31 दिसंबर, 2017

किसानो की मौत पर भी संवेदन हीन होती सियासत

बुंदेलखंड की डायरी 

 किसानो की मौत पर भी संवेदन हीन होती सियासत


रवींद्र व्यास 

 क्या अजब हालात हैं , कही लोग नव वर्ष के जश्न की तैयारी में मशगूल हैं वहीँ  बुंदेलखंड के अन्नदाता की आहों से वातावरण गुंजायमान हो रहा है | टीकमगढ़ जिले में एक किसान  ने फिर  मौत को गले लगा लिया है | शायद  हमारी संवेदनशील  सरकारों को   अन्नदाता की मौत आहत नहीं करती | देश की मोदी सरकार और उनके प्रदेश के मुख्य मंत्री किसानो की आय दुगनी करने की बात कर रहे हैं , पर  हालात ये हैं की मोदी सरकार के काल में किसानो की आत्म ह्त्या की दर बड़ी है |   सरकार और उसके प्रशासन तंत्र की संवेदनाओ को जाग्रत करने के लिए  बुंदेलखंड के किसान  "त्राहि त्राहि पुकारें नाथ " नाटक का मंचन ३१ दिसंबर और  नववर्ष के प्रथम दिवस दमोह जिला में करेंगे | शायद   बुंदेलखंड के  अन्नदाता की आह अब मंच पर  देख कर तंत्र की संवेदनाये जाग्रत हो जाएँ  | 


                    किसी पिता के लिए इससे बड़ी जीवन की  कोई त्रासदी नहीं होती की उसकी आँखों के सामने उसके इकलौते बेटे का शव हो | टीकमगढ़ जिला के पृथ्वीपुर थाना क्षेत्र के बरगोला खिरक गाँव में मिट्ठूलाल कुशवाहा के घर जब उसके ही जवान बेटे धनीराम (28 ) का शव रखा गया  तो  वह एकदम से चेतना शून्य हो गया |  धनीराम की पत्नी  ने पास के कुँए तरफ दौड़ लगा दी यदि वहां मौजूद महिला उसकी चोटी पकड़ कर कुँए के किनारे से नहीं खींचती तो शायद उसको भी बचाना संभव नहीं होता | मृतक अपने पीछे दो पुत्र और एक पुत्री वा पत्नी को छोड़ गया है | धनीराम ने अपने ही घर के पास लगे  नीम के पेड़ पर फांसी लगाकर गुरूवार की रात  आत्म ह्त्या  कर ली थी |

                                        मिट्ठूलाल के मुताबिक़  परिवार की  दो एकड़ जमीन पर पिछले तीन साल से सिर्फ लागत ही लगी फसल का दाना नहीं हुआ | ऐसे हालात में वह यही मजदूरी कर हम सब का पेट पाल रहा था , पर ना मजदूरी इतनी मिलती थी की घर का खर्च चल सके और ना सरकार की सहायता | वह बार बार दिल्ली जा कर मजदूरी करने की बात कहता था हम ही उसे मना करते थे कि वहां भी अब काम नहीं मिल रहा है कई लोग वापस आ गए हैं | अब प्रशासन को यह एक मुद्दा मिल गया है की उसकी मौत की वजह भूख ,बेरोजगारी , लाचारी नहीं थी बल्कि उसे दिल्ली जाने से रोकने के कारण ही उसने आत्म ह्त्या की है | 

टीकमगढ़ जिला में वर्षा के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष २०१६ में भी जिले में पूर्ण औसत वर्षा नहीं हुई थी , और इस वर्ष भी औसत से 45 फीसदी कम बारिस हुई है | ये हालात पिछले तीन चार साल से लगातार चल रहे हैं , जिसके चलते टीकमगढ़ जिले में पिछले तीन सालों में 120 किसान मौत को गले लगाने को मजबूर हुए | मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के इस जिले को भी सूखा ग्रस्त घोषित किया गया है | पर संभाग के अन्य जिलों की तरह इस जिले के किसानो को खरीफ फसलों की सूखा राहत राशि नहीं बांटी गई है | इस मामले प्रशासन तंत्र गोल मोल जबाब देकर  अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता हे | दूसरी तरफ राहत राशि ना बांटने के पीछे राजनैतिक कारण बताये जा रहे हैं | सूत्र बताते हैं की चुनावी वर्ष होने के कारण बीजेपी वा उसकी  सरकार  राहत राशि का भी चुनावी फायदा लेने का जतन कर रही है , जिसके चलते खरीफ फसल की सूखा राहत राशि  समारोह पूर्वक बांटने की तैयारी अंदर खाने में चल रही है | अब इस दौरान अगर कुछ किसान हताशा में अपनी जान दे भी दें तो क्या फर्क पड़ता है , जिनको पैसा मिलेगा वे तो सरकार की जय जय कार करेंगे ही | 
  
                                                             देखा जाए तो   टीकमगढ़ जिला बुंदेलखंड का ऐसा एकमात्र जिला है जहां सर्वाधिक चन्देली तालाब यहां के लोगों को विरासत में मिले हैं | ये अलग बात है की लोगों की नासमझी , और प्रशासन के अनदेखे रवैय्ये के कारण  अनेको तालाब  नष्ट कर दिए  गए | आज जब प्रकृति  कहर बरपा रही है तो ऐसे में वे तालाब  जो इस समय जल सराबोर रहते थे अब सूखे पड़े हैं | तालाबों के सूखने से  ना सिर्फ यहां की रवि फसल  प्रभावित हुई है बल्कि इसके कारण सिंघाड़ा और  मछली का कारोबार भी प्रभावित हुआ है  | इस कारोबार में लगे लोगों के सामने भी रोजी संकट आया है | 
 
                                                              कमोवेश  बुंदेलखंड इलाके  की तस्वीर ऐसी ही है  चाहे वह मध्य प्रदेश वाला बुंदेलखंड हो अथवा उत्तर प्रदेश वाला बुन्देलखंड | दोनों ही इलाकों में रवि फसल की बुवाई का औसत २० से ४० फीसदी ही है |  इसी माह महोबा जिले के श्रीनगर में  किसान हरगोविंद यादव ने खेत पर लगे पेड़ पर फांसी लगाकर आत्म ह्त्या कर ली थी | 40 बीघा जमींन के मालिक इस किसान  के खेत  की फसल सूखे में सूख गई थी |  महोबा जिले में भी   किसान की मौत का यह कोई पहला मामला नहीं था पिछले दो  साल में यहां भी ९० से ज्यादा किसान मौत को गले लगा चुके हैं   | इसी माह  झाँसी जिले के  मऊरानीपुर ब्लॉक के  उल्दन थाना क्षेत्र के ग्राम विजना निवासी धनकु पत्नी हरप्रसाद (67)   सूखे की चपेट में बरबाद हुई फसल को देख उसने रस्सी से रात्रि के समय फांसी लगाकर आत्म हत्या कर ली।वह खेत पर ही बने मकान में रहती थी |  घटना की सूचना सुबह जब हुई जब मृतिका का पुत्र अर्जुन खेत पर पहुचा। 
 अर्जुन  ने बताया कि उसकी मां के नाम एक एकड़ जमीन है तथा पिता के नाम 8 बीघा जमीन है। जिस पर   करीब सवा लाख का केसीसी का कर्ज है। कुओ का पानी सूख जाने व फसल की बर्बादी के चलते उसकी माँ ने यह कदम उठाया।
                        दरअसल किसानो की आत्म ह्त्या  के तथ्यात्मक विश्लेषण में एनसीआरबी ने किसानो के आत्महत्या की मुख्य वजह बेंको और माइक्रो फाइनेंस को माना है देश के 80 फीसदी किसानो की मौत की वजह कर्ज है | तो वहीँ फसलों का कम उत्पादन भी किसानो की आत्म ह्त्या की वजह बने हैं | खेतीहर मजदूरों की आत्महत्या के पीछे एनसीआरबी बीमारी और पारिवारिक समस्या को मुख्य कारण मानता है | मोदी जी  ने 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान यूपीए सरकार को किसानो की आत्म ह्त्या के मामले पर जम कर घेरा था , और किसानो को भरोषा दिलाया था की उनकी सरकार बनी तो किसानो को उनकी उपज की लागत निकालने के बाद 50 फीसदी मुनाफ़ा दिलाया जाएगा | मध्य प्रदेश में भावान्तर योजना शुरू की गई जिन किसानो ने नवम्बर में छतरपुर , टीकमगढ़ , पन्ना , दमोह और सागर में अपनी उपज बेचीं है उनमे अधिकाँश किसान अब भी अपनी उपज की राशि पाने के लिए बैंकों के चक्कर काट रहे हैं | 

                                                           दमोह जिला के पथरिया के मेलवारा गाँव में किसान 31 दिसंबर  और 1  जनवरी  2018 की रात  किसानो के इस असली दर्द को मच पर दिखाएँगे | हालांकि यह नाटक हैदराबाद सेन्ट्रल एक्टिंग   युनीवर्सिटी के छात्रों में तैयार किया गया है पर  इलाके के 30 से ज्यादा किसान अपना किरदार निभाएंगे | सवा घंटे के इस नाटक में बुंदेलखंड के  किसान के आर्थिक हालात , प्रकृति के प्रकोप शासन -प्रशासन के रवैये , पर  जम कर व्यंग्य बाण चलाये गए हैं | खाश बात ये भी है कि इस नाटक में रमतूला हो , एकतारा , नगड़िया ,सारंगी ,मजीरा जैसे  बुंदेलखंड के पारम्परिक वाद्य यंत्रो का सहारा लिया गया है |  ३१ दिसंबर की शाम  जब लोग नव वर्ष की तैयारियों के नाम शाम रंगीन करने का सपना साकार कर रहे होंगे समय बुंदेलखंड के किसान लोगों को अपने दर्द की मंचीय प्रस्तुति दे रहे होंगे |  
                                    किसानो के दर्द को आस्वसनो की मीठी गोली देकर शांत तो कर दिया जाता है पर उसके स्थाई समाधान की तलाश नहीं की जाती |  जब कि बुंदेलखंड भूसंरचना  हिसाब से ऐसा इलाका है जहां कम लागत में बहुत  अच्छे जल श्रोत विकसित किये जा सकते हैं जरुरत है तो सिर्फ ईमानदार पहल की |  
                                                                
                   
                 रवीन्द्र व्यास 

24 दिसंबर, 2017

Desart Of Bundelkhand



सूखा ग्रस्त बुंदेलखंड में खजुराहो की सुनहरी शाम 

 रवीन्द्र व्यास 
वो सात दिनों की खजुराहो की सुनहरी शाम थी , सरकार की रंगीन दुनिया में  खजुराहो  में  फ़िल्मी दुनिया के सितारे छटा बिखेर रहे थे  | | इसी दौरान  खजुराहो के रेलवे स्टेशन पर बुंदेलखंड के किसानो वा खेत मजदूरों की भीड़ अपने पेट की आग बुझाने के लिए दिल्ली जाने की जद्दोजहद में जुटे थे | दोनों ही नज़ारे  चौंका देने वाले थे  | यहां से जाने वाली संपर्क क्रान्ति  की जनरल बोगी में घुसने के लिए  किसान और खेत मजदूर जद्दो जहद करते दिखे | पर शायद रंगीन चश्मे से देखने वाली सरकार  और  उसके तंत्र  के लिए फिल्म महोत्सव तो नजर आता है पर बुंदेलखंड के इन किसानो के दर्द को देखने और समझने की उसके पास फुर्सत नहीं है | 



                                खजुराहो रेलवे स्टेशन पर संपर्क क्रान्ति ट्रेन का इन्तजार करते  मिले पन्ना जिले के बराच गाँव के किसान  बसंत लाल साहू (३५ )  बताने लगे की क्या करे इस बार पानी हे ही नहीं पहले की फसल भी बर्बाद हो गई थी इस बार भी पानी नहीं है जिस कारण खेत खाली पड़े हैं , ले देकर मजदूरी का ही सहारा है सो मजदूरी के लिए दिल्ली जा रहे हैं | गाँव में मनरेगा जैसी योजनाओं से काम मिलने अथवा पन्ना में मजदूरी करने के सवाल पर उसका जबाब भी कम चौकाने वाला नहीं था ,बताने लगा की काहे का मनरेगा काम करो तो छह माह में मजदूरी मिलती है , पन्ना में तो कोई काम ही नहीं है | उसके ही साथ जाने वाले पवन साहू , जगदीश साहू  और उसकी पत्नी वंदना का भी यही दर्द था | बच्चो को अपने बूढ़े माँ बाप के भरोषे गाँव में छोड़ आये हैं | जिसका दर्द भी उनके चेहरों पर साफ़ पड़ा जा सकता था |जगदीश ने बताया की उनके गाँव के लगभग ६० फीसदी जवान लोग पलायन कर गए गाँव में सिर्फ बुजुर्ग और आसक्त लोग ही अधिकांश बचे हैं |

                                                   ऐसी ही व्यथा कथा  छतरपुर जिले के बिजावर विकाश खंड के अमरपुरा गाँव के आदिवासी राम राजा सोर , पप्पू  और वीरेंद्र की भी थी | आदिवासी बाहुल्य इस गाँव के अधिकांश आदिवासी मजदूरी के लिए गाँव छोड़ कर जा चुके हैं | रामराजा ने बताया की पानी की हालात ये है की पिछली साल हम अपने पडोसी खेत वाले को सिचाई के लिए पानी देते थे इस बार हालत ये है की हमें पीने  का पानी दूसरों से मांगना पढ़  रहा है  | दो हजार की आबादी वाले इस गाँव में भी वही मातमी सन्नाटा पसरा हुआ है |  इसी रेलवे स्टेशन पर हमें खजुराहो के ही राकेश अनुरागी और कालीचरण भी मिले , ये दोनों भी मजदूरी की तलाश में दिल्ली ही जा रहे थे | पर्यटन नगरी के पास इनकी बेशकीमती जमीन तो थी  पर उनके गाँव के पास बने बाँध ने उनके और उनके परिवार का जीने का सहारा ही छीन लिया | उनकी सारी जमीन बाँध की भेंट चढ़ गई और जो मुआवजा मिला उससे प्लाट भी खरीदने लायक स्थिति नहीं थी |  अब मजदूरी ही जीने का सहारा है  मजदूरी के लिए दिल्ली जा रहे  हैं | 

                                                   ट्रेन के प्लेट फ़ार्म पर आते ही भगदड़ सी मच गई हर कोई जल्द से जल्द बोगी में सवार होने के लिए इधर से उधर  सर पर बड़ी सी पोटली रखे दौड़ लगा रहा था | ठसा ठस भरे रेल के इस जनरल कम्पार्टमेंट में पैर रखने के लिए भी जगह नहीं थी | पर पेट की आग बुंदेलखंड के किसानो को मजबूर कर रही है की या तो मौत को गले लगा लो या घर छोडो | 


                                                    खजुराहो रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर राजकुमार बताने लगे की हर रोज लगभग एक हजार टिकिट दिल्ली के लिए कटते हैं  | इनमे अधिकाँश यात्री मजदूर वर्ग के ही रहते हैं | स्टेशन पर ही कुली का काम करने वाले बताने लगे की दरअसल एक टिकिट पर दो से चार लोगों के टिकिट रहते हैं , औसतन रोजाना १५०० _ से २००० मज़दूर  यहां से रोजाना जाते हैं  यह सिलसिला  पिछले  तीन माह से चल रहा है , जाते पहले भी थे पर उनकी संख्या इतनी ज्यादा नहीं होती थी | देखा जाए तो पलायन की  यह स्थिति  सिर्फ खजुराहो रेलवे स्टेशन भर की नहीं है बल्कि ऐसे ही हालात , दमोह , टीकमगढ़ , चित्रकूट ,बांदा , महोबा ,मऊरानीपुर, झाँसी और ललितपुर रेलवे स्टेशनों पर भी देखने को मिलते हैं | 
                                 बुंदेलखंड और सूखा एक स्थाई नियति बन चुके हैं ,| रसातल में पहुँचते भू जल ने स्थिति और भी गंभीर बना दी है | बुंदेलखंड के सागर संभाग में इस बार पिछले साल की तुलना में औसत से ४० फीसदी कम वर्षा हुई है | अनियमित और रुक रुक कर हुई 60 फीसदी बारिश का जल काम नहीं आया | उस पर सरकारी तंत्र के मैनेजमेंट ने इस जल को भी व्यर्थ बहाने में सहयोग किया | अब तक बुवाई के जो आंकड़े सामने आये हैं वो बताते हैं कि बुंदेलखंड के सागर ,दमोह , छतरपुर , पन्ना और टीकमगढ़ में मात्र ३० से ४० फीसदी ही रवि फसलों की बुवाई हुई है |  बुवाई करने वाले किसानो में अधिकांश वे लोग हैं जिनके पास खुद के जल श्रोत हैं , क्योंकि तालाब और बाँध खाली पड़े हैं , शुरू में चली नहर एक पानी के लिए ही हुई दूसरे पानी की उम्मीद किसानो को नहीं थी | सबसे ज्यादा त्रासदी के हालात टीकमगढ़ जिले में बने हैं जहां 16 _17 में भी औसत से कम वारिश हुई थी , और इस बार तो औसत से आधी वारिस ही हुई है | हालात ये बने हैं कि जो तालाब कभी नहीं सूखे थे वह भी सूख गए |

 सरकार ने सागर संभाग के छतरपुर जिला के लिए 6878 लाख रु , टीकमगढ़ जिला के लिए 7334 लाख रु,  सागर जिला के लिए 8116 लाख रु  और दमोह जिला के लिए 5655 लाखरु  किसानो को मुआवजा देने के लिए स्वीकृत किये हैं | सूखा ग्रस्त पन्ना जिला के लिए , कोई राशि स्वीकृत ना होना  लोगों के समझ से परे है | हालंकि पन्ना से निकलते समय मुख्य मंत्री शिवराज सिंह  से जब पन्ना के पत्रकारों ने सूखे को लेकर  सवाल किये कि पन्ना जिला को सूखा ग्रस्त तो घोषित किया गया किन्तु मुआवजा राशि स्वीकृत नहीं हुई ? इस पर शिवराज ने लोगों को गोलमोल जबाब देते हुए कहा कि किसानो के हित में सरकार काम करेगी | मुख्य मंत्री के इस जबाब को लेकर पन्ना के  कांग्रेस नेता  सवाल खड़े कर रहे है , वे अब पूंछने लगे हैं कौन सा हित सरकार किसानो का कर रही है , क्या जब पन्ना के सारे गाँव पलायन से खाली हो जाएंगे तब मुआवजा राशि स्वीकृत होगी |   

  दरअसल बुंदेलखंड के दर्द पर संसद से लेकर सेमिनारों में जम कर घड़ियाली आंशु बहाये जाते हैं पर  दर्द की दवा नहीं मिल पाती | 

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