01 फ़रवरी, 2012

अनकही

 
किसे सुनाऊं हाले गम 

पिछले कुछ दिनों में बुंदेलखंड इलाके के कई नेताओं  से मिलने का समय  मिला | कुछ देश दुनिया का दर्द सब को बेचैन किये था |  कुछ उनकी सुनी कुछ अपनी सुनाई ,चर्चा चलती रही |  सब कुछ एसा लग रहा था मानो देश के इनसे बडे शुभ चिन्तक कहीं हें ही नहीं | उनके अन्दर झांकने का जब हमने कुछ प्रयाश किया तो उनका दर्द बाहर निकल ही आया | कहने लगे क्या बताएं प्रदेश में सरकार तो हमारी है किन्तु कोई सुनने वाला ही नहीं है | इलाके में तो अधिकारियों ने लूट मार मचा रखी है | पुलिस को क्या कहें ये तो डकेतों की पर्याय हो गई है |  मुख्य मंत्री को भी बताया की यदि हालत यही रहे तो लोगों का विशवास टूट जाएगा , और तीसरी बार सरकार बनाने का सपना चकना चूर हो जाएगा | मुख्य मंत्री जी सुन तो लेते हें पर करते कुछ नहीं हें | अब तो हमे भी लगने लगा है की उमा भारती की बी.जे.पी. में वापसी के बाद से शिवराज को बुंदेलखंड के तीन जिलों( छतरपुर,पन्ना,और टीकमगढ़) से कोई मतलब नहीं रह गया है | वे यहाँ एसे अधिकारी भेज रहे हें जो हम लोगों की कम कांग्रेसियों की ज्यादा सुनते हें |
बात चली थी भ्रष्टाचार से की सत्ता धारी नेता किस तरह से भ्रष्टाचार कर रहे हें : पर वे आखिर अपने दल के दलदल में कैसे पत्थर फेकते कीचड़ तो उन्ही पर आकार लगता | एक बात कह कर वे मौन हो गए जो एसा कर रहे हें उनको जनता सबक सिखाएगी |

विकास की उमंग और चुनौतियों के संघर्ष का बुंदेलखंड

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