रवीन्द्र व्यास
बुंदेलखंड शोषित , शापित इस इलाके की बदनसीबी ही है की भू - गर्भ खनिजों ,रत्नो से सराबोर है पर जीवन जीने के लिए आवश्यक जल धीरे धीरे उससे दूर होता जा रहा है |28 फरवरी रविवार को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने जल सहेजने के लिए बुंदेलखंड के जिस गाँव का जिक्र किया है वह छतरपुर जिले के बड़ामलहरा विकाश खंड में स्थित है | यहां एक एनजीओ ने वन विभाग के पहाड़ को जेसीबी से कटवाकर नहर बनवाई थी | पर इसे प्रचारित इस तरह किया गया की गाँव की महिआलाओ ने पहाड़ काट कर पानी सहेजने का कार्य किया |
जल , जंगल, जानवर और जमीन जिससे जुड़ा है जीवन और समृद्धि का एक चक्र , पर आर्थिक समृद्धि की लालसा में जीवन के इस चक्र को ही ना सिर्फ खंडित कर दिया बल्कि इसे नेस्तानाबूद करने में जुटे हुए हैं | सामाजिक जिम्मेदारी समझने वाले लोग इसको लेकर प्रयास भी करते हैं , सरकार योजनाए भी बनाती है बजट भी देती है किन्तु तंत्र को संचालित करने वाला गिरोह योजनाओ को कागजों में साकार कर देता है और धन को अपनी तिजोरी में बंद कर देता है | जिसके चलते कागजों में जंगल लहलहा रहें हैं , और धरा जल से परिपूर्ण है | जल संरचनाओं की उपेक्षा ही बुंदेलखंड के दुष्काल का सबसे बड़ा कारण बन कर सामने आया है | आपदा में अवसर की तलाश में बैठे तथाकथित समाजसेवी लोग बुंदेलखंड के हालातों का भरपूर उपयोग करते हैं |
ऐसा ही एक मामला बुंदेलखंड के छतरपुर जिले के बड़ामलहरा विकाश खंड के अंगरोठा गाँव में देखने को मिला | इस गाँव में उरई उत्तर प्रदेश के परमार्थ समाज सेवी संस्थान ने स्थानीय ग्रामीण महिलाओं के सहयोग से सूखे तालाब को जल से लबालब भरने के लिए पहाड़ काट कर नहर बनाने का दावा किया | दावा किया गया की बीते 18 माह में पहाड़ काट कर 107 मीटर लम्बी नहर महिलाओं ने बनाई | प्रधान मंत्री मोदी जी ने २८ फरवरी को मन की बात कार्यक्रम में जब जल संरक्षण के लिए कहा कि साथियो, एक समय था जब गाँव में कुएं, पोखर, इनकी देखभाल, सब मिलकर करते थे, अब ऐसा ही एक प्रयास, तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई में हो रहा है। यहाँ स्थानीय लोगों ने अपने कुओं को संरक्षित करने के लिये अभियान चलाया हुआ है। ये लोग अपने इलाके में वर्षों से बंद पड़े सार्वजनिक कुओं को फिर से जीवित कर रहे हैं।मध्य प्रदेश के अगरोथा गाँव की बबीता राजपूत जी भी जो कर रही हैं, उससे आप सभी को प्रेरणा मिलेगी। बबीता जी का गाँव बुंदेलखंड में है। उनके गाँव के पास कभी एक बहुत बड़ी झील थी जो सूख गई थी। उन्होंने गाँव की ही दूसरी महिलाओं को साथ लिया और झील तक पानी ले जाने के लिये एक नहर बना दी। इस नहर से बारिश का पानी सीधे झील में जाने लगा। अब ये झील पानी से भरी रहती है। 28 फरवरी के दिन जब मोदी जी यह कह रहे थे तो जो दृश्य दिखाए जा रहे थे उसमे महिलाओं की बैठक दिखाई गई , तसला लेकर जाती महिलाएं दिखी हरी भरी पहाड़ी नजर आई तालाब का लॉन्ग शॉट नजर आया |
इस इलाके के जानकार बताते हैं की अंगरोठा का यह तालाब कोई २०० वर्ष पुराना है, और तालाब की मरम्मत का कार्य 2007 में बुंदेलखंड के पैकेज के तहत कराया गया था | तीनो और से पहाड़ियों से घिरे इस तालाब का भराव क्षेत्र इतना विशाल है कि यहां पहाड़ काटने की आवश्यकता ही नहीं थी | जो नहर बनाई गई है इसका ढाल उस ओर है जहां से पानी आने का दावा किया जा रहा है | हकीकत ये है की नहर में पानी तभी आएगा जब श्रोत स्थल दस फिट भर जाएगा | जब की इसी वर्षा जल भराव श्रोत स्थल से पानी नजदीक के एक दूसरे तालाब में पहुंचता था जिसमे आज भी पानी भरा है , और जिस अंगरोठा तालाब बनाम झील को पानी से भरा हुआ बताया जा रहा है वह पूर्णतः सूखा है | और जिस बछेड़ी नदी को जीवंत करने दावा किया जा रहा है वह भी सिर्फ कागजों में जीवंत हो गई | जेसीबी मशीनों से पहाड़ कटवाकर यह प्रचारित करवाना लोगों को रास नहीं आ रहा कि पहाड़ को महिलाओं ने काटा | गाँव की आदिवासी बति बाई कहती हैं कि हमने भी यहां काम किया ,मशीन आई थी उसने नहर बनाई , हमने ये खंती पहाड़ों पर बनाई वो बताती है कि 250 महिलाओं से काम कराया गया उन्हें पर्याप्त मजदूरी भी नहीं दी गई | बबिता राजपूत भी कहती हैं दो दिन जेसीबी मशीन चली क्यों की पत्थर हटाना महिलाओं के बस में नहीं था | मजदूरी के लिए महिलाओं को अनाज और श्रृंगार किट दी गई |
बुंदेलखंड में आपदा से अवसर तलाशते तथा कथित स्वयं सेवी संस्थान के लोग अपनी चालाकियों से जल सहजने का जो दिखावा करते हैं उसकी अगर सोशल आडिट कराई जाए तो कई बड़े रहस्योदघाटन हो जाएंगे | देखा जाए तो अगर आप वाकई समाज और आने वाली पीढ़ी को कुछ लौटाना चाहते हैं तो लोगों को छतरपुर नगर के जानकी कुंड जाकर देखना चाहिए | जहां के गोपाल भाई दुबे ने तालाब बचाने की ऐसी मुहीम शुरू की कि सारा नगर जुड़ गया , और उन्होंने इसका खुद श्रेय कभी नहीं लिया आज यह तालाब जन जन की आवाज बन गया है हर शहर वासी धन से सहयोग दे रहे हैं | अगर को इससे दूर है तो वे ऐसे स्वयं सेवी संस्थान जो बुंदेलखंड में जल के नाम पर कारोबार कर रहे हैं | जबकि जन सहयोग के इस अभियान में प्रशासन भी कंधे से कंधा मिलाकर जुटा है | छतरपुर कलेक्टर शीलेन्द्र सिंह स्वयं इस अभियान की देख रेख कर रहे हैं |


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शानदार
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