग भी कहते हें, फागों को गाने वाले फगुवारे लक्ष्मण सिंह  इस उत्सव में अपनी उम्र को बाधक नहीं मानते | वे कहते हें की फागों की मस्ती का आलम ही कुछ और होता है ,हम तो वेसा ही आनंद लेते हें जैसा जिन्दगी भर होली के माह में लेते रहे हें | काल की  गति के साथ अब सब कुछ बदल गया है ,अब वैसा उत्साह और उल्लास लोगों में नहीं रहा |

बुंदेलखंड में डेढ़ सौ वर्ष पूर्व ईसुरी रचित फागों की श्रंगारित ने इसे लोक जीवन की फागें बना दिया | इस दौर में लोग प्राचीनतम छंद माऊ, डिडखुरयाऊ, पयाऊ, लापडिया, और खडी फागों को भूल गए |यह ईसुरी की फागों की ही खासियत थी की लोक जीवन से सीधी जुड़ गई |फाग मंडलियों की प्रतियोगी फाग गायन के आयोजन से इसको व्यापकता मिली समय के साथ यह परम्परा समाप्त हो रही है |अब गांवों में साहित्य  और लोक जीवन की फागों का स्थान अश्लील फागों ने और सी.डी.ने ले लिया है |

 साहित्यकार  प्रवीण गुप्त   "अश्लील फाग गायन को श्रृंगार की ही उपाधि देते हें, वे कहते हें की यह भी जीवन का एक अंग है | और इसका कोई बुरा भी नहीं मानता है , वे कहते हैं कि  अब गांवों की चौपालों पर फागों के फड नहीं जमते धोके से ही कुछ गाँवों में फागों के स्वर सुनाई देते हैं |जब की बुन्देलखंड  की यह लोक परम्परा फाग गायन सबसे निराली है,यह ब्रज की होली से भी कहीं ज्यादा आकर्षक है | होली पर लोक गायन की जो परंपरा बुंदेलखंड में है, वह अन्यत्र कहीं नहीं है | फिर भी इसे वह स्थान नहीं मिल पाया जो इसे मिलना चाहिए था | ईसुरी की फागों में लोक जीवन ही नहीं देखने को मिलता है बल्कि करारा व्यंग्य भी देखने को मिलता है

 

लाठियों के साथ होली 

बुंदेलखंड में  लाठियां चलाते हुए होली  खेली जाने की भी एक अनोखी परम्परा है | इस परंपरा में बच्चों से लेकर बूढ़े तक भाग लेते हैं लट्ठमार होली में हाथों में लाठियां लेकर  ढोलक की थाप के बीच एक दूसरे पर लाठियों से वार करते हैं.  पिचकारी की जगह लाठी डंडो के वार और संगीत की धुन पर थिरकते कदमों के साथ जांबाजी के अनोखे करतब का अनोखा संगम सिर्फ बुंदेलखंड की इस होली में ही देखने को मिलता है.

 क्या बूढ़े और क्या जवानसभी हिस्सा लेते हैं. बुंदेलखंड के लोग इस होली को अपनी प्राचीन बुंदेली संस्कृती से जोड़ते हैं. बुजुर्ग भगवती प्रसाद बताती हैं कि यहां परंपरा महाभारत काल से जुड़ी है, जब पांडव अज्ञातवास के दौरान विराट की नगरी में रुके थे, क्योकि उस समय पांडवो ने अपने अस्त्र और शस्त्र छिपाकर रख दिये थे. इसलिए भगवान श्री कृष्ण ने पांडवो को लाठी युद्ध कला कौशल की शिक्षा दी थी. उस समय होली का त्यौहार था. इसी के बाद यहां यह परंपरा की शुरुआत हो गई, जो आज भी बुंदेलखंड के गांवों में दिखाई देती है.

होली पर पुरुषों का प्रवेश वर्जित 

उत्तरप्रदेश के  हमीरपुर जिले में एक गाँव है  कुंडौरा , इस गाँव में  होली खेलने की  महिलाओं की अनोखी  परंपरा है। गाँव की  महिलाएं राम जानकी मंदिर से होली पर टोलियों में निकलकर गलियों में हुड़दंग करती हैं।लगभग पांच सौं साल से चली आ रही इस परम्परा में  जब महिलाएं होली खेल रही हों तब किसी भी पुरुष को आने की इजाजत नहीं होती है। पुरुष या तो गाँव के बाहर चले जाते हैं अथवा घर में ही बंद रहते हैं | अगर कोई बाहर आ गया तो उसकी जमकर मरम्मत हो जाती है या जुर्माना लग जाता है | होली खेलती महिलाओं की फोटो लेने भी प्रतिबंधित रहता है

लट्ठ मार होली 

  बुंदेलखंड के कई गांवों  में लट्ठ मार होली के साथ मटका फोड़  का खेल भी होता है  झांसी जिले के बबीना क्षेत्र में इसका चलन कुछ ज्यादा देखने को मिलता है दरअसल यह एक पूर्णे परम्परा है जिसे लोग बरसाने की होली से जोड़कर मानते हैं एक ऊँचे  लकड़ी के खम्भे पर गुड़ मेवा से भरी मटकी बांदी जाती है ,|  खम्बे पर आसानी से चढ़ ना पाएं इसलिए उसपर तेल लगा दिया जाता है | इस पर चढ़ने का जब पुरुष प्रयास करते हैं तो उन पर महिलायें लाठियों से प्रहार करती हैं | ये दुश्मनी की नहीं प्रेम की लाठी होती है जिसे खाने के बाद भी पुरुष नाराज नहीं होता

नहीं जलाते  होली और नहीं खेलते रंग गुलाल 

सागर जिले के देवरी विधानसभा क्षेत्र का एक गाँव है हथखोय , आदिवासी बाहुल्य इस गाँव में होली से लेकर रंग पंचमी तक कोई त्यौहार नहीं मनाते | यहाँ के आदिवासी समुदाय का मानना है की अगर हमने होली का त्यौहार मनाया तो हमारी कुल देवी झारखंडन देवी नाराज हो जाएंगी | गाँव के मुखिया मानते हैं कि बहुत समय पहले एक बार किसी ने होली जलाई थी , उसके बाद पुरे गाँव में आग लग गई थी | माता के दरबार में प्रार्थना करने और अपनी गलती की छमा मांगने के बाद आग शांत हुई तभी से  गाँव में होली नहीं मनाई जाती

दरअसल देश दुनिया में होली का त्यौहार ही ऐसा है जिसकी विविधता, रंगउत्साह और उमंग  सहज ही लोगों को मोहित कर लेता है |

 

विकास की उमंग और चुनौतियों के संघर्ष का बुंदेलखंड

  बुंदेलखंड की डायरी  विकास की उमंग और चुनौतियों के  संघर्ष का  बुंदेलखंड  रवीन्द्र व्यास  दो राज्य में बटे बुंदेलखंड के लिए    2025  में कई...