04 फ़रवरी, 2018

बजट से बेजार हुआ बुंदेलखंड

बुंदेलखंड की डायरी

//रवीन्द्र व्यास //

बजट और बुंदेलखंड ये ऐसे रिश्ते हैं जैसे नदी के दो तट , जो कभी नहीं मिलते | हम लोग तो सरकार की लोक लुभावन बातों के बजट से  अपनी तक़दीर सवारने का जतन करते रहते हैं | धुंधले आईने में अतीत की तस्वीर ही दिखती है वर्तमान और भविष्य की तस्वीर जब  बुन्देलखंडियों के धुंधले आईने में आती है तो वह दर्पण ही चूर चूर हो जाता है | छल और फरेब के सियासी समीकरणों ने बुन्देलखंडियो को छला तो खूब है | जब देने की बारी आती है तो बुंदेलखंड  का बही खाता  ही बंद हो जाता है |
          ज्यदा समय नहीं बीता जब उत्तर प्रदेश वाले बुंदेलखंड के लोगों ने  भाजपा की झोली ऐसी  भरी की सातों जिलों की सारी 19 विधान सभा सीटें बीजेपी की झोली में डाल दी |  2014  के लोकसभा चुनाव में भी बांदा ,जालौन ,हमीरपुर और     झाँसी   लोकसभा सीटों पर बीजेपी  को जिताया था |  मध्य प्रदेश वाले बुंदेलखंड इलाके से भी खजुराहो टीकमगढ़,दमोह और सागर लोकसभा सीट पर बुंदेलखंड के लोगों ने   बीजेपी   की झोली ही भरी थी | 2013 के विधान सभा चुनाव में भी इस तरफ के बुंदेलखंड की 26 विधान सभा सीटों में से 20 सीटें बीजेपी की झोली में डाली और 6 कांग्रेस की झोली में डाली थी |  बीजेपी के प्रति उदार हुई बुंदेलखंड की जनता को उम्मीद थी कि      चुनावी साल में  मोदी के वित्त मंत्री अरुण जेटली जी कुछ तो अरुणिमा  बुंदेलखंड में बिखेरेंगे पर प्रकृति की तरह  उन्होंने भी बेरुखी ही दिखाई | उनके पास  ना यहां के किसानो के जख्मो  पर लगाने के लिए मल्हम था  और ना ही बेबस बुंदेलखंड को सवारने के लिए कोई  योजना| 
मोदी जी  ने 2015 की  किसानो की रैली में कहा था 2022 तक देश के किसानो की आय दो गुनी कर देंगे |मतलब साफ़ है की आय तभी दुगनी होगी जब 2019 के  चुनाव  में फिर से उनको चुनोगे | 2019 के बजट में मोदी सरकार  ने किसानो के लिए बड़ी बड़ी बातें की थी |  बजट में  किसानो के कर्ज को कम करने के लिए 15 हजार करोड़ का प्रावधान रखा  था   देश के कुछ जिलों में खाद की सब्सिडी सीधी किसानो के खाते में भेजने की बात भी कही थी | गांव के विकाश के लिए 87795 करोड़ रुपये ,सड़को के लिए 19  हजार करोड़ और मनरेगा के लिए 38500 करोड़ रु  का प्रावधान किया गया था | मनरेगा के बजट में इस बात का भी ध्यान रखा जाएगा की एक वर्ष में तालाब और कुँए देश में बने  सरकार ने गिरते भूजल स्तर पर भी चिंता जताई थी  और इसके लिए 60 हजार करोड़ का प्रावधान किया गया था   पांच साल में देश में 28 लाख हेक्टेयर में सिचाई सुविधा  उपलब्ध कराने के लिए 86500 करोड़ रु का बजट में प्रावधान किया गया था   , मई 2018  तक देश के सभी गाँवों तक बिजली पहुचाने के लिए 8500 करोड़ रु रखे गए थे   फसल बीमा के लिए 55 सौ करोड़ और दाल उतपादन के लिए 500 करोड़ रु रखे गए थे  जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए जतन  किये जाने की बात कही गई थी       देश के सन्दर्भ में बनी सरकार की इन नीतियों का लाभ बुंदेलखंड इलाके के लोगों को कितना  मिला यह बुंदेलखंड के किसान और मजदूर भली भाँती जानते हैं | 
                           पिछले बजट की ही यदि बात करें तो स्थिति साफ़ हो जायेगी की मनरेगा के प्रति सरकार कितनी संवेदन शील है | बुंदेलखंड के मध्य प्रदेश के छतरपुर,सागर , पन्ना ,टीकमगढ़ ,दमोह, और दतिया  तथा उत्तर प्रदेश के ललितपुर , झाँसी , जालौन ,हमीरपुर ,महोबा ,बांदा और चित्रकूट के किसानो  और मजदूरों को रोजगार की तलाश में पलायन ना करना पड़ता | बुंदेलखंड में नाम मात्र की जल सरचनाओ का विकाश हुआ , उससे कहीं ज्यादा तालाबों का विनाश हुआ | बुंदेलखंड के दर्जनों गाँव अब भी विद्दुत विहीन हैं , उज्ज्वला योजना गैस  सिलेंडर  भराने के लिए उनमें से अधिकांश आदिवासियों के  पास पैसे नहीं हैं | 
                               इस वर्ष के बजट में फिर किसानो को सब्ज बाग़ दिखाए गए हैं | देश के प्रसिद्ध अधिवक्ता और देश के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट भाषण की शुरुआत किसानो से की तो लगा एक बड़ा बदलाव  बुंदेलखड के  किसानो और आम आदमी की जिंदगी में आएगा |    2022 तक किसानो की आय दुगनी कर देंगे कैसे करेंगे इसकी कोई योजना  पेश नहीं की , तीन साल से दुगनी आय का गीत सुनने वाले भी अब कहने लगे हैं की तीन साल में तीस फीसदी ही आय बड़ा देते ?  किसानो को उनकी उपज की लागत पर डेढ गुना समर्थन मूल्य दिया जाएगा | यह वायदा तो खुद मोदी जी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में किया था | पर इस को लागू नहीं किया ,था और ना ही इसे कभी बजट में रखा |  हाल के गुजरात चुनाव में ग्रामीण क्षेत्रो  मिली करारी शिकस्त के बाद इस सरकार को किसानो के गुस्से का अहसास हुआ | 2 हजार करोड़ का फंड कृषि बाजार के लिए रक्खा है ,कृषि प्रोसेसिंग सेक्टर के लिए 1400 करोड़ रु , आपरेशन ग्रीन के लिए 5 सौ करोड़ रु , देश में 42 मेगा फ़ूड पार्क बनाये जाने , गाँव की २२ हजार हाटों को कृषि बाजार में बदलने की योजना है,| मछुआरों और पशु पालकों को किसानो की तरह क्रेडिट कार्ड दिए जाएंगे , और इस व्यवसाय में दस हजार करोड़ रु देकर आय बढ़ाने की कोशिश होगी | गाँव के इंफ्रा स्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए 14 लाख करोड़ रु का बजट में प्रावधान किया गया है | 
         दरअसल बुंदेलखंड के किसानो को उम्मीद थी कि बुंदेलखंड के लिए कुछ विशेष होगा , पर ना रेलवे के लिए कुछ मिला और ना यहां की जल सरचनाओं के विकाश के लिए कोई योजना सामने आई | बजट के पहले दमोह से पन्ना, और दमोह से जबलपुर  रेल लाइन की बात की जा रही थी , वहीँ झाँसी से बांदा रेल ट्रेक के विस्तार और विद्दुती करण की बात हो रही थी | पर सारे अरमान  दफ़न हो कर रह गए | ये तो भविष्य की योजनाए थी पर वर्तमान में जो योजनाए  चल रही हैं उनमे बीना रिफाइनरी के दूसरे चरण का काम , और छतरपुर के एनटी पी सी के काम पर पूर्ण विराम ही लगा दिया गया है | असल में एन टी पी सी का शिलान्यास कांग्रेस नेता ज्योतरादित्य सिंधिया ने किया था इस कारण बीजेपी सरकार नहीं चाहती की इसका श्रेय उन्हें मिले | इसी के चलते योजना को पर्यावरण स्वीकृति के नाम पर विराम लगा दिया , जबकि केन बेतवा लिंक परियोजना में इससे कई गुना ज्यादा नुक्सान वन और वन्य जीवों का होना है | हीरा खनन का बड़ा प्रोजेक्ट छतरपुर जिले के बक्स्वाहा में रिओ टिंटो ने शुरू किया था , सरकार की अड़ंगे बाजी के चलते कम्पनी वाले सामान समेटने को मजबूर हो गए | 
               रही बात मनरेगा के बजट वृद्धि का तो इसकी दशा सरकार ने क्या की है इसे बुंदेलखंड के गाँवों में समझा जा सकता है | साल में सौ दिन मजदूरी देने वाली इस योजना के नाम पर मजदूरों को महिनो मजदूरी नहीं मिलती | सरकार ने मशीनों से 40 फीसदी कार्य कराने का क्या प्रावधान किया  सारा काम मशीनों से होने लगा , मजदूरी के नाम पर फर्जी  मस्टर बनने लगे | यहां तक की गाँव के पलायन करने वाले लोगों के जॉब कार्ड भी सरपंच सचिव धन और दबाव से अपने पास ही रखने लगे | यह सारा तमाशा प्रशासन की मिली भगत से चलता जा रहा है | बुंदेलखंड का देशी पान उद्योग तबाही की कगार पर है , वही यहां का सिघाड़ा कारोबार सूखते जलाशयों के कारण समाप्त हो रहा है | मछुआरों के लिए जिस मछली उत्पादन के प्रोत्साहन की बात की जा रही है उसमे भी बुंदेलखंड के मछुआरों के हाथ कुछ नहीं लगने वाला है | एक तो सूखे जलाशय  में मछली नहीं मिलना ,दूसरा मछुआ समिति तो मछुआरों की होती है पर इस पर कब्जा दबंगो का होता है | इनमे से अधिकांश सत्ता धारी दल के नजदीकी हैं | 
                  2010 -11 में उत्तर प्रदेश वाले बुंदेलखंड इलाके में किसानो के हालात जानने  आई केंद्रीय समिति ने अपनी एक रिपोर्ट में कई सुझाव दिए थे , जिनमे बेतवा नदी पर बाँध , केंद्रीय विश्व विद्यालय , उद्योग विकसित करने के लिए ,एक्साइस , आयकर ,कस्टम, विक्रय कर , सर्विस टेक्स में शत प्रतिशत छूट देने की बात कही थी | समिति ने पलायन के  आंकड़े भी  दिए थे | अब ये रिपोर्ट मनमोहन सरकार के समय की थी इसलिए वर्तमान सरकार के अधिकारी  इस रिपोर्ट को देखने और बताने की जहमत नहीं उठाते |
  ० असल में यह बुंदेलखंड की नियति ही है कि जिस पर भरोषा किया उसी ने खंजर घोपा , | बीजेपी तो शायद यह मानने लगी है की बुंदेलखंड की मज़बूरी है बीजेपी जरुरी है |  जब कोई मजबूर और लाचार हो जाए तो उससे जैसा चाहे बर्ताव करो वह कही जा ही नहीं सकता |  ,   
                                       

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