खजुराहो / / ६ /११/१६
आज मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान की सुरक्षा व्यवस्था में भारी लापरवाही देखने को मिली । मुख्य मंत्री के लिए लाइ गई इनोवा गाडी आधे घंटे के लिए सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए गायब हो गई । फिर वापस मौके पर आकर खड़ी हो गई । मुख्य मंत्री का वाहन लापता होने की खबर लगते ही सुरक्षा दल में हड़कंप मच गया । एक दूसरी दशा तब देखने को मिली जब अंदर प्रवेश के लिए काटी जाने वाली रशीद बुक लावारिश हालात में टेबल पर रखी मिली । यह हालात तब हैं जब पूरा देश और खासकर देश के पर्यटन स्थल और विमान तल हाई एलर्ट पर हैं ।
08 नवंबर, 2016
06 नवंबर, 2016
Bundelkhand Dayri_Moniya Dance
मोनिया नृत्य और दिवारी गीतों के सीमित होते स्वर
रवींद्र व्यास
विन्ध्य पर्वत मालाओंओ से घिरा बुंदेलखंड का यह अंचल वैसे तो अपने अभावों औरबदहाली के कारण जाना जाता है । इस बदहाल इलाके में ऐसी कई परम्परा और और लोकसाहित्य है जो यहाँ की अपनी एक अलग पहचान बनाता है ।पर काल के गर्त में धीरे- धीरे ये परम्पराएं समाप्त होती जा रहीं हें । ऐसी ही एक परम्परा है दिवारी गीत और नृत्य ।दिवाली के दूसरे दिन जहां इनके ये दल हर गली और नुक्कड़ पर दिख जाते थे अब सीमितहोते जा रहे हें ।
दिवारी गीत और नृत्य मूलतः चरागाही संस्कृति के गीत ह़े , यही कारण है की इन गीतोंमें जीवन का यथार्थ मिलता है । फिर चाहे वह सामाजिकता हो,या धार्मिकता , अथवा श्रृंगार या जीवन का दर्शन । ये वे गीत हें जिनमे सिर्फ जीवन की वास्तविकता के रंग हें , बनावटी दुनिया से दूर , सिर्फ चारागाही संस्कृति का प्रतिबिम्ब । अधिकाँश गीत निति औरदर्शन के हें । ओज से परिपूर्ण इन गीतों में विविध रसों की अभिव्यक्ति मिलती है ।
दिवारी गीत दिवाली के दूसरे दिन उस समय गाये जाते हें जब मोनिया मौन व्रत रख करगाँव- गाँव में घूमते हें । दीपावली के पूजन के बाद मध्य रात्रि में मोनिया -व्रत शुरू हो जाताहै । गाँव के अहीर - गडरिया और पशु पालक तालाब नदी में नहा कर , सज-धज कर मौन व्रतलेते हें । इसी कारण इन्हे मोनिया भी कहा जाता है ।
द्वापर युग से यह परम्परा चली आ रही है , इसमें विपत्तियों को दूर करने के लिए ग्वाले मौनरहने का कठिन व्रत रखते हैं। यह मौन व्रत बारह वर्ष तक रखना पड़ता है। इस दौरान मांस मदिरा का सेवन वर्जित रहता है । तेरहवें वर्ष में मथुरा व वृंदावन जाकर यमुना नदी के तटपर पूजन कर व्रत तोड़ना पड़ता है।
शुरुआत में पांच मोर पंख लेने पड़ते हैं प्रतिवर्ष पांच-पांच पंख जुड़ते रहते हैं। इस प्रकार उनकेमुट्ठे में बारह वर्ष में साठ मोर पंखों का जोड़ इकट्ठा हो जाता है। परम्परा के अनुसार पूजनकर पूरे नगर में ढोल,नगड़िया की थाप पर दीवारी गाते, नृत्ये करते हुए हुए अपने गंतव्य कोजाते हैं। इसमें एक गायक ही लोक परम्पराओं के गीत और भजन गाता है और उसी पर दलके सदस्य नृत्य करते हैं ।
हालांकि मोनिया कोंड़ियों से गुथे लाल पीले रंग के जांघिये और लाल पीले रंग की कुर्ती यासलूका अथवा बनियान पहनते हें । जिस पर कोड़ियो से सजी झूमर लगी होती है , पाँव मेंभी घुंघरू ,हाथो में मोर पंख अथवा चाचर के दो डंडे का शस्त्र लेकर जब वे चलते हें तो एकअलग ही अहशास होता है । मोनियों के इस निराले रूप और उनके गायन और नृत्य कोदेखने लोग ठहर जाते हें ।
संस्कृति के जानकार डॉ. केएल प टेल बताते हैं मौन साधना के पी छे सबसे मुख्य कारण पशुओं को हो ने वाली पीड़ा को समझना है। वे बताते हैं कि जिस तरह किसान खे ती के दौरान बैलों के साथ व् यवहार करता है। उसी प्रकार प् रतिपदा के दिन मौनिया भी मौन रह कर हाव-भाव करते हैं। वे प्यास लगने पर पानी जानवरों की तरह ही पीते हैं। पूरे दिन कुछ भी भो जन नहीं करते हैं। वे कम से कम 7 गांव की परिक्रमा करते हैं।
दिवारी गीतों का चलन कब शुरू हुआ इसको लेकर अलग -अलग मान्यताएं हें । कुछ कहतेहें की दिवारी गीतों का चलन 10वी . शत्दी में हुआ । तो कुछ का मानना है की द्वापर मेंकालिया के मर्दन के बाद ग्वालों ने श्री कृष्ण का असली रूप देख लिया था। श्री कृष्ण ने उन्हेंगीता का ज्ञान भी दिया था। गो पालकों को दिया गया ज्ञान वास्तव में गाय की सेवा के साथशरीर को मजबूत करना था। श्री कृष्ण ने उन्हें समझाया कि इस लोक व उस लोक को तारनेवाली गाय माता की सेवा से न केवल दुख दूर होते हैं बल्कि आर्थिक समृद्धि का आधार भी यहीहै। इसमें गाय को 13 वर्ष तक मौन चराने की परंपरा है। आज भी यादव (अहीर) और पाल(गड़रिया) जाति के लोग गाय को न सिर्फ मौन चराने का काम करते हैं\
एक और मान्यता है कि भगवान कृष्ण गोकुल में गोपिकाओं के साथ दिवारी नृत्य कर रहेथे, गोकुलवासी भगवान इंद्र की पूजा करना भूल गए तो नाराज होकर इंद्र ने वहां जबर्दस्तबारिश की, जिससे वहां बाढ़ की स्थिति बन गई। भगवान कृष्ण ने अपनी अंगुली पर गोवर्धनपर्वत उठाकर गोकुल की रक्षा की, तभी से गोवर्धन पूजा और दिवारी नृत्य की परम्परा चलीआ रही है।
अब यह परम्परा अब धीरे-धीरे कम होती जा रही है । गाँव ही सिमट रहे हें गो पालन घटताजा रहा है , गौचर भूमि पर कब्जा हो गया जंगल जा नहीं सकते ऐसे में चरवाहे भीसिमित होते जा रहे हें । जिसका परिणाम है की अब पहले की तरह ये दल नहीं दिखते हें ।हालांकि कुछ लोग इस परम्परा को जीवित बनाए रखने का प्रयास कर रहें हें ।
रवीन्द्र व्यास
बुंदेलखंड के एक भाग में सपनो का संसार दिखाया जा रहा है , आश्वासनों और भरोषे के सतरँगी सपने सजाये जा रहे हैं । तो दूसरे भाग में तीन वर्ष पूर्व दिखाए गए सपनो के साकार होने ना होने की जद्दोजहद चल रही है । चुनावी सपनो के इस संसार में एक बात दोनों भागों में समान रूप से देखने को मिलती है कि बुंदेलखंड की दशा और दिशा को लेकर चिंतन लगभग एक समान है । प्रकृति ,पर्यावरण , और पुरातत्त्व सम्पदा से परिपूर्ण इस इलाके की दशा सुधारने के लिए अलग राज्य की बात की जाती है तो कहीं एक बेहतर प्रबंधन की । बुंदेलखंड के लोगों को बेहतर कल का सपना दिखाने में प्रधान मंत्री से लेकर मुख्य मंत्री तक पीछे नहीं हैं , पर यहां के लोगों को शायद अब यह समझ में आने लगा है की सपने सिर्फ सोते हुए सुहाने लगते हैं जागने पर फिर वही काल का चक्र इर्द गिर्द घूमता नजर आता है । 

बुंदेलखंड की अमीर धरती पर गरीब लोग रहते है । पर अब में यहां किसी को गरीब नही रहने दूंगा । रेल आ गई है जल्द ही केन बेतवा लिंक परियोजना शुरू हो जायेगी । रेल के आने से उद्योग आयेंगे सिचाई की सुविधा बढेगी तो खुशहाली आयेगी ।बुन्देलखण्ड में लघु और कुटीर उद्योग का जाल फैलाया जायेगा । यह कहना है मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान का < जो 18 अक्टूबर को खजुराहो में खजुराहो -ललितपुर रेल लाइन पर चलने वाली पहली पैसेंजर ट्रैन को हरी झंडी दिखाने रेलमंत्री सुरेश प्रभु और केंद्रीय मंत्री उमा भारती के साथ आये थे । दो राज्यो में फैले बुंदेलखंड की हकीकत कमोवेश एक जैसी ही है । इसके कुछ दिनों बाद महोबा आये प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंच से मध्य प्रदेश सरकार के काम काज की जम कर तारीफ़ की । उन्होंने मध्य प्रदेश सरकार के अच्छे काम काज के कारण मध्य प्रदेश वाले बुंदेलखंड इलाके के विकाश का दावा भी किया । केन बेतवा लिंक परियोजना से बुंदेलखंड की तक़दीर और तस्वीर बदलने का सपना भी दिखाया । बुंदेलखंड की अकूत खनिज सम्पदा का भी जिक्र किया और यह भी आरोप जड़ा की इसके लुटेरे सपा बसपा के कुछ मुट्ठी भर माफिया हैं जो लखनऊ में बैठ कर यहां लूट करते हैं । इनको ठीक बीजेपी ही कर सकती है ।
मदारी मंच लूट कर चला जाता है फिर वह नहीं देखता की कौन है क्या है और क्या हो रहा है ? उसका तो काम ही है लच्छेदार भाषा शैली का उपयोग करना , जन समूह को अपने शब्द जाल के आकर्षण में बाँध रखना और अपना काम बनाना और अगले मुकाम की ओर बढ़ जाना । लगभग ऐसा ही कुछ मध्य प्रदेश में हो रहा है , जहां इन्वेस्टर सम्मिट के नाम पर बुंदेलखंड में उद्योगों का जाल बिछाने की बात कही जाती है , और डायमंड पार्क इंदौर भेज दिया जाता है । उद्योग विध्य में लगते हैं और जमीन बुंदेलखंड की दे दी जाती है । २००७ के इन्वेस्टर मीट में बुंदेलखंड के लिए 36 हजार करोड़ के १३ एम् ओ यू साइन हुए , 2010 में खजुराहो में हुए इन्वेस्टर मीट में ३० हजार 478 करोड़ के एम् ओ यू पर उद्योगपतियों के हताक्षर होने की बात कही गई , जिसमे रियो टिंटो का हीरा जिसने काम शुरू करके बंद कर दिया , स्पंज आयरन , सीमेंट निर्माण का काम शुरू ही नहीं हो पाया । मुख्य मंत्री ने जो घोषणाएं की उनमे से अधिकाँश आज तक पूर्ण नहीं हुई हैं । मामला चाहे छतरपुर के रिंग रोड का हो या छतरपुर जिले गोद लिए विधान सभा क्षेत्र बड़ा मलहरा और बिजावर का हो । ,
मोदी जी ने लोकसभा के चुनावी भाषण में कहा था की केंद्र में बीजेपी सरकार के बनने के बाद बुंदेलखंड में कोई भूख से नहीं मरेगा । इसके आंकड़े तो अपनी जगह हैं किन्तु महोबा में उनके भाषणों के कुछ दिन बाद ही उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के गुगवारा गाँव के सुखलाल की मौत भूख से हो गई । उसके पेट पर कपड़ा बंधा था और जेब में रोटियों के टुकड़े मिले । उसके घर कई दिनों से चूल्हा नहीं जला था और पत्नी वा बच्चे भूखे थे । इस घटना के बाद दीपावली के समय टीकमगढ़ जिले के किसान राजेन्द्र सिंह ने खुद को गोली मार ली । नायब तहसीलदार को दिए बयान में उसने कहा की फसल खराब होने के कारण यह कदम उठाया ।
6 नव को झांसी के प्रदर्शनी मैदान में जन सभा को बीजेपी के विकाश के स्वप्न संसार में ले जाने के बाद अमित शाह ने ,परिवर्तन रथ यात्रा को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया । इस सभा में उन्होंने सपा -बसपा पर शब्द वाण चलाये , तो केंद्र की मोदी सरकार का विकाश एजेंडा भी बताया , वहीँ ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर मुस्लिम महिलाओ के साथ बीजेपी के मजबूती से खड़े रहने की बात भी कही । सर्जिकल स्ट्राइक की चर्चा भी अपनी शैली में की ।
अलग राज्य
परिवर्तन यात्रा के मौके पर झाँसी की सांसद और केंद्र में मंत्री उमा भारती ने बुंदेलखंड अलग राज्य के मुद्दे पर अपने अलग अंदाज में बात कही । उन्होंने कार्यकर्ताओ के लिए अपनी जान देने की बात कहते हुए कहा की बुंदेलखड अलग राज्य जरुरी है । असल में उमा भारती इस बात को बहुत ही गंभीरता से समझ रही हैं की बुंदेलखंड अलग राज्य की बात पर ही यू पी वाले बुंदेलखंड के लोग साथ जुड़ते हैं । यही कारण है की १८ अक्टूबर को जब खजुराहो -ललितपुर रेल को हरी झंडी दिखाने वे पहुंची तो अलग बुंदेलखंड राज्य बनाये जाने पर उन्होंने सहमति व्यक्त की । और इसके लिए उन्होंने बुंदेलखंड राज्य की मांग करने वालों को सुझाव् भी दिया की वे अपना काम करते रहें । उन्होंने हर हाल बुंदेलखंड राज्य बनने की बात कही । बीजेपी नेता और फिल्म अभिनेता राजा बुंदेला उमा भारती को इस मसले पर बधाई देते हुए कहते हैं की बुंदेलखंड के लिए यू पी से प्रस्ताव पारित है मध्य प्रदेश में विधान सभा के पटल पर है , मध्य प्रदेश में पास होने के बाद लड़ाई केंद्र में लड़नी पड़ेगी ।
दरअसल सियासत के इस दाँव पेंच में बुंदेलखंड के विकाश की कोई दशा और दिशा ही तय नहीं हो पाई है । प्रबंधन बेहतर तंत्र से बुंदेलखंड की दशा बदली जा सकती है , पर शर्त ये है की नियत साफ़ हो । वैसे बुंदेलखंड के पास वो सब कुछ है जो एक समृध्द प्रदेश के लिए जरुरी है । बुंदेलखंड की बदहाली के लिए जितने बाहुबली जिम्मेदार हैं उससे कहीं ज्यादा जिम्मेदार देश प्रदेश की सरकारें रही । जो बुंदेलखंड की सम्पदा पर तो अपना अधिकार जताती रही पर इसके विकाश से उसे सरोकार सिर्फ इतना ही रहा जितने में जनता को विकास का भ्रम होता रहे ।
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