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Univrsity_विश्वविद्यालय में महराजा कालेज का संविलयन हुए 8 माह यू जी सी को जानकारी देंगे तीन साल की
विश्वविद्यालय में महराजा कालेज का संविलयन हुए 8 माह यू जी सी को जानकारी देंगे तीन साल की
रवीन्द्र व्यास
छतरपुर // महराजा छत्रसाल विश्वविद्
सन 2015 में यह महराजा छत्रसाल विश्वविद्यालय अस्तित्व में आया था, ऑटोनॉमस महाराजा कॉलेज को
27/9/2021 के बाद विश्वविद्या
अब 23 -24 मई को यू जी सी का निरीक्षण दल विश्वविद्यालय के 12 (बी) के निरीक्षण हेतु आ रहा है | यूजीसी का 12( वीं) के नियम
कर लेता है तब उसका निरीक्षण
यहां यह भी दिलचस्प है कि 16 मार्च 2022 को विश्वविद्यालय ने जब अपना प्रथम दीक्षांत समारोह आयोजित किया था , उस समय महाराजा ऑटोनॉमस कॉलेज के मेरिट वाले छात्रों को उसमें शामिल नहीं किया गया था | कहा गया था इनकी अंकसूची और छात्र यूटीडी के नहीं हैं | जबकि संभाग के सभी कालेजों के स्नातकोत्तर कक्षाओं के मेरिट चार वाले छात्रों को राज्यपाल तथा उच्च शिक्षा मंत्री ने गोल्ड मेडल तथा डिग्री प्रदान की थी | अब वही कुलपति महोदय सभी कालेज के विभागों के पिछले 3 वर्षों के परीक्षा परिणाम अकादमी की उपलब्धियां जिसमें सेमिनार, बेविनार , स्पोर्ट्स ,
16 मार्च 2022 को छतरपुर के महराजा छत्रशाल बुंदेलखंड वि
28 अप्रैल, 2022
Tempel_Varship_ पुरातत्व संरक्षित मंदिर- दक्षिण भारत में पूजन उत्तर भारत में प्रदर्शन
पुरातत्व संरक्षित मंदिर
दक्षिण भारत में पूजन उत्तर भारत में प्रदर्शन
रवीन्द्र व्यास
पुरातत्व संरक्षित मंदिरों में पूजा की अगर बात करें तो अजब स्थितियां देखने को मिलती हैं | जहां दक्षिण भारत के अधिकाँश मंदिरों में पूजा और धार्मिक कार्यक्रम होते हैं वहीँ उत्तर भारत के पुरातत्व विभाग के आधीन अधिकाँश मंदिर सिर्फ प्रदर्शन के लिए ही हैं | इन मंदिरों में किसी भी तरह के धार्मिक कार्य अथवा पूजा करने की अनुमति भारत सरकार प्रदान नहीं करती | बुंदेलखंड के प्रमुख गढ़ खजुराहो के ही मंदिरों में पूजा नहीं होती |
खजुराहो के प्रमुख गाइड प सुधीर शर्मा कहते हैं कि भारत के मंदिरों मे जो प्रथा सरकार द्वारा चलाई जा रही है वाह मात्र एक प्रदर्शन बनकर रह गई है | जो कि हमारी सनातन धर्म कि प्रार्थओं के विपरीत है | वे बताते हैं कि विगत वर्षों में खजुराहो दर्शन पर आए आध्यात्मिक संत देव प्रभकार शास्त्री जी, कथा वाचक पंडित धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री , मन्नत महाराज जी, जैन आचार्य श्री विद्यासागर जी , ऋतंभरा जी ने भी इस बात पर हमेशा जोर दिया कि हमारे धार्मिक मंदिरों में प्रदर्शन नहीं दर्शन होना चाहिए || लोगों को भ्रमण करने के लिए टिकट लेना भी वे अनुचित मानते
हैं |
जबकि इसके ठीक विपरीत पुरातत्व विभाग से संरक्षित दक्षिण भारत के सभी मंदिरों में नियमित पूजन , धार्मिक कार्यक्रम , भजन एवं प्रसाद वितरण का कार्यक्रम होता है | दक्षिण भारत के इन मंदिरों में हो रहे धार्मिक कार्यक्रमों के सुखद परिणाम भी देखने को मिले हैं | इन मंदिरों के कारण सैकड़ों लोगों के परिवार का भरण पोषण होता है रोजगार का सृजन होता है | मंदिरों में चढ़ोत्री से होने वाली आय से कई चेरिटेबिल हॉस्पिटल और शिक्षा सस्थान संचालित होते हैं | साथ इसका व्यापक असर समाज के साथ साथ यहां आने वाले देशी विदेशी सैलानियों पर भी देखने को मिलता है | ये एक तरह से भारतीय संस्कृति के प्रचार प्रसार के महत्वपूर्ण स्थल होते हैं |
उत्तर भारत के प्रमुख पर्यटन क्षेत्र में शामिल खजुराहो के ही २६ में से २१ मंदिरों में पूजा की अनुमति नहीं है | मात्र मतंगेश्वर मंदिर , हनुमान मंदिर और जैन मंदिरों में लोग भक्ति पूजन कर सकते हैं | पुरातत्व विभाग के जानकारों की माने तो इसके पीछे एक बड़ी वजह है | वे बताते हैं कि मुगलों के आक्रमण सबसे ज्यादा उत्तर भारत में हुए , सबसे ज्यादा मंदिरों को क्षत विक्षत उन्होंने ही किया | ऐसे में उत्तर भारत के अधिकाँश मदिर या तो नष्ट हो गए या वीरान हो गए | अंग्रेजों के शासन काल में 1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की स्थापना हुई थी | स्थापना के बाद पुरातत्व महत्त्व के स्मारकों को पहले सूचि बद्ध किया गया , बाद में एक एक्ट के माध्यम से इन स्मारकों को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया | १आजादि के बाद १९५८ में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने एक्ट में संसोधन वगैरह किये |
जब मंदिर वगैरह संरक्षित घोषित किये गए उस समय दो श्रेणियों में इनको विभक्त किया गया एक वे मंदिर थे जहां पूजा वगैरह होती थी उन्हें जीवंत श्रेणी में रखा गया , दूसरी तरफ वे मंदिर थे जहां पूजा नहीं होती थी उन्हें निर्जीव श्रेणी में रखा गया | इसमें दिलचस्प ये है की जीवंत श्रेणी के अधिकांश मंदिर दक्षिण भारत में थे जब की निर्जीव श्रेणी के अधिकांश मंदिर उत्तर भारत के थे | खजुराहो के ही मंदिरों के बारे में यह स्पष्ट किया गया ,कि खजुराहो के मंदिर जब ए एस आई को ट्रांसफर हुए उस समय यहां के राजा ने जिन मंदिरो में पूजा होने की जानकारी दी थी उनमे आज भी पूजा होती है ,| जिनमे मतंगेश्वर मंदिर , हनुमान मंदिर और नवदुर्गा के समय जगदम्बिका मंदिर में पूजा की बात कही थी | इसी हिसाब से मंदिरों का गजट नोटिफिकेशन हुआ था | अब अगर पूजा और धार्मिक कार्यक्रम करने की बात कही जाती है तो, यह एक संवैधानिक मुद्दा हो जाएगा इसके लिए संसद से ही संसोधन हो सकता है |
दक्षिण भारत के मंदिर मुग़ल आक्रांताओं से सुरक्षित रखने में वहां के समाज का भी एक बड़ा योगदान माना जाता है | इसी के चलते दक्षिण भारत के मंदिरों में निरंतर पूजन और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन चलता रहा , जो आज भी निरंतर जारी है | इसके अलावा मंदिरों की आर्थिक समृद्धि में समाज का भी एक बड़ा योगदान रहा , वहां के लोग अपनी लाभांश आय का दशांस इन देवालयों में दान कर अपने को भाग्यवान मानते हैं | ससर्थीक रूप से समृद्ध दक्षिण भारत के मंदिर सिर्फ समाज से लेना भर नहीं जानते बल्कि समाज को लौटाना भी जानते हैं , इनमे से कई मंदिरों के अपने शैक्षणिक संस्थान और चिकित्सालय भी हैं |
दरअसल पुरातत्व महत्व के संरक्षित मंदिरों में पूजा को लेकर मांग ने तब जोर पकड़ा जब उमा भारती ने रायसेन जिले पुरातत्व धरोहर सोमेश्वर मंदिर में पूजा की अनुमति मांगी | जब उन्हें इसकी अनुमति नहीं मिली तो उन्होंने द्वार के बाहर से ही पूजन किया और अन्न त्याग की घोषणा कर दी | उनकी इस मांग के बाद से खजुराहो में यह मांग जोर पकड़ने लगी है कि यहाँ के मंदिरों में पूजन की अनुमति मिले |
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