24 दिसंबर, 2017

Desart Of Bundelkhand



सूखा ग्रस्त बुंदेलखंड में खजुराहो की सुनहरी शाम 

 रवीन्द्र व्यास 
वो सात दिनों की खजुराहो की सुनहरी शाम थी , सरकार की रंगीन दुनिया में  खजुराहो  में  फ़िल्मी दुनिया के सितारे छटा बिखेर रहे थे  | | इसी दौरान  खजुराहो के रेलवे स्टेशन पर बुंदेलखंड के किसानो वा खेत मजदूरों की भीड़ अपने पेट की आग बुझाने के लिए दिल्ली जाने की जद्दोजहद में जुटे थे | दोनों ही नज़ारे  चौंका देने वाले थे  | यहां से जाने वाली संपर्क क्रान्ति  की जनरल बोगी में घुसने के लिए  किसान और खेत मजदूर जद्दो जहद करते दिखे | पर शायद रंगीन चश्मे से देखने वाली सरकार  और  उसके तंत्र  के लिए फिल्म महोत्सव तो नजर आता है पर बुंदेलखंड के इन किसानो के दर्द को देखने और समझने की उसके पास फुर्सत नहीं है | 



                                खजुराहो रेलवे स्टेशन पर संपर्क क्रान्ति ट्रेन का इन्तजार करते  मिले पन्ना जिले के बराच गाँव के किसान  बसंत लाल साहू (३५ )  बताने लगे की क्या करे इस बार पानी हे ही नहीं पहले की फसल भी बर्बाद हो गई थी इस बार भी पानी नहीं है जिस कारण खेत खाली पड़े हैं , ले देकर मजदूरी का ही सहारा है सो मजदूरी के लिए दिल्ली जा रहे हैं | गाँव में मनरेगा जैसी योजनाओं से काम मिलने अथवा पन्ना में मजदूरी करने के सवाल पर उसका जबाब भी कम चौकाने वाला नहीं था ,बताने लगा की काहे का मनरेगा काम करो तो छह माह में मजदूरी मिलती है , पन्ना में तो कोई काम ही नहीं है | उसके ही साथ जाने वाले पवन साहू , जगदीश साहू  और उसकी पत्नी वंदना का भी यही दर्द था | बच्चो को अपने बूढ़े माँ बाप के भरोषे गाँव में छोड़ आये हैं | जिसका दर्द भी उनके चेहरों पर साफ़ पड़ा जा सकता था |जगदीश ने बताया की उनके गाँव के लगभग ६० फीसदी जवान लोग पलायन कर गए गाँव में सिर्फ बुजुर्ग और आसक्त लोग ही अधिकांश बचे हैं |

                                                   ऐसी ही व्यथा कथा  छतरपुर जिले के बिजावर विकाश खंड के अमरपुरा गाँव के आदिवासी राम राजा सोर , पप्पू  और वीरेंद्र की भी थी | आदिवासी बाहुल्य इस गाँव के अधिकांश आदिवासी मजदूरी के लिए गाँव छोड़ कर जा चुके हैं | रामराजा ने बताया की पानी की हालात ये है की पिछली साल हम अपने पडोसी खेत वाले को सिचाई के लिए पानी देते थे इस बार हालत ये है की हमें पीने  का पानी दूसरों से मांगना पढ़  रहा है  | दो हजार की आबादी वाले इस गाँव में भी वही मातमी सन्नाटा पसरा हुआ है |  इसी रेलवे स्टेशन पर हमें खजुराहो के ही राकेश अनुरागी और कालीचरण भी मिले , ये दोनों भी मजदूरी की तलाश में दिल्ली ही जा रहे थे | पर्यटन नगरी के पास इनकी बेशकीमती जमीन तो थी  पर उनके गाँव के पास बने बाँध ने उनके और उनके परिवार का जीने का सहारा ही छीन लिया | उनकी सारी जमीन बाँध की भेंट चढ़ गई और जो मुआवजा मिला उससे प्लाट भी खरीदने लायक स्थिति नहीं थी |  अब मजदूरी ही जीने का सहारा है  मजदूरी के लिए दिल्ली जा रहे  हैं | 

                                                   ट्रेन के प्लेट फ़ार्म पर आते ही भगदड़ सी मच गई हर कोई जल्द से जल्द बोगी में सवार होने के लिए इधर से उधर  सर पर बड़ी सी पोटली रखे दौड़ लगा रहा था | ठसा ठस भरे रेल के इस जनरल कम्पार्टमेंट में पैर रखने के लिए भी जगह नहीं थी | पर पेट की आग बुंदेलखंड के किसानो को मजबूर कर रही है की या तो मौत को गले लगा लो या घर छोडो | 


                                                    खजुराहो रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर राजकुमार बताने लगे की हर रोज लगभग एक हजार टिकिट दिल्ली के लिए कटते हैं  | इनमे अधिकाँश यात्री मजदूर वर्ग के ही रहते हैं | स्टेशन पर ही कुली का काम करने वाले बताने लगे की दरअसल एक टिकिट पर दो से चार लोगों के टिकिट रहते हैं , औसतन रोजाना १५०० _ से २००० मज़दूर  यहां से रोजाना जाते हैं  यह सिलसिला  पिछले  तीन माह से चल रहा है , जाते पहले भी थे पर उनकी संख्या इतनी ज्यादा नहीं होती थी | देखा जाए तो पलायन की  यह स्थिति  सिर्फ खजुराहो रेलवे स्टेशन भर की नहीं है बल्कि ऐसे ही हालात , दमोह , टीकमगढ़ , चित्रकूट ,बांदा , महोबा ,मऊरानीपुर, झाँसी और ललितपुर रेलवे स्टेशनों पर भी देखने को मिलते हैं | 
                                 बुंदेलखंड और सूखा एक स्थाई नियति बन चुके हैं ,| रसातल में पहुँचते भू जल ने स्थिति और भी गंभीर बना दी है | बुंदेलखंड के सागर संभाग में इस बार पिछले साल की तुलना में औसत से ४० फीसदी कम वर्षा हुई है | अनियमित और रुक रुक कर हुई 60 फीसदी बारिश का जल काम नहीं आया | उस पर सरकारी तंत्र के मैनेजमेंट ने इस जल को भी व्यर्थ बहाने में सहयोग किया | अब तक बुवाई के जो आंकड़े सामने आये हैं वो बताते हैं कि बुंदेलखंड के सागर ,दमोह , छतरपुर , पन्ना और टीकमगढ़ में मात्र ३० से ४० फीसदी ही रवि फसलों की बुवाई हुई है |  बुवाई करने वाले किसानो में अधिकांश वे लोग हैं जिनके पास खुद के जल श्रोत हैं , क्योंकि तालाब और बाँध खाली पड़े हैं , शुरू में चली नहर एक पानी के लिए ही हुई दूसरे पानी की उम्मीद किसानो को नहीं थी | सबसे ज्यादा त्रासदी के हालात टीकमगढ़ जिले में बने हैं जहां 16 _17 में भी औसत से कम वारिश हुई थी , और इस बार तो औसत से आधी वारिस ही हुई है | हालात ये बने हैं कि जो तालाब कभी नहीं सूखे थे वह भी सूख गए |

 सरकार ने सागर संभाग के छतरपुर जिला के लिए 6878 लाख रु , टीकमगढ़ जिला के लिए 7334 लाख रु,  सागर जिला के लिए 8116 लाख रु  और दमोह जिला के लिए 5655 लाखरु  किसानो को मुआवजा देने के लिए स्वीकृत किये हैं | सूखा ग्रस्त पन्ना जिला के लिए , कोई राशि स्वीकृत ना होना  लोगों के समझ से परे है | हालंकि पन्ना से निकलते समय मुख्य मंत्री शिवराज सिंह  से जब पन्ना के पत्रकारों ने सूखे को लेकर  सवाल किये कि पन्ना जिला को सूखा ग्रस्त तो घोषित किया गया किन्तु मुआवजा राशि स्वीकृत नहीं हुई ? इस पर शिवराज ने लोगों को गोलमोल जबाब देते हुए कहा कि किसानो के हित में सरकार काम करेगी | मुख्य मंत्री के इस जबाब को लेकर पन्ना के  कांग्रेस नेता  सवाल खड़े कर रहे है , वे अब पूंछने लगे हैं कौन सा हित सरकार किसानो का कर रही है , क्या जब पन्ना के सारे गाँव पलायन से खाली हो जाएंगे तब मुआवजा राशि स्वीकृत होगी |   

  दरअसल बुंदेलखंड के दर्द पर संसद से लेकर सेमिनारों में जम कर घड़ियाली आंशु बहाये जाते हैं पर  दर्द की दवा नहीं मिल पाती | 

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