22 मार्च, 2021

Watar day-ken Betwa बुदेलखंड के लिए यादगार रहेगा विश्व जल दिवस

 बुंदेलखंड के लिए यादगार रहेगा विश्व जल दिवस   


रवीन्द्र व्यास 


२२ मार्च  को विश्व जल दिवस है और यह दिवस बुंदेलखंड के लोगों के लिए यादगार बन जाएगा ,| इस दिन प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी  में केन बेतवा लिंक परियोजना  शुरू करने के लिए केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ,मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान और उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ  हस्ताक्षर करेंगे | जल बटवारे को लेकर दोनों राज्यों के बीच  कई वर्षो से जंग चल रही थी  जिसके चलते अटल बिहारी वाजपेई के शासन काल में  स्वीकृत हुई यह योजना  कागजों में ही अपना अंतिम रूप नहीं ले पाई | सूत्रों की माने तो स्वयं मोदी जी के हस्तक्षेप के बाद जल बटवारे पर सहमति बनी | 


                                                             1993 में संयुक्त राष्ट्र ने २२ मार्च को विश्व जल दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया था  , निश्चित रूप से संयुक्त राष्ट्र की यह पहल दुनिया में घटते जल श्रोतो और  जल संरक्षण और आम्वर्धन के प्रति लोगों को जागरूक करने की थी | भारत  भू जल दोहन में दुनिया के शीर्ष देशों में से एक है ,| जिसके चलते  देश के अधिकाँश इलाकों में भूजल  स्तर  खतरनाक स्तर  तक गिर चुका है | पानी   को लेकर वाटर ओआरजी के आकड़े बतलाते है  कि  दुनिया के 85 करोड़ लोगों को साफ़  पानी नहीं मिल  पाता  है , जिनमे 60  करोड़ लोग अकेले हिन्दुस्तान के हैं | दुनिया भर में  औरतों का  6 घंटे का समय पानी भरने में खर्च होता है तो बुंदेलखंड में  24  घंटे में से 10 घंटे औरतों का समय पानी भरने में व्यतीत होता है | ये आंकड़े बताते हैं की जल को लेकर हालात कितने चिंता जनक हैं | सम्भवतः इसीलिए पीएम मोदी जी ने   इस वर्ष का विश्व जल दिवस देश में वर्षा जल संरक्षण अभियान के तहत मनाने का निर्णय लिया है जिसकी शुरुआत वे सोमवार को 12 बज कर 30 मिनट पर  करेंगे | 


   . 22 मार्च 2021 से 30 नवंबर 2021 तक पूरे देश में यह अभियान चलेगा | लोगों की भागीदार बनाकर इसे एक जान आंदोलन बनाने की मंशा सरकार की है | अब देखना यह होगा की वर्षा जल के संरक्षण के प्रति लोग अपनी जिम्मेदारी का कितना निर्वहन करते हैं | 


केन बेतवा लिंक परियोजना 


 सरकार और इंजीनियरों की नजर में  बुंदेलखंड के छतरपुर,पन्ना,टीकमगण ,झाँसी जिले के लोगों की तक़दीर और तस्वीर  बदलने वाली है  केन -बेतवा लिंक परियोजना।  अटल जी के प्रधानमंत्रित्व काल में जब देश की 37  नदियों को आपस मेंजोडने का फैसला लिया गया ,उनमे से एक यह भी थी ||यह देश की वहपरियोजना है जिसे सबसे पहले शुरू होना था |  इसका   मुख्य बाँध पन्ना टाइगर रिजर्व  के  ढोडन  गाँव में बनना है |बाँध वा नहरों के कारण सवा पांच हजार हेक्टेयर वन  क्षेत्र  नष्ट हो जाएगा ,छतरपुर जिले केदस गाँव डूब जायेंगे |


केन बेतवा लिंक परियोजना में चार बाँध बनाए जायेंगे | केन नदी पर ढोढन  बाँधबनेगा 77  मी.ऊँचा वा 19633  वर्ग कि.मी. जलग्रहण छमता  वाले इस मुख्य बाँधमें 2853  एम्.सी.एम्.पानी भंडारण कि छमता होगी| इस बाँध से दो  बिजली घर बनेंगेजिससे 78  में.वा. बिजली बनेगी   |इस बाँध के कारण पन्ना टाइगर रिजर्व  कि 5258  हेक्टेयरजमीन  सहित कुल 9  हजार हेक्टेयर जमीन डूब जाएगी | इस जमीन पर बसे सुकुवाहा ,भावरखुवा ,घुगारी ,वसोदा ,कुपी,शाहपुरा ,डोंदन ,पल्कोहा ,खरयानी,और मेनारी गाँव का अस्तित्वसमाप्त हो जाएगा | बाँध से 221  कि.मी.लम्बी मुख्य  नहर उत्तर प्रदेश के बरुआ सागर में जाकर मिलेगी | इस नहर से 1074  एम्.सी.एम्. पानी प्रति वर्ष भेजा जाएगा ,जिसमेसे 659  एम्.सी.एम्. पानी बेतवा नदी में पहुंचेगा |


ढोंडन  बाँध के अलावा तीन और बाँध भी मध्य प्रदेश कि जमीन पर बेतवा नदी पर  बनेंगे |रायसेन , विदिशा जिले में बनने वाले मकोडिया बाँध से 5685 हेक्टेयर क्षेत्र  में,बरारी बेराजसे 2500  हे.वा केसरी बेराज से 2880  हे. क्षेत्र  में  सिचाई  होगी | लिंक नहर से मार्गोंमें 60294  हे. क्षेत्र  सिंचित होगा ,इसमे मध्यप्रदेश के 46599  हे. वा उत्तर प्रदेशके 13695  हे.क्षेत्र  में सिचाई होगी | ढोंडन बाँध से  नहर के मार्ग में पडऩे वाले 6.45 लाख हेक्टेयर (1.55 लाख हेक्टेयर उत्तर प्रदेश में एवं 4.90 लाख हेक्टेयर मध्य प्रदेश में) जमीन की सिंचाई के लिए 31960 लाख घन मीटर पानी इस्तेमाल होगा। इससे घरेलू एवं औद्योगिक उपयोग के लिए 120 लाख घन मीटर पानी प्रदान किया जाएगा।


                 2008  में केन बेतवा लिंक परियोजना की पूर्ण ड्राइंग डिजाइन तैयार की गई | पर्यावरण विदों और वन आप्पत्ति के चलते मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा था | 2015 में उमा भारती  इस परियोजना को शुरू करने  की  भी कोशिश की थी | पर  यह हो नहीं सकी  2017  में नॅशनल बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ की  सशर्त अनुमति के बाद फिर यह आश  बंधी की परियोजना शुरू होगी | पर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच  जल बटवारे को लेकर बात नहीं बनी | अब दोनों राज्यों के  बीच जल बटवारे को लेकर सहमति बनने के बाद  परियोजना को विश्व जल दिवस पर हरी झंडी मिलेगी |   


 


 जल संरक्षण 


  सभी जानते हैं कि जल बिन जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है ,|  दुनिया की तमाम सभ्यताओं का विकाश   नदियों के के किनारे  ही हुआ है |  बुंदेलखंड इलाके में सभ्यताओं  के विकाश लिए  के लोगों ने जहाँ नदी नहीं थी वहां सरोवरों का  निर्माण किया |   भारत की संस्कृति में जल के महत्व को पर्याप्त स्थान मिला है वैदिक साहित्य में  भू जल विज्ञान  का विकाश ५ हजार वर्ष से भी ज्यादा प्राचीन माना जाता है | पंच तत्व से जिस शरीर के निर्माण की बात  भारत के  धर्म ग्रंथो  में की जाती है  उनमे जल भी एक महत्वपूर्ण  घटक है |  


                          वर्षों से मानव सभ्यता एक कार्य में जुटी रही की जल जहां हो जैसा हो उसे उपयोग कर लो | परिणाम ये हुआ की भू जल भण्डार खाली होते गए , इन भंडारों को भरने की हमने जरुरत नहीं समझी | दुनिया के ९९ फीसदी पानी पिने के काम का नहीं है मात्र एक फीसदी जल ही पीने योग्य है , ऐसा नहीं की ये देश के अधिकाँश लोग ना जानते हों , जानते हैं इसी लिए जल के नाम पर बड़े बड़े एनजीओ अपना कारोबार  चला रहे हैं | समाजसेवी होने का चोला ओढ़कर इनमे से अधिकाँश जनता और सरकार से एक बड़ा छलाव करने में जुटे हैं | 


                                                  दरअसल  जल संरक्षण के लिए एक ईमान दार  पहल की जरुरत है | ऐसी सार्थक पहल कुछ लोग करते भी हैं  और उसके सार्थक परिणाम भी देखने को मिलते हैं |

09 मार्च, 2021

watar_NGO_जेसीबी से काटा पहाड़ :: अवसर की तलाश में स्वयं सेवी संस्थान







रवीन्द्र व्यास

बुंदेलखंड  शोषित , शापित इस इलाके की बदनसीबी ही है की भू - गर्भ खनिजों ,रत्नो से सराबोर है पर जीवन  जीने के लिए आवश्यक जल धीरे  धीरे उससे दूर होता जा रहा है |28 फरवरी  रविवार को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने जल सहेजने के लिए बुंदेलखंड के जिस गाँव का जिक्र किया है वह छतरपुर जिले के बड़ामलहरा विकाश खंड में स्थित है |  यहां एक एनजीओ ने  वन विभाग के पहाड़ को जेसीबी से कटवाकर  नहर बनवाई थी |   पर इसे प्रचारित इस तरह किया गया की  गाँव की महिआलाओ ने पहाड़ काट कर  पानी सहेजने का कार्य किया  | 


  जल , जंगलजानवर  और जमीन  जिससे जुड़ा है जीवन और समृद्धि का एक चक्र , पर आर्थिक समृद्धि की लालसा में जीवन के इस चक्र को ही ना सिर्फ  खंडित कर दिया बल्कि इसे नेस्तानाबूद करने में जुटे हुए हैं | सामाजिक जिम्मेदारी समझने वाले लोग इसको लेकर प्रयास भी करते हैं , सरकार योजनाए भी बनाती है बजट भी देती है किन्तु तंत्र को संचालित करने वाला गिरोह योजनाओ को कागजों में साकार कर देता है और धन को अपनी तिजोरी में बंद कर देता है | जिसके चलते कागजों में जंगल लहलहा रहें हैं , और धरा जल से परिपूर्ण है | जल संरचनाओं की उपेक्षा ही  बुंदेलखंड के दुष्काल का सबसे बड़ा कारण बन कर सामने आया है | आपदा में अवसर की तलाश में बैठे  तथाकथित समाजसेवी  लोग बुंदेलखंड के हालातों का भरपूर उपयोग करते हैं | 


                                       ऐसा ही एक मामला  बुंदेलखंड के छतरपुर जिले के बड़ामलहरा विकाश खंड के अंगरोठा  गाँव में देखने को  मिला |  इस गाँव में उरई उत्तर प्रदेश के  परमार्थ समाज सेवी संस्थान  ने  स्थानीय ग्रामीण महिलाओं के सहयोग से  सूखे तालाब को जल से लबालब भरने के लिए पहाड़ काट कर  नहर बनाने का दावा किया | दावा किया गया की बीते  18  माह में पहाड़ काट कर   107  मीटर लम्बी नहर महिलाओं ने बनाई |  प्रधान मंत्री मोदी जी ने  २८ फरवरी को मन की बात कार्यक्रम में  जब जल संरक्षण के लिए कहा कि  साथियोएक समय था जब गाँव में कुएंपोखरइनकी देखभालसब मिलकर करते थेअब ऐसा ही एक प्रयासतमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई में हो रहा है। यहाँ स्थानीय लोगों ने अपने कुओं को संरक्षित करने के लिये अभियान चलाया हुआ है। ये लोग अपने इलाके में वर्षों से बंद पड़े सार्वजनिक कुओं को फिर से जीवित कर रहे हैं।मध्य प्रदेश के अगरोथा गाँव की बबीता राजपूत जी भी जो कर रही हैंउससे आप सभी को प्रेरणा मिलेगी। बबीता जी का गाँव बुंदेलखंड में है। उनके गाँव के पास कभी एक बहुत बड़ी झील थी जो सूख गई थी। उन्होंने गाँव की ही दूसरी महिलाओं को साथ लिया और झील तक पानी ले जाने के लिये एक नहर बना दी। इस नहर से बारिश का पानी सीधे झील में जाने लगा। अब ये झील पानी से भरी रहती है। 28 फरवरी के दिन जब मोदी जी यह कह रहे थे तो जो दृश्य दिखाए जा रहे थे उसमे महिलाओं की बैठक दिखाई गई , तसला लेकर जाती महिलाएं दिखी हरी भरी पहाड़ी नजर आई तालाब का लॉन्ग शॉट नजर आया  |


 

  इस इलाके के जानकार बताते हैं की अंगरोठा का यह तालाब कोई २०० वर्ष पुराना है, और तालाब की मरम्मत का कार्य 2007 में बुंदेलखंड के पैकेज के तहत कराया गया था | तीनो और से पहाड़ियों से घिरे इस तालाब का भराव क्षेत्र इतना विशाल है कि यहां पहाड़ काटने की आवश्यकता ही नहीं थी |  जो नहर बनाई गई है इसका ढाल उस ओर है जहां से पानी आने का दावा किया जा रहा है | हकीकत ये है की नहर में पानी तभी आएगा जब  श्रोत स्थल दस फिट भर जाएगा | जब की इसी वर्षा  जल भराव श्रोत स्थल से पानी नजदीक के एक दूसरे तालाब में पहुंचता था जिसमे  आज भी पानी भरा है , और जिस अंगरोठा तालाब बनाम झील को पानी से भरा हुआ बताया जा रहा है वह पूर्णतः सूखा है | और जिस बछेड़ी नदी को जीवंत करने दावा किया जा रहा है वह भी सिर्फ कागजों में जीवंत हो गई |  जेसीबी मशीनों से पहाड़ कटवाकर यह  प्रचारित करवाना लोगों को रास नहीं आ रहा कि पहाड़ को महिलाओं ने काटा | गाँव की आदिवासी बति बाई कहती हैं कि हमने भी यहां काम किया ,मशीन आई थी उसने नहर बनाई , हमने ये खंती  पहाड़ों पर बनाई वो बताती है कि  250  महिलाओं से काम कराया गया उन्हें पर्याप्त मजदूरी भी नहीं  दी गई |   बबिता राजपूत भी कहती हैं दो दिन जेसीबी मशीन चली क्यों की पत्थर हटाना महिलाओं के बस में नहीं था | मजदूरी के लिए महिलाओं को अनाज और श्रृंगार किट दी गई | 

 

                              बुंदेलखंड में आपदा से अवसर तलाशते तथा कथित स्वयं सेवी संस्थान के लोग अपनी चालाकियों से जल सहजने का जो दिखावा करते हैं उसकी अगर सोशल आडिट कराई जाए तो कई बड़े रहस्योदघाटन हो जाएंगे | देखा जाए तो अगर आप वाकई समाज और आने वाली पीढ़ी को कुछ लौटाना चाहते हैं तो लोगों को छतरपुर नगर के जानकी कुंड  जाकर देखना चाहिए | जहां के गोपाल भाई दुबे ने तालाब बचाने की ऐसी मुहीम शुरू की कि सारा नगर जुड़ गया , और उन्होंने इसका खुद श्रेय कभी नहीं लिया आज यह तालाब जन जन की आवाज बन गया है हर शहर वासी  धन से सहयोग दे रहे हैं | अगर को इससे दूर है तो वे ऐसे स्वयं सेवी संस्थान जो बुंदेलखंड में जल के नाम पर कारोबार कर रहे हैं | जबकि जन सहयोग के इस अभियान में प्रशासन भी कंधे से कंधा मिलाकर जुटा है | छतरपुर कलेक्टर शीलेन्द्र सिंह स्वयं इस अभियान की देख रेख कर रहे हैं | 


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