जब शहर की सड़कों पर उमड़ा था पुलिस के विरोध में युवाओं का सैलाब
निरंकुश पुलिस ने बरसाई थी गोलियां
मजिस्ट्रियल जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होने से बौखलाया था कलेक्टर
पत्रकारों के मामले पर देश में पहली बार हुई कलेक्टर के विरुद्ध न्यायिक जांच
रवीन्द्र व्यास
छतरपुर// 26 जुलाई 1980 को छतरपुर में एक ऐसी घटना घटी जिसने छतरपुर की पत्रकारिता का इतिहास बदल के रख दिया । और इस इतिहास को बनाने का श्रेय जाता है शिव अनुराग पटेरियाा को । 26 जुलाई 1980 को गुप्ता लाज में एक लड़की के साथ पुलिस के एक ए एस आई ने रेप किया, जिसकी रिपोर्ट पुलिस ने नहीं लिखी | दैनिक कृष्ण क्रांति के संपादक अजय दोसांज ने इस खबर को छाप कर शहर में सनसनी फैला दी | इस घटना के विरोध में आंदोलन हुए पुलिस ने गोलिया चलाई , मजिस्ट्रियल जांच हुई जांच में दोषी पाए गए अधिकारियों को बचाने का जतन प्रशासन ने किया , पर उस समय छतरपुर के नौजवान पत्रकार शिव अनुराग पटैरिया ने जांच रिपोर्ट शुभ भारत में प्रकाशित कर शहर ही नहीं देश प्रदेश में खोजी पत्रकारिता की मिशाल कायम कर दी |
गुप्ता लाज में अपने भाई के साथ ठहरी लड़की के साथ पुलिस ए एस आई बघेल 22 _23 जुलाई 1980 की मध्य रात्रि रेप किया | दैनिक क्रांति कृष्ण के संपादक अजय दोसांज ने इस खबर को प्रमुखता से छापा , रिपोर्ट में उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि रेप पीड़िता की रिपोर्ट पुलिस ने नहीं लिखी | यह वह समय था जब लोग आपात काल के दौर से बाहर आये थे | पुलिस की यह करतूत सामने आने के बाद लोगों का गुस्सा भड़क गया | घटना के विरोध में आक्रोशित छात्रों ने 26 जुलाई को जुलूस निकाला , पुलिस ने जुलूस पर न सिर्फ लाठियां चलाई, बल्कि गोलियां भी चलाई | निर्दोष नागरिक गोलियों के शिकार हुए ,पिपट का एक व्यक्ति जिंदगी भर के लिए विकलांग हो गया | पत्रकारों , नेताओं और कई सामजिक संस्थाओं ने इस घटना की जुडिशियल जांच की मांग की | प्रशासन ने इस मांग को दरकिनार करते हुए मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए |
सरकार और प्रशासन ने जिस मंशा के साथ मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए थे ,वह ईमानदार जांच अधिकारी डिप्टी कलेक्टर एस सी पाठक के कारण सफल नहीं हो सकी | 16 पृष्ठीय जांच रिपोर्ट के आधार पर प्रशासन का कर्तव्य था कि वह दोषी अधिकारियों पर कार्यवाही करता ,परन्तु प्रशासन इस रिपोर्ट को दबाने में जुट गया और चार माह तक रिपोर्ट दबाये रखी गई | इसकी भनक जैसे ही शिव अनुराग पटैरिया को लगी वे इस रिपोर्ट को पाने के अभियान में जुट गए | लगभग 15 दिन की मेहनत के बाद उनका यह प्रयास सफल हुआ | रिपोर्ट में यह पाया गया की पुलिस ने निर्दोष लोगों पर गोलियां चलाई | वरिष्ठ अफसर ने बदले की भावना से गोली चलाने का आदेश दिया था \ रिपोर्ट में यह भी उल्लेख था कि जिस अधिकारी ने गोली चलाने का आदेश दिया उसे आदेश देने का अधिकार ही नहीं था | यह अधिकारों के दुरुपयोग का भी मामला था | नगर के निर्भीक पत्रकार श्री शिव अनुराग पटैरिया की यह खोजी रिपोर्ट छतरपुर के दैनिक शुभ भारत में 23 जनवरी 1981 के अंक में प्रमुखता से प्रकाशित हुई |
देखा जाए तो जब सत्ता और प्रशासन पत्रकारों के विरोध में एक जुट हो ऐसे समय में शुभ भारत के सम्पादक श्याम किशोर अग्रवाल ने एक बड़ा साहस दिखाया | उन्होंने अपने समाचार पत्र में इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया | खबर छपने के बाद से ही शहर में सनसनी फैल गई लोग जिला प्रशासन की निंदा करने लगे | तत्कालीन कलेक्टर शालिगराम गुप्ता की करतूतें भी लोगों के सामने आने लगी | दूसरी तरफ मजिस्ट्रियल जांच में दोषी लोग कलेक्टर साहब की सेवा में जुट गए | कलेक्टर गुप्ता दोषियों को बचाने के अभियान में जुट गए | हद तो तब हो गई जब जांच मजिस्ट्रेट पाठक की जांच रिपोर्ट को दर किनार कर कलेक्टर ने फिर से मजिस्ट्रियल जांच कराने के आदेश दे दिए | नया जांच मजिस्ट्रेट ए डी एम् जी पी पांडेय को नियुक्त कर दिया था | इसके लिए एक बैठक भी 3 फरवरी 1981 को हुई ,जिसमे अनेकों प्रमुख अधिवक्ताओ और जान प्रतिनिधियों ने इसका विरोध किया | हालात इतने बिगड़ गए कि प्रशासन ने पत्रकारों और उनके परिवार को परेशान करना शुरू कर दिया , श्याम अग्रवाल के परिवार के विरुद्ध आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत कार्यवाही की गई | ( 10 वर्ष बाद राज्य शासन ने न्यायालय से प्रकरण वापस लिया ) पत्रकारों को जान से हाथ धोने की धमकियां मिलने लगी | पत्रकारों से पूछा जाता था कि वह बताएं कि यह मजिस्ट्रियल जांच की रिपोर्ट उन्हें कहां से मिली यदि वे ऐसा नहीं करेंगे तो जेल में डाल दिया जाएगा | कलेक्टर साहब सार्वजनिक समारोह में एस पी से पूंछने लगे कि शिव अनुराग और श्याम अग्रवाल अब तक बाहर कैसे घूम रहे हैं | पत्रकारों के आपसी मतभेद को भी कलेक्टर गुप्ता ने भुनाने का प्रयास किया ,| उन्होंने अंग्रेजों वाला फार्मूला अपनाते हुए फूट डालो और राज करो की नीति का अनुसरण किया और पत्रकारों के बीच में एक दीवार खड़ी कर दी और यह दीवार इतनी मजबूत है कि आज भी पत्रकारों के मतभेद का फायदा प्रशासन उठाता है |
रोज रोज की धमकियों से त्रस्त होकर पीड़ित पत्रकारों ने एक बैठक कर कलेक्टर के विरुद्ध निंदा प्रस्ताव पारित किया | 1 मार्च 81 को पत्रकार भोपाल के लिए रवाना हो गए | भोपाल में भी इन्हे एक अजब नजारा देखने को मिला भोपाल का सुविधा भोगी पत्रकार सहयोग के लिए आगे नहीं आया | कस्बाई पत्रकारों का एक संगठन मध्यप्रदेश आंचलिक पत्रकार संघ का इन लोगों को साथ मिला | आंचलिक पत्रकार संगठन ने घटना की वास्तविकता जानने के लिए टी सदस्यीय जांच दल भेजा | वरिष्ठ पत्रकार लज्जा शंकर हरदेनिया के संयोजकत्व में विजय दत्त श्रीधर और प्रेम चंद्र नागर छतरपुर आये | जांच दल ने स्थानीय नागरिकों , पत्रकारों , प्रशासनिक अधिकारियों , व्यापारियों , और सामाजिक कार्यकर्ताओं से मिलकर तथ्यों को जाना और समझा | पत्रकार संगठन के जांच दल ने अपनी जांच रिपोर्ट सी एम् और प्रेस काउन्सिल ऑफ़ इंडिया को भेजी और सीएम को स्पष्ट किया की यह एक तरह से अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है , दोषियों पर कार्यवाही होनी चाहिए | पत्रकारों तत्कालीन प्रतिपक्ष के नेता सुंदरलाल पटवा और सीपीआई के विधायक कामरेड कपूरचंद घुवारा का साथ मिला | मामला विधान सभा तक पहुंचा और तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने विधानसभा में मामले की जुडिशल जांच की घोषणा कर दी | न्यायिक मजिस्ट्रेट डी पी पांडे की अध्यक्षता में एक सदस्यीय जांच आयोग का गठन किया गया |
सरकार का यह एक बहुत बड़ा सहयोग पत्रकारों को मिला | पर यहां भी सबल प्रशासन ने अपने हर तरह के हथकंडे अपनाए | प्रशासनिक अमले के साथ अनेकों वकीलों और पत्रकारों के एक गुट को भी अपने साथ मिलाने का काम किया | इन विपरीत हालातों में भी डी एस शर्मा ,कामरेड जगदीश तिवारी, सतीश नारायण सक्सेना, श्यामसुंदर श्रीवास्तव श्रीमती पार्वती सक्सेना रामस्वरूप जी रावत ,ब्रज गोपाल चतुर्वेदी और राकेश शुक्ला जैसे अधिवक्ताओं ने पत्रकारों का साथ दिया | देश _ प्रदेश के प्रमुख समाचार पत्रों ने पत्रकारों का खूब साथ दिया चाहे वह इंडियन एक्सप्रेस हो नई दुनिया रविवार देशबंधु हितवाद ,युगधर्म आदि कई पत्र-पत्रिकाओं ने खुलकर साथ दिया | राजेंद्र माथुर जी सुरेंद्र प्रताप सिंह ललित सुरजन लज्जा शंकर हरदेनिया एवं एनके सिंह ने समय-समय पर सहयोग और मार्गदर्शन प्रदान किया |
कलेक्टर शालिगराम गुप्ता के वकील जब आयोग के सामने कोई तर्क संगत दलील ना दे पाए तो वे यह दलील देने लगे के कलेक्टर के पक्ष में गवाह इसलिए नहीं आ रहे हैं क्योंकि पत्रकारों का समर्थन जिले के डाकू कर रहे हैं और उनके गवाहों को डाकुओं का भय है | जबकि इसके विपरीत पत्रकार शिव अनुराग पटेरिया , राजेश बादल , विभूति शर्मा, श्याम अग्रवाल और जगदीश तिवारी को हत्या की धमकियां मिल रही थी | आयोग ने पत्रकारों द्वारा लगाए गए सभी आरोप सही पाए और कलेक्टर शालिगराम गुप्ता को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया था | पर राजनैतिक रसूख के चलते शालिग्राम गुप्ता को विरुद्ध के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की गई सिर्फ एक एक नाराजगी का पत्र सरकार ने भेजा | सरकार ने कलेक्टर शालिग्राम गुप्ता को प्रदेश में कहीं भी कलेक्टर नहीं बनाया
कलेक्टर शालिग्राम गुप्ता की निरंकुशता इतनी अधिक थी के आयोग के कार्य विधि समाप्त होने के बाद भी उन्होंने शुभ भारत राष्ट्र भ्रमण और क्रांति कृष्ण के अखबारों के घोषणापत्र ही रद्द कर दिए | मजे की बात यह है कि घोषणा पत्र निरस्त करने का अधिकृत पत्र कलेक्टर ने प्रेस के मालिकों को नहीं दिया | इसका नोटिस कोतवाली को दिया , निर्देशित किया की 188 के तहत ये प्रेस बंद कराये जाएँ | हालंकि इस मामले में भी उन्हें मुंह की खाना पड़ी और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया इंडिया ने घोषणा पत्र को रद्द करना गैरकानूनी बताया |
छतरपुर के और देश के पत्रकारिता इतिहास में यह अपनी तरह का पहला और अब तक का अंतिम मामला था , जिसमे नियम विरुद्दः, और पत्रकारों को प्रताड़ित करने का कार्य करने वाले कलेक्टर के विरुद्दः न्याययिक जांच आयोग बना हो और उस जांच में वह दोषी पाया गया हो | यह संभव हो पाया था शिव अनुराग पटेरिया की पत्रकारिता की लगन और उनके पत्रकार साथी श्याम अग्रवाल , राजेश बादल ,विभूति शर्मा , जगदीश तिवारी , राकेश शुक्ल के सहयोग और सम्बल से | आज भले ही शिव अनुराग हमारे बीच नहीं रहे पर उनकी बेमिसाल पत्रकारिता और मित्रता कभी नहीं भुलाई जा सकती |
