09 जून, 2022

watar_crises जल से जुड़ा है जीवन और अर्थ

जल से जुड़ा है जीवन और अर्थ रवीन्द्र व्यास भारतीय संस्कृति के वेद और पुराणों में जल और उसके महत्व के बारे में विस्तार से लिखा गया है | लिखा ही नहीं गया बल्कि लोगों ने सदियों तक इसे आत्मसात भी किया | जीवन के आधार जल की महत्वत्ता को देखते हुए वैदिक काल से ही जल को धर्म से भी जोड़ दिया गया था | हिन्दू समाज के अधिकाँश संस्कार जल बिन अधूरे हैं | जन्म के समय कुआँ पूजन हो , विवाह के समय मागर माटी का संस्कार हो , अमावस्या, मकर संक्रांति का स्नान हो , अथवा कुम्भ का स्नान हो , कार्तिक स्नान , मृत्यु के बाद मोक्ष तभी मिलता है जब जल में अस्थियां प्रवाहित हो जाती हैं | यही कारण है कि नदियों को माता का दर्जा दिया जाता है | देश दुनिया में जहां भी सभ्यता और संस्कृति का विकाश हुआ है उसके मूल में जल तत्व प्रमुख रहा है | वराह मिहिर द्वारा रचित वृहद संहिता में जल के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है | जिस जल के महत्व को सनातन काल से भारतीय जन मानस मानता रहा , इसके पीछे धर्म के साथ जीवन और अर्थ का चक्र भी जुड़ा था | उसी संस्कृति को जब देश के जनमानस के द्धारा लोभ और आधुनिकता के नाम पर तिरस्कृत किया जाने लगा तो उसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे | बढ़ते तापमान घटते वृक्षों ने हालातों को बेकाबू किया है | बुंदेलखंड सहित देश के अनेकों राज्य इन दिनों भीषण जल संकट का सामना कर रहे हैं | इन हालातों से निपटने के लिए शासन स्तर पर प्रयास किये जा रही हैं , पर जब तक जल संरक्षण और पर्वावरण के संरक्षण और संवर्धन में आम जन का जुड़ाव नहीं होगा इसके सार्थक परिणाम सामने नहीं आएंगे | पंचायत राज दिवस पर २४ अप्रेल २०२२ को प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने देश के प्रत्येक जिले में 75 _75 तालाब बनाने की घोषणा की | आजादी के आजादी अमृत महोत्सव को भी यादगार बनाने के लिए इन तालाबों को अमृत सरोवर नाम दिया गया | प्रधान मंत्री के इस अभियान का राज्यों में भी असर दिखा , मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रायसेन जिले के काहुला में एक जल संसद आयोजित की और जल अभिषेक अभियान की शुरुआत करते हुए कहा कि हमारी जल संस्कृति के अभिन्न अंग हैं तालाब | उन्होंने प्रदेश के 52 जिलों के 5000 अमृत सरोवरों का वर्चुअली शिलान्यास भी किया | वर्षा जल के संरक्षण के लिए ये अमृत सरोवर लाभ कारी सिद्ध होंगे |हालांकि केंद्र और राज्य सरकारों ने समय समय पर सरोवरों के संरक्षण की योजनाए बनाई और जिस तंत्र के भरोसे इनको पूर्ण करने का जतन किया गया उसी तंत्र ने इस पर पलीता लगाया | बुंदेलखंड क्षेत्र में सदियों पहले वर्षा जल संरक्षण के प्रयास किये गए थे | यह क्षेत्र विरासत में मिली अपनी जल संरक्षण निति के कारण जाना जाता रहा है | यहां की बसाहट भी कुछ इस तरह होती थी कि एक पहाड़ और उसकी तलहटी में गाँव , पानी की व्यवस्था के लिए एक सरोवर | अधिकाँश गाँवों की बसाहट कुछ इसी तरह देखने को मिलती है | गौड़ राजा और चन्देल , बुंदेला शासको के कालखंड को देखा जाए तो पानी के लिए तालाबों का निर्माण इन शासकों की पहली प्राथमिकता रही है | बुंदेलखंड के इन चन्देली तालाबों की संख्या हजारों में थी | जो अपनी बेजोड़ तकनीकी के लिए भी जाने जाते हैं | तालाबों के निर्माण और उनकी योजना को इस तरह बनाया जाता था कि एक तालाब का पानी भर जाने के बाद दूसरे तालाब में , कुंआ और बावड़ी में भी पहुंच जाता था | पन्ना नगर जो पत्थरो पर ही एक तरह से बसा है , पहाड़ी की तलहटी है , पानी का संकट यहां की स्थाई नियति है , यहां बने तालाबों का लिंक सिस्टम लोगों को तब पता चला जब एक कुंए को खाली कराने के लिए मोटर लगाईं गई और वह कुंआ खाली नहीं हो रहा था | पन्ना के तत्कालीन कलेक्टर ने जब इसकी खोज बीन कराई तो पता चला ये कुँए भूमिगत नहरों से तालाब से जुड़े हैं | टीकमगढ़ जिले में जहां सर्वाधिक चन्देली तालाब बने हैं , इन तालाबों को पानी से भरने के लिए मध्य प्रदेश सरकार ने नदी जोड़ो तालाब जोड़ो योजना के तहत प्रयास किये | दुखद पहलू ये है कि इनमे से अधिकाँश तालाब तक, अब भी नदी का पानी नहीं पहुँच पा रहा है |बान सुजारा बाँध से भूमिगत पाइप लाइनों से खेतों और गाँवों तक पानी पहुंचाने का जतन सरकार ने किया इसे आधुनिक तकनीकी का ही कमाल है कि अधिकाँश पाइप लाइने फूट रही हैं और खेतों और गाँवों तक पानी नहीं पहुंच रहा है | असल में बुंदेलखंड के सागर ,दमोह ,पन्ना , टीकमगढ़, निवाड़ी ,दतिया , क्षेत्र मध्य प्रदेश में आते हैं , जब कि झाँसी ,ललितपुर , बाँदा ,महोबा , हमीरपुर , उरई , जालौन , चित्रकूट उत्तर प्रदेश में आते हैं | देश के ये वो जिले हैं जो अपनी समृद्ध शाली परम्पराओं के कारण जाने जाते रहे हैं | मूलतः यह इलाका कृषि पर ही आधारित रहा है | पिछले तीन दशकों में यहां मौसम कुछ ऐसा मेहरबान रहा कि लोग एक दशक में आठ बार प्रकृति के प्रकोप के शिकार हुए | जिसके चलते लोगों को अलग अलग तरह की समस्याओं का समाना करना पद रहा है | ऐसा भी नहीं कि लोगों ने इस समस्या का अपने स्तर पर मुकाबला नहीं किया बांदा का जखनि गाँव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है , जहाँ लोगों ने स्वयं जल संरक्षण , और वृक्षा रोपण की दिशा में सार्थक प्रयास किये जिसका उन्हें फायदा मिला | इस तरह की प्रेरणा और गाँव वालों को भी मिली है | ऐसे समय जबकि भूजल भी दिन प्रति दिन पाताल की और जा रहा है ,| केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट बताती है कि देश में 66 फीसदी जलाशयों में 40 फीसदी से भी कम पानी बचा है | मानसून अगर बिगड़ा तो खरीफ फसलों के लिए हालात चिंताजनक हो जाएंगे | नीति आयोग ने 2019 में एक रिपोर्ट में बताया था 2020 तक देश के 21 शहरो में भू जल समाप्त हो जाएगा | इस रिपोर्ट के बाद हड़कंप मच गया था | इन हालातों को देख कर केंद्र सरकार ने अटल भूजल योजना शुरू की थी | इसी साल अप्रेल में केंद्र की मोदी सरकार ने अमृत सरोवर योजना शुरू की है | जिसमे एक हेक्टेयर के तालाब में 10 क्यूबिक जल संरक्षण किया जाएगा | बुंदेलखंड में इस योजना से कितना लाभ होगा यह वक्त ही बताएगा |

26 मई, 2022

Famliy _ टूटते संयुक्त परिवार:: बढ़ते एकल परिवार

-डॉ. सौरभ मालवीय मनुष्य जिस तीव्र गति से उन्नति कर रहा है, उसी गति से उसके संबंध पीछे छूटते जा रहे हैं. भौतिक सुख-सुविधाओं की बढ़ती इच्छाओं के कारण संयुक्त परिवार टूट रहे हैं. माता-पिता बड़ी लगन से अपने बच्चों का पालन-पोषण करते हैं. उन्हें उच्च शिक्षा दिलाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं. परिवार में लड़कियां हैं, तो वे विवाह के पश्चात ससुराल चली जाती हैं और लड़के नौकरी की खोज में बड़े शहरों में चले जाते हैं. इस प्रकार वृद्धावस्था में माता-पिता अकेले रह जाते हैं. इसी प्रकार शहरों में उनके बेटे भी अकेले हो जाते हैं. संयुक्त परिवार टूटने के कारण एकल परिवार बढ़ते जा रहे हैं. एकल परिवारों के कारण संबंध टूट रहे हैं. संयुक्त परिवारों में बहुत से रिश्ते होते थे. दादा-दादी, ताया-ताई, चाचा-चाची, बुआ-फूफा, नाना-नानी, मामा-मामी, मौसी-मौसा तथा उनके बच्चे अर्थात बहुत से भाई-बहन. बच्चे बचपन से ही इन सभी संबंधों को जानते थे, परन्तु अब एकल परिवारों में माता-पिता और उनके दो या एक बच्चे ही हैं. संयुक्त परिवार टूटने के अनेक कारण हैं. रोजगार के अतिरिक्त परिवार के सदस्यों में बढ़ते मतभेद, कटुता एवं स्वार्थ आदि के कारण भी एकल परिवार बढ़ते जा रहे हैं. ऐसी परिस्थितियों में व्यक्ति नितांत अकेला पड़ता जा रहा है. संयुक्त परिवार में समस्याएं सांझी होती थीं. व्यक्ति किसी कठिनाई या समस्या होने पर परिवार के सदस्यों के साथ विचार-विमर्श कर लेता था. इस प्रकार उसे समस्या का समाधान घर में ही मिल जाता था. संयुक्त परिवार के बहुत से लाभ हैं. परिवार के प्रत्येक सदस्य की सुरक्षा का दायित्व सबका होता है. किसी भी सदस्य की समस्या पूरे परिवार की होती है. यदि किसी को पैसे आदि की आवश्यकता है, तो पैसे बाहर किसी से मांगने नहीं पड़ते. परिवार के सदस्य ही मिलजुल कर सहयोग कर देते हैं. परिवार में सदस्यों की संख्या अधिक होने के कारण घर और बाहर के कार्यों का विभाजन हो जाता है. प्रत्येक सदस्य अपनी योग्यता और क्षमता के अनुसार कार्य कर लेता है तथा अन्य कार्यों से मुक्त रहता है. ऐसे में उसे अपने लिए पर्याप्त समय मिल जाता है. इसके अतिरिक्त संयुक्त परिवार में रसोई एक होने के कारण खर्च भी कम हो जाता है. उदाहरण के लिए दो या तीन एकल परिवार यदि संयुक्त परिवार के रूप में रहते हैं, तो उन्हें अधिक सामान की आवश्यकता होगी. थोक में अधिक सामान लेने पर वह सस्ता पड़ता है. इसी प्रकार तीन के बजाय एक ही फ्रिज से काम चल जाता है. ऐसी ही और भी चीजें हैं. परिवार के किसी सदस्य के बीमार होने पर उसकी ठीक से देखभाल हो जाती है. परिवार के सदस्य साथ रहते हैं, तो उनमें भावनात्मक लगाव भी बना रहता है. इसके अतिरिक्त बच्चों का पालन-पोषण भी भली-भांति आसानी से हो जाता है. उनमें अच्छे संस्कार पैदा होते हैं. वे यह भी सीख जाते हैं कि किस व्यक्ति के साथ किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए. इसमें बड़ों का सम्मान करना, अपनी आयु के लोगों के साथ मित्रवत व्यवहार करना तथा छोटों से स्नेह रखना आदि सम्मिलित हैं. आज परिस्थितियां पृथक हैं. मनुष्य किसी भी कठिनाई या किसी संकट के समय स्वयं को अकेला ही पाता है. यदि परिवार में महिला का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, तो तब भी उसे घर का सारा कार्य स्वयं करना पड़ता है, जबकि संयुक्त परिवार में अन्य महिलाएं होने के कारण उसे आराम करने का समय मिल जाता था. साथ ही उसकी भी उचित प्रकार से देखभाल भी हो जाती थी. एकल परिवार में अकेले पड़ जाने के कारण व्यक्ति अवसाद का शिकार हो जाता है. अवसाद एक मानसिक रोग है. इस अवस्था में व्यक्ति स्वयं को निराश अनुभव करता है. वह स्वयं को अत्यधिक लाचार समझने लगता है. ऐसी स्थिति में प्रसन्नता एवं आशा उसे व्यर्थ लगती है. वे अपने आप में गूम रहने लगता है. वह किसी से बात करना पसंद नहीं करता. हर समय चिड़चिड़ा रहता है. यदि कोई उससे बात करने का प्रयास करता है, तो वे क्रोधित हो जाता है. कभी वह उसके साथ असभ्य अथवा उग्र व्यवहार भी करता है. मनोचिकित्सकों के अनुसार अवसाद के भौतिक कारण भी होते हैं, जिनमें आनुवांशिकता, कुपोषण, गंभीर रोग, नशा, कार्य का बोझ, अप्रिय स्थितियां आदि प्रमुख हैं. अवसाद की अधिकता होने पर व्यक्ति आत्महत्या तक कर लेता है. अवसाद के कारण आत्महत्या करने के अप्रिय समाचार सुनने को मिलते रहते हैं. ऐसे विचलित करने वाले समाचार भी मिलते हैं कि अमुक व्यक्ति ने सपरिवार आत्महत्या कर ली या परिवार के सदस्यों की हत्या करने के पश्चात स्वयं भी आत्महत्या कर ली. कोरोना काल में जहां संयुक्त परिवारों के लोग एक-दूसरे के साथ मिलजुल कर रहे, वहीं एकल परिवारों के लोग अवसाद का शिकार होने लगे. ‘द लैंसेट पब्लिक हेल्थ’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार कोरोना वायरस संक्रमण से ठीक हो चुके लोगों में अवसाद एवं घबराहट की शिकायतें देखने को मिल रही है. सात दिन या उससे अधिक समय तक कोरोना वायरस संक्रमण से पीड़ित रहे लोगों में अवसाद एवं घबराहट की दर उन लोगों की तुलना में अधिक थी, जो संक्रमित रोगी कभी अस्पताल में भर्ती नहीं हुए अर्थात वे अपने परिजनों के मध्य ही रहे. रिपोर्ट के अनुसार सार्स-कोव-2 संक्रमण वाले ऐसे रोगी जो अस्पताल में भर्ती हुए उनमें 16 महीने तक अवसाद के लक्षण देखे गए, परन्तु जिन रोगियों को अस्पताल में भर्ती नहीं होना पड़ा, उनमें अवसाद और घबराहट के लक्षण दो महीने के भीतर ही कम हो गए. सात दिनों या उससे अधिक समय तक बिस्तर पर रहने वाले लोगों में 16 महीने तक अवसाद और घबराहट की समस्या 50 से 60 प्रतिशत अधिक थी. मनोचिकित्सकों के अनुसार अवसाद से निकलने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति अपने परिजनों एवं मित्रों के साथ समय व्यतीत करे. किसी भी समस्या या संकट के समय परिजनों से बात करे. स्वयं को अकेला न समझे. सकारात्मक विचारों वाले व्यक्तियों से बात करे. परिजनों को भी चाहिए कि वे अवसादग्रस्त लोगों में सकारात्मक विचार पैदा करने का प्रयास करें, उन्हें अकेला न छोड़ें, क्योंकि ऐसे लोग आसानी से अपराध की ओर अग्रसर हो सकते हैं. उन्हें उनकी किसी भी नाकामी के लिए तानें न दें, अपितु उनको प्रोत्साहित करें तथा उनके आत्मविश्वास को बढ़ाएं. वास्तव में आज तकनीकी ने समस्त संसार के लोगों को जितना समीप कर दिया है, उतना ही एक-दूसरे से दूर भी कर दिया है. मोबाइल के माध्यम से व्यक्ति क्षण भर में विदेश में बैठे व्यक्ति से भी बात कर लेता है. परन्तु मोबाइल के कारण ही लोगों को परिवार के सदस्यों से बात करने का समय नहीं मिल पाता. प्रत्येक स्थान पर लोग अपने मोबाइल के साथ व्यस्त दिखाई देते हैं. परिणामस्वरूप व्यक्ति का अकेलापन बढ़ता जा रहा है. व्यक्ति व्यक्ति से दूर होता चला जा रहा है. आवश्यकता है सामूहिक संवाद की प्रत्यक्ष संवाद मन से भाव से विचार से हमे जोड़ता है दुख :सुख में सहायक होकर साथ होने की अनुभूति प्रदान करता है। ( लेखक- हैपीनेस/ अनुभूति कार्यक्रम के प्रभारी है- बेसिक शिक्षा, उत्तर- प्रदेश )

22 मई, 2022

Univrsity_विश्वविद्यालय में महराजा कालेज का संविलयन हुए 8 माह यू जी सी को जानकारी देंगे तीन साल की

 विश्वविद्यालय में  महराजा कालेज का संविलयन हुए 8 माह यू जी सी को जानकारी देंगे तीन साल की 

रवीन्द्र व्यास 

 छतरपुर  //  महराजा छत्रसाल  विश्वविद्यालय  अपने अस्तित्व के साथ ही विवादों का पर्याय रहा है | मामला चाहे जिस तरह का हो विवादों से इसका स्थाई नाता सा बन गया है | हाल ही में एक नया मामला सामने आया है जिसमे बताया जा रहा है कि विश्वविद्यालय किस तरह से यू जी सी को भ्रमित करने का षड्यंत्र रच रहा है | अब ये विश्वविद्यालय का षडयंत्री कारी कदम है अथवा विश्विद्यालय को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की कोई योजना | यह जांच का विषय हो सकता है | 

     सन 2015 में   यह महराजा छत्रसाल   विश्वविद्यालय अस्तित्व में आया था, ऑटोनॉमस महाराजा कॉलेज को छोड़कर  संभाग के सभी 190 शासकीय / अशासकीय कॉलेज जोड़े गए थे |  विश्वविद्यालय  में  यू टी डी विभाग ना होने के कारण विश्वविद्यालय  2015 से 2021 तक सिर्फ परीक्षाओं का संचालन करता रहा|  मध्य प्रदेश शासन के उच्च शिक्षा  विभाग ने पत्र क्र एफ 73 -4/2021 /38 -3  दिनांक  24 सितंबर 2021 को आदेश जारी कर महाराजा ऑटोनॉमस कॉलेज को विश्वविद्यालय में विलय करने का आदेश दिया | कुलसचिव ने 27/9/2021 को इसकी अधिसूचना जारी कर शासकीय महाराजा स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय छतरपुर के समस्त संसाधन (समस्त चल अचल संपत्ति)  समस्त अस्तियाँ  अभिलेख दायित्व तथा महाविद्यालय में अध्ययनरत छात्र सत्र 2021-22 में महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय छतरपुर स्वीकार कर लिए  है | तथा महाविद्यालय छतरपुर  कार्यरत समस्त अधिकारी कर्मचारियों को महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय छतरपुर में संविलय कर लिया गया | इसकी जानकारी यू जी सी को नहीं दी गई |  

 27/9/2021 के बाद विश्वविद्यालय में कार्य की सभी विभागों को वरिष्ठता अनुसार विभाग अध्यक्ष तथा टीम बनाकर यूटीडी विभागों का संचालन  शुरू  किया गया | महराजा महाविद्यालय के विश्वविद्यालय में संविलयन के बाद महराजा छत्रसाल विश्वविद्यालय प्रदेश में सर्वाधिक छात्र संख्या वाला विश्विद्यालय  बन गया | पर विश्व विद्यालय के पास स्वयं के स्वामित्व का कोई भवन नहीं है , प्रोफ़ेसर भी प्रतिनयुक्ति पर हैं जिनका वेतन शासकीय कन्या महाविद्यालय से निकलता है | 

अब  23 -24 मई को यू जी सी का निरीक्षण दल विश्वविद्यालय के 12 (बी) के   निरीक्षण  हेतु आ रहा है | यूजीसी का 12( वीं) के  नियम  है कि किसी भी विश्वविद्यालय में जब यूटीडी का संचालन 3 वर्ष पूर्ण

 कर लेता है  तब उसका निरीक्षण किया जाता है | यह नियम कई सवाल खड़े करता है कि जब महविद्यालय  संविलयन 27 सितम्बर 2021 को किया गया , उसके बाद विश्वविद्यालय में कार्य की सभी विभागों को वरिष्ठता अनुसार विभाग अध्यक्ष तथा टीम बनाकर यूटीडी विभागों का संचालन शुरू  किया| इस आधार पर तो यू टी डी के संचालन को मात्र ८ माह ही हुए हैं | फिर ये तीन साल की रिपोर्ट किस आधार पर देंगे | ये भी दिलचस्प है कि   फरवरी 2021 में  उच्च शिक्षा मंत्री मोहन यादव ने विश्वविद्यालय  में पांच विषयों मे स्नातकोत्तर  यूटीडी कक्षाओं का उद्घाटन किया था | जिसमे 25_25 छात्रों  को प्रवेश दिया गया था | विश्व विश्वविद्यालय में 6 माह पूर्व ही  यूटीडी विभाग एवं संकाय के डीन बनाए गए हैं |

  यहां यह भी दिलचस्प है कि  16 मार्च  2022 को  विश्वविद्यालय ने जब  अपना प्रथम दीक्षांत समारोह आयोजित किया  था , उस समय महाराजा ऑटोनॉमस कॉलेज के मेरिट वाले छात्रों को उसमें शामिल नहीं किया गया था | कहा गया था  इनकी अंकसूची और छात्र यूटीडी  के नहीं हैं |  जबकि  संभाग के सभी कालेजों के स्नातकोत्तर कक्षाओं के मेरिट चार वाले छात्रों को राज्यपाल तथा उच्च शिक्षा मंत्री ने  गोल्ड मेडल तथा डिग्री प्रदान की थी | अब वही  कुलपति महोदय  सभी कालेज के विभागों के पिछले 3 वर्षों के परीक्षा परिणाम अकादमी की उपलब्धियां जिसमें सेमिनार, बेविनार , स्पोर्ट्स ,एनसीसी, एनएसएस की उपलब्धियों को 12वीं के प्रोफार्मा में भरकर जानकारी  मांग रहे हैं |

               16 मार्च 2022 को छतरपुर के महराजा छत्रशाल बुंदेलखंड विश्व विद्यालय का  प्रथम दीक्षांत समारोह आयोजित हुआ समारोह में  कुलाधिपति और मध्य प्रदेश के राजयपाल मंगू भाई पटेल ने कहा था कि  विश्वविद्यालय की पहचान भवन भौतिक संसाधन से नहीं होती,, बल्कि वहां के संस्कारित छात्रों और शिक्षक से होती है |  शायद प्रदेश के कुलाधिपति और महामहिम राज्यपाल का यह ज्ञान छात्रों के लिए था  गुरु जी के लिए नहीं था |  

28 अप्रैल, 2022

Tempel_Varship_ पुरातत्व संरक्षित मंदिर- दक्षिण भारत में पूजन उत्तर भारत में प्रदर्शन

 









पुरातत्व  संरक्षित मंदिर 

दक्षिण भारत में पूजन उत्तर भारत में प्रदर्शन 

रवीन्द्र व्यास 

पुरातत्व संरक्षित मंदिरों में पूजा की  अगर बात करें तो अजब स्थितियां देखने को मिलती हैं | जहां दक्षिण भारत के अधिकाँश मंदिरों में पूजा और धार्मिक कार्यक्रम होते हैं वहीँ उत्तर भारत के पुरातत्व विभाग के आधीन  अधिकाँश मंदिर सिर्फ प्रदर्शन के लिए ही हैं | इन मंदिरों में किसी भी तरह के धार्मिक कार्य अथवा पूजा करने की अनुमति भारत सरकार प्रदान नहीं करती | बुंदेलखंड के प्रमुख गढ़ खजुराहो के  ही  मंदिरों में पूजा नहीं होती | 


   खजुराहो के प्रमुख गाइड प सुधीर शर्मा कहते हैं कि  भारत के मंदिरों मे जो प्रथा सरकार द्वारा चलाई जा रही है वाह मात्र एक प्रदर्शन बनकर रह गई है | जो कि हमारी सनातन धर्म कि प्रार्थओं के विपरीत है | वे बताते हैं कि  विगत वर्षों में  खजुराहो दर्शन पर  आए आध्यात्मिक संत  देव प्रभकार शास्त्री जी,  कथा वाचक पंडित धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री ,  मन्नत महाराज जी, जैन आचार्य श्री विद्यासागर जी , ऋतंभरा जी ने भी इस बात पर हमेशा जोर दिया कि  हमारे धार्मिक मंदिरों में प्रदर्शन नहीं दर्शन होना चाहिए ||  लोगों को भ्रमण करने के लिए टिकट लेना भी वे  अनुचित मानते

 हैं |



                                 जबकि इसके ठीक विपरीत पुरातत्व विभाग से संरक्षित  दक्षिण भारत के सभी मंदिरों में नियमित पूजन , धार्मिक कार्यक्रम ,  भजन एवं प्रसाद वितरण का कार्यक्रम होता है | दक्षिण भारत के इन मंदिरों में हो रहे धार्मिक कार्यक्रमों के सुखद परिणाम भी देखने को मिले हैं | इन मंदिरों के कारण सैकड़ों लोगों के परिवार का भरण पोषण होता है रोजगार का सृजन होता है | मंदिरों में चढ़ोत्री से होने वाली आय से कई चेरिटेबिल हॉस्पिटल और शिक्षा सस्थान संचालित होते हैं | साथ इसका व्यापक असर समाज के साथ साथ यहां आने वाले देशी विदेशी सैलानियों पर भी देखने को मिलता है | ये एक तरह से भारतीय संस्कृति के प्रचार प्रसार के महत्वपूर्ण स्थल होते हैं |  


                  उत्तर भारत के प्रमुख पर्यटन क्षेत्र में शामिल खजुराहो के ही २६ में से २१ मंदिरों में पूजा की अनुमति नहीं है | मात्र मतंगेश्वर मंदिर , हनुमान मंदिर और जैन मंदिरों में लोग भक्ति पूजन कर सकते हैं |  पुरातत्व विभाग के जानकारों की माने तो इसके पीछे एक बड़ी वजह है | वे बताते हैं कि मुगलों के आक्रमण सबसे ज्यादा उत्तर भारत में हुए , सबसे ज्यादा मंदिरों को क्षत विक्षत उन्होंने ही किया | ऐसे में उत्तर भारत के अधिकाँश  मदिर या तो नष्ट हो गए या वीरान हो गए | अंग्रेजों के शासन काल में 1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की स्थापना हुई थी  | स्थापना के बाद पुरातत्व महत्त्व के स्मारकों को पहले सूचि बद्ध  किया गया , बाद में एक एक्ट के माध्यम से इन स्मारकों को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया | १आजादि के बाद १९५८ में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने एक्ट में संसोधन वगैरह किये |


                  जब मंदिर वगैरह संरक्षित घोषित किये गए उस समय दो श्रेणियों में इनको विभक्त किया गया एक वे मंदिर थे जहां पूजा वगैरह होती थी उन्हें जीवंत श्रेणी में रखा गया , दूसरी तरफ वे मंदिर थे जहां पूजा नहीं होती थी उन्हें निर्जीव  श्रेणी में रखा गया | इसमें दिलचस्प ये है की जीवंत श्रेणी के अधिकांश मंदिर दक्षिण भारत में थे जब की निर्जीव श्रेणी के अधिकांश मंदिर उत्तर भारत के थे | खजुराहो के ही मंदिरों के बारे में यह स्पष्ट किया गया ,कि खजुराहो के मंदिर जब ए एस आई को ट्रांसफर हुए उस समय यहां के राजा ने जिन मंदिरो में पूजा होने की जानकारी दी थी उनमे आज भी पूजा होती है ,| जिनमे मतंगेश्वर मंदिर , हनुमान मंदिर और नवदुर्गा के समय जगदम्बिका मंदिर में पूजा की बात कही थी | इसी हिसाब से मंदिरों का गजट नोटिफिकेशन हुआ था | अब अगर पूजा और धार्मिक कार्यक्रम करने की बात कही जाती है तो, यह एक संवैधानिक मुद्दा हो जाएगा  इसके लिए  संसद से ही संसोधन हो सकता है |         

                    दक्षिण भारत के मंदिर मुग़ल आक्रांताओं से सुरक्षित रखने में वहां के समाज का भी एक बड़ा योगदान माना जाता है | इसी के चलते दक्षिण भारत के मंदिरों में निरंतर पूजन और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन चलता रहा , जो आज भी निरंतर जारी है |  इसके अलावा मंदिरों की आर्थिक समृद्धि में समाज का भी एक बड़ा योगदान रहा , वहां के लोग अपनी लाभांश आय का दशांस इन देवालयों में दान कर अपने को भाग्यवान मानते हैं | ससर्थीक रूप से समृद्ध दक्षिण भारत के मंदिर सिर्फ समाज से लेना भर नहीं जानते बल्कि समाज को लौटाना भी जानते हैं , इनमे से कई मंदिरों के अपने शैक्षणिक संस्थान और चिकित्सालय भी हैं | 


                      दरअसल पुरातत्व महत्व के संरक्षित मंदिरों में पूजा को लेकर मांग ने तब जोर पकड़ा जब उमा भारती ने रायसेन जिले पुरातत्व धरोहर सोमेश्वर मंदिर में पूजा की अनुमति मांगी | जब उन्हें इसकी अनुमति नहीं मिली तो उन्होंने द्वार के बाहर से ही पूजन किया और अन्न त्याग की घोषणा कर दी | उनकी इस मांग के बाद से खजुराहो में यह मांग जोर पकड़ने लगी है कि यहाँ के मंदिरों में पूजन की अनुमति मिले |      


Political_bangal _election_बंगाल का फैसला: सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, राजनीतिक चेतावनी भी

  बंगाल का फैसला: सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं , राजनीतिक चेतावनी भी रवीन्द्र व्यास  पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों ने भारतीय राजनीति को एक ब...