बुन्देलखण्ड

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24 सितंबर, 2018

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बुंदेलखंड की डायरी 

चुनावी सियासत में  प्रत्यशियों का पलायन 

रवीन्द्र व्यास 

बुंदेलखंड में सियासत के समीकरण  नित नए रंगों से सराबोर हो रहे हैं | लोग रोजगार की तलाश में पलायन कर गए हैं , तो वहीँ  दलों के नेता अपनी राजनैतिक महत्वाकांछाओं की पूर्ति के लिए पलायन की जुगत में जुटे हैं | इन सब के बीच बुंदेलखंड के असल मुद्दे कहीं दफ़न होते जा रहे हैं | नेताओ का लोक संपर्क अभियान तो तेज होता ही जा रहा है ,|  सपाक्स की आंधी को रोकने के लिए एक  नया  प्रचार तंत्र विकसित किया जा रहा है | दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके से अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग को लेकर आंदोलन तेज होता जा रहा है | 


        पन्ना जिले के पूर्व को आप बैंक अध्यक्ष संजय नगायच  ने  पवई विधानसभा क्षेत्र के लोगों से अपील की  हैं  कि आगामी चुनाव में  मतदान  पार्टी को देखकर नहीं प्रत्याशी की छवि, सक्रियता, विधायक की उपलब्धता और  क्षेत्रीयता को प्राथमिकता देकर करें | उन्होंने लोगों को समझाइस दी है कि  पार्टियों गिरोह और जागीर बन गई हैं जो कथित नेता और कार्यकर्ता विधायक और मंत्रियों की चापलूसी करते हैं वही पार्टियों के अब जिम्मेवार कार्यकर्ता और पदाधिकारी माने जाने लगे हैं, परिश्रमी और पराक्रमी कार्यकर्ता नेता नहीं l* 
 उन्होंने लोगों के सामने सवाल रखा कि  क्या विधायक और मंत्री  महीने दो   महीने में सिर्फ 1 दिन के लिए पिकनिक दौरे पर आने के लिए होता है ?? इतने कम समय में  क्षेत्र की समस्याओं को समझ सकता है क्या ?? तो स्वभाविक है वह चमचों और चापलूसों के चश्मे से ही क्षेत्रवासियों को देखेगा | जनता की समस्याओं, जनता से संवाद से उनका ज्यादा लेना-देना नहीं होगा l 

               *क्षेत्र का कितना विकास हुआ ? कितने लोगों को रोजगार मिला ? विकास के कौन कौन से साधन संसाधन हैं जिनसे हमारे क्षेत्र के लोगों को रोजगार मिले ?  किसानों को खेती किसानी में कितना फायदा मिला हम हरियाणा और पंजाब जैसे कितनी उन्नतिशील खेती कर रहे हैं ? युवाओं को क्षेत्र में अच्छी शिक्षा के कितने अवसर और कितने युवाओं को रोजगार मिला ? विकास के नाम पर सुदूर कल्दा, शाहनगर, रैपुरा, सुनवानी क्षेत्रों की हालत तो बहुत खराब है विधानसभा मुख्यालय तहसील और विकासखंड मुख्यालय पवई, सिमरिया और शाहनगर रेपुरा के आसपास ही मूलभूत व्यवस्थाएं सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य में  क्षेत्र की बदहाली देश और प्रदेश के सबसे पिछड़े विधानसभा क्षेत्र में है आधे से ज्यादा गांव में बिजली नहीं पहुंची अगर बिजली पहुंची तो तार नहीं है ट्रांसफार्मर नहीं है, सड़कों की हालत जर्जर है, साफ और स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था नहीं है, क्षेत्र के सीमित गांव में नल जल योजना है और वह भी आधी अधूरी है अथवा बंद पड़ी है हैंड पंप खराब हैं, स्कूलों में पूरी विधानसभा में एक भी हाई सेकेंडरी हाई स्कूल में पूर्णकालिक प्रिंसिपल नहीं है कामचलाऊ प्रभारी प्रिंसिपल और अतिथि शिक्षकों के भरोसे और वह भी आधे अधूरे स्कूल रो रहे हैं,| 
कॉलेजों के नाम पर खिलवाड़ शाहनगर और पवई के महाविद्यालयों में प्रोफ़ेसर ही नहीं है व्यक्ति निर्माण करने वाली और संस्कार देने वाली शिक्षा की बदहाली की यह हालत है ग्रामीण क्षेत्रों में शायद ही कोई 10वीं 12वीं पास करके कॉलेज में विद्यार्थी जाते हो ?? जनकल्याणकारी योजनाओं मैं लापरवाही भ्रष्टाचार का यह आलम है वह भी शासन की अतिमहत्वकांक्षी जन कल्याणकारी योजनाएं के नाम पर, चाहे वह प्रधानमंत्री आवास हो, चाहे शौचालय हो अथवा निराश्रित गरीब और विधवा पेंशन सभी में भारी गोलमाल है गरीबों को मिलने वाला राशन हो उसमें जबरदस्त भ्रष्टाचार और लूट मची हुई है इन सबके लिए किसी जनप्रतिनिधि और विधायक को फुर्सत नहीं l*

इसलिए  अब हम  सबको  सजग और जागरूक होना होगा और अपने   स्वाभिमान को  जगाना होगा |  जब हम बाजार में एक माचिस, साबुन भी खरीदने जाते हैं तो उसकी विशेषता पूछते हैं तभी लेते हैं, एक शर्ट पेंट भी खरीदते हैं तो 10 बार इधर उधर से उसको देखते हैं परंतु हम अपने क्षेत्र का भविष्य जिसके हाथों में दे रहे हैं , विधायक बनाकर क्षेत्र के सेवक की अहम जिम्मेवारी जिसको दे रहे हैं उसको ठोक-बजाकर देखते हैं क्या ??* 
 *फिर जिस विधायक को हमने 5 साल के लिए वोट दिया और वह भी सेवक बनने के लिए जो अब शासक बन गया है तो क्या हम उसका लेखा-जोखा हिसाब किताब लेते हैं कि वह अपने वायदों पर कितना खरा उतरा ? उसने चुनाव के पहले क्या आश्वासन और विकास के वादे किए थे हम उनकी समीक्षा क्यों नहीं करते क्योंकि लोकतंत्र में यही हमारी सबसे बड़ी ताकत है मतदान करने की और उससे जनप्रतिनिधि बनाने की सरकारें बनाने की और गिराने की भी l* 
                         
दरअसल  संघ और बीजेपी के प्रति समर्पित रहने वाले  संजय नगायच  द्वारा उठाये गए मुद्दे  बुंदेलखंड और प्रदेश की अधिकाँश विधान सभा सीटों पर लागू होते हैं | चुनाव के समय नेता जी के चाल चरित्र और चेहरे में  अपनत्व का ऐसा मिश्रण प्रगट होता है मानो इनसे बड़ा हमारा कोई हितेषी नहीं है | चुनाव में जिन मतदाताओं  की चरण रज लेकर नेता जी अपने को धन्य मानते थे जीतने के बाद अपनी चरण रज देकर लोगों  पर कृपा करते हैं | चुनाव के समय क्या वायदे किये थे कितने पूर्ण हुए कितने अपूर्ण यह जानने  और समझने का शायद लोगों के पास अब वक्त रहा नहीं | 
पलायन 
 बुंदेलखंड में पलायन एक स्थाई नियति बन गई है , लोगों को रोजगार की तलाश में पलायन करना एक तरह से मज़बूरी और जरुरत बन गई है | चुनावी मौसम में पलायन का यह क्रम  सियासत में भी तेज हो जाता है |  पलायन का यह क्रम  तब शुरू होता है जब टिकिट वितरण का दौर शुरू हो जाता है , और जब नेता जी को टिकिट नहीं मिलता तो  वे  उस पार्टी में ठिकाना तलाशने लगते हैं जिसे वो जीवन भर गालिया देते हैं |  ऐसी ही कुछ हलचल छतरपुर जिले में देखने को मिल रही है , कांग्रेस के कई  नेता  इन दिनों बीजेपी के आला नेताओं के संपर्क में हैं | इन नेताओ की सौदे बाजी इस बात को लेकर हो रही है कि पार्टी टिकिट  देगी अथवा नहीं | टिकिट का आश्वासन मिलते ही ये पंजा वाले कमल छाप अपने दल बल के साथ हो जाएंगे | हालांकि इस कतार में बीजेपी के भी एक बड़े नेता जी हैं जो अपनी मूल पार्टी में फिर वापस जाना चाहते हैं , सवाल फिर टिकिट पर आकर अटका है | 
मुद्दों से बेरुखी 
पिछले  दिनों  केंद्र सरकार ने   उत्तर प्रदेश  के बुंदेलखंड इलाके में राष्ट्रीय राजमार्ग विकसित करने और बुंदेलखंड कॉरिडोर बनाकर रक्षा उत्पादों के लिए योजना तैयार की है | मध्य प्रदेश के फेडरेशन आफ मध्य प्रदेश चेम्बर्स आफ कॉमर्स एन्ड इंडस्ट्रीज ने बुंदेलखंड कॉरिडोर में मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके को जोड़ने की मांग की है |  फेडरेशन  ने केंद्रीय रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण को  पत्र लिखा है ,वहीँ मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान को ज्ञापन सौंपा है | असल में बुंदेलखंड के विकाश के लिए  बुंदेलखंड में औद्योगिक कॉरिडोर बनाने का निर्णय केंद्र की मोदी सरकार और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने लिया था | सुरक्षा जरुरतो को ध्यान में रख कर केंद्र ने इस कॉरिडोर में रक्षा उत्पादों के उद्योग लगाने का फैसला किया है | इस कॉरिडोर में  उत्तर प्रदेश के  बुंदेलखंड के  सभी सातों जिलों को जोड़ा गया है |   यह चर्चा लगभग दो वर्ष से चल रही है ,  पर चुनावी बिसात में व्यस्त मध्य प्रदेश सरकार  को इस बात की फुर्सत ही नहीं थी , और ना मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के मंत्रियों और विधायकों  को इस बात की फुर्सत थी की वे विकाश के इस महत्वपूर्ण अवसर का लाभ उठाते | 
                                            जबकि मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के जिओग्राफिक हालातों को देखा जाए तो , उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके की तुलना में मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके की अधिकाँश भूमि  पथरीली और कम उपजाऊ है | ऐसे स्थानों पर उद्योगं के विकाश से  उपजाऊ भूमि को  भी बचाया जा सकता है |  
 उमा भारती के मुख्यमंत्रित्व काल में बुंदेलखंड के विकाश के लिए एक विशेष योजना तैयार की जा रही थी | इसके लिए बुंदेलखंड से सम्बद्ध आई ए एस रविंद्र पस्तोर  को जिम्मेदारी सौंपी गई थी | उन्होंने पन्ना जिले के कल्दा और छतरपुर जिले के किशनगढ़ इलाके को मिलाकर आदिवासी  उप क्षेत्र बनाने  की योजना के साथ ,छतरपुर को संभाग बनाने और बुंदेलखंड के पर्यटक स्थलों के विकाश वाटर स्पोर्ट्स के लिए योजना तैयार की थी | लोगों को रोजगार के लिए जंगल ,कृषि और कुटीर आधिरत उद्योगों की पहल की थी | साथ ही बुंदेलखंड के प्राचीन बुनकर उद्योगों को फिर से खड़ा करने और उनके माल की खपत की योजना तैयार की थी | उमा भारती के जाने के बाद ना यहां के विधायकों   को और ना यहां के सांसदों को यह जानने की फुरसत रही की उमा भारती के समय तैयार योजनाओ का क्या हुआ | 

अलगाव की आवाज  : 
 बुंदेलखंड को अलग राज्य बनाने के लिए चुनाव के समय आंदोलन तेज हो जाते हैं | २०१८ के मध्यप्रदेश  विधान सभा चुनाव और २०१९ के लोकसभा चुनावों को देख कर  अलग राज्य की आवाज तेज होती जा रही है | 17 सितम्बर से झांसी में हर दिन आंदोलन धरना प्रदर्शन का क्रम जारी है | इस बार बुंदेलखंड राज्य की मांग कर रहे सभी दल इसके लिए एक साथ लामबंद हुए हैं | 


सपाक्स का संघर्ष 

सवर्ण  और पिछड़ा वर्ग एस सी और एस टी एक्ट को लेकर सरकार द्वारा जारी किये गए अध्यादेश से खफा है | बुंदेलखंड की  आठ लोक सभा सीटों और मध्य प्रदेश की २६ विधान सभा सीटों को देखा जाए इन सब क्षेत्रो में सवर्ण और पिछड़े वर्ग का प्रतिशत 74 से 80 फीसदी है | जाहिर है बुंदेलखंड की हर सीट पर सपाक्स प्रभावी है | सपाक्स के इस समीकरण को देख अब योजनाबद्ध तरीके से यह प्रचारित किया जा रहा है कि बुंदेलखंड में सवर्ण ,अल्प संख्यको ,और पिछड़ा वर्ग 50 फीसदी से कम है | बीजेपी के इस अभियान में  देश के जाने माने समाचार पत्र समूह अहम् भूमिका अदा कर रहे हैं | 


By Ravindra Vyas at सितंबर 24, 2018 कोई टिप्पणी नहीं:
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01 सितंबर, 2018

India_Groth Rate


अप्रैल-जून क्वॉर्टर में भारत ने दर्ज की 8.2 प्रतिशत की शानदार जीडीपी ग्रोथ रेट
 साभार _ नवभारतटाइम्स.कॉम | :Aug 31, 2018,
नई दिल्ली
मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल से जून) में देश का सकल घरेलू उत्पाद (GDP) 8.2 प्रतिशत बढ़ा है। मैन्यूफैक्चरिंग और फार्म सेक्टर के बेहतरीन प्रदर्शन की वजह से ऐसा मुमकिन हुआ है। यह पिछले 2 साल में सबसे ऊंची विकास दर है। शुक्रवार को सरकार ने जीडीपी के आंकड़े जारी किए। इससे पहले 2015-16 की जनवरी-मार्च तिमाही में जीडीपी में सर्वाधिक तेज वृद्धि हासिल की गई। तब जीडीपी 9.3 प्रतिशत रही थी।

पिछली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ रेट 7.7 प्रतिशत थी, जबकि पिछले वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 5.59 प्रतिशत थी। मैन्यूफैक्चरिंग, इलेक्ट्रिसिटी, गैस, वॉटर सप्लाइ व अन्य यूटिलिटी सर्विसेज, कंस्ट्रक्शन, डिफेंस और अन्य सेवाओं ने 7 प्रतिशत से ज्यादा की ग्रोथ दर्ज की है।
2011-12 की स्थिर कीमतों के आधार पर 2018-19 की पहली तिमाही में देश की आनुमानित जीडीपी 33.74 लाख करोड़ रुपये दर्ज की गई, जो पिछले साल की पहली तिमाही में 31.18 लाख करोड़ रुपये थी। इस तरह 8.2 प्रतिशत की ग्रोथ रेट दर्ज हुई है। बता दें कि सरकार ने 2015 में जीडीपी गणना के लिए बेस इयर को 2004-05 से बदलकर 2011-12 कर दिया था।
मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में ग्रॉस वेल्यू एडेड (GVA) ग्रोथ रेट 8 प्रतिशत रही। बता दें कि जीडीपी के जरिए उपभोक्ताओं और मांग के नजरिए से किसी देश की आर्थिक गतिविधियों की तस्वीर साफ होती है जबकि इसके उलट GVA के जरिए निर्माताओं या आपूर्ति के लिहाज से आर्थिक गतिविधियों की तस्वीर साफ होती है।
अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी बात यह है कि अप्रैल-जून तिमाही में जीडीपी ग्रोथ रेट उम्मीद से भी बेहतर है। रॉयटर्स के अर्थशास्त्रियों इस तिमाही 7.6 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ का अनुमान व्यक्त किया था।
ताजा जीडीपी आंकड़ों से दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था का भारत का तमगा और सुरक्षित हो गया है। चीन ने दूसरी तिमाही में 6.7 प्रतिशत की जीडीपी ग्रोथ दर्ज की है। बता दें कि चीन में जनवरी से दिसंबर का वित्तीय कैलेंडर लागू है, जबकि भारत में अप्रैल से मार्च का वित्तीय कैलेंडर चलता है।

इससे पहले, विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक इसी साल भारत ने 2.6 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी के साथ फ्रांस को पछाड़कर दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का तमगा हासिल किया है।
दूसरी तरफ, 2017-18 के लिए भारतीय रिजर्व बैंक की तरफ से बुधवार को जारी किए गए सालाना रिपोर्ट में उम्मीद जताई गई है कि 2018-19 के पूर्ण वित्तीय वर्ष में आर्थिक विकास दर 7.4 प्रतिशत रहेगी।

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रवीश कुमार ने पूछा- क्या चौकीदार जी ने अंबानी के लिए चौकीदारी की है?

 August 29, 2018 by रवीश कुमार
Ravish Kumar 
क्या चौकीदार जी ने अंबानी के लिए चौकीदारी की है? उपरोक्त संदर्भ में चौकीदार कौन है, नाम लेने की ज़रूरत नहीं है। वर्ना छापे पड़ जाएंगे और ट्विटर पर ट्रोल कहने लगेंगे कि कानून में विश्वास है तो केस जीत कर दिखाइये। जैसे भारत में फर्ज़ी केस ही नहीं बनता है और इंसाफ़ झट से मिल जाता है। आप लोग भी सावधान हो जाएं।
आपके ख़िलाफ़ कुछ भी आरोप लगाया जा सकता है। अगर आप कुछ नहीं कर सकते हैं तो इतना तो कर दीजिए कि हिन्दी अख़बार लेना बंद कर दें या फिर ऐसा नहीं कर सकते तो हर महीने अलग अलग हिन्दी अख़बार लें, तभी पता चलेगा कि कैसे ये हिन्दी अख़बार सरकार की थमायी पर्ची को छाप कर ही आपसे महीने का 400-500 लूट रहे हैं।
हिन्दी चैनलों का तो आप हाल जानते हैं। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं इसके लिए आपको 28 और 29 अगस्त के इंडियन एक्सप्रेस में ऋतिका चोपड़ा की ख़बर बांचनी होगी। आप सब इतना तो समझ ही सकते हैं कि इस तरह की ख़बर आपने अपने प्रिय हिन्दी अख़बार में कब देखी थी।
इंडियन एक्सप्रेस की ऋतिका चोपड़ा दो दिनों से लंबी-लंबी रिपोर्ट फाइल कर रही हैं कि किस तरह अंबानी के जियो इंस्टीट्यूट के लिए पीएमओ के कहने पर नियमों में बदलाव किया गया। ऋतिका ने आर टी आई के ज़रिए मानव संसाधन मंत्रालय और पीएमओ के बीच पत्राचार हासिल कर यह रिपोर्ट तैयार की है। मानव संसाधन मंत्रालय ने शुरू में जो नियम बनाए थे उसके अनुसार अंबानी के जियो इंस्टीट्यूट को प्रतिष्ठित संस्थान का टैग नहीं मिल पाता। यहां तक कि वित्त मंत्रालय ने भी चेतावनी दी थी कि जिस संस्थान का कहीं कोई वजूद नहीं है उसे इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस का लेबल देना तर्कों के ख़िलाफ़ है। इससे भारत में शिक्षा सिस्टम को ठेस पहुंचती है। इसके बाद भी अंबानी के जियो इंस्टीट्यूट को मानव संसाधन मंत्रालय की सूची में शामिल करने के लिए मजबूर किया गया।
वित्त मंत्रालय के ख़र्चा विभाग यानी डिपार्टमेंट आफ एक्सपेंडिचर ने मानव संसाधन मंत्रालय को लिखा था कि इस तरह से एक ऐसे संस्थान को आगे करना जिसकी अभी स्थापना तक नहीं हुई है, उन संस्थानों की तुलना में उसके ब्रांड वैल्यू को बढ़ाना होगा जिन्होंने अपने संस्थान की स्थापना कर ली है। इससे उनका उत्साह कम होगा। सिर्फ मंशा के आधार पर कि भविष्य में कुछ ऐसा करेंगे, किसी संस्थान को इंस्टीट्यूट ऑफ़ एमिनेंस का दर्जा देना तर्कों के ख़िलाफ़ है। इसलिए जो नए नियम बनाए गए हैं उनकी समीक्षा की जानी चाहिए।
वित्त मंत्रालय और मानव संसाधन मंत्रालय की राय के ख़िलाफ़ जाकर पीएमओ से अंबानी के जियो संस्थान को दर्जा दिलवाने की ख़बर आप इंडियन एक्सप्रेस में पढ़ सकते हैं। भले ही इस खबर में यह नहीं है कि चौकीदार जी अंबानी के लिए इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं लेकिन इस ख़बर को पढ़ते ही आपको यही समझ आएगा। दो दिनों से ख़बर छप रही है मगर किसी ने खंडन नहीं किया है। अडानी जी की एक कंपनी है। अडानी एंटरप्राइजेज़ लिमिटेड। यह कंपनी सिंगापुर के हाईकोर्ट में अपना केस हार चुकी है। भारत के रेवेन्यु इंटेलिजेंस ने कई पत्र जारी कर इस कंपनी के बारे में जवाब मांगे हैं, दुनिया के अलग अलग देशों से, तो इसके खिलाफ अडानी जी बांबे हाईकोर्ट गए हैं कि डिपार्टमेंट ऑफ रेवेन्यु इंटेलिजेंस के लेटर्स रोगेटरी को रद्द कर दिया जाएगा। जब आप विदेशी मुल्क से न्यायिक मदद मांगते हैं तो उस मुल्क को लेटर ऑफ़ रोगेटरी जारी करना पड़ता है।
आप जानते हैं कि चौकीदार जी ने मुंबई के एक कार्यक्रम में ”हमारे मेहुल भाई” कह दिया था। आप यह भी जानते हैं कि यही ”हमारे मेहुल भाई” ने महान भारत की नागरिकता छोड़ कर महान एंटीगुआ की नागरिकता ले ली है। चौकीदार जी के ”हमारे मेहुल भाई” लगातार भारत को शर्मिंदा कर रहे हैं। उन्होंने कह दिया है कि वे भारत नहीं जाएंगे क्योंकि वहां के जेलों की हालत बहुत ख़राब है।
चौकीदार जी के ”हमारे मेहुल भाई” पर मात्र 13,500 करोड़ के गबन के आरोप हैं। सरकार चाहे तो इनके लिए 1 करोड़ ख़र्च कर अलग से जेल बनवा सकती है, या किसी होटल के कमरे को जेल में बदल सकती है। कम से कम मेहुल भाई को वहां रहने में तो दिक्कत नहीं होगी। कहां तो काला धन आने वाला था, कहां काला धन वाले ही चले गए।
2014 के लोकसभा चुनाव से पहले श्री रविशंकर का एक ट्विट घूमता है कि मोदी जी प्रधानमंत्री बनेंगे तो एक डॉलर 40 रुपये का हो जाएगा। फिलहाल यह 70 रुपये का हो गया है और भारत के इतिहास में इतना कभी कमज़ोर नहीं हुआ है। वैसे भी आप तक इसकी ख़बर प्रमुखता से नहीं पहुंची होगी और जिनके पास पहुंची है उनके लिए तर्क के पैमाने बदले जा रहे हैं। नीति आयोग के उपाध्यक्ष हैं राजीव कुमार। राजीव ने कहा है कि हमें मुद्रा के आधार पर अर्थव्यवस्था को जज करने की मानसिकता छोड़नी ही पड़ेगी। मज़बूत मुद्रा में कुछ भी नहीं होता है।
वाकई ऐसे लोगों के अच्छे दिन हैं। कुछ भी तर्क देते हैं और मार्केट में चल जाता है। राजीव कुमार को पता नहीं है कि उनके चेयरमैन चौकीदार जी भी भारतीय रुपये की कमज़ोरी को दुनिया में भारत की गिरती साख और प्रतिष्ठा से जोड़ा करते थे। सबसे पहले उन्हें जाकर ये बात समझाएं। वैसे वे समझ गए होंगे।
वैसे आप कोई भी लेख पढ़ेंगे, उसमें यही होगा कि रुपया कमज़ोर होता है तो उसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। वित्तीय घाटा बढ़ता है। 2018 के साल में भारतीय रुपया ही दुनिया भर में सबसे ख़राब प्रदर्शन कर रहा है। वैसे रामदेव ने भी रजत शर्मा के आपकी अदालत में कहा था कि मोदी जी आ जाएंगे तो पेट्रोल 35 रुपया प्रति लीटर मिलेगा। इस समय तो कई शहरों में 86 और 87 रुपये प्रति लीटर मिल रहा है।
ये सब सवाल पूछना बंद कर दीजिए वर्ना कोई आएगा फर्ज़ी कागज़ पर आपका नाम लिखा होगा और फंसा कर चला जाएगा। जब टीवी और अखबारों में इतना डर घुस जाए तभी शानदार मौका होता है कि आप अपनी मेहनत की कमाई का 1000 रुपया बचा लें। दोनों को बंद कर दें। कुछ नहीं तो कम से कम ये काम तो कर ही सकते हैं। हमेशा के लिए नहीं बंद कर सकते मगर एक महीने के लिए तो बंद कर ही सकते हैं।
लेखक रवीश कुमार वरिष्ठ टीवी पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक पेज से

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Political_Curencey





आ गए आंकड़े : नोटबंदी फेल, न काला धन लौटा न आतंकवाद गया, ‘भक्त’ गायब!

साभार भड़ास 4 मीडिया 
 August 30, 2018 by अश्विनी / नक़वी / अभिषेक / गिरीश / यशवंत
Ashwini Kumar Srivastava : नोटबंदी पर सिर्फ नरेंद्र मोदी को ही शर्मिंदा नहीं होना चाहिए बल्कि थोड़ी शर्म तो उन अंध समर्थकों (भक्त कहने पर बुरा लग जायेगा) को भी आनी चाहिए, जिन्होंने अपनी अक्ल पर पत्थर रखकर उस वक्त हर तर्क या विश्लेषण को महज इसलिए खारिज कर दिया था….क्योंकि उन्हें लगता था कि नोटबंदी को गलत ठहरा कर या उसका विरोध करके उनके आराध्य मोदी का विरोध किया जा रहा है। और उनकी नजर में जो मोदी और उनकी नोटबन्दी का विरोध करे, वह राष्ट्रद्रोही है, काले धन का मालिक है…
मुझे याद है कि किस तरह मेरे ही कुछ मित्रों और रिश्तेदारों ने नोटबन्दी का विरोध करने पर मुझ पर कैसे-कैसे तंज कसे थे, किस तरह से मुझसे अनर्गल बहस करके शब्द बाणों से मुझ पर हमले किये थे। बजाय मेरे तार्किक विश्लेषण पर तर्क वितर्क करने के मुझसे व्यंग्यात्मक लहजे में यह पूछा जा रहा था कि नोटबंदी से मुझे कितने काले धन का नुकसान हुआ? मानों मेरे उस काल्पनिक नुकसान से उन्हें बड़ी खुशी हासिल हो रही हो।
जैसे ही नोटबंदी की घोषणा मोदी जी ने की तो मैंने उसी वक्त महज चंद मिनटों बाद अपनी फेसबुक वॉल पर नोटबंदी क्यों और कैसे घातक साबित होगी, इसका आर्थिक विश्लेषण करते हुए इसे तुगलकी फैसला लिखा था। फिर मुहम्मद तुगलक के राज का विस्तार से जिक्र करते हुए इसे उसी तरह का ऐतिहासिक आर्थिक ब्लंडर भी बताया था। यह भी लिखा था कि आज भले ही इसे मोदी समेत उनके समर्थक न मानें लेकिन इसके घातक नतीजे खुद ही जल्द इसे असफल करार दे देंगे।
उसी दौर की लिखी गईं पोस्ट में मेरा तब यह भी आंकलन था कि मोदी को जब भी याद किया जाएगा तो नोटबंदी के इसी कलंक के साथ, जैसे कि तुगलक को उसकी सिक्काबन्दी (चांदी/सोने के सिक्के बंद करने) के लिए आज भी कोसा जाता है। क्योंकि इतिहास बड़ा ही बेरहम होता है। वह भक्तों या समर्थकों की तादाद के आधार पर किसी की वाहवाही या निंदा नहीं करता।
ऐसा होता तो समूचे हिंदुस्तान में लंबे अरसे तक राज करने वाले मुहम्मद तुगलक और उसके वंश के मुरीदों की तादाद देखकर इतिहास उसे भी अशोक, विक्रमादित्य, ललितादित्य या अकबर की श्रेणी में रखता। जबकि इतिहास उसे हिंदुस्तान के असफल व एक तरह के सनकी/बेवकूफ शासकों में ही गिनता आया है। खुद जनता भी उसका उपहास हर बेवकूफाना फैसले को तुगलकी फैसला कहकर उड़ाती आयी है।
बहरहाल, भक्त कहो या अंध समर्थक कहो…या फिर मोदी जी के ऐसे प्रशंसक कहो, जिन्होंने मोदी जी को नेतृत्व देकर भारत और हिंदुओं की रक्षा का सारा भार अपने कंधे पर उठा लिया है….और जिसे हम जैसे वे देशद्रोही देख/समझ ही नहीं पा रहे, जिन्हें मोदी जी के फैसलों में कहीं से भी कुछ कमी नजर आ जाती है। अब मोदी तो इन समर्थकों के आराध्य हैं…और आराध्य केवल किसी अवतार या महापुरुष को ही बनाया जा सकता है…जाहिर है, कोई महापुरुष या अवतार किसी आम इंसान की तरह गलतियां तो नहीं ही कर सकता…
इसी कारण नोटबंदी तब भी गलत नहीं थी, जब मोदी जी ने रात 8 बजे आकर अचानक की थी…और आज भी गलत नहीं है, जब उसका नतीजा सिफर निकल कर आया है। यानी तब भी मैं भक्तों की नजर में देशद्रोही था…आज भी वही हूँ। लेकिन क्या करूँ, दिल है कि मानता नहीं इसलिए मोदी जी के कुछ फैसलों पर कभीकभार उंगली उठा देता हूँ। मेरा मानना है कि अब इतिहास ही बिल्कुल निष्पक्ष तरीके से नोटबंदी समेत मोदी के पांच बरस के हर काम-काज की समीक्षा कर पायेगा। जहां तक मेरी बात है तो मैं भी अब मिर्ज़ा ग़ालिब के इस एक शेर के साथ यह पोस्ट भी शेयर करके सब कुछ इतिहास पर ही छोड़ दे रहा हूँ..
“या-रब वो न समझे हैं न समझेंगे मिरी बात
दे और दिल उन को जो न दे मुझ को ज़बाँ और”
पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

Qamar Waheed Naqvi : सरकार के मूर्खतापूर्ण फ़ैसलों का विरोध करना ‘देशद्रोह’ नहीं है श्रीमान. यह जनहित का काम है, जिसे ‘अन्धभक्त’ कभी नहीं कर सकते! रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट आ जाने के बाद अब नोटबन्दी के समर्थक ‘भक्तगण’ कहाँ हैं? आख़िर सही कौन साबित हुआ? क्या वह लोग सही साबित हुए जो नोटबन्दी को मूर्खतापूर्ण फ़ैसला बता रहे थे या वह लोग सही थे जो नोटबन्दी के आलोचकों को ‘देश-विरोधी’ और ‘मोदी-विरोधी’ बता रहे थे?
नोटबन्दी पर मैंने अपने पहले ही लेख में लिखा था कि नोटबन्दी से काला धन ख़त्म नहीं हो सकता और अगर होगा, तो भी बहुत मामूली ही. क्योंकि काला धन कोई करेन्सी में रखता ही नहीं है. उसे तो कहीं न कहीं सम्पत्ति में, सोने-चाँदी, हीरे-जवाहरात में, शेयर बाज़ार में, या देश-विदेश में उद्योग-धन्धे में खपा दिया जाता है.
वैसे यह सोचना ही आर्थिक अज्ञानता और मूर्खता है कि कोई अपना काला धन अपनी तिजोरी में करेन्सी में रखेगा. क्योंकि ताले में या बोरे में बन्द रखी गयी करेन्सी की क्रय शक्ति हर साल मुद्रास्फीति के कारण घटती जाती है. इसे इस उदाहरण से समझिए कि यदि किसी ने दस साल पहले दस लाख रुपये के नोट अपनी तिजोरी में बन्द करके रख दिये, तो आज क्या उन दस लाख रुपयों का मूल्य वही होगा, जो दस साल पहले था? वह घट कर आधा भी नहीं रह जायगा! इसलिए कौन मूर्ख काले धन को करेन्सी में रखेगा? और जो लोग अरबों-खरबों के काले धन का धन्धा करते हैं, उन्हें आप इतना ही मूर्ख समझते हैं क्या कि वह काले धन को नोटों में रख कर बैठेंगे?
करेन्सी में काला धन केवल उतने समय के लिए यानी कुछ दिनों या महीनों के लिए रहता है, जब तक उसे कहीं खपाया न जा सके. इसलिए काले धन का बहुत छोटा हिस्सा ही करेन्सी में रहता है, यह सामान्य गणित है. नोटबन्दी के बाद जो लोग यह सामान्य-सा गणित, यह सच्चाई जनता को बता रहे थे, उन्हें ‘ग़द्दार,’ ‘देश-विरोधी,’ ‘आतंकवाद और नक्सलवाद समर्थक’ और जाने क्या-क्या कह कर गालियाँ दी जा रही थीं. कहा जा रहा था कि वह तो मोदी सरकार के हर क़दम का विरोध ही करेंगे, चाहे सरकार कितना भी अच्छा काम करे.
लेकिन अब सच्चाई सामने आ ही गयी और समय ने सिद्ध कर दिया कि कौन सच बोल रहा था और कौन झूठा था? रिज़र्व बैंक ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में साफ़-साफ़ बता दिया है कि पुरानी करेन्सी के 99.3% नोट रिज़र्व बैंक के पास वापस लौट आये हैं. यानी केवल कुल पुरानी करेन्सी का 0.7% हिस्सा ही बैंकों में वापस नहीं लौटा. मतलब यह कि 15.41 लाख करोड़ रुपये की पुरानी करेन्सी में से केवल दस हज़ार करोड़ रुपये की करेन्सी ही वापस नहीं लौटी.
नोटबन्दी के तुरन्त बाद मैंने यही लिखा था कि यह बेवक़ूफ़ी भरा विचार है कि नोटबन्दी से काला धन ख़त्म हो जायेगा. आज सच्चाई यह है कि न काला धन पकड़ में आया और न ‘कैशलेस इकॉनॉमी’ में कोई उल्लेखनीय सफलता मिली. नोटबन्दी के पहले जहाँ 15.41 लाख करोड़ की करेन्सी चलन में थी, वहीं जून 2018 के रिज़र्व बैंक के आँकड़ों के मुताबिक़ अब 19.3 लाख करोड़ की करेन्सी चलन में है. तो फिर नोटबन्दी से क्या मिला?
आजतक न्यूज चैनल के न्यूज डायरेक्टर रह चुके वरिष्ठ पत्रकार क़मर वहीद नक़वी की एफबी वॉल से.

Abhishek Parashar : 99.3 फीसद नोट, नोटबंदी के बैंकों में वापस आ गए. सरकार कह रही है कि नोटबंदी के जो भी मकसद थे उसे पूरा कर लिया गया. लेकिन यह आंकड़ा बताता है कि भारत चोरों का देश बन चुका है. सरकारी और निजी क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों को पता है उन्हें रिटायरमेंट के बाद का सारा इंतजाम नौकरी के दौरान ही कर लेना है. क्योंकि हमारी सरकार ने यह सोचना छोड़ दिया है कि उसके नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा की भी जरूरत है. एक खुशहाल परिवार, राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी ईकाई है लेकिन हम तनाव पैदा कर रहे हैं.
हिंदू युवा की भृकुटी तनी हुई है, वह नहीं दिखने वाले किसी खतरे के सच होने की बात को मान चुका है. वह तैयारी कर रहा है देश को बचाने की. भीड़ में भी वहीं शामिल है. सरकार मान चुकी है, जो उन्हें वोट देते हैं, उनकी हैसियत कीड़े और मकोड़े से ज्यादा नहीं है. उन्हें कुछ नहीं भी दो, तो भी वह खुश रहेंगे. बस उन्हें बताते रहो खतरा बगल में है और यह कहानी सभी सरकारों की है. पुराने नोट इसलिए बैंकों में वापस आ गए कि बैंकों के मैनेजर और कर्मचारी भ्रष्ट थे. उन्होंने 10 या 20 फीसद का कट लिया और नोट बदल डाले. निजी क्षेत्र में हालत और भी खराब है. सरकार टैक्स छूट के नाम पर करोड़ों रुपये देती है, लेकिन सामाजिक सुरक्षा के नाम पर वह बिदक जाती हैं. सीएसआर जैसे फंड का इस्तेमाल रिटायरमेंट के बाद पेंशन देने में क्यों नहीं किया जा सकता, यह सरकार आपको कभी नहीं बताएगी लेकिन वह आपको यह जरूर बताएगी कि देश खतरे में हैं.
प्रतिभाशाली पत्रकार अभिषेक पराशर की एफबी वॉल से.

Girish Malviya : रिजर्व बैंक ने कल जो अपनी एन्युअल जनरल रिपोर्ट जनता के सामने पेश की है यदि उस पर भरोसा करें तो मोदी जी के चार सालों में देश की बदहाल हुई अर्थव्यवस्था की सच्ची तस्वीर निकल कर सामने आ जाती है, इस रिपोर्ट में यह तो सिद्ध कर ही दिया गया है कि नोटबन्दी पूरी तरह से फेल हो गयी है, लेकिन उसे एक तरफ भी रख दे तब भी इस रिपोर्ट मोदी सरकार के नेतृत्व में देश के बर्बाद होने वाले भविष्य की भयावह तस्वीर उभर रही है…
देश का बिका हुआ मीडिया कभी इस तरह के विश्लेषण पेश नही करता है इसलिए यही पर एक नजर डाल लीजिए…
सबसे बड़ा आश्चर्यजनक तथ्य तो यह सामने आया है कि मोदीं सरकार के आखिरी तीन सालों में सरकारी बैंकों के एनपीए में 6.2 लाख करोड़ की वृद्धि हुई है रिपोर्ट में कहा गया है कि अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (एससीबी ) का कुल सकल एनपीए 31 मार्च, 2018 तक बढ़कर 10,35,528 करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जो 31 मार्च, 2015 को 3,23,464 करोड़ रुपये था…
यानी सारा घाटा मोदीं सरकार के समय ही सामने आया है रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार बैंकिंग प्रणाली में मार्च, 2018 के अंत तक कुल एनपीए और पुनर्गठित कर्ज कुल ऋण के 12.1 प्रतिशत पर पहुंच गई हैं जो बेहद खतरनाक स्तर है भविष्य को लेकर रिजर्व बैंक का कहना है कि बैंकों को अभी गैर निष्पादित आस्तियों (एनपीए) की समस्या से निजात नहीं मिलने वाली है केंद्रीय बैंक ने कहा कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों के मद्देनजर चालू वित्त वर्ष में बैंकों का डूबा कर्ज और बढ़ेगा…
आरबीआई ने सरकार को महंगाई के मोर्चे पर भी चेताते हुए कहा कि आने वाले दिनों में महंगाई ऊपर जाने की आशंका है और इसके लिए तैयारी और सावधानी दोनों की जरूरत है। उसने महंगाई पर काबू पाने के लिए तत्काल कदम उठाने की सलाह देते हुए कहा कि वर्तमान में देश का व्यापार घाटा पांच साल के उच्चतम स्तर पर पहुंचकर 18 अरब डॉलर हो गया है। इसी तरह बीते जुलाई में थोक महंगाई सूचकांक की दर बढ़कर 5.09% पहुंच गई जबकि साल 2017 की जुलाई में यह दर महज 1.88% पर थी…
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि और तेल बाजार में मांग व आपूर्ति में हो रहे बदलाव का सबसे अधिक प्रभाव देश के व्यापार घाटे पर होने वाला है ऐसी आशंका है कि चालू वित्त वर्ष में GDP के 2.8 प्रतिशत पर चालू खाता घाटा पुहंच जाएगा कल ही रुपया 42 पैसे टूटा है और 70.52 प्रति डॉलर के रेकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया है, एक लीटर पेट्रोल की कीमत 85.60 रुपये तक पुहंच गयी हैं…
लेकिन इस संदर्भ में एक बात ओर गौरतलब है कि 2013-14 में तेल की औसत कीमतें 2017-18 की तुलना में दुगुनी से भी अधिक थीं, पर तब व्यापार घाटा 13.4 बिलियन डॉलर ही रहा था लेकिन वर्तमान में आयात में तेज उछाल के कारण इस साल जुलाई में मासिक व्यापार घाटा पांच साल का रिकार्ड तोड़ते हुए 18.02 बिलियन डॉलर तक जा पहुंचा है…
व्यापार घाटे में वृद्धि तेल और सोने-चांदी से इतर वस्तुओं के आयात के बढ़ने से हो रही है. साल 2013-14 में इस श्रेणी में व्यापार घाटा सिर्फ 0.4 बिलियन डॉलर रहा था, जो पिछले वित्त वर्ष में 53.3 फीसदी के स्तर तक पहुंच गया. बीते सालों में हमारे आयात की मात्रा तेजी से बढ़ रही है, पर निर्यात में मामूली इजाफा हो रहा है…
इसीलिए इस बढ़ते व्यापार घाटे की पूरी जिम्मेदारी मोदी सरकार की ही है इसके लिए नेहरू जी जिम्मेदार नही है और न ही बैंकिंग व्यवस्था को डुबो देने का का आरोप उन पर लगाया जा सकता है देश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर देने की पूरी जिम्मेदारी आपकी है मोदी जी…
आर्थिक मामलों के जानकार गिरीश मालवीय की एफबी वॉल से.

Yashwant Singh : नोटबंदी फेल वाली न्यूज से ध्यान भटकाने के लिए मोदीजी एंड कंपनी ने अरबन नक्सल का खेल खेला… इसलिए अब नोटबंदी वाली खबर पर कंसंट्रेट करें. आंकड़े आ चुके हैं. मोदीजी और उनके भक्तों का गुब्बारा फूट चुका है. देश के करोड़ों गरीबों की रोजी-रोटी छीनने के अपराधी हैं ये लोग.
नोटबंदी फेल हो जाने की खबर को आगे बढ़ाएं-फैलाएं….गोदी मीडिया ये न छापेगा न दिखाएगा… वह फिलहाल गोद में बैठकर ”अरबन अरबन नक्सल नक्सल” का जाप करेगा, जब तक आका कोई नया आदेश न जारी कर दें….
भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.
Bhadas4Media.com
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Political_

किसी पीएम के लिए ऐसी हेडिंग किसी अखबार में नहीं छपी होगी, देखें

 August 31, 2018 by संजय कुमार सिंह
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बड़बोलापन अब उन पर भारी पड़ने लगा है. नोटबंदी के दिनों में बोल गए थे कि अगर वो गलत करेंगे तो चौराहे पर लाकर जिंदा जला दिया जाए. कुछ इसी टाइप उनकी टिप्पणी थी. तब भक्तों और गोदी मीडिया ने जमकर इसे हाईलाइट किया था और मोदीजी की नीयत को सही बताते हुए नोटबंदी के विरोधियों को आड़े हाथों लिया था.
मोदी की कही पुरानी बात पर उनको चौराहे पर आने का न्योता… ये आज द टेलीग्राफ में छपी खबर है… फिलहाल ये खबर और इसकी हेडिंग सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है…
ये है मोदीजी द्वारा कही गई पुरानी बात… इसे ही याद दिलाकर राहुल ने मोदीजी को चौराहे पर आ जाने का आह्वान किया है…
अब जबकि ये साबित हो गया कि नोटबंदी फेल रही और मोदी जी के भाषण-दावे वाकई जुमले थे तो राहुल गांधी ने मोदी जी से मांग कर दी है कि अब वे उसी चौराहे पर आ जाएं जहां के लिए वो बोले थे. ये तो चलो खैर नताओं की बात हुई.
द टेलीग्राफ अखबार ने जिस तरह से राहुल के बयान पर आधारित खबर की हेडिंग लगाई है, वो वाकई दुर्लभ है. खासकर मुख्यधारा के अखबारों में इतनी हिम्मत तो बिलकुल न होगी जो पीएम को लेकर ऐसी हेडिंग लगा दें. उपर देखें टेलीग्राफ की हेडिंग और पढ़ें वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की इस पर एक टिप्पणी….
Sanjaya Kumar Singh : मोदी जी, आपके फरमाए चौराहे पर आपका स्वागत है… प्रधानमंत्री गुरुवार को काठमांडो पहुंचे। पर वहां भी पुराने भारतीय नोटों का लफड़ा है। पुराने भारतीय नोट नेपाल में भी चलते थे और नोटबंदी के बाद वहां के बैंकों में तथा नागरिकों के पास अनुमानतः 146 मिलियन डॉलर मूल्य के प्रतिबंधित नोट पड़े हैं जिन्हें बदलने के लिए नेपाल भारत पर दबाव डालता रहा है पर भारत अभी तक राजी नहीं हुआ है। नोटबंदी में जो 13,000 करोड़ रुपए या 0.7 प्रतिशत नोट नहीं बदले जा सके उसका बड़ा हिस्सा नेपाल में है।
टेलीग्राफ में छपी पूरी खबर पढ़ने के लिए नीचे के लिंक पर क्लिक करें…
Epaper.TelegraphIndia.com/imageview
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