बुंदेलखंड की डायरी
बुंदेली लोक संस्कृति को बचाने का जतन बुंदेली उत्सव
रवीन्द्र व्यास
वसंत ऋतू को ऋतुओं का राजा ऐसे ही नहीं कहा जाता है , इस समय वायु मंडल के पांचो तत्व(अग्नि ,जल,वायु,धरा और गगन ) अपने मन मोहक स्वरुप में होते हैं | प्रकृति मानो अपना नवश्रृंगार कर रही हो ऐसी अदभुत ऋतू में बुंदेलखंड इलाके में बुन्देली सांस्कृतिक के रंग घरों से निकल कर मंचों पर बिखरने लगते हैं । बुंदेली लोक कला और संस्कृति के रंग ,बुंदेलखंड के कई जिलों में मंच पर देखने को मिल जाते हैं ,पर उनमे से छतरपुर जिले के बसारी गाँव के बुंदेली उत्सव के रंग कुछ अलग ही हैं | बुंदेली उत्सव के साथ ही साथ खजुराहो में खजुराहो नृत्य समारोह २० फरवरी से शुरू होगा , वही इस बार ओरछा में ६ मार्च से तीन दिवसीय नमस्ते ओरछा फेस्टिवल शुरू होगा |
आधुनिकता की दौड़ में और हम कहीं ना कही अपने सांस्कृतिक मूल्यों ,परम्पराओं और तो और भाषा को ही भूलते जा रहे हैं । लोकसंस्कृति को बचाने और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से अवगत कराने के लिए छतरपुर जिले के एक छोटे से गाँव बसारी में पिछले 23 वर्ष से बुन्देली उत्सव होता आ रहा है ।२४ वे बुन्देली उत्सव के आयोजन के दौरान १७ फरवरी से २२ फरवरी तक चलेगा | 16 फरवरी को बुन्देली उत्सव का शुभारंभ मप्र के राजस्व एवं परिवहन मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने किया । शुभारम्भ मौके पर बुंदेली उत्सव में बिखरी बुंदेली संस्कृति से वे इतने प्रभावित हुए कि खुद भी अपने को गीत सुनाने से नहीं रोक पाए | श्री राजपूत ने कहा कि हमारी कला, संस्कृति, रीतिरिवाज, बोली, खेल, गायन और नृत्य आज देश भर में चर्चित हो रहे हैं। उन्होंने फिल्मों में लिए गए कई बुन्देली गीतों को मंच से गाकर सुनाया और कहा कि यह हमारे लिए गर्व की बात है कि हमारे शब्द और संस्कृति दुनिया का ध्यान खींच रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनके सागर जिले की राई लोक नृत्य की टीम को जापान में नृत्य प्रतियोगिता में जब प्रथम पुरस्कार मिला तब दुनिया ने माना कि हमारा लोक नृत्य, हमारी संस्कृति कितनी अनूठी है। उन्होंने बुन्देली विकास संस्थान एवं पूर्व विधायक मुन्नाराजा के कार्यो की प्रशंसा करते हुए कहा कि ये उनके ही प्रयासों का नतीजा है कि उन्होंने इस अनूठे आयोजन को देश भर में पहुंचाकर बुन्देलखण्ड की कला और संस्कृति को विस्तार दिया है। उन्होंने कहा कि हमें गर्व है कि हम बुन्देलखण्डी हैं।
बुंदेली उत्सव के आयोजन के चलते इस छोटे से गाँव में एक विशाल स्टेडियम बन गया । इस मैदान पर आयोजन के दौरान जब छोटे छोटे बच्चों को गिल्ली डंडा खेलते हुए लोग देखते हैं तो लोगो को अपने अतीत की बरबस याद आ ही जाती है । अब तो ये खेल किसी गाँव की गली में भले देखने को मिल जाए शहरों से तो गायब हो चुका है । बच्चे मोबाइल और कम्यूटर के खेल में व्यस्त हैं । बुंदेलखंड की मनमोहक चित्रकारी , महिलाओं की कुश्ती प्रतियोगिता , कबड्डी , बालीबाल , घोड़ो का नाच , रस्सा कसी , बुन्देली व्यंजन प्रतियोगिता बरबस ही लोगों का ध्यान अपनी और खीँचती है । चौपड़ पहले बुंदेलखंड के प्रिय खेंलों में से एक होता था , गाँव गाँव में चौपड़ के फड् जमते थे, हालात बदले अब खेल को जानने और समझने वाले कम लोग ही बचे हैं । यहां इस खेल की प्रतियोगिता देखते ही बनती थी । जब लोग पांसे फेंक कर जयकारा लगाते थे ।
मंचीय कार्यक्रमो में लोक विधाओं की महफिले ना सिर्फ सजेंगी बल्कि उनकी प्रतियोगिता भी होगी | यहां के मंच पर बुंदेलखंड के अंचल में अब सीमित और लुप्त होते जा रहे बधाई नृत्य , कछयाई , दीवारी , अहिरयाई , कहरवा , बनरे , लमटेरा , सैर , ख्याल ,दादरा , गोटें , कार्तिक गीत , आल्हा ,बिलवारी ,काडरा , रावला ,सोहरे ,ढिमरयाई , राई और फाग की लय और ताल, एक अलग ही रंग जमाते हैं । अपने आप में अनोखी इन प्रस्तुतियों को देखने सुनने और समझने का मौका यहाँ मिलता है । हम जिन बैलो को छोड़ कर मशीनी युग में जी रहे हैं उन बैलो की बैल गाडी दौड़ प्रतियोगिता भी किसानों को बैलो से लगाव और प्रकृति से जुड़े रहने का सन्देश देती है । इस बार डोंडा (नोका ) दौड़ प्रतियोगिता का भी आयोजन 17 को हुआ । बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत को लिपि वद्ध करने के लिए हर वर्ष की तरह बुन्देली वसंत पत्रिका का विमोचन भी मंत्री जी ने किया । बुंदेलखंड की विरासत को सहेजने और समृद्ध करने वालों का सम्मान भी हुआ । यहां बुन्देली में बनी फिल्मो का प्रदर्शन भी पिछले ३-४ वर्षो से किया जा रहा है ।
पूर्व विधायक शंकर प्रताप सिंह बुंदेला , 23 साल पहले शुरू किये गए इस आयोजन के सम्बन्ध में बताते हैं कि , इस दौर में हम अपनी , बोली ,भाषा ,संस्कृति को भूलते जा रहे हैं , बुंदेलखंड की यह वाणी और संस्कृति बची रहे इसी लिए यह शुरुआत की थी । आज पाश्चात्य संस्कृति इतनी हॉबी होती जा रही है कि लोगों का खान-पान और रहन-सहन बदल गया है, लोक संस्कृति भूलते जा रहे हैं , बुन्देली बोलने में लोगों को शर्म आने लगी है ।लोग अपने बच्चों को बुंदेलखंडी बोलने पर डांटने लगे हैं , यहां तक की मजदूरी करके लौटे लोग भी बुन्देली छोड़ एक अजीब तरह की हिंदी बोलने लगते हैं ।
शंकर प्रताप सिंह बुंदेला के विचारों से सहमत छतरपुर के प्रमुख साहित्यकार सुरेंद्र शर्मा शिरीष , प्रो बहादुर सिंह परमार , ,के. एल पटेल सहित अनेको साहित्यकार,समाज सेवी बुंदेलखंड की लोकसंस्कृति को बचाने के इस अभियान में जुटे हैं । श्री बुंदेला भले ही इसे गैर राजनैतिक मानकर कार्य करते हैं , अपने इस आयोजन में सभी राजनैतिक दलों के लोगों को जोड़ने का प्रयास भी करते हैं मुख्य अतिथि भी बनाते हैं , पर सियासत करने वाले इसमें भी राजनैतिक रंग देने से नहीं चूकते ।
श्री बुंदेला ने जब यह कार्यक्रम शुरू किया था उस समय प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी । शुरुआत के पांच साल तो सरकार और लोगों के सहयोग से ठीक ठाक चले । यह वह दौर था जब सांस्कृतिक विरासत को बचाने के इस अभियान की एक मजबूत नीव बन चुकी थी । सरकार बदली सियासत का और लोगों का मिजाज भी बदल गया । सरकार ने सहयोग पर विराम लगा दिया , सियासत से हित साधने वाले अनेकों लोगों ने मुंह मोड़ लिया । यहां तक की इस आयोजन के समांनातर छतरपुर में एक आयोजन भी उन्ही दिनों सरकार ने कराया , एक ही साल हुआ ।
देखा जाए तो लोकसंस्कृति किसी बैशाखी की मुहताज ७० -८० के दशक तक नहीं रही । लोकसंस्कृति और लोक परंपराएं बुंदेलखंड के लोगों की जीवन की एक शैली थी और है। पर बीते तीन_चार दशकों में जिस तेजी से जन रंजन के माध्यमो का विस्तार हुआ उसने देश की तमाम लोकसंस्कृतियो पर आघात पहुंचाया है । हालांकि लोकसंस्कृति के कोई लिखित मापदंड नहीं होते पर इसमें परम्पराओ की जड़ें इतनी गहरी होती हैं की इसको बदलने में सादिया बीत जाती थी । आधुनिकता की जीवन शैली और पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण लोगों को अपनी परम्पराओं से अलग कर देता है । ऐसी दशा में वे न घर के रहते ना घाट के । जिस बुन्देली भाषा के बोलने में आज के बुन्देलखण्ड के नव् धनाड्य वर्ग को शर्म आती है , असल में आम जन मानस में यह बात बैठा दी गयी है कि रीती रिवाज , लोक गीत , बोली वगैरह गवारुपन है , पाश्चात्य सभ्यता अपनाना ,विलायती शब्दों का प्रयोग आधुनिकता है | देश के जाने माने साहित्यकार प बनारसी दास चतुर्वेदी ने मधुकर पत्रिका में लिखा था कि बुन्देली भाषा इतनी मधुर और समृद्ध है कि इसके सामने बृज की भाषा कही नहीं लगती ।
वसंत ऋतू को ऋतुओं का राजा ऐसे ही नहीं कहा जाता है , इस समय वायु मंडल के पांचो तत्व(अग्नि ,जल,वायु,धरा और गगन ) अपने मन मोहक स्वरुप में होते हैं | प्रकृति मानो अपना नवश्रृंगार कर रही हो ऐसी अदभुत ऋतू में बुंदेलखंड इलाके में बुन्देली सांस्कृतिक के रंग घरों से निकल कर मंचों पर बिखरने लगते हैं । बुंदेली लोक कला और संस्कृति के रंग ,बुंदेलखंड के कई जिलों में मंच पर देखने को मिल जाते हैं ,पर उनमे से छतरपुर जिले के बसारी गाँव के बुंदेली उत्सव के रंग कुछ अलग ही हैं | बुंदेली उत्सव के साथ ही साथ खजुराहो में खजुराहो नृत्य समारोह २० फरवरी से शुरू होगा , वही इस बार ओरछा में ६ मार्च से तीन दिवसीय नमस्ते ओरछा फेस्टिवल शुरू होगा |
आधुनिकता की दौड़ में और हम कहीं ना कही अपने सांस्कृतिक मूल्यों ,परम्पराओं और तो और भाषा को ही भूलते जा रहे हैं । लोकसंस्कृति को बचाने और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से अवगत कराने के लिए छतरपुर जिले के एक छोटे से गाँव बसारी में पिछले 23 वर्ष से बुन्देली उत्सव होता आ रहा है ।२४ वे बुन्देली उत्सव के आयोजन के दौरान १७ फरवरी से २२ फरवरी तक चलेगा | 16 फरवरी को बुन्देली उत्सव का शुभारंभ मप्र के राजस्व एवं परिवहन मंत्री गोविंद सिंह राजपूत ने किया । शुभारम्भ मौके पर बुंदेली उत्सव में बिखरी बुंदेली संस्कृति से वे इतने प्रभावित हुए कि खुद भी अपने को गीत सुनाने से नहीं रोक पाए | श्री राजपूत ने कहा कि हमारी कला, संस्कृति, रीतिरिवाज, बोली, खेल, गायन और नृत्य आज देश भर में चर्चित हो रहे हैं। उन्होंने फिल्मों में लिए गए कई बुन्देली गीतों को मंच से गाकर सुनाया और कहा कि यह हमारे लिए गर्व की बात है कि हमारे शब्द और संस्कृति दुनिया का ध्यान खींच रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनके सागर जिले की राई लोक नृत्य की टीम को जापान में नृत्य प्रतियोगिता में जब प्रथम पुरस्कार मिला तब दुनिया ने माना कि हमारा लोक नृत्य, हमारी संस्कृति कितनी अनूठी है। उन्होंने बुन्देली विकास संस्थान एवं पूर्व विधायक मुन्नाराजा के कार्यो की प्रशंसा करते हुए कहा कि ये उनके ही प्रयासों का नतीजा है कि उन्होंने इस अनूठे आयोजन को देश भर में पहुंचाकर बुन्देलखण्ड की कला और संस्कृति को विस्तार दिया है। उन्होंने कहा कि हमें गर्व है कि हम बुन्देलखण्डी हैं।
बुंदेली उत्सव के आयोजन के चलते इस छोटे से गाँव में एक विशाल स्टेडियम बन गया । इस मैदान पर आयोजन के दौरान जब छोटे छोटे बच्चों को गिल्ली डंडा खेलते हुए लोग देखते हैं तो लोगो को अपने अतीत की बरबस याद आ ही जाती है । अब तो ये खेल किसी गाँव की गली में भले देखने को मिल जाए शहरों से तो गायब हो चुका है । बच्चे मोबाइल और कम्यूटर के खेल में व्यस्त हैं । बुंदेलखंड की मनमोहक चित्रकारी , महिलाओं की कुश्ती प्रतियोगिता , कबड्डी , बालीबाल , घोड़ो का नाच , रस्सा कसी , बुन्देली व्यंजन प्रतियोगिता बरबस ही लोगों का ध्यान अपनी और खीँचती है । चौपड़ पहले बुंदेलखंड के प्रिय खेंलों में से एक होता था , गाँव गाँव में चौपड़ के फड् जमते थे, हालात बदले अब खेल को जानने और समझने वाले कम लोग ही बचे हैं । यहां इस खेल की प्रतियोगिता देखते ही बनती थी । जब लोग पांसे फेंक कर जयकारा लगाते थे ।
मंचीय कार्यक्रमो में लोक विधाओं की महफिले ना सिर्फ सजेंगी बल्कि उनकी प्रतियोगिता भी होगी | यहां के मंच पर बुंदेलखंड के अंचल में अब सीमित और लुप्त होते जा रहे बधाई नृत्य , कछयाई , दीवारी , अहिरयाई , कहरवा , बनरे , लमटेरा , सैर , ख्याल ,दादरा , गोटें , कार्तिक गीत , आल्हा ,बिलवारी ,काडरा , रावला ,सोहरे ,ढिमरयाई , राई और फाग की लय और ताल, एक अलग ही रंग जमाते हैं । अपने आप में अनोखी इन प्रस्तुतियों को देखने सुनने और समझने का मौका यहाँ मिलता है । हम जिन बैलो को छोड़ कर मशीनी युग में जी रहे हैं उन बैलो की बैल गाडी दौड़ प्रतियोगिता भी किसानों को बैलो से लगाव और प्रकृति से जुड़े रहने का सन्देश देती है । इस बार डोंडा (नोका ) दौड़ प्रतियोगिता का भी आयोजन 17 को हुआ । बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत को लिपि वद्ध करने के लिए हर वर्ष की तरह बुन्देली वसंत पत्रिका का विमोचन भी मंत्री जी ने किया । बुंदेलखंड की विरासत को सहेजने और समृद्ध करने वालों का सम्मान भी हुआ । यहां बुन्देली में बनी फिल्मो का प्रदर्शन भी पिछले ३-४ वर्षो से किया जा रहा है ।
पूर्व विधायक शंकर प्रताप सिंह बुंदेला , 23 साल पहले शुरू किये गए इस आयोजन के सम्बन्ध में बताते हैं कि , इस दौर में हम अपनी , बोली ,भाषा ,संस्कृति को भूलते जा रहे हैं , बुंदेलखंड की यह वाणी और संस्कृति बची रहे इसी लिए यह शुरुआत की थी । आज पाश्चात्य संस्कृति इतनी हॉबी होती जा रही है कि लोगों का खान-पान और रहन-सहन बदल गया है, लोक संस्कृति भूलते जा रहे हैं , बुन्देली बोलने में लोगों को शर्म आने लगी है ।लोग अपने बच्चों को बुंदेलखंडी बोलने पर डांटने लगे हैं , यहां तक की मजदूरी करके लौटे लोग भी बुन्देली छोड़ एक अजीब तरह की हिंदी बोलने लगते हैं ।
शंकर प्रताप सिंह बुंदेला के विचारों से सहमत छतरपुर के प्रमुख साहित्यकार सुरेंद्र शर्मा शिरीष , प्रो बहादुर सिंह परमार , ,के. एल पटेल सहित अनेको साहित्यकार,समाज सेवी बुंदेलखंड की लोकसंस्कृति को बचाने के इस अभियान में जुटे हैं । श्री बुंदेला भले ही इसे गैर राजनैतिक मानकर कार्य करते हैं , अपने इस आयोजन में सभी राजनैतिक दलों के लोगों को जोड़ने का प्रयास भी करते हैं मुख्य अतिथि भी बनाते हैं , पर सियासत करने वाले इसमें भी राजनैतिक रंग देने से नहीं चूकते ।
श्री बुंदेला ने जब यह कार्यक्रम शुरू किया था उस समय प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी । शुरुआत के पांच साल तो सरकार और लोगों के सहयोग से ठीक ठाक चले । यह वह दौर था जब सांस्कृतिक विरासत को बचाने के इस अभियान की एक मजबूत नीव बन चुकी थी । सरकार बदली सियासत का और लोगों का मिजाज भी बदल गया । सरकार ने सहयोग पर विराम लगा दिया , सियासत से हित साधने वाले अनेकों लोगों ने मुंह मोड़ लिया । यहां तक की इस आयोजन के समांनातर छतरपुर में एक आयोजन भी उन्ही दिनों सरकार ने कराया , एक ही साल हुआ ।
देखा जाए तो लोकसंस्कृति किसी बैशाखी की मुहताज ७० -८० के दशक तक नहीं रही । लोकसंस्कृति और लोक परंपराएं बुंदेलखंड के लोगों की जीवन की एक शैली थी और है। पर बीते तीन_चार दशकों में जिस तेजी से जन रंजन के माध्यमो का विस्तार हुआ उसने देश की तमाम लोकसंस्कृतियो पर आघात पहुंचाया है । हालांकि लोकसंस्कृति के कोई लिखित मापदंड नहीं होते पर इसमें परम्पराओ की जड़ें इतनी गहरी होती हैं की इसको बदलने में सादिया बीत जाती थी । आधुनिकता की जीवन शैली और पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण लोगों को अपनी परम्पराओं से अलग कर देता है । ऐसी दशा में वे न घर के रहते ना घाट के । जिस बुन्देली भाषा के बोलने में आज के बुन्देलखण्ड के नव् धनाड्य वर्ग को शर्म आती है , असल में आम जन मानस में यह बात बैठा दी गयी है कि रीती रिवाज , लोक गीत , बोली वगैरह गवारुपन है , पाश्चात्य सभ्यता अपनाना ,विलायती शब्दों का प्रयोग आधुनिकता है | देश के जाने माने साहित्यकार प बनारसी दास चतुर्वेदी ने मधुकर पत्रिका में लिखा था कि बुन्देली भाषा इतनी मधुर और समृद्ध है कि इसके सामने बृज की भाषा कही नहीं लगती ।