बुंदेलखंड की डायरी
जल की जद्दोजहद में जूझते बुंदेलखंड गाँव
रवीन्द्र व्यास
वर्षा का अभाव , आग उगलता सूरज , तपती धरा , धरा का सूखा पानी , सूख रही आँखों की नमी , बेहाल बुंदेलखंड की यही स्थाई नियति बन गई है | पिछले दिनों झाँसी में गाँव गाँव से पहुंचे लोगों ने पानी की समस्या को लेकर ना सिर्फ प्रदर्शन किया बल्कि इक्षा मृत्यु की मांग भी की | लोगों ने यह फ़रियाद उन लोगों से की जिस प्रशासनिक तंत्र की आँखों का नीर ही सूख चुका है ,| और जो तंत्र एम् पी , यूपी के बुंदेलखंड को पिछले एक दशक में जल के लिए मिले 15 हजार करोड़ ठिकाने लगा चुका है उससे उम्मीद करने की बेबसी किसानो की नजरों में साफ़ देखी जा सकती थी | बुंदेलखंड में सूरज की तपन और सूखते जल श्रोतों ने हालात और भयावह बना दिए हैं | जल की जद्दोजहद में बुंदेलखंड का हर दूसरा गाँव जूझ रहा है | ऐसे में लोगों को अब पुराने कुओं की तालाबों की भी याद आने लगी है |
झांसी के कचहरी चौराहे पर स्थित गाँधी पार्क में 24 मई से बुंदेलखंड किसान पंचायत के अध्यक्ष गौरी शंकर बिदुआ के नेतृत्व में पीने के पानी की मांग को लेकर अनिश्चित कालीन धरना शुरू किया | उनका दावा है की बुंदेलखंड में अनेकों गाँव पीने के पानी की समस्या से ग्रस्त हैं जानवर प्यास से दम तोड़ रहे हैं | सरकार दावे कागजी साबित हो रहे हैं , जब तक समस्या का समाधान नहीं होता आंदोलन जारी रहेगा |
देखा जाए तो यह समस्या सिर्फ झाँसी जिले की भर नहीं है , बल्कि बुंदेलखंड के गाँव गाँव की यही कहानी है | छतरपुर जिले का एक क़स्बा है बिजावर , यहां कभी लोग कुँए से पानी लेने के लिए बाल्टी में रस्सी नहीं बांधते थे बल्कि हाथ से बाल्टी कुए से भर लेते थे | यहां लोगों ने परम्परागत कुओं को पाट दिया , उनकी जगह घरों में बोर करवा लिए , बटन दबाते ही पानी तो जमीन से इन लोगों ने खींचा पर , जमीन के जल का कर्ज अदा करना भूल गए , आज हालात ये हैं की पानी से संम्पन्न यह क़स्बा बून्द बून्द जल के लिए तरस रहा है | नगर पालिका नलों और टेंकरो से घर घर पानी पहुंचाने में जुटी है | बिजावर के ही समीप है जटाशंकर धाम कहते हैं की यहां के कुंडों का पानी कभी खाली नहीं होता था , पम्प से पानी निकालने के बावजूद कुंड भरे रहते थे | अब भगवान् शंकर के इस धाम के कुंडों में पानी सिर्फ इतना रहता है की बड़ी मुश्किल से शंकर जी के जलाभिषेक के लिए लोटा भर पाता है | अमावस्या के दिन स्थाई आने वाले लोग तो अब पानी साथ लेकर जाने लगे हैं | छतरपुर जिले का ही एक और कुंड है भीम कुंड जिसके जल स्तर में इस बार ऐतिहासिक गिरावट देखने को मिली है |
छतरपुर 100 किमी दूर बसे जिले के बक्श्वाहा कस्बे के हालात किसी से छिपे नहीं हैं | इस कसबे में जल समस्या एक स्थाई समस्या बन गई है | इस छोटे से कसबे में पानी प्रदाय के हालत बेहद चिंताजनक हैं | यहां के पत्रकार विनोद जैन बताते हैं की नगर पंचायत के अधिकार में 12 ट्यूब बेल हैं जिनमे से 8 सूख चुके हैं | नगर पंचायत 15 -15 दिनों में नलों से पानी सप्लाई करती है | जिस दिन यहां नल से जल सप्लाई होती है वह दिन किसी उत्सव से कम नहीं होता | यहां की ज्यादातर आबादी टेंकरो के पानी पर निर्भर है , इस कारोबार में लगभग ५० से ज्यादा टेंकर लगे हैं | टेंकर वालों की भलमानसता ही कहें की वे 4000 लीटर पानी टेंकर के मात्र 200 रु लेते हैं |
सामाजिक संस्था सोशल मीडिया फाउंडेशन की प्रारम्भिक रिपोर्ट कहती है कि सागर संभाग में शासकीय तौर पर 95302 हेंड पम्प लगे हैं | जिनमे 571921 हेंड पम्प घटते जल स्तर , वा तकनिकी खराबी के कारण बंद पड़े हैं | सरकार ने आम आदमी को पानी उपलब्ध कराने के लिए सागर जिले में 10686 , छतरपुर जिले में 10124 , टीकमगढ़ जिले में 9606 ,दमोह जिले में 9376 और पन्ना जिले में 9510 हेण्डपम्प लगवाए गए हैं | प्रशासन तंत्र वाह वाही लूटने के लिए सरकार को आंकड़े बताता है की सागर संभाग में मात्र 5 हजार हेंड पम्प बंद पड़े हैं | प्रतिशत में देखें तो यह मात्र पांच फीसदी हेण्डपम्प सरकारी रिकार्ड में बंद हैं |
बुंदेलखंड में तापमान 44 से 48 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच रहा है , लू के थपेड़े लोगों की जान ले रहे हैं , उस पर बचे खुचे पानी के वाष्पीकरण से समस्या और विकराल होती जा रही है | पिछले दिनों बुंदेलखंड के इन हालातों को समझने के लिए विदेशी मीडिया के दो पत्रकार आये थे | छतरपुर , सागर और दमोह जिले के दौरे के बाद उन्होंने बताया की हमने तरह की पानी की समस्या की उम्मीद की थी यहां तो उससे कहीं ज्यादा भयावह हालात हैं | पानी की इस विकराल समस्या को देख समझ कर अब लोगों को अपने परम्परागत कुओं की याद आने लगी है | उत्तर प्रदेश के महोबा जिले के बुंदेली समाज ने तारा पाटकर नेतृत्व में प्राचीन कुओं सफाई का अभियान शुरू हुआ | नगर पालिका के सहयोग से शुरू हुए इस अभियान में गोरखगिरि के निकट बंद और कचरे से पटे दूधिया कुँए की सफाई की गई तो कुँए का निर्मल जल देख लोगों की आँखे फटी की फटी रह गई | पहले ही कुँए ने लोगों को उनकी गलती का अहसास करा दिया की पुरखों की जिस धरोहर को हमने बेकार समझा था वास्तव में वही काम की है | अब लोग उस कुँए को देखने पहुंच रहे हैं | महोबा जिले के अभिलेख बताते हैं की जिले में 1240 कुए थे जिनमे से 800 कुँए अनुपयोगी बना दिए गए हैं | इन 800 कुओं को पुनर्जीवित करने की जरुरत अब समाज को महशूस होने लगी है |
बड़ा सवाल यही खड़ा होता है कि बुंदेलखंड की कितनी नगर पालिकाएं , नगर पंचायते ,ग्राम पंचायते और महानगर पालिकाएं महोबा नगर पालिका जैसा कार्य करने के लिए संकल्पित हैं ? देखा जाए तो बुंदेलखंड के हर नगर ,कसबे , गाँव में कुआं ,बावड़ी जल के एक बड़े श्रोत थे | इनको आधुनिकता की चकाचौंध ने ना सिर्फ उपेक्षित किया बल्कि इनका अस्तित्व ही ख़त्म कर दिया | "प्यास लगने पर कुआं खोदने की युक्ति को ही चरितार्थ करते हुए यदि इस दिशा में भी पहल की गई तो काफी कुछ समस्या का समाधान हो सकता है | दूसरा कुँए ही हैं जिनमे वर्षा जल का संरक्षण भी किया जा सकता है |



